‘बना रहे बनारस’ – श्री विश्वनाथ मुखर्जी



श्री विश्वनाथ मुखर्जी की यह पुस्तक – बना रहे बनारस सन 1958 में भारतीय ज्ञानपीठ, काशी ने छापी थी. उस समय पुस्तक की छपी कीमत है ढ़ाई रुपया. अब भी शायद 30-40 रुपये के आस-पास होगी. इस 188 पेज की पुस्तक में कुल 24 लेख हैं. अर्थात प्रत्येक लेख 7-8 पृष्ठ का है. सभी लेख बनारस से बड़ी सहज और हास्य युक्त शैली में परिचय कराते हैं. मेरे पास तो 1958 की छपी पुस्तक की फोटो कॉपी है.

मैं यहां पुस्तक की लेखक द्वारा लिखी प्रस्तावना प्रस्तुत कर रहा हूं, और फिर पुस्तक के कुछ फुटकर अंश.

बना रहे बनारस की प्रस्तावना:


मैने कहा —

खुदा को हाज़िर-नज़िर जान कर मैं इस बात को कबूल करता हूं कि बनारस को मैने जितना जाना और समझा है, उसका सही-सही चित्रण पूरी ईमानदारी से किया है. प्रस्तुत पुस्तक जिस शैली में लिखी गयी है, आप स्वयम ही देखेंगे. जहां तक मेरा विश्वास है,किसी नगर के बारे में इस प्रकार की व्यंगात्मक शैली में वास्तविक परिचय देने का यह प्रथम प्रयास है. इस संग्रह के जब कुछ लेख प्रकाशित हुये तब उनकी चर्चा वह रंग लायी कि लेखक केवल हल्दी-चूने के सेवन से वंचित रह गया. दूसरी ओर प्रसंशा के इतने इतने पत्र प्राप्त हुये हैं कि अगर समझ ने साथ दिया होता तो उन्हें रद्दी में बेंच कर कम से कम एक रियायती दर का सिनेमा शो तो देखा ही जा सकता था.

इन लेखों में कहीं-कहीं जन श्रुतियों का सहारा मजबूरन लेना पड़ा है. प्रार्थना है कि इन श्रुतियों और स्मृतियों को ऐतिहासिक तथ्य न समझा जाये. हां, जहां सामाजिक और ऐतिहासिक प्रश्न आया है, वहां मैने धर्मराज बन कर लिखने की कोशिश की है. पुसतक में किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या सम्प्रदाय ठेस पंहुचाने क प्रयास नहीं किया गया है, बशर्ते आप उसमें जबरन यह बात न खोजें. अगर कहीं ऐसी बात हो गयी हो या छूट गयी हो तो कृपया पांच पैसे से पन्द्रह नये पैसे के सम्पत्ति दान की सनद मेरे पास भेज दें ताकि अगले संस्करण में अपने आभार का भार आपपर लाद कर हल्का हो सकूं. गालिब के शैरों के लिये आदरणीय बेढबजी का, जयनारायण घोषाल जी की कविताओं के लिये प. शिव प्रसाद मिश्र रुद्र जी का, संगीत सम्बन्धी जानकारी के लिये पारसनाथ सिंह जी का, पाण्डुलिपि संशोधन, धार्मिक-सांस्कृतिक जानकारी के लिये तथा प्रूफ संशोधन के लिये केशर और भाई प्रदीप जी का आभारी हूं.

अंत में इस बात का इकबाल करता हूं, कि मैने जो कुछ लिखा है, होश-हवाश में लिखा है, किसी के दबाव से नहीं. ये चन्द अल्फाज़ इस लिये लिख दिये हैं कि मेरी यह सनद रहे और वक्त ज़रूरत पर आपके काम आये. बस फ़कत —

बकलमखुद
विश्वनाथ मुखर्जी
सिद्धगिरि बाग
बुद्ध पूर्णिमा, 2015 वि.


