सुरियांवां, देवीचरण, टाई और नमकीन!



देवी चरण उपाध्याय तो उम्मीद से ज्यादा रोचक चरित्र निकले! कल की पोस्ट पर बोधिसत्व जी ने जो देवीचरण उपाध्याय पर टिप्पणी की, और उसको ले कर हमने जो तहकीकात की; उससे इस पोस्ट का (हमारे हिसाब से रोचक) मसाला निकल आया है.
कल अनूप सुकुल जी की पोस्ट पर वर्षा के बारे में निराशा के साथ टिपेरा तो शाम को वह पूरे रंग समेत चढ़ दौड़ी. दफ्तर से घर आने में भीषण तेज वर्षा में ड्राइवर के और मेरे पसीने छूट गये. रास्ता दीख नहीं रहा था. सड़क पर टखने के ऊपर पानी था. घर में आने पर बिजली नहीं. घर के पीछे गंगा नदी थोड़ी दूर पर हैं. मूसलाधार बरिश से गंगा के किनारे रहने वाले सियारों की मान्दों में पानी भर गया था. सो बाहर निकल कर खूब हुआं-हुआं कर रहे थे. बिजली न हो, तेज हवा और वर्षा हो और सियारों का समूह गान हो तो क्या समा बन्धता है!
कल शाम से बिजली न होने से आज फिर इंक-ब्लॉगिंग का ही सहारा है.
वैसे पिछली पोस्ट पर आप सब ने इतनी बढ़िया टिप्पणियां की हैं कि मैने उनका टिप्पणी में वनलाइनर जवाब भी देना उचित समझा. उतने में लैपटॉप की बैटरी खतम.
खैर, अब इंक में मेरी मारी हुई मख्खियाँ देखें.
devicharan


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सुरियांवां के देवीचरण उपाध्याय के रेल टिकट



देवीचरण उपाध्याय सुरियांवां के थे. बोधिस्त्व के ब्लॉग में सुरियांवां का नाम पढ़ा तो उनकी याद आ गयी. मैं देवीचरण उपाध्याय से कभी नहीं मिला. मेरी ससुराल में आते-जाते थे. वहीं से उनके विषय में सुना है.

जो इस क्षेत्र को नहीं जानते उन्हे बता दूं – इलाहाबाद से रेल लाइन जाती है बनारस. वह सुरियांवां के रास्ते जाती है. ज्ञानपुर, औराई उसके पास हैं. जिला है भदोही. ये स्थान पहले बनारस के अंतर्गत आते थे. मेरा ससुराल है औराई के पास.

देवीचरण उपाध्याय मेरी ससुराल पँहुचते थे और दरवाजे पर घोषणा करते थे – “हम; देवीचरण!”

मेरी सास कहती थीं – “लो; आ गये. अब भोजन बनाओ!” भोजन बनता था वैसे मेहमान के लिये जो रुकने वाले हों और प्रतिष्ठित हों. देवीचरण उपाध्याय मेरे श्वसुरजी के फुफेरे भाई थे. उनसे उम्रमें काफी बड़े. अक्सर आते-जाते रहते थे. ज्यादातर यात्रा रेल से करते थे.

खास बात यह थी; और जिस कारण से यह पोस्ट लिखी जा रही है; वे कभी रेल टिकट नहीं लेते थे. साथ में पीले पड़ चुके पुराने कागजों का पुलिन्दा ले कर चलते थे. कोई टीटीई अगर अपने दुर्भाग्य से उनसे टिकट पूछ बैठता था तो वे कागजों का पुलिंदा खोल लेते थे. वे कागज रेलवे लाइन बिछाने के लिये किये गये जमीन के अधिग्रहण से सम्बन्धित थे. एक एक कागज पर पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन की तरह वे बताने लगते – कौन सी उनकी जमीन रेलवे ने कौड़ियों के भाव किस तरह अधिग्रहीत की थी. उन्होने कौन सा प्रतिवेदन किसे दिया था जिसका सरकार ने संतोषजनक निपटारा कभी नहीं किया. इस प्रकार सरकार ने उन्हे कितने का चूना लगाया था. इस प्रेजेण्टेशन के बाद पंचलाइन – आखिर वह टीटीई किस मुह से उनसे टिकट मांग रहा है?

