वनस्पतियों पर आश्चर्यजनक जानकारियाँ



यह पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। पंकज जी अपने व्यस्त वानस्पतिक अनुसंधान में समय निकाल कर प्रतिसप्ताह हिन्दी में हमारे लिये जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। उनके पिछले लेख आप पंकज अवधिया के लेबल पर क्लिक कर देख सकते है।

इस बार वे कुछ वनस्पतियों के कुछ विरोधाभासी गुणों पर रोचक और काम की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। आप पढ़ें –





इस बार मै आपको अपने वानस्पतिक सर्वेक्षणों के दौरान एकत्र की गयी कुछ अजीबो-गरीब पर उपयोगी जानकारियों के विषय मे बताने की कोशिश करूंगा।

 

आप सब अमलतास को तो जानते ही होंगे। जल्दी ही आप इसके स्वर्ण पुष्पों को देख पायेंगे। ऐसा लगेगा जैसे कि पूरा वृक्ष सोने से लदा हुआ है। यही कारण है कि इसे जंगल झरना, धनबहेर या धनबोहार भी कहा जाता है। इसके बीजों को खाने से पेट साफ होता है। पर अधिक मात्रा से दस्त होने लगते हैं। इस दस्त को रोकने के लिये उसी पेड की पत्तियो को भूनकर दिया जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब (बीज के बिना) पत्तियों को इसी रूप मे खाया जाता है तो इससे दस्त होने लगते हैं। बीजो के प्रयोग के बाद इसके प्रयोग से दस्त का रूकना और सीधे इसके प्रयोग से दस्त का होना बडा ही अजीब करिश्मा है माँ प्रकृति का।


आपने केवाँच का नाम तो सुना ही होगा और बचपन मे हममे से कईयो ने तो होली मे खुजली के लिये शरारतपूर्वक इसका प्रयोग भी किया होगा। जंगल मे जब केवाँच के बीजो का एकत्रण किया जाता है तो पूरे पौधे को जला दिया जाता है और बीज एकत्र कर लिये जाते है पर इससे अधिक ताप के कारण बीजो को नुकसान पहुँच सकता है। पारम्परिक चिकित्सक दूसरा उपाय अपनाते हैं। वे कहते हैं कि जंगल में जहाँ केवाँच उगती है, वहाँ पर एक विशेष प्रकार की वनस्पति अवश्य उगती है। वे इसे स्थानीय भाषा मे ममीरा कहते है। यह असली ममीरा से अलग होती है। केवाँच के बीज एकत्र करने से पहले वे इस वनस्पति को चबा लेते है। आश्चर्यजनक रूप से इससे केवाँच से होने वाली खुजली नही होती है और वे सुगमतापूर्वक यह कार्य कर लेते है।


केवाँच के चित्रों की कड़ी


आप समय-समय पर यह पढते-सुनते रहते है कि सरसो के तेल मे मिलावट से ड्राप्सी नामक बीमारी हो गयी। यह मिलावट सत्यानाशी नामक वनस्पति के बीजों की होती है जो कि सरसो के समान दिखते हैं। यह वनस्पति बेकार जमीन मे अपने आप उगती है। यह कहा जाता है कि यह सरसो के खेत मे उगती है और यहीं पर इसके बीज अपने आप सरसो के साथ मिल जाते है पर वास्तव मे बडे पैमाने पर ग्रामीणों से इसका एकत्रण करवाया जाता है और फिर इसे सरसो मे मिलाया जाता है। देश के पारम्परिक चिकित्सक इस वनस्पति और इसके गलत प्रयोग दोनो ही को जानते हैं। पर वे इस वनस्पति के एक अनोखे गुण को भी जानतहैं। बीजो से निकलने वाले जिस तेल से ड्राप्सी होती है उसी ड्राप्सी को पत्तियो के प्रयोग से ठीक किया जा सकता है। है न विचित्र बात?


सत्यानाशी के चित्रों की कड़ी

 

सर्पगन्धा नामक भारतीय वनस्पति के दिव्य गुणों से प्रभावित होकर जब आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियो ने उसकी जड़ से रिसर्पिन अलग कर हृदय रोगो मे उपयोग आरम्भ किया तो कई तरह के दुष्प्रभाव सामने आने लगे। ये दुष्प्रभाव उस समय नही होते जब पारम्परिक चिकित्सा मे इसका प्रयोग इन्ही रोगो की चिकित्सा मे होता है। यह पता लगाने के लिये अध्ययन किये गये तो राज खुला कि जड़ का जब प्रयोग किया जाता है तो उसमे रिसर्पिन के अलावा कई ऐसे प्राकृतिक रसायन होते है जो रिसर्पिन के दुष्प्रभावो को समाप्त कर देते हैं। जबकि अकेले रिसर्पिन नुकसानदायक सिद्ध होता है।


सर्पगन्धा के चित्रों की कड़ी

 

एक और उदाहरण। एलो वेरा की पत्तियों के आधार से एक पीला द्रव निकलता है। यह द्रव त्वचा रोग पैदा करता है। पर यदि पत्तियों के ऊपरी भाग के अन्दर का रस का प्रयोग किया जाये तो इस त्वचा रोग से मुक्ति मिल जाती है।

 

ये निश्चित ही माँ प्रकृति के चमत्कार है। पर मै तो उन देव पुरुषो को भी कम नही मानता हूँ जिन्होने इन गुणों का पता लगाया।

 

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पिछली पोस्ट मे मैने भोजन तालिकाओ की बात की थी। ये तालिकाएं कैसी होती है यह आप भी जानें। ये तालिकाए एक विशिष्टजन के लिये बनायी गयी हैं।

आप उदाहरण स्वरूप इन्हे इस कडी पर देख सकते है।

 

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार पंकज अवधिया जी का है।


कल मेरे घर पर “मीठा दिन” था। भरतलाल के जन्मदिन के अवसर पर नाश्ते में जलेबी मिली। भरत ने सभी बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद लिया।

दिन में मेरे ससुराल से सूरज पासवान नये गुड़ की पोटली लेकर आया। नया मीठा गुड़।

शाम को बिल्कुल सरप्राइज के रूप में भरतलाल एक अच्छा केक लाया। आनन फानन में एक खूबसूरत मोमबत्ती का इन्तजाम हुआ। भरत ने केक काटा। सब ने ताली बजाई। मां ने भरत को उपहार दिया। आप केक काटते भरत लाल की फोटो देखें।



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