पुस्तक के कुछ अंश:


सफाई पसन्द शहर –

...तीर्थ स्थान होने की वजह से यहां गन्दगी काफी होती है. लिहाजा सफाई खर्च (बनाम जुर्माना ) तीर्थयात्री कर के रूप में लिया जाता है. बनारस कितना साफ सुथरा शहर है इसका नमूना गली सड़कें तो पेश करती ही हैं, अखबारों में सम्पादक के नाम पत्र वाले कालम भी “प्रसंशा शब्दों” से रंगे रहते हैं. माननीय पण्डित नेहरू और स्वच्छ-काशी आन्दोलन के जन्मदाता आचार्य विनोबा भावे इस बात के कंफर्म्ड गवाह हैं.
खुदा आबाद रखें देश के मंत्रियों को जो गाहे-बगाहे कनछेदन, मूंडन, शादी और उद्घाटन के सिलसिले में बनारस चले आते हैं जिससे कुछ सफाई हो जाती है; नालियों में पानी और चूने का छिड़काव हो जाता है.

बनारस की सड़कें –

… जब कोई बैलगाड़ी, ट्रक, जीप या टेक्सी इन सड़कों पर से गुजरती है तब हर रंग की हर ढ़ंग की समांतर रेखायें, त्रिभुज और षटकोण जैसे अजीब गरीब नक्शे बन जाते हैं कि जिसका अंश बिना परकाल की सहायता के ही बताया जा सकता है. नगरपालिका को चाहिये कि वह यहां के अध्यापकों को इस बात का आदेश दे दे कि वे अपने छात्रों को यहां की सड़क पर बने हुये इस ज्योमेट्रीका परिचय अवश्य करा दें. सुना है कि काशी के कुछ माडर्न आर्टिस्ट इन नक्शों के सहयोग से प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं.
यहां की सड़कें डाक्टरों की आमदनी भी बढ़ाती हैं. यही वजह है कि अन्य शहरों से कहीं अधिक डाक्टर बनारस में हैं. … यहां हर 5 कदम पर गढ़्ढ़े हैं. जब इन गढ़्ढ़ों में पहिया फंसेगा तब पेटका सारा भोजन कण्ठ तक आ जायेगा. दूसरे दिन बदनमें इतना दर्द हो जायेगा कि आपको डाक्टर का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा.

बनारसी निपटान –

सुबह के समय लोगा प्रात: क्रिया से निवृत्त होते हैं, इस क्रिया को बनारसी शब्द में ‘निपटान’ कहते हैं. बनारस में नगरपालिका की कृपा से अभी तक भारत की सांस्कृतिक राजधानी और अनादिकाल की बनी नगरी में सभी जगह ‘सीवर’ नहीं गया है. भीतरी महाल में जाने पर वहां भरी गर्मी की दोपहर को लाइट की जरूरत महसूस होती है. फलस्वरूप अधिकांश लोगों को बाहर जा कर निपटना पड़ता है. निपटान एक ऐसी क्रिया है जिसे बनारसी अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य समझता है. बनारस के बाहर जाने पर उसे इसकी शिकायत बनी रहती है. एक बार काशी के एक प्रकाण्ड पण्डित सख्खर गये. वहां से लौटने पर सख्खर-यात्रा पर लेख लिखते हुये लिखा – ‘हवाई जहाज पर निपटान का दिव्य प्रबन्ध था.’ कहने का मतलब है कि हर बनारसी निपटान का काफी शौक रखता है.

असली बनारसी –

एक बनारसी सही माने में बनारसी है, जिसके सीने में एक धड़कता हुआ दिल है और उस सीने में बनारसी होने का गर्व है, वह कभी भी बनारस के विरुद्ध कुछ सुनना या कहना पसन्द नहीं करेगा. यदि वह आपसे तगड़ा हुआ तो जरूर इसका जवाब देगा, अगर कमजोर हुआ तो गालियों से सत्कार करने में पीछे न रहेगा. बनारस के नाम पर धब्बा लगे ऐसा कार्य कोई भी बनारसी स्वप्न में भी नहीं कर सकता. … बनारसी अगर घर के भीतर गावटी का गमछा पहन कर नंगे बदन रहता है तो वह उसी तरह गंगास्नान या विश्वनाथ दर्शन भी कर सकता है. उसके लिये यह जरूरी नहीं कि घर के अन्दर फटी लुंगी या निकर पहन कर रहे और बाहर निकले तो कोट-पतलून में. दिखावा तो उसे पसन्द नहीं. … आजकल बड़े शहरों में मेहमान आ जाने पर लोग चिढ़ जाते हैं, पर बनारसी चिढ़ता नहीं. … मस्त रहना बनारसियों का सबसे बड़ा गुण होता है. ….


