लेखक और ब्लॉगर में फर्क जाना जाये


पता नहीं स्कूल के दिनों में कैसे मुझे गलतफहमी थी कि हिन्दी मुझे बहुत अच्छी आती है बस, मेरे मन में फितूर आ गया था लेखक बनने का. जिसे मेरे पिता ने कस के धोया. उनके अनुसार अगर प्रोफेशनल डिग्री हासिल कर ली तो कम से कम रोटी-पानी का जुगाड़ हो जायेगा.

मैने भी वही किया और मैं अपने को बेहतर अवस्था में पाता हूं. वर्ना हरिवंशराय बच्चन जैसी सोशल नेटवर्किंग तो कर नहीं पाता. निराला जैसा बनने की क्षमता न होती और बनता तो भी फटेहाल रहता. हिन्दी में बीए/एमए कर कई साल सिविल सेवा परीक्षा में बैठता और अंतत: किराने की दुकान या क्लर्की करता.

इस लिये जब सत्येन्द प्रसाद श्रीवास्तव जी ने ब्लॉगर को लेखक कहा तो मैं अपने को बागी महसूस करने लगा.

लेखक और ब्लॉगर में मूल भूत अंतर स्पष्ट करने को हम मान सकते हैं कि लेखक मूर्तिकार की तरह है. वह एक अच्छी क्वालिटी का पत्थर चुनता है. अच्छे औजार लेता है और फिर परफेक्शन की सीमा तक मूर्ति बनाने का यत्न करता है. ब्लॉगर तलाशता है कोई भी पत्थर सैण्ड स्टोन/चाक भी चलेगा. न मिले तो पेड़ की सूखी जड़/पत्ती/कबाड़/या इनके कॉम्बीनेशन जिसे वह फैवीकोल से जोड़ ले वह भी चलेंगे. इन सब से वह प्रेजेण्ट करने योग्य वस्तु बना कर ब्लॉग पर टांग देगा. वह भी न हो पाये तो वह किसी पत्थर को पटक कर अपना सौभाग्य तलाशेगा कि पटकने से कोई शेप आ जाये और आज की ब्लॉग पोस्ट बन जाये. यह व्यक्ति लेखक की तुलना में कम क्रियेटिव नहीं है और किसी भी लेखक की अभिजात्यता को ठेंगे पर रखता है.

ब्लॉगर के दृष्टांत देता हूं. सवेरे मॉर्निंग वाक करते मैने नीलगाय की फोटो मोबाइल के कैमरे से उतारी थी और 25 मिनट फ्लैट में ब्लूटूथ से फोटो कम्प्यूटर में डाउनलोड कर, पोस्ट लिख कर और वह फोटो चिपका कर पोस्ट कर चुका था इंटरनेट पर. उसके बाद वह पोस्ट भले ही एडिट की थी दिन में, पर ब्लॉगरी का रैपीडेक्स काम तो कर ही दिया था. कौन लेखक इस तरह का काम करेगा? चाहे जितना बोल्ड या डेयरिंग हो; पच्चीस मिनट तक तो वह मूड बनाता रहेगा कि कुछ लिखना है! फिर फोटो खींचना, डाउनलोड करना, चिपकाना यह सब तो 4-इन-1 काम हो गया !!

इसी तरह मैने अपनी पिछली ओधान कलेन पर लिखी पोस्ट आनन फानन में चिपकाई थी. बस उस बन्दे का काम पसन्द आ गया था और मन था कि बाकी जनता देखे.

मिर्ची सेठ की देखो भैया पैसा ऐसे बनता है और हवा से चलती गाड़ी मुझे बहुत पसन्द आईं. इनमें कौन सा लेखकत्व है जरा देखें. पिद्दी-पिद्दी से साइज़ वाले लेखन की, फोटो लगी पोस्टें है ये.

कई लोग ब्लॉगरी में इसी तरह लठ्ठ मार काम कर रहे हैं. यह बड़ा इम्पल्सिव होता है. कई बार थूक कर चाटने की अवस्था भी आ सकती है. पर जब आप मंज जायें तो वैसा सामान्यत: नही होता. और आप उत्तरोत्तर कॉंफीडेंस गेन करते जाते हैं.

श्रीवास्तव जी, आपको मेरे कहने में कुछ सब्स्टेंस लग रहा है या नहीं? अगर आप लेखक हैं तो शायद यह कूड़ा लगेगा वैसे भी काकेश का कहना है (?) कि यहां चिठेरी में 75% कूड़ा है!

(इसी कूड़े के बाजू में कृष्ण जी को बिठा दिया है!)

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