टीटीई अगर अकलमन्द होता था तो पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन प्रारम्भ होते ही बैक-ट्रैक कर खिसक लेता था. नहीं तो पूरा पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन ग्रहण कर के जाता था. टिकट तो देवीचरण उपाध्याय को न लेना था न कभी लिया! टिकट न लेना तो देवीचरण उपाध्याय जी के एण्टी-एस्टेब्लिशमेण्ट होने का प्रमुख प्रतीक था.

टीटीई ही नहीं, अफसर और मेजिस्ट्रेट चेकिंग को भी देवीचरण उपाध्याय जी ने पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन के माध्यम से ही निपटाया था. न कभी जेल गये, न जुर्माना दिया न टिकट खरीदा.

मैं इस पोस्ट के माध्यम से टिकट न लेने की प्रवृत्ति को उचित नहीं बता रहा. मैं सरकार की अधिग्रहण नीति पर भी टिप्पणी नहीं कर रहा. मैं तो केवल सुरियांवां, देवीचरण उपाध्याय और उनकी खुद्दारी की बात भर कर रहा हूं. देवीचरण उपाध्याय अब दुनियाँ में नहीं हैं. पर सुरियांवां का नाम आया तो याद हो आई.

अभी डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर – जो बड़ा महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट है रेलवे के लिये; और जिसके लिये बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण होगा; कितने देवीचरण उपाध्याय पैदा करेगा? या इस प्रकार के चरित्र पैदा भी होंगे या नहीं – पता नहीं.


शांती की पोस्ट पर मेरे माता-पिताजी का लगाव



कल मैने शांती पर एक पोस्ट पब्लिश की थी. कुछ पाठकों ने ब्लॉगरी का सही उपयोग बताया अपनी टिप्पणियों में. मैं आपको यह बता दूं कि सामान्यत: मेरे माता-पिताजी को मेरी ब्लॉगरी से खास लेना-देना नहीं होता. पर शांती की पोस्ट पर तो उनका लगाव और उत्तेजना देखने काबिल थी. शांती उनके सुख-दुख की एक दशक से अधिक की साझीदार है. अत: उनका जुड़ाव समझमें आता है.
कल मेरे घर में बिजली 14 घण्टे बन्द रही. अत: कुछ की-बोर्ड पर नहीं लिख पाया. मैने कागज पर अपने माता-पिता का इंवाल्वमेण्ट दर्ज किया है, वह आपके समक्ष रख रहा हूं.

SHANTI FOLLOWUP


समाज में तरक्की तो है – नेवस्टी गया है मोनू



शांती मेरे घर में बरतन-पोंछा करने आती है. जाति से पासी. नेतृत्व के गुण तलाशने हों तो किसी कॉरपोरेट के सीईओ को झांकने की जरूरत नहीं, शांती में बहुत मिलेंगे. एक पूरी तरह अभावग्रस्त परिवार को अपने समाज में हैसियत वाला बना दिया है. हाड़तोड़ मेहनत करने वाली. कभी-कभी सवेरे 4-5 बजे आ जाती है. मेरी मां से कहती है जब्बै मुरगा बोला, उठि गये. का करी, सोचा कामै पर चली. करीब 12-15 घरों में काम करती है. कुल 2500-3000 तक कमाती है. पैसा बचाना, बच्चों को पढ़ाना, सरकार की किस स्कीम से क्या लाभ मिल सकता है यह जानकारी रखना, नगरपालिका और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा काम करा लेना, जरूरत पड़े तो 25-50 रुपये दक्षिणा देकर काम करा लेना यह सब शांती को आता है. बाकी बिरादरी के लोग मड़ई में रहते हों, पर शांती ने तीन कमरे का पक्का मकान बना लिया है.

