विक्तोर फ्रेंकल का साथी कैदियों को सम्बोधन – 1.



अपनी पुस्तक – MAN’S SEARCH FOR MEANING में विक्तोर फ्रेंकलसामुहिक साइकोथेरेपी की एक स्थिति का वर्णन करते हैं। यह उन्होने साथी 2500 नास्त्सी कंसंट्रेशन कैम्प के कैदियों को सम्बोधन में किया है। मैं पुस्तक के उस अंश के दो भाग कर उसका अनुवाद दो दिन में आपके समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूं।

(आप कड़ी के लिये मेरी पिछली पोस्ट देखें)

यह है पहला भाग:


वह एक बुरा दिन था। परेड में यह घोषणा हुई थी कि अबसे हम कैदियों के कई काम विध्वंसक कार्रवाई माने जायेंगे। और विध्वंसक माने जाने के कारण उनके लिये तुरंत फांसी की सजा मिला करेगी। इन आपराधिक कामों में अपने कम्बल से छोटे छोटे टुकड़े काट लेना (जो हम अपने घुटनों के सपोर्ट के लिये करते थे) जैसे छोटे कृत्य भी शामिल थे। बहुत हल्की चोरियां भी इन विध्वंसक कामों की सीमा में ले आयी गयी थीं।

कुछ दिन पहले एक भूख से व्याकुल कैदी ने स्टोर से कुछ पाउण्ड आलू चुराये थे। इसे पता चलने पर बड़ी गम्भीरता से लिया जा रहा था। चुराने वाले को सेंधमार की संज्ञा दी जा रही थी। अधिकारियों ने हम कैदियों को आदेश दिया था कि हम उस “सेंधमार” को उनके हवाले कर दें, अन्यथा हम सभी 2500 कैदियों को एक दिन का भोजन नहीं मिलेगा। और हम सभी 2500 ने एक दिन का उपवास करना बेहतर समझा था।

जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक “मैंस सर्च फॉर मीनिंग” उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने मात्र 9 दिनों में लिखी थी.

इस दिन शाम को हम सभी भूखे अपनी झोंपड़ियों में लेटे थे। निश्चय ही हम बड़ी मायूसी में थे। बहुत कम बातें हो रही थीं। हर आदमी चिड़चिड़ा हो रहा था। ऐसे में बिजली भी चली गयी। हम लोगों की चिड़चिड़ाहट और बढ़ गयी। पर हमारे सीनियर ब्लॉक के वार्डन बुद्धिमान आदमी थे। उन्होने एक छोटी सी टॉक में उन बातों को बताया जो हम सब के मन में चल रही थीं। उन्होने पिछले दिनों बीमारी या भूख से मरे साथियों की चर्चा भी की। लेकिन वे यह बताना नहीं भूले कि मौतों का असली कारण क्या था – वह था – जीने की आशा छोड़ बैठना। सीनियर ब्लॉक वार्डन ने कहा कि कोई न कोई तरीका होना चाहिये जिससे साथी लोग इस चरम अवस्था तक न पंहुंच जायें। और उन्होने इस बारे में मुझे कुछ सलाह देने का आग्रह किया।

भगवान जानता है कि मैं अपने साथियों को उनके आत्मिक स्वास्थ्य के लिए किसी मनोवैज्ञानिक स्पष्टीकरण या उपदेश युक्त सलाह देने हेतु कतई मूड में नहीं था। मैं सर्दी और भूख से परेशान था। मुझमें थकान और चिड़चिड़ाहट थी। पर मुझे अपने को इस अभूतपूर्व स्थिति के लिये तैयार करना ही था। आज उत्साह संचार की जितनी आवश्यकता थी, उतनी शायद पहले कभी नहीं थी।

