रेलवे अधिकारियों को लैप- टाप देने जा रही है.


भारतीय रेलवे इस समय बम-बम है. अपने को स्वर्णिम युग में पा रही है. भारतीय अर्थ व्यवस्था के ८-९ प्रतिशत के उछाल के समय को बखूबी भुनाया जा रहा है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इसके टर्न एराउण्ड को देख कर बहुतों ने खीसें निपोर दी हैं; जो कल तक इसका मर्सिया पढ़ने की तैयारी कर रहे थे. हमारे अधिकारी वर्ग में भी अनेक थे जो इस बात से परेशान थे कि रिटायर होने पर पेंशन मिल पायेगी भी या नहीं. अब सभी “हम हो गये कामयाब” का गीत गा रहे हैं.

रेलवे अब अपने कनिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड व ऊपर के अधिकारियों को लैपटाप दे रही है. रु. ५०-५५ हजार में ठीक ठाक मशीन आ जायेगी. कुछ लोग अपनी क्षमता में निश्चय ही वृद्धि कर पायेंगे. कुछ उस दिशा में अग्रसर होंगे. पर अधिकांश की स्थिति में बहुत अंतर आने वाला नहीं लगता. मुझे बिजनेस-वीक में छपे लेख की याद आ रही है जो परसों उनके न्यूजलैटर में मेरे पास आया था. इस लेख में है कि जापान और दक्षिण कोरिया में विश्वस्तरीय आईटी नेटवर्क के बावजूद वहां के कर्मी अपनी कुर्सियों से बंधे बैठे हैं. कारण बताया गया है कि वहां वातावरण कंजरवेटिव है. हमारे यहां भी स्थिति वैसी ही है.

हमारे यहां अफसर कमरे में बैठते हैं. चपरासी बाहर बैठ कर कमरे से आने-जाने वाले ट्रैफिक का प्रबंधन करता है. निर्णय ईमेल से नहीं फाइल पर नोटिंग और करस्पॉण्डेन्स साइड पर १०-१० पन्ने व दर्जनों दस्तखत के बाद होते हैं. दफ्तर में काम के आधार पर नहीं, समय से उपस्थिति के आधार पर कार्यकुशलता को मापा जाता है. ऐसे में लैपटाप बहुत अंतर डाल पायेगा – क्या मालूम. लैपटाप केवल एक औजार है. यह मानसिकता तभी बदल सकता है, जब लोगों में रचनात्मकता हो. सीमायें तोड़ने का जज्बा हो.

एक चमत्कार रेलवे ने कर दिखाया है. राकेश मोहन कमेटी की हाइपोथिसिस कूडे़ के हवाले हो गयी है. लैपटाप सामन्ती मानसिकता में कुछ बदलाव ले आये – यह देखना रोचक होगा.