पढ़ी-लिखी नहीं है शांती. सो शब्द उसके अपने गढ़े हैं. अनुसूचित जाति को कहती है सुस्ती जाति. सुस्ती जाति के वैधानिक लाभ और राजनैतिक दाव-पेंच समझती है. अपने वोट की कीमत भी जानती है वह. उसकी बड़ी लड़की बी.ए. तक पढ़-लिख कर शिक्षामित्र बन गयी है. शांती शिक्षामित्र नहीं कह पाती. कहती है छिच्छामित्र. छिच्छामित्र बन जाने से बिरादरी में शांती का दबदबा बढ़ गया है.

बच्चे अच्छे से पाले हैं शांती ने. छोटी लड़की कभी-कभी शांती की बजाय बरतन-पोंछा करने आती है. वह अपनी मां की तरह टांय-टांय नहीं बोलती. मधुर स्वर में बोलती है अंकलजी नमस्ते, आण्टी जी नमस्ते. मैनेरिज्म अभिजात्य हो गये हैं. बच्चों में आकांक्षायें भी शायद श्रमिक वर्ग से परिवर्तित हो मध्यम वर्ग की हो गयी हैं. यह सामाजिक तरक्की है.

शांती का पति लल्लू है. नाम है रंगी. रंगीलाल पन्नी का शौकीन है. पर शांती उसे धेला नहीं देती पीने को. अपना जो कमाता है, उसी में कपट कर पीता है. अन्यथा शांती उससे सारी कमाई ले लेती है. गंगा के कछार में अवैध शराब बनती है. एक दिन रंगी वहीं पी रहा था कि पुलीस की रेड पड़ी. रंगी दो दिन तक भागता फिरा. पुलीस उसे ढ़ूंढ़ नहीं रही थी, फिर भी, केवल डर के मारे भागता रहा. बड़ी मुश्किल से शांती ढ़ूंढ़ कर वापस ला पायी. कभी-कभी रंगी पिनक में रहता है और 3-4 दिन काम पर नहीं जाता. तब शांती भोजन बनाना बन्द कर देती है. रंगी को लाई-चना पर उतार देती है तो झख मार कर काम पर जाता है. मेरे पिता जी बिलानागा रंगी का हाल पूछते हैं रंगी पन्नी पर है कि काम पर? शांती हंस कर जवाब देती है नाहीं बाबू, काम पर ग हयें.

आज मेरी मां से शांती अपने से बताने लगी – अम्मा मोनू कालि नेवस्टी ग रहा.

यह नेवस्टी क्या है? मुझे कुछ देर बाद समझ आया. उसका लड़का स्कूली पढ़ाई पूरी कर कल यूनिवर्सिटी में भरती होने गया था आगे की पढ़ाई के लिये.

एक ही पीढ़ी का अंतर – मां अनपढ़, बाप पियक्कड़. लड़की छिच्छामित्र. लड़का नेवस्टी जा रहा है.

मित्रों, भारत की तस्वीर बदलती दिख रही है न! मुझे भविष्य पर भरोसा हो रहा है.


मुद्राष्टाध्यायी नामक ग्रंथ रचने की गुहार



शिव कुमार मिश्र ने एसएमएस कर नये पर सशक्त शब्द मुद्राभिषेक से परिचय कराया है. रुद्राष्टाध्यायी के आधार पर रुद्राभिषेक किया जाता है. भगवान शिव का शुक्लयजुर्वेदीय पूजन है यह. पर मुद्राभिषेक क्या है?

उन्होने लिखा है कि अमुक सज्जन थे. हर वर्ष रुद्राभिषेक कराते थे श्रावण मास में. एक बार यह अनुष्ठान करने के पहले ही उनके यहां कर चोरी के कारण छापा पड़ गया. अनुष्ठान टाल दिया गया. अलग प्रकार के पुरोहितों का इंतजाम कर मुद्राभिषेक का विशेष अनुष्ठान महामुद्राभिषेक कराया गया. ग्रह शांति हुई. कृपा की वर्षा हुई. मुद्राभिषेक फलदायी हुआ. Continue reading “मुद्राष्टाध्यायी नामक ग्रंथ रचने की गुहार”

‘बना रहे बनारस’ – ये लो यूनुस लास्ट सुट्टा!