चलते-चलते: भारतीय सहित्य संग्रह के इस वेब-पेज पर है कि श्री विश्वनाथ मुखर्जी अब स्वर्गीय हैं. उन्होनें शरत चद्र की जीवनी भी लिखी थी. श्री विश्वनाथ मुखर्जी को सादर श्रद्धांजलि.


कछुआ और खरगोश की कथा – नये प्रसंग



कछुआ और खरगोश की दौड़ की कथा (शायद ईसप की लिखी) हर व्यक्ति के बचपन की कथाओं का महत्वपूर्ण अंग है. यह कथा ये सन्दर्भ में नीचे संलग्न पावरप्वाइण्ट शो की फाइल में उपलब्ध है. इसमें थोड़ेथोड़े फेर बदल के साथ कछुआ और खरगोश 4 बार दौड़ लगाते हैं और चारों बार के सबक अलगअलग हैं.

कुछ वर्षों पहले किसी ने मेल से यह फाइल अंग्रेजी में प्रेषित की थी. इसके अंतिम स्लाइड पर है कि इसे आगे प्रसारित किया जाये. पर यह संतोषीमाता की कथा की तरह नहीं है कि औरों को भेजने से आपको फलां लाभ होगा अन्यथा हानि. यह प्रबन्धन और आत्म विकास से सम्बन्धित पीपीएस फाइल है. इसमें व्यक्तिगत और सामुहिक उत्कष्टता के अनेक तत्व हैं.

बहुत सम्भव है कि यह आपके पास पहले से उपलब्ध हो. मैने सिर्फ यह किया है कि पावरप्वाइण्ट का हिन्दी अनुवाद कर दिया है, जिससे हिन्दी भाषी इसे पढ़ सकें.

आप नीचे के चिन्ह पर क्लिक कर फाइल डाउनलोड कर सकते हैं. हां; अगर डाउनलोड कर पढ़ने लगे, तो फिर टिप्पणी करने आने से रहे! 🙂

खैर, आप डाउन लोड करें और पढ़ें यही अनुरोध है.


कभी-कभी धुरविरोधी की याद आती है



मैं बेनामी ब्लॉगरी के कभी पक्ष में नहीं रहा. पर मैने धुरविरोधी को; यह जानते हुये भी कि उस सज्जन ने अपनी पहचान स्पष्ट नहीं की है; कभी बेनाम (बिना व्यक्तित्व के) नहीं पाया. मेरी प्रारम्भ की पोस्टों पर धुरविरोधी की टिप्पणियां हैं और अत्यंत स्तरीय टिप्पणियां हैं. धुरविरोधी के अन्य सज्जनों से विवाद हुये होंगे, पर मैने उन सज्जन को अत्यंत संयत और संवेदनशील व्यक्ति पाया. उनकी एक कविता जो राजा-की-मण्डी में अभावग्रस्त मां के विषय में थी; ने मुझे अंतर्मन में दूर तक छुआ. पढते हुये मेरी आंखें नम हो गयी थीं. और ऐसा मैने टिप्पणी में भी स्पष्ट किया था.

मुझे लगता था कि मैं उन सज्जन को भले न जानता होऊं, पर ब्लॉगरी में अन्य लोग जानते होंगे या उनका ई-मेल एड्रेस होगा. जब मैने ब्रेन इंजरी की वेब साइट के लिये जिन लोगों ने सहायता की हामी भरी थी, उनकी शॉर्ट लिस्टिंग की, तो उनमें धुरविरोधी भी थे. पर उनका ई-मेल एड्रेस मिला ही नहीं! शॉर्ट लिस्टिंग और उसके बाद की गतिविधियां तो नॉन-स्टार्टर सी रहीं; पर मुझे पता चला कि शायद किसी के पास इन सज्जन का पता-ठिकाना नहीं है.

