सुबोध पाण्डे की याद


सुबोध पाण्डे मेरे सीनियर थे रेल सेवा में. जब मैने रेलवे ज्वाइन की, तब वे पश्चिम रेलवे में मुम्बई मण्डल के वरिष्ठ परिचालन अधीक्षक थे. बाद में विभिन्न पदों पर वे मेरे अधिकारी रहे.

मैं यहां उनके सनिध्य को बतौर रेल अधिकारी याद नहीं कर रहा. रिटायरमेण्ट के बाद वे अभी कहां पर हैं, यह भी मुझे पता नहीं. उन्हें एक अच्छे व्यक्ति के रूप में स्मरण कर रहा हूं. उनसे मै रेलवे के इतर अनेक प्रकार के मामलों पर बात कर लेता था. वे एक प्रतिभावान परिवार से थे. उनके बड़े भाई श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय भारत के कैबिनेट सेक्रेटरी रह चुके थे जो कालांतर में बिहार और अरुणांचल के राज्यपाल रहे. अपने बड़े भाई की तरह सुबोध भी विस्तृत ज्ञान के व्यक्ति थे. मैं जो भी पुस्तक उनसे चर्चा के लिये उठाता था वह उन्होने या तो पहले ही पढ़ी होती थी या उसकी विषयवस्तु से वे अपने अध्यन की गहराई के माध्यम से काफी परिचित होते थे. मुझे एक बार लगा कि मैं शायद इन्टरनेट के बारे में उनसे बेहतर परिचय रखता हूं और उसपर अगर बात करूं तो मैं हमेशा की तरह उनसे जानकारी लेने की बजाय इसबार उन्हे कुछ बता सकूंगा. मेरा सोचना नितांत गलत निकला. बात प्रारम्भ की ही थी कि उन्होनें मुझे उनके प्रिय विषय इतिहास पर दर्जनों साइट बता ड़ालीं इस आग्रह के साथ कि मैं उन्हे अवश्य देखूं. मैं अपने ही लासे में फंस गया!

Subodh Pande is a person with knowledge spread in varied fields. History was his pet. But you could discuss Big Bang theory with equal ease with him. He used to ask me to send dry Neem leaves to him to Bombay because he had vast collection of books. To save books from worms in humid Bombay climate he wanted to make layers of Neem leaves before placing them. He had sound knowledge of Astrology too, though he never flashed his knowledge.

It is not easy to find such people in daily life so near and so interactive with you!

एक समय सुबोध मेरे मण्डल रेल प्रबन्धक थे कोटा में. मैं वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक था. रेलगाड़ी परिचालन की व्यस्तता से 11 बजे तक निवृत्त होता था. सवा इग्यारह बजे उनका फोन आता था चले आओ. मुझे उनके ज्ञान वर्धक प्रवचन की तलब होती थी और उन्हे शायद एक ट्यूंड-फ्रीक्वेंसी वाले शिष्य की! मै उनके पास जाते समय उनकी दो-तीन नोटिंग्स वाली फाइलें साथ ले जाता था. उनकी हस्तलिपि इतनी खराब थी कि उन्ही से पूछना पड़ता था कि उन्होने क्या लिखा है. कई बार तो अपनी हैण्डराइटिंग से वे स्वयम जूझते थे और हार कर नयी नोटिंग लिखते थे. उनके साथ मैने कोटा के अनेक म्यूजियम, पुरानी पुस्तकों के संग्रह, बून्दी की हवेलियां आदि देखे जो शायद अकेले मैं कभी न देख पाता. अंग्रेजों की कब्रों पर उन्होने बड़ा अध्ययन किया था. उनके इंक्रिप्शंस से वे यह जानने का यत्न करते थे कि विभिन्न समय पर किस-किस प्रकार के अंग्रेज भारत में थे.

गजब के जुनून वाले आदमी थे सुबोध. मैं सोचता हूं कि अब भी उनमें वही इंक्विजिटिव मनुष्य जिन्दा होगा. अभी वे 65 वर्ष के होंगे.

इतना विशद अध्ययन, इतने सरल और जीवन में उत्साह से भरे सुबोध पाण्डे वे कई अर्थों में मेरे रोल माडल हैं.

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