कल टिप्पणी में यूनुस छैलाइ गये. बना रहे बनारस का केवल झांकी दिखाना उन्हे एक सुट्टे के बाद बीड़ी छीन लेने जैसा लगा. अब पूरे 188 पेज की किताब पेश करना तो फुरसतिया सुकुल जैसे ही कर सकते हैं! फिर भी मैने अपनी पत्नी से विमर्श किया. वे बनारस की हैं. उनका विचार था कि यूनुस जैसे रेगुलर ग्राहक को नाराज नहीं करना चाहिये. पूरी किताब देख कर उन्होने ही सुझाव दिया कि ये लास्ट वाला सुट्टा पिला दो यूनुस को.

तो यूनुस कहीं बीड़ी का ब्राण्ड न बदल लें, उस के डर से बना रहे बनारस का यह अंतिम लेखांश प्रस्तुत है. यह उम्मीद है कि सभी को पसन्द आयेगा:


बना रहे बनारस
(श्री विश्वनाथ मुखर्जी) आजाद शहर

भारत को सन 1947 में आजादी मिली. अब हम आजाद हैं. आजादी का क्या उपयोग है, इसकी शिक्षा लेनी हो तो बनारस चले आइये. बनारसवाले सन 1947 से ही नहीं, अनादिकाल से अपने को आजाद मानते आ रहे हैं. इन्हे नयी व्यवस्था, नया कानून या नयी बात कत्तई पसन्द नहीं. इसके विरुद्ध ये हमेशा आवाज उठायेंगे. बनारस कितना गन्दा शहर है, इसकी आलोचना नेता, अतिथि और हर टाइप के लोग कर चुके हैं,पर यहां की नगरपालिका इतनी आजाद है कि इन बातों का ख्याल कम करती है. खास बनारस वाले भी सोचते हैं कि कौन जाये बेकार सरदर्द मोल लेने. हिन्दुस्तान में सर्वप्रथम हड़ताल 24 अगस्त सन 1790 ई. में बनारस में हुई थी और इस हड़ताल का कारण थी गन्दगी. सिर्फ इसी बात के लिये ही नहीं, सन 1809 ई. में जब प्रथम गृहकर लगाया गया, तब बनारसी लोग अपने घरों में ताला बन्दकर, मैदानों में जा बैठे. शारदा बिल, हिन्दू कोड बिल, हरिजन मन्दिर प्रवेश, गल्ले पर सेल टेक्स और गीता काण्ड आदि मामलों में सर्वप्रथम बनारस में हड़तालें और प्रदर्शन हुये हैं. कहने का मतलब हमेशा से आजाद रहे और उन्हे अपने जीवन में किसी की दखलन्दाजी पसन्द नहीं आती. यहां तक कि वेश-भूषा में परिवर्तन लाना पसन्द नहीं हुआ. आज भी यहां हर रंग के, हर ढ़ंग के व्यक्ति सड़कों पर चलते फिरते दिखाई देंगे. एक ओर तो ऊंट, बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी है तो दूसरी ओर मोटर, टेक्सी, लारी और फिटन हैं. एक ओर अद्धी तंजेब झाड़े लोग अदा से टहलते हैं तो दूसरी ओर खाली गमछा पहने दौड़ लगाते हैं.