धुरविरोधी के मेरे ब्लॉग पर पहले 2 कमेण्ट:
मार्च 1, 2007: ज्ञानदत्त साहब; विरोध किसी को पचता नहीं तो “अहो रूपम अहो ध्वनि” का गान ही ठीक है ना?
वैसे आपके लिये भी मेरे मन में अहो ध्वनि का भाव है.
मार्च 5, 2007: ज्ञानदत्त साहब, मेरे मन मैं आज फिर अहो ध्वनि के भाव आ रहे हैं. लिखते रहिये, धुरविरोधी पढता रह्वेगा. (अब नहीं पढता!)
यह वह सामय था जब मेरा ब्लॉग फीड एग्रेगेटर पर पंजीकृत भी नहीं था. मुझे मालुम भी नहीं था एग्रेगेटर के विषय में! धुरविरोधी कैसे ब्लॉग पर आये, यह वही जाने!

ऐसा नहीं कि मेरी धुरविरोधी से पूर्ण वैचारिक साम्य रहा हो. उदाहरण के लिये मैं नन्दीग्राम के मामले में किसानों पर जुल्म के खिलाफ था, पर मुझे लगता था कि बंगाल का औद्योगीकरण भी जरूरी है. शायद धुरविरोधी ने मेरी संवेदना को समझा था और मैने उनकी. कभी कोई मतभेदात्मक स्थिति नहीं पैदा हुई; जबकि मैने एक ब्लॉग पोस्ट भी लिखी थी नन्दीग्राम पर कितने ब्लॉग बनायेंगे.

यह सब मैं इसलिये लिख रहा हूं कि मुझे धुरविरोधी का ब्लॉग अचानक शांत होना जमा नहीं. उस ब्लॉग पर मेरी भी कुछ टिप्पणियां थीं मेरा भी कुछ अंश था. इसके अतिरिक्त उसकी भाषा मुझे हिन्दी ब्लॉगरी के सर्वथा उपयुक्त लगती थी साहित्यिक आडम्बर से रहित, सरल और भद्र.

मेरा मत है कि ये सज्जन कहीं दूर नहीं गये होंगे. अभी भी पूरे तौर से वर्तमान परिदृष्य के भागीदार नहीं तो दर्शक अवश्य होंगे. कितना अच्छा हो कि प्रॉसेस ऑफ नॉर्मलाइजेशन के तहद अपना ब्लॉग पुन: प्रारम्भ करें. या और भी बेहतर हो अपने ई-मेल पते के साथ ब्लॉग प्रारम्भ करें.

पर मेरा सोचना, मेरा सोचना है. पता नहीं और लोग इसे किस प्रकार से लें.


एक घायल पिल्ले की पांय-पांय



परसों एक पिल्ला एक कार से टकरा गया. बहुत छोटा नहीं था. कुत्ते और पिल्ले के बीच की अवस्था में था. कार रुकी नहीं. पिल्ला मरा नहीं. जख्मी होकर पांय-पांय करता रहा. शायद अपंग हो जाये. अपंग होने पर मानव का जीवन दुरूह हो जाता है, जानवर के लिये तो और भी कठिन होगा. मेरी भी गाड़ी वहां रुकी नहीं थी. इसलिये पता नहीं पिल्ले को कितनी चोट लगी. पर मन जरूर लगा है.

पिल्ला अचानक गाड़ी की तरफ दौड़ पड़ा था. गलती ड्राइवर की नहीं थी. पर शायद मानव का बच्चा होता तो वह आपात तरीके से ब्रेक लगा कर दुर्घटना बचा लेता.

भारत में सड़कें सभी प्रयोग करते हैं. पैदल, साइकल सवार, वाहन वाले और जानवर – सभी बिना लेन के उसी पर चलते हैं. फुटपाथ की जगह पार्किंग, बिजली के ट्रांसफार्मर, हनुमान जी के मन्दिर और पटरी/ठेले पर दुकान लगाने वाले छेंक लेते हैं. चलने और वाहनों के लिये सड़क ही बचती है. बेतरतीब यातायात में आदमी फिर भी बच जाता है; जानवर मरता या अपंग होता है.

इसी तरह ट्रेनों से कट कर जानवर मरते हैं. पिल्ले की याद तो अब तक है. पर वे जानवर तो हमारे आंकड़े भर बन जाते हैं. फिर यह पता किया जाता है कि कितने पालतू थे और कितने जंगली. आंकड़ों में जंगली जानवर बढ़ रहे हैं. शायद नीलगायों की आबादी बढ़ रही है. एक नीलगाय या पालतू जनवर कट जाने पर कमसे कम आधा घण्टा ट्रेन लेट होती है. आधे से ज्यादा मामलों में इंजन फेल हो जाता है और ट्रेन 2 से ढ़ाई घण्टे लेट हो जाती है. हमारा सारा ध्यान रेलगाड़ी के व्यवधान की तरफ रहता है. जानवर के प्रति सोच या करुणा का भाव तो रहता ही नहीं. साल भर मे एक-आध मामला तो हो ही जाता है जब नीलगाय या भैंसे के कट जाने से गाड़ी पटरी से उतर जाये.

