दीन दयाल बिरद सम्भारी – पुन: दृष्टि


एक साल गुजर गया। मैने पहली पोस्ट लिखी थी इस ब्लॉग पर २३ फरवरी’२००७ को। एक अनगढ़ पोस्ट – दीनदयाल बिरद सम्भारी। आज उसे देखता हूं तो लगता है बहुत पानी बह गया है गंगा में। लिखने का तरीका, फॉण्ट का प्रयोग, प्रेजेण्टेन और वैचारिक परिपक्वता – सब में अन्तर है। भाषा में प्रवाह पहले से बेहतर है। हिन्दी में टाइप करने की क्षमता में विकास ने पोस्ट में विस्तार और टिप्पणियां करने में सहूलियत प्रदान की है। फलस्वरूप मुझे भी पाठक मिले हैं।

टिप्पणियों के लिये कुछ हद तक अहो रूपम – अहो ध्वनि का भाव रखना होता है। उसमें हतोत्साहित होने की बजाय आत्मविश्वास बढ़ता है। पहले पहल मैं इसे काफी हेय भावना मानता था। पर अब लगता है कि दूसरों में प्रशंसा का कोई मुद्दा ढूंढना और उसे आगे रख बात करना बहुत महत्वपूर्ण है न केवल ब्लॉगिन्ग में वरन सामान्य जीवन में भी। यह वैसे ही है कि किसी फिल्म की एक्स्ट्रा की प्रशंसा कर उसे फिल्म की नायिका बनने में मदद करना। वही मेरे साथ हुआ। कई लोगों ने मुझे प्रोत्साहन दिया। मेरे अक्खड़पन ने कुछ लोगों में मेरे प्रति अरुचि भी पैदा की। पर बैलेन्स शायद मेरे फायदे में रहा। मैं इस सूत्र का महत्व उत्तरोत्तर अधिकाधिक समझता गया हूं। यह सूत्र सरकारी अफसरी की रुक्षता की सीमायें पार कर गया है।

मैं पहले पहल अपने को एमेच्योर और अतिथि ब्लॉगर मानता था। उस सोच में कुछ ही अन्तर आया है। अभी भी लगता है कि कभी भी दूसरे काम का दबाव मुझे विरत कर सकता है। हां, अगर मुझे ब्लॉगिन्ग से कुछ आय होने लगे और भविष्य में यह सेल्फ सस्टेनिंग एक्टीविटी बन सके तो शायद नजरिया बदल सके। फिलहाल वह मॉडल बनता नजर नहीं आता। लेकिन इतना अवश्य लगता है कि ब्लॉग पर चाहे सप्ताह में एक पोस्ट पब्लिश हो; वह पूर्णत: समाप्त शायद ही हो।

मेरी विभिन्न वर्गों और विचार धाराओं के प्रति असहिष्णुता में कमी आयी है। इसी प्रकार आलोचना को कम से कम हवा दे कर झेलने का गुर भी सीखने का अभ्यास मैने किया है। मैने अपनी सोच में पानी नहीं मिलाया। पर दूसरों की सोच को फ्रॉड और खोखला मानने का दम्भ उत्तरोत्तर कम होता गया है। बहुत नये मित्र बने हैं जो मेरी भाषागत अक्षमताओं के बावजूद मेरे लेखन को प्रोत्साहित करते रहे हैं। उनका स्नेह तो अमूल्य निधि है।

केवल नित्य २५-५० हिन्दी ब्लॉग पठन मुझे अभी पर्याप्त विचार नहीं दे पा रहा है कि मैं उसके बल पर सप्ताह में ४-५ पोस्टें लिख-पब्लिश कर सकूं। मुझे आस-पास का अवलोकन; ब्लॉग से इतर अध्ययन और विभिन्न विषयों पर स्वतन्त्र रूप से अपने विचारों का परिमार्जन करना पड़ रहा है। उससे शायद मुक्ति नहीं है। पर मैं यह अवश्य चाहूंगा कि हिन्दी ब्लॉगजगत में नये अनछुये विषयों पर अथॉरिटेटिव तरीके से लिखने वाले बढ़ें। वह हो भी रहा है – पर शायद और तेजी से होना चाहिये।

