उत्तर – रमानाथ अवस्थी की एक कविता का अंश



कविता हर एक के बस की बात नहीं है. मैं जो कुछ बनना चाहता था और नहीं बन पाया – उसमें काव्य लेखन भी एक आयाम है. इसलिये दूसरों की कविता से मन रमाना पड़ता है. रमानाथ अवस्थी की कविता/गीत मुझे बहुत प्रिय हैं.

समय के विविध रंग देखते देखते समय से एक अजीब सम्मोहन हो गया है. यह कब सुखद हो जाता है और कब कष्टकर – समझ नहीं आता. और बहुत सी ऊर्जा सुखद समय को लम्बा खींचने, दुखद को पलटने तथा दोनो का अंतर समझ समय को उत्तर देने में व्यतीत होती है.

आप फिलहाल इस विषय में अवस्थी जी की कविता के अंश देखें.

सवाल समय करेगा, उत्तर देना होगा!

आसानी से समय किसी को नहीं छोड़ता,
खामोशी के साथ एक दिन हमें तोड़ता,
कभी समय के सागर की कोई चाह नहीं,
और कभी यह करता कोई परवाह नहीं!
बुरे समय को सब-कुछ चना-चबेना होगा!

समय हुआ नाराज राम को वन में भेजा
और भरत को पूरा-पूरा राज सहेजा!
समय कभी देवता कभी दानव लगता है,
जो है नहीं सचेत उन्ही को यह ठगता है!
वह क्षण ही सच जब तू निरा अकेला होगा!

मार समय की बहुत बुरी होती है यारों,
अपने कर्मों से ही खुद को यहां संवारो!
पानी में जो डूब रहा है उसे निहारो,
अपनी जान लगा कर उसकी जान उबारो!
बालू में भी हमको नौका खेना होगा!
समय सवाल करेगा उत्तर देना होगा!


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