अत: मैने छोटी छोटी सुविधाओं की चर्चा से अपनी बात प्रारम्भ की। मैने बताया कि योरोप की द्वितीय विश्वयुद्ध की छठी सर्दियों में भी हमारी दशा उतनी खराब नहीं थी, जितनी हम कल्पना कर सकते हैं। मैने कहा कि हम सब सोचने का यत्न करें कि अब तक हमें कौन कौन सी क्षति हुई है, जिसे भविष्य में रिकवर न किया जा सके। मैने यह अटकल लगाई कि बहुत से लोगों के मामले में यह बहुत कम होगी। हममें से जो भी जिन्दा थे, उनके पास आशा के बहुत से कारण थे। स्वास्थ्य, परिवार, खुशियां, व्यवसायिक योग्यता, सौभाग्य, समाज में स्थान – ये सब या तो अभी भी पाये जा सकते हैं या रिस्टोर किये जा सकते हैं। आखिर अभी हमारी हड्डियां सलामत हैं। और हम जो झेल चुके हैं, वह किसी न किसी रूप में हमारे लिये भविष्य में सम्पदा (एसेट) बन सकता है। फिर मैने नीत्शे को उधृत किया – “वह जो मुझे मार नहीं डालता, मुझे सक्षमतर बनाता है”।

आगे मैने भविष्य की बात की। मैने यह कहा कि निरपेक्ष रूप से देखें तो भविष्य निराशापूर्ण ही लगता है। हममें से हर एक अपने बच निकलने की न्यून सम्भावना का अन्दाज लगा सकता है। मेरे अनुसार, यद्यपि हमारे कैम्प में क्षय रोग की महामारी नहीं फैली थी, मैं अपने बच निकलने की सम्भावना बीस में से एक की मानता हूं। पर इसके बावजूद मैं आशा छोड़ कर हाथ खड़े कर देने की नहीं सोचता। क्योंकि कोई आदमी नहीं जानता कि भविष्य उसके लिये क्या लेकर आयेगा। वह यह भी नहीं जानता कि अगले घण्टे में क्या होगा। भले ही हम अगले महीनों में किसी सनसनीखेज सामरिक घटना की उम्मीद नहीं करते, पर (कैम्प के पुराने अनुभव के आधार पर) हमसे बेहतर कौन जानता है कि व्यक्ति (इण्डीवीजुअल) के स्तर पर बड़ी सम्भावनायें अचानक प्रकटित हो जाती हैं। उदाहरण के लिये हममें से कोई किसी अच्छे ग्रुप के साथ अचानक जोड़ दिया जा सकता है, जहां काम की स्थितियां कहीं बेहतर हों। और किसी कैदी के लिये तो यह सौभाग्य ही है।…..

(शेष भाग 2 में, कल)


आलू और कोल्डस्टोरेज



तेलियरगंज, इलाहाबाद में एक कोल्ड स्टोरेज है। उसके बाहर लम्बी कतारें लग रही हैं आलू से लदे ट्रकों-ट्रैक्टरों की। धूप मे‍ जाने कितनी देर वे इन्तजार करते होंगे। कभी कभी मुझे लगता है कि घण्टो‍ नहीं, दिनों तक प्रतीक्षा करते हैं। आलू की क्वालिटी तो प्रतीक्षा करते करते ही स्टोरेज से पहले डाउन हो जाती होगी।

पढ़ने में आ रहा है कि बम्पर फसल हुई है आलू की। उत्तरप्रदेश के पश्चिमी हिस्सों – आगरा, मथुरा, फिरोज़ाबाद, हाथरस आदि में तो ट्रकों-ट्रैक्टरों के कारण ट्रैफिक जाम लग गया है। मारपीट के मामले हो रहे हैं। आस पास के राज्यों के कोल्डस्टोरेज प्लॉण्ट्स को साउण्ड किया जा रहा है।

भारत में ५००० से अधिक कोल्डस्टोरेज हैं और उत्तरप्रदेश में १३०० हैं जो ९० लाख टन स्टोर कर सकते हैं। मालगाड़ी की भाषा में कहें तो करीब ३६०० मालगाड़ियां! लगता है कि कोल्डस्टोरेज आवश्यकता से बहुत कम हैं। उनकी गुणवत्ता भी स्तरीय है, यह भी ज्ञात नहीं। स्तरीय गुणवत्ता में तो आलू ८-९ महीने आसानी से रखा जा सकता है। पर हमें सर्दियों में नया आलू मिलने के पहले जो आलू मिलता है उसमें कई बार तो २५-३०% हिस्सा काला-काला सड़ा हुआ होता है।

उत्तर-मध्य रेलवे में हमने इस महीने आलू का लदान कर तीन ट्रेनें न्यू-गौहाटी और हासन के लिये रवाना की है। मुझे नहीं मालुम कि कोल्डस्टोरेज और ट्रेन से बाहर भेजने का क्या अर्थशास्त्र है। पर एक कैरियर के रूप में तो मैं चाहूंगा कि आगरा-अलीगढ़ बेल्ट से ३-४ और रेक रवाना हों! और अभी तो मालगाड़ी के रेक तो मांगते ही मिलने की अवस्था है – कोई वेटिंग टाइम नहीं!

