वाह, अजय शंकर पाण्डे!



गाजियाबाद म्यूनिसिपल कर्पोरेशन ने उत्कोच को नियम बद्ध कर म्युनिसिपालिटी का आमदनी बढ़ाने का जरीया बना दिया है. यह आज के टाइम्स ऑफ इण्डिया में छपा है. टाइम्स ऑफ इण्डिया मेरे घर आता नहीं. आज गलती से आ गया. पर यह समाचार पढ़ कर अजीब भी लगा, प्रसन्नता भी हुई और भ्रष्टाचार खतम करने की विधि की इम्प्रेक्टिकेलिटी पर सिर भी झटका मैने.

यह खबर हिन्दी में भी दिखी नवभारत टाइम्स पर, गाजियाबाद में रिश्वत को मिली सरकारी मान्यता के शीर्षक से.

म्यूनिसिपल कमिश्नर अजय शंकर पाण्डे ने दो महीने पहले म्यूनिसिपल कार्पोरेशन ऑफ गाजियाबाद (एमसीजी) के कमिश्नर का पदभार सम्भाला है. उन्होने यह फरमान जारी किया है कि सभी ठेकेदार निविदा स्वीकृति पर 15% पैसा एमसीजी के खाते में जमा कर देंगे! यह रकम सामान्यत: लोगों की जेब में जाती जो अब एमसीजी को मिलेगी.

अजय शंकर पाण्डे मुझे या तो आदर्शवादी लगते हैं या फिर त्वरित वाहावाही की इच्छा वाले व्यक्ति. मैने कई अधिकारियों को – जो निविदा से वास्ता रखते हैं – ठेकेदारों को कम रेट कोट करने पर सहमत कराते पाया है; चूकि वे स्वयम उत्कोच नहीं लेते और विभाग को उतने का फायदा पंहुचाने में विश्वास करते हैं. यह तरीका बड़ी सरलता से और बिना ज्यादा पब्लिसिटी के चलता है. अधिकारी की साख एक ईमानदार के रूप में स्वत: बनती जाती है. पर अजय शंकर जो कर रहे हैं – वह तो आमूल चूल परिवर्तन जैसा है और इससे बहुतों के पेट पर लात लग सकती है. यह भी रोचक हो सकता है देखना कि अजय शंकर कब तक वहां रह पाते हैं और बाद में यह 15% जमा करने के फरमान का क्या होता है!

जहां काम या सर्विस पूरी तरह निर्धारित और परिभाषित है, वहां तकनीकी विकास का लाभ लेकर भ्रष्टाचार कम हो सकता है. उदाहरण के लिये रेलवे तत्काल आरक्षण के माध्यम से वह पैसा जो टीटीई या आरक्षण क्लर्क की जेब में जाता, उसे सरकारी खाते में लाने में काफी हद तक सफल रही है. आईटी में प्रगति भ्रष्टाचार कम करने का सबसे सशक्त हथियार है. जितनी ज्यादा से ज्यादा सामग्री लोगों तक कम्प्यूटर से या इण्टरनेट से पंहुचाई जायेगी, उतना ही भ्रष्टाचार कम होगा! पर निविदा आदि के मामले में, जहां उत्पाद या सेवा की परिभाषा में फेर बदल की गुंजाइश हो – यह तरीका काम कम ही कर पाता है.

फिर भी; अच्छा जरूर लगा अजय शंकर के प्रयास के बारे में पढ़ कर!

मोहम्मद बिन तुगलक की भी बहुत याद आई. वे समय से पहले, बाद के विचारों पर कार्य करने वाले इतिहास पुरुष थे.


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घर बैठो; तनख्वाह पाओ!



जाज आटो के 2200 कर्मचारी बैठे ठाले (सीएनएन मनी के अनुसार) अपने रिटायरमेण्ट तक घर बैठेंगे और तनख्वाह पायेंगे. आलोक पुराणिक (अ.ब.) के लिये पक्का मसाला है पोस्ट का. वे कह सकते हैं कि इसमें क्या बात है सरकारी कर्मचारी तो नौकरी शुरू करते से रिटायरमेण्ट के दिन माला पहनने तक बिना काम के तनख्वाह पाता है. पर भैयाजी, उसे झूठी-सच्ची हाजिरी तो लगानी पड़ती है दफ्तर में! बजाज आटो में तो शुद्ध घर बैठे बिना काम के तनख्वाह मिलेगी.

आलोक पुराणिक (स्मा.नि.) और वाह मनी के कमल शर्मा जी बतायें कि बजाज आटो निवेश के लिये बेहतर हुआ है क्या?

बजाज आटो अपने पुराने अकुर्दी (पुणे) के प्लाण्ट में मोटरसाइकल असेम्बली का काम बन्द कर लोगों को घर बैठे तनख्वाह देने का काम कर रहा है. अब यह उत्पादन अन्य इकाइयों में होगा. अकुर्दी में स्पेयर पार्ट बनते रहेंगे. काम बन्द करने का कारण महाराष्ट्र सरकार की केपेसिटी रेशनलाइजेशन को ले कर नीतियों के कष्ट और अन्य राज्यों द्वारा टेक्स और चुंगी के कंशेसन हैं.

जैसा अपेक्षित था, मैरिल्ल लिंच ने बजाज आटो पर खरीद की अनुशंसा की है. उद्धव ठाकरे ने (अगर पुणे में बजाज आटो का प्लाण्ट बन्द हुआ तो) शिव सेना के घूंसे की धमकी दी है. “महाराष्ट्र सरकार और बजाज आटो में ठनी” का समाचर है. उधर बजाज आटो के राजीव बजाज ने कहा है कि वे अकुर्दी का प्लाण्ट बन्द नहीं कर रहे.

खबरें हैं रोचक. और अगर लोग विषय से ट्यून कर पाये तो बहस और भी रोचक हो सकती है. पूंजीवाद-साम्यवाद-समाजवाद-प्रान्तवाद-हेन वाद-तेन वाद… बहुत पेंच बनाये जा सकते हैं इसमें.


कविता करने से छुट्टी तो मिली! बड़ा झमेला है उसमें.
वैसे मैं कह सकता हूं कि समीर लाल जी से मस्त सपोर्ट नहीं मिला(!). तुलसी लिखते हैं न – “मोहे न नारि नारि के रूपा”. कवि को दूसरा कवि भला क्यों पसन्द आने लगा. वह भी हमारे जैसा उदीयमान! 🙂 🙂 🙂