कर्ज लेते हैं पर लौटाते समय कोसते हैं बाजारवाद को!


बाजार है वह भग्वद्गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन पर नहीं चलता है. वह उपभोक्ता केन्द्रित होता है और पूंजी तथा वस्तुओं के विनिमय को सुविधजनक बनाता है. बैंक बाजार की एक महत्वपूर्ण इकाई है. बैंक वाले रेलवे स्टेशन के हॉकर की तरह चाय-चाय की रट जैसा बोल लोन बाटें तो लोग अच्छा महसूस करते हैं. उससे उनके उपभोग की कल्पनाओं को मूर्त करने के साधन सुलभ हो जाते हैं. पर उगाही के लिये बैंक टेढ़ी उंगली का प्रयोग करें तो वही लोग “नाश हो पूंजीवाद का” नारा लगाते हैं!

भैया, बैंक वाले ने धर्मादे के लिये सदाव्रत थोड़े ही खोल रखा है.

लोग बेइंतहा खर्च करें. कर्जा लेकर घी पियें. चारवाक को आधुनिक युग में री-इनवेण्ट करें वह ठीक. पर उनसे कोई कर्जा वापस मांगे तो वे बन जायें निरीह/दीन/गरीब और वापस मांगने वाला सूदखोर महाजन. यह प्रपंचवाद मैने भारतीय समाज में बहुत देखा है.

मैं पुराना अनुभव बताता हूं. एक मण्डल रेल प्रबन्धक जी के पास बैंक वाले पंहुचे. करीब 300 कर्मचारियों की लिस्ट दी; जिन्होने पर्सनल लोन ले कर वापस न करने का मन बना रखा था और लम्बे समय से डिफॉल्टर थे. एक रेल वाले ने सर्टीफाई किया था कि वे रेल कर्मी हैं और उनकी नियमित आय है. उसी आधार पर उन्हें लोन मिला था. मण्डल रेल प्रबन्धक ने अपने विवेक से तय किया कि कर्मचारियों का यह व्यवहार अशोभनीय है और रेल की छवि को धूमिल करता है. उन लोगों को चार्ज-शीट देने का निर्णय लिया – उनको अशोभनीय व्यवहार के लिये क्यों न नौकरी से निकाल दिया जाये? इस निर्णय के लेते ही बहुतों ने आनन-फानन में लोन वापस कर दिये. बाकियों ने किश्त भरनी प्रारम्भ कर दी.

एक दूसरा उदाहरण : एक चपरासी बहुत कर्जे में डूबा था – पठानी ब्याज के कर्ज में. उधारी की रकम बढ़ती ही जा रही थी. हम दो अधिकारियों नें, जिन्हे परोपकार का कीड़ा यदा-कदा काटता है, विचार विमर्श कर पाया कि हम दोनो मिलकर उसे ब्याज मुक्त लोन अगर दें और उसका पठानी ब्याज वाला कर्ज एक बार उतर जाये तो शायद उसकी गाड़ी पटरी पर आ जाये. पूरी गणना के बाद हमने उससे कहा कि हम उससे वायदा चाहेंगे कि वह तनख्वाह मिलने पर हमारी किश्त – जो मूल ऋण (मुक्त ब्याज) की होगी, समय से वह चुका देगा. चपरासी ने बताया कि उसके घर का खर्च उसकी पत्नी चलाती है. अत: अंतिम रूप से तय करने को उसे सपत्नीक दफ्तर में बुलाया. हमारा सोचना था कि उसकी पत्नी कुशलता से घर का खर्च भी चलायेगी और हमारा सॉफ्ट-लोन भी चुकायेगी. पर जब उसकी पत्नी को देखा तो हमारे चेहरे पर से परोपकार की हिलोरें शांत हो गयीं. वह इतने साज शृंगार के साथ थी कि कोई अफसर की बीवी भी क्या होगी. हम समझ गये कि चपरासी की समस्या परिस्थितियों का मारा होने की नहीं – जैसा वह कहता था, वरन ऋण लेकर उपभोग करने की है. वह हमारे एक बार की सहायता से हल होने वाली नहीं है. परोपकार की हमारी कोशिश चारवाक के सिद्धांत के सलीब पर चढ़ गयी – अमल में आ ही न सकी.

मैं जानता हूं कि लोन देना भी भ्रष्टाचार का जनक है. यह भ्रष्टाचार पहले महाजन किया करता था (आज भी करता है). अब, कुछ मात्रा में, बैंक कर्मी भी करते हैं. ग्रामीण माइक्रोक्रेडिट देने के लिये तो भारत में बांगलादेश के मोहम्मद यूनुस जी की तर्ज पर ईमानदार पहल होनी चाहिये. पर वह विषयांतर है. मैं यहां केवल लोन लेने की वृत्ति और न चुकाने की नीयत के विषय में लिख रहा हूं. यह वृत्ति नव-मध्यवर्ग में तेजी से घर करता जा रही है. इसके लिये अपनी इच्छाओं पर लगाम लगाने की बजाय बाजार/पूंजीवाद को कोसना गैरजिम्मेदार आचरण है.

कर्ज न चुका पाने के कारण जो मौतें हो रही हैं, उन सबके मूल में दैवी आपदा या मानव की क्षमता के बाहर के गणक नहीं हैं. बहुधा अपने उपभोक्तापन के लिये कर्ज लिये जाते हैं. शादी-विवाह-तेरही आदि के लिये अपनी सामाजिक हैसियत से अधिक कर्ज लिये जाते हैं. येन-केन-प्रकरेण कर्ज लिये जाते हैं. आज के उपभोग के लिये भविष्य के स्वयम को बन्धक बना देते हैं लोग! कर्ज लेते समय कर्ज वापसी का कैश-फ्लो कितने लोग सोचते है? कर्ज लेते समय लोग अपनी अर्जन क्षमता का भी तर्कसंगत आकलन नहीं करते. फिर एक कर्ज को दूसरे कर्ज से पाटने का दुश्चक्र चलाते हैं. बाजार व्यक्ति को ललचाता जरूर है. पर बाजार में अपना विवेक तो व्यक्ति स्वयम बेचता है!

मैं अपने कर्मचारियों को समझाता हूं. मकान बनाने के लिये लोन लेते हो तो ठीक है. अगर कल विपत्ति आयी तो मकान बेंच कर भी लोन चुका सकते हो. पर मोटरसाइकल या कार के लिये लोन न लो. वह खरीदते ही उनकी कीमत कम हो जाती है. फिर डिप्रीशियेशन से और भी वैल्यू कम होने लगती है. उनकी खरीद उपभोग के लिये है. उपभोग करना हो तो अपनी कमाई या बचत से करो. अपनी आय और व्यय के खानों की समझ रखो. अपनी सम्पत्तियों और देनदारियों की समझ रखो. मोटरसाइकल/कार/एयरकण्डीशनर आपकी सम्पत्तियां नहीं; आपकी देनदारियां है. पर लोग इस फेर में पड़ते नहीं. या तो न चुकाने की नीयत से लोन लेते हैं या फिर सरासर बेवकूफी में अपना विवेक बेच देते हैं.

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फुटनोट: आलोक पुराणिक अपने अगड़म-बगड़म वाले ब्लॉग पर जितना लिखते हैं उतना ही स्मार्टनिवेश वाले ब्लॉग के लिये लिखें और लोगों में पैसे के प्रति आदरभाव विकसित करें तो हम ब्लॉगरों का बहुत भला हो! 🙂