घर पर आलू विषयक अपना काम मेरी अम्मा ने पूरा कर लिया है। आलू के चिप्स-पापड़ पर्याप्त बना लिये हैं। आपके यहां कैसी तैयारी रही?


विदर्भ: मैं विक्तोर फ्रेंकल पर लौटना चाहूंगा



आठ महीने से अधिक हुये मैने विक्तोर फ्रेंकल के बारे में पोस्ट लिखी थी:

अब जब विदर्भ की आत्महत्याओं नें मन व्यथित किया है, तब इस पोस्ट की पुन: याद आ रही है। विदर्भ की समस्या वैसी ही जटिल है जसे नात्सी कंसंट्रेशन कैम्प की हालत। यहां सरकार की उदासीनता या कपास का खरीद मूल्य ठीक स्तर पर न रखने का मामला है। किसान की (शायद) अधिक की अपेक्षा है, बाजार की ठगी है, किसान की मेहनत का वाजिब मूल्य न मिलना है, मौसम की रुक्षता है – और न जाने क्या क्या है। पर उस सब का नैराश्य नात्सी कंसंट्रेशन कैम्प से ज्यादा नहीं होगा।

इसलिये मैं विक्तोर फ्रेंकल का आशावाद उस पुरानी पोस्ट के माध्यम से पुन: व्यक्त करना चाहता हूं। आप वह पोस्ट पढ़ें:


जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक मैंस सर्च फॉर मीनिंग”* उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने
मात्र 9 दिनों में लिखी थी.


पुस्तक में एक प्रसंग है. नात्सी यातना शिविर में 2500 कैदी एक दिन का भोजन छोड़ने को तैयार हैं क्योंकि वे भूख के कारण स्टोर से कुछ आलू चुराने वाले कैदी को चिन्हित कर मृत्युदण्ड नहीं दिलाना चाहते. दिन भर के भूखे कैदियों में ठण्ड की गलन, कुपोषण, चिड़चिड़ाहट, निराशा और हताशा व्याप्त है. बहुत से आत्महत्या के कगार पर हैं. बिजली भी चली गयी है. ऐसे में एक सीनियर विक्तोर को कैदियों को सम्बोधित कर आशा का संचार करने को कहता है. विक्तोर छोटा सा पर सशक्त सम्बोधन देते हैं और उससे कैदियों पर आशातीत प्रभाव पड़ता है. मैं इस अंश को बार-बार पढ़ता हूं. उससे मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है. उस ढ़ाई पृष्ठों का अनुवाद मैं फिर कभी करने का यत्न करूंगा. (सॉरी, यह मैं अब तक नहीं कर पाया। – 29 मार्च 2008)

अभी मैं पुस्तक के कुछ उद्धरणों का अनुवाद प्रस्तुत करता हूं, जो यह स्पष्ट करे कि विक्तोर फ्रेंकल की सोच किस प्रकार की थी. विभिन्न विषयों पर फ्रेंकल इस प्रकार कहते हैं:

अपने नजरिये को चुनने की स्वतंत्रता पर:
मानव से सब कुछ छीना जा सकता है. सिवाय मानव की मूलभूत स्वतंत्रता के. यह स्वतंत्रता है
किसी भी स्थिति में अपना रास्ता चुनने हेतु अपने नजरिये का निर्धारण करने की.

वह, जो मुझे मारता नहीं, मुझे और दृढ़ता प्रदान करता है. – नीत्से.

जीवन मूल्यों और लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध होने पर:
मानव को तनाव रहित अवस्था नहीं चाहिये. उसे चाहिये एक उपयुक्त लक्ष्य की दिशा में सतत आगे बढ़ती और जद्दोजहद करती अवस्था.

तनावों को किसी भी कीमत पर ढ़ीला करना जरूरी नहीं है, जरूरी है अपने अन्दर के सोये अर्थ को उद्धाटित करने को उत्प्रेरित होना.

