किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार और मधुकर उपाध्याय



मधुकर उपाध्याय द्वारा लिखी किस्सा पांड़े सीताराम सूबेदार,सारांश प्रकाशन द्वारा सन 1999 में प्रकाशित।

बहुत पहले जब बीबीसी सुना करता था, मधुकर उपाध्याय अत्यंत प्रिय आवाज हुआ करती थी. फिर उनकी किताब किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार की समीक्षा वर्ष २००० मे रतलाम में पढी। समीक्षा इतनी रोचक लगी कि वह पुस्तक दिल्ली से फ्रंटियर मेल के कंडक्टर से मंगवाई।

पहले बात मधुकर जी की कर ली जाये। मधुकर जी से मैं व्यक्तिगत रुप से जान-पहचान नहीं रखता हूँ। उनको बीबीसी पर सुनता था,वही परिचय है। उनकी आवाज अत्यन्त मधुर है। बीबीसी सुनना बंद हो गया तो उनसे भी कट गया। उनके बीबीसी पर भारतीय स्वातंत्र्य के १५० वर्ष होने पर धारावाहिक शृंखला में बोलने और उनकी दांडी यात्रा पुन: करने के विषय में काफी सामग्री मैंने अखबार से काट कर रखी थी, जो अब इधर- उधर हो गयी है।

वर्ष २००३-०४ मे उन्हें टीवी चैनल पर समाचार पत्रों की समीक्षा में कई बार देखा था। उनके व्यक्तित्व में ओढ़ी दार्शनिकता या छद्म-बौद्धिकता के दर्शन नही हुये, जो आम पढ़े-लिखे (और सफ़ल?) भारतीय का चरित्र है। फिर पता चला कि मधुकर लोकमत समाचार के ग्रुप एडीटर हो गए हैं। अभी व्हिस्पर न्यूज़ में था कि वहाँ से त्यागपत्र दे दिया है। पता नही सच है या नही। अखबारों में जो बाजार हथियाने की स्पर्द्धा चला रही है, वहा निश्चय ही तनाव देने वाली रही होगी। खैर, पुस्तक पर छपे के अनुसार वे मेरे समवयस्क होंगे। अगर ईश्वर अपना मित्र चुनने की आजादी देते हों तो मैं मधुकर उपाध्याय को चुनना चाहूँगा। Continue reading “किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार और मधुकर उपाध्याय”