आप कलकत्ता की सड़कों पर धोती के ऊपर बुशशर्ट पहने या कोट पैण्ट पहनकर पैरों में चप्पल पहनें तो लोग आपको इस प्रकार देखेंगे मानो आप सीधे रांची (पागलखाने) से चले आ रहे हैं. यही बात दिल्ली और बम्बई में भी है. वहां के कुली-कबाड़ी भी कोट-पैण्ट पहने इस तरह चलते हैं जैसे बनारस में आई.ई.आर. के स्टेशन मास्टर. यहां के कुछ दुकानदार ऐसे भी देखे गये हैं जो ताश, शतरंज या गोटी खेलने में मस्त रहते हैं. अगर उस समय कोई ग्राहक आ कर सौदा मांगता है तो वे बिगड़ जाते हैं. का लेब? केतन क लेब? का चाही? केतना चाही? इस तरह के सवाल करेंगे. अगर मुनाफेदार सौदा ग्राहक ने न मांगा, तबियत हुआ दिया, वर्ना माल रहते हुये वह कह देंगे नाहीं हव भाग जा. खुदा न खास्ता ग्राहक की नजर उस सामान पार पड़ गयी तो तो भी उस हालत में कह उठते हैं जा बाबा जा, हमके बेंचे के नाहीं हव.

है किसी शहर में ऐसा कोई दुकानदार? कभी-कभी वे झुंझलाकर माल का चौगुना दाम बता देते हैं. अगर ग्राहक ले लेता है तो वह ठगा जाता है और दूकानदार जट्टू की उपाधि मुफ्त में पा जाता है.

बनारस की सड़कों पर चलने की बड़ी आजादी है. सरकारी अफसर भले ही लाख चिल्लायें, पर कोई सुनता नहीं. जब जिधर से तबियत हुई चलते हैं. अगर किसी साधारण आदमी ने उन्हें छेड़ा तो तुरंत कह उठेंगे तोरे बाप क सड़क हव, हमार जेहर मन होई, तेहर से जाब, बड़ा आयल बाटै दाहिने बायें रस्ता बतावै. जब सरकारी अधिकारी यह कार्य करते हैं तब उन्हें भी कम परेशानियां नहीं होतीं. लाचारी में हार मान कर वे भी इस सत्कार्य से मुंह मोड़ लेते हैं.

सड़क पर घण्टों खड़े रह कर प्रेमालाप करना साधारण बात है, भले ही इसके लिये ट्रैफिक रुक जाये. जहां मन में आया लघु शंका करने बैठ जाते हैं, बेचारी पुलीस देखकर भी नहीं देखती. डबल सवारी, बिना बत्ती की साइकल चलाना और वर्षों तक नम्बर न लेना रोजमर्रे का काम है. यह सब देखते-देखते यहां के अफसरों का दिल पक गया है. पक क्या गया है, उसमें नासूर भी हो गया है. यही वजह है कि वे लोग साधारण जनता की परवाह कम करते हैं. परवाह उस समय करते हैं, जब ये सम्पादक नामधारी जीवाणु उनके पीछे हाथ धो कर पड़ जाते हैं. कहा गया है कि खुदा भी पत्रकारों से डरता है.

मतलब यह कि हिन्दुस्तान का असली रूप देखना हो तो काशी अवश्य देखें. बनारस को प्यार करने वाले कम हैं, उसके नाम पार डींग हांकने वाले अधिक हैं. सभ्यता-संस्कृति की दुहाई देकर आज भी बहुत लोग जीवित हैं, पर वे स्वयम क्या करते हैं यह बिना देखे नहीं समझा जा सकता. सबके अंत में यह कह देना आवश्यक समझता हूं कि बनारस बहुत अच्छा भी है और बहुत बुरा भी.


चलते चलते

1. कल बोधिसत्व का ब्लॉग देखा – विनय पत्रिका. उलटने-पलटने पर कॉम्प्लेक्सिया गया. अपने से कहा – मिस्टर ज्ञानदत्त इतनी बढ़िया हिन्दी तो तुम लिख पाने से रहे. लिहाजा अपने अंग्रेजी के शब्द ठेलने का क्रम ढ़ीला मत करो. भले ही चौपटस्वामी अंग्रेजी का पानी मिलाने पर कितना भी कहें.
2. चेले को बनारस में भेजा ‘बना रहे बनारस’ खरीदने. दुकान वाला बोला – छप रही है. महीना – डेढ़ महीना लगेगा आने में.