जीवन के अर्थ की खोज पर:
हमें अपने अस्तित्व के अर्थ की संरचना नहीं करनी है, वरन उस अर्थ को खोजना है.

और हम यह खोज तीन प्रकार से कर सकते हैं (1) काम कर के, (2) जीवन मूल्य पर प्रयोग कर के और (3) विपत्तियां झेल कर.

अपने कार्य को पूरा करने पर:
एक व्यक्ति जो जानता है कि उसकी किसी व्यक्ति के प्रति कुछ जिम्मेदारी है जो उसके लिये प्रेम भाव से इंतजार कर रहा होगा; अथवा उस अधूरे काम के प्रति जो उसे पूरा करना है, तो वह कभी अपने जीवन को यूंही फैंक नहीं देगा. अगर उसे जीवन के
क्यों की जानकारी है तो वह “कैसी भी परिस्थिति को झेल जायेगा.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम जिन्दगी से क्या चाहते हैं, वरन यह है जिंदगी हमसे क्या चाहती है. हम जीवन के अर्थ के बारे में प्रश्न करना छोड़; प्रति दिन, प्रति घण्टे अपने आप को यह समझने का यत्न करें कि जिन्दगी हमसे प्रश्न कर रही है. हमारा उत्तर ध्यान और वार्ता में नहीं वरन सही काम और सही आचरण में होना चाहिये. जिन्दगी का अर्थ उसकी समस्याओं के सही उत्तर पाने तथा वह जिन कार्यों की अपेक्षा मानव से करती है, उनके पूर्ण सम्पादन की जिम्मेदारी मानने में है.


* – पुस्तक पर विकी लिंक यहां है.
और विक्तोर फ्रेन्कल के एक इण्टरव्यू का वीडियो यहां है:


विदर्भ की आत्महत्याओं का तोड़ (वाकई?)



मुझे झेंप आती है कि मेरे पास विदर्भ की समस्या का कोई, बेकार सा ही सही, समाधान नहीं है। वैसे बहुत विद्वता पूर्ण कहने-लिखने वालों के पास भी नहीं है। सरकार के पास तो नहियंई है। वह तो मात्र कर्ज माफी का पेड़ लगा कर वोट के फल तोड़ना चाहती है।



श्रीयुत श्रीमोहन पाण्डेय

हमारे साथी अधिकारी श्रीयुत श्रीमोहन ने एक पते की बात बताई है। उनका गांव बलिया जिला में है। गरीबी का मूल स्थान है बलिया। और आज भी गरीबी की भीषणता के दर्शन करने हों तो वहां जाया जा सकता है।

करनराम, गांव दामोदरपुर, पास का रेल स्टेशन फेफना, जिला बलिया के निवासी थे। वे 96 साल की जिन्दगी काट कर दुनियां से गये। उनके अपने पास एक इंच जमीन नहीं थी। गांव में एक बाग में संत की समाधि की देखभाल करते थे करनराम जी। आसपास की लगभग एक बीघा की जमीन में अरहर, पटसन, चना – जो भी हो सकता था बो लेते थे। कुछ और कमाई के लिये पाजामा-कुरता-नेकर आदि देसी पहनावे के वस्त्र सिल लेते थे। उनकी पत्नी उनकी मृत्यु से तीन साल पहले मरी थीं। अर्थात दोनो पूरी जिन्दगी काट कर दुनियां से गये। एक लड़का था जिसे चतुर्थ श्रेणी में एफ सी आई में नौकरी मिली थी और जो अपने बूते पर अफसर बन गया था; पर करन राम जी ऐसे स्वाभिमानी थे कि लड़के से एक रत्ती भी सहायता कभी नहीं ली।


ढ़ोल

करनराम जी के पास खाने को कुछ हुआ तो ठीक वरना पटसन के फूलों की तरकारी बना कर भी काम चलाते थे। सदा मस्त रहने वाले जीव। किसी भी मेले में उनकी उपस्थिति अनिवार्य बनती थी। चाहे बलिया का ददरी मेला हो या गड़वार के जंगली बाबा के मन्दिर पर लगने वाला मेला हो। बड़े अच्छे गायक थे और ढ़ोल बजाते थे। अभाव में भी रस लेने का इंतजाम उनकी प्रकृति का अंग बना हुआ था। उन्हे अवसाद तो कभी हुआ न होगा। भले ही भूखे पेट रहे हों दिनो दिन।