कुल मिला कर बहुत सन्तुष्ट करने वाला रहा यह हिन्दी ब्लॉगिंग का वर्ष।


मेरी पहली पोस्ट – दीनदयाल बिरद सम्भारी
आदमी कभी न कभी इस दुनिया के पचडे में फंस कर अपनी नींद और चैन खोता है. फिर अपने अखबार उसकी मदद को आते हैं. रोज छपने वाली – ‘गला रेत कर/स्ल्फास की मदद से/फांसी लगा कर मौतों की खबरें’ उसे प्रेरणा देती हैं. वह जीवन को खतम कर आवसाद से बचने का शॉर्ट कट बुनने लगता है.
ऐसे में मंत्र काम कर सकते हैं.
मंत्र जाप का अलग विज्ञान है. मैं विज्ञान शब्द का प्रयोग एक देसी बात को वजन देने के लिये नहीं कर रहा हूं. मंत्र आटो-सजेशन का काम करते हैं. जाप किसी बात या आइडिया को अंतस्थ करने में सहायक है.
अर्जुन विषादयोग का समाधान ‘मामेकं शरणमं व्रज:’ में है. अर्जुन के सामने कृष्ण उपस्थित थे. कृष्ण उसके आटो-सजेशन/रिपीटीशन को प्रोपेल कर रहे थे. हमारे पास वह सुविधा नहीं है. हमारे पास मंत्र जाप की सुविधा है. और मंत्र कोई संस्कृत का टंग-ट्विस्टर हो, यह कतई जरूरी नहीं. तुलसी बाबा का निम्न पद बहुत अच्छा काम कर सकता है:

दीन दयाल बिरद संभारी. हरहु नाथ मम संकट भारी.

बस हम निश्चय करें, और प्रारंम्भ कर दें.
(२३ फरवरी’२००७)



और चलते चलते मुझे यह लिखना ही पड़ा:

मुझे जिस का अन्देशा था, वह हो गया है। मेरे विभाग ने मेरा काम बदलने का निर्णय किया है। भारतीय रेलवे में उत्तर मध्य रेलवे को “वर्क हॉर्स” अर्थात काम करने वाले घोड़े की संज्ञा दी जाती है। घोड़े का काम तेज गति से वहन करना है। यह उत्तर-मध्य रेलवे, पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण का बहुत सा माल यातायात वहन करती है।

अबतक मेरा कार्य उत्तर-मध्य रेलवे के सवारी यातायात का प्रबन्धन था। अब यह बदल कर माल यातायात (freight traffic) का प्रबन्धन हो रहा है। माल यातायात में सवारी यातायात से कहीं अधिक प्रबन्धन के परिवर्तनीय अंग (variables) होते हैं और उनपर कस कर निगाह न रखी जाये तो अव्यवस्था होने की सम्भावनायें ज्यादा होती है। कुल मिला कर यह ज्यादा इंवाल्वमेण्ट का काम है (यह मेरा नजरिया है; कई लोग इससे सहमत नहीं भी हो सकते!)।

ज्यादा इंवाल्वमेण्ट का अर्थ उससे इतर कामों में कम समय दे पाना भी होता है। अत: ब्लॉगिंग में कटौती अनिवार्य है। मेरी पत्नी का कथन है कि ब्लॉगिंग पूर्णत: बन्द न की जाये। अत: मैं “मानसिक हलचल” पर ताला नहीं लगा रहा। पर अपनी आवृति अवश्य कम कर रहा हूं। ब्लॉग लेखन अब सप्ताह में दो या तीन दिन होगा। पोस्ट सोम, वृहस्पति (और सम्भव हुआ तो शनिवार) को पब्लिश करूंगा। अगर उसमें लगा कि पोस्ट के स्तर से समझौता हो रहा है तो फिर यह निर्णय बदल कर आवृति और कम करूंगा। ब्लॉग लेखन में रेगुलॉरिटी बनाये रखूंगा, भले ही आवृति कम हो जाये।

मुझे आशा है कि श्री पंकज अवधिया अपनी अतिथि पोस्ट यथावत बुधवार को देते रहेंगे; भले ही मेरी ब्लॉग एक्टिविटी में कमी आये। कल तो उनकी पोस्ट है ही।
धन्यवाद।


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