जमीन पर दबाव इतना है कि चरागाह बचे ही नहीं. लोग तालाबों तक को पाट कर खेती कर रहे हैं या मकान बना रहे हैं. जानवर रेल की पटरी के किनारों पर चरने को विवश हैं. चाहे जंगली हों या पालतू. जब ट्रेनों की गति और बढ़ेगी तो शायद पटरी को बाड़ लगा सुरक्षित किया जाये. तब जानवर भी सुरक्षित हो जायेंगे. अभी तो जानवर कट ही जाते है. इसके अलावा पटरी के किनारे कई अपंग जानवर भी दिख जाते हैं जो घायल हो कर बचे रहते हैं जीवन का अभिशाप झेलने को.

जहां आदमी जीने को जद्दोजहद करता हो, जानवर को कौन पूछे? पिल्ले की पांय-पांय की आवाज अभी भी मन में गूंज रही है. कोई और दुख या सुख जब तक उसका स्थान नहीं ले लेता, तब तक गूंजेगी.


स्टैटकाउण्टर के ओधान कलेन को बिजनेस वीक का अवार्ड


मैने स्टैटकाउण्टर के ओधान कलेन को बिजनेस वीक के वर्ष के बिजनेस ऑंत्रेपिन्योर के लिये वोट देने को 10 जून को अपनी पोस्ट में कहा था.
आज सवेरे अपना मेल बॉक्स खोला तो पता चला को वह बिजनेस वीक का नॉमिनेशन जीत चुका है. बिजनेस वीक के
StatCounter Rakes In the Clicks में यह घोषणा है.
एलेक्सा (जो विजिट्स के आधार पर साइट्स की रैंकिंग करती है, ने स्टैटकाउण्टर को अमेरिका की 34 वीं सबसे ज्यादा विजिट की जाने वाली साइट बताया है. यह एडोब, डेल, वाल-मार्ट, सी-नेट, एक्स्पेडिया और आस्क.कॉम से ज्यादा ट्रेफिक वाली साइट है. स्टैटकाउण्टर बड़ी कम्पनियों को नहीं वरन छोटी कम्पनियों और हम जैसे फ्री में अपने काउण्ट की सुविधा चाहने वालों को सर्विस मुहैया कराती है.


विश्व बैंक का गवर्नेंस आकलन – भारत बेहतर हुआ है.



विश्व बैंक क्रॉस-कण्ट्री गवर्नेंस मेज़रमेण्ट के 212 राष्ट्रों के सरकार के कामकाज पर 6 आयामों के आंकड़े जारी करता हैं. ये आंकड़े सन 1996 से 2006 तक के उपलब्ध है. इन आंकड़ों को विभिन्न प्रकार से – एक देश के लिये, विभिन्न देशों की तुलना करते हुये, विभिन्न क्षेत्रों के देशों की प्रत्येक आयाम पर तुलना करते हुये – देखा जा सकता है. सन 2006 का अपडेट अभी जुलाई 2007 में जारी हुआ है. अत: इन आंकड़ों पर अर्धारित अनेक लेख देखने को मिलेंगे. एक लेख तो बिजनेस स्टेण्डर्ड में मैने कल ही देखा.

आपके पास सर्फिंग के लिये कुछ समय हो तो विश्व बैंक की उक्त साइट पर जा कर 6 आयामों पर विभिन्न देशों के परसेण्टाइल स्कोर का अवलोकन करें. परसेण्टाइल स्कोर का अर्थ यह है कि उस आयाम पर उतने प्रतिशत देश उस देश से खराब/नीचे हैं. अत: ज्यादा परसेण्टाइल स्कोर यानी ज्यादा बेहतर स्थिति.

बिजनेस स्टेण्डर्ड के लेख में विभिन्न आयामों पर 1996 व 2006 के भारत और चीन के परसेण्टाइल स्कोर की तुलना है. दोनो देश विकास पथ पर अग्रसर हैं और दोनो बड़ी जनसंख्या के राष्ट्र हैं. यह तुलना निम्न सारणी से स्पष्ट होगी:

आयाम भारत चीन
वर्ष 1996 2006 1996 2006
बोलने की आजादी और जवाबदेही 52.2 58.2 4.8 4.8
राजनैतिक स्थिरता 14.9 22.1 34.6 33.2
कुशल शासन 50.7 54 66.8 55.5
नियंत्रण की गुणवत्ता 44.4 48.3 54.1 46.3
कानून का राज 61 57.1 48.1 45.2
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण 40.3 52.9 56.3 37.9
साधारण योग 43.9 48.8 44.1 37.2

भारत में अभिव्यक्ति की आजादी, सरकार चुनने की आजादी और सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही दुनियां के आधे से ज्यादा देशों से बेहतर है जबकि चीन में शासन आजादी और जवाबदेही को संज्ञान में नहीं लेता. इस आयाम में भारत की दशा पहले से बेहतर हुई है, जबकी चीन की जस की तस है.

राजनैतिक स्थिरता (अर्थात अवैधानिक और हिंसात्मक तरीकों से सरकार गिरने की आशंका का अभाव) के मामले में भारत का परसेप्शन अच्छा नहीं है. पर चीन भी बहुत बेहतर अवस्था में नहीं है. कुल मिला कर भारत में दशा सुधरी है पर चीन में लगभग पहले जैसी है. चीन की स्थिति भारत से बेहतर है.

सरकार की कुशलता (जन सेवाओं की गुणवत्ता/राजनैतिक दबाव का अभाव/सिविल सर्विसेज की गुणवत्ता आदि) में भारत की स्थिति में सुधार हुआ है. यह सुधार मुख्यत: सूचना तंत्र के क्षेत्र में प्रगति के चलते हुआ है. इस मद पर चूंकि चीन की स्थिति खराब हुई है, भारत उसके तुलनीय हो गया है.

सरकार का नियंत्रण (उपयुक्त नीतियों के बनाने और उनके कार्यांवयन जिनसे लोगों के निजी और समग्र प्राइवेट सेक्टर का व्यापक विकास हो) के आयाम में भारत का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा है. पर भारत ने इस विषय में स्थिति सुधारी है और चीन की दशा में गिरावट है. कुल मिला कर दोनो देश बराबरी पर आ गये हैं.

पुलीस और कानून के राज के विषय मे भारत की दशा विश्व में अन्य देशों के सापेक्ष पहले से खराब हुई है. अपराध और आतंक के विषय मे हमारा रिकार्ड खराब हुआ है. ऐसा ही चीन के बारे में है. इस मद में भारत की साख चीन से बेहतर है.

भ्रष्टाचार पर नियंत्रण (इसमें छोटा भ्रष्टाचार और व्यापक स्तर पर बड़े निजी ग्रुपों द्वारा सरकार के काम में दखल – दोनो शामिल हैं) के विषय में भारत की दशा में अन्य देशों के मुकाबले व्यापक सकारात्मक परिवर्तन हुआ है. बहुत सम्भव है तकनीकी विकास का इसमें योगदान हो. चीन की दशा में इस आयाम में बहुत गिरावट है.

कुल मिला कर भारत की स्थिति बेहतर हुई लगती है विश्व बैंक के वर्डवाइड गवर्नेन्स इण्डिकेटर्स में.

चीन और कई अन्य देश विश्व बैंक के इस वर्डवाइड गवर्नेन्स इण्डिकेटर्स वार्षिक आकलन से प्रसन्न नहीं हैं और विश्व बैंक के 24 में से 9 कार्यकारी निदेशकों ने इन विवादास्पद इण्डिकेटर्स के खिलाफ अध्यक्ष को लिखा है. पर यह कार्य भविष्य में विश्व बैंक न भी कराये, करने वाले तो अपने स्तर पर कर ही सकते हैं.

यह लेखन उक्त विश्व बैंक के लिंक मे उपलब्ध आंकड़ों का मात्र एकांगी उपयोग है. अन्यथा अनेक देशों के बारे में अनेक प्रकार के निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. उसके लिये उक्त साइट पर उपलब्ध सामग्री का व्यापक उपयोग करना होगा.