करनराम जी एब्जेक्ट पावर्टी में भी पूरी जिन्दगी मस्त मलंग की तरह काट गये। और पूर्वांचल में करनराम अकेले नहीं हैं। यहां भूख के कारण मौत हो सकती है। पर विदर्भ की तरह के किसानों के सपने टूटने के अवसाद की आत्महत्या वाली मौतें नहीं होतीं। लोगों ने अपनी कृषि से कैश क्रॉप के अरिथमैटिक/कैश-फ्लो वाली अपेक्षायें अपने पर लाद नहीं रखी हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बेचे स्वप्न बिना वास्तविकता का डिस्काउण्ट लगाये उन लोगों ने स्वीकार नहीं कर लिये हैं। उन सपनों के आधार पर हैसियत से ऊपर के कर्ज नहीं ले रखे हैं। मितव्ययता/फ्रूगालिटी उनके गुणसूत्र में है। गंगा की बाढ़ ने सहस्त्राब्दियों से अभावों को सहजता से लेना उन्हे सिखाया है। आप एक आध चारवाकवादी को उद्धृत भले कर दें यहां के; पर सामान्य जनसंख्या करनराम जी की तरह की है।

करनराम जी का उदाहरण शायद विदर्भ का एण्टीडोट हो। न भी हो तो भी उसपर विचार करने से क्या जाता है। अपनी अपेक्षायें कम करने और थोड़े में प्रसन्नता ढ़ूंढ़ना ही तो समाधान है। और कोई समाधान भी तो नहीं है। है भी तो लफ्फाजी की चाशनी में लिपटा यूटोपिया है!

आप भी सोचें!


मुझे पक्का यकीन है कि बुद्धिवादी मेरी इस पोस्ट को खारिज करने का पूरा मन बनायेंगे। देश के आर्थिक विकास की बजाय मैं फ्रूगालिटी की बात कर रहा हूं। और असली बात – किसान की आत्महत्या का इतना बढ़िया मुद्दा मिला है सरकार पर कोड़े बरसाने का, उसे छोड़ मैं पटसन के फूलों की तरकारी की वकालत कर रहा हूं।

“सरकारी मुलाजिम हूं न! सो सरकार के पक्ष के लिये मामला डाइवर्ट कर रहा हूं!”


मणियवा खूब मार खाया



मणियवा का बाप उसे मन्नो की दुकान पर लगा कर पेशगी 200 रुपया पा गया। सात-आठ साल के मणियवा (सही सही कहें तो मणि) का काम है चाय की दुकान पर चाय देना, बर्तन साफ करना, और जो भी फुटकर काम कहा जाये, करना। उसके बाप का तो मणियवा को बन्धक रखवाने पर होली की पन्नी (कच्ची शराब) का इंतजाम हो गया। शांती कह रही थी कि वह तो टुन्न हो कर सड़क पर लोट लोट कर बिरहा गा रहा था। और मणियवा मन्नो की दुकान पर छोटी से गलती के कारण मार खाया तो फुर्र हो गया। उसकी अम्मा उसे ढ़ूंढ़ती भटक रही थी। छोटा बच्चा। होली का दिन। मिठाई-गुझिया की कौन कहे, खाना भी नहीँ खाया होगा। भाग कर जायेगा कहां?

शाम के समय नजर आया। गंगा किनारे घूम रहा था। लोग नारियल चढ़ाते-फैंकते हैं गंगा में। वही निकाल निकाल कर उसका गूदा खा रहा था। पेट शायद भर गया हो। पर घर पंहुचा तो बाप ने, नशे की हालत में होते हुये भी, फिर बेहिसाब मारा। बाप की मार शायद मन्नो की मार से ज्यादा स्वीकार्य लगी हो। रात में मणियवा घर की मड़ई में ही सोया।

कब तक मणियवा घर पर सोयेगा? सब तरफ उपेक्षा, गरीबी, भूख देख कर कभी न कभी वह सड़क पर गुम होने चला आयेगा। और सड़क बहुत निर्मम है। कहने को तो अनेकों स्ट्रीट अर्चिंस को आसरा देती है। पर उनसे सब कुछ चूस लेती है। जो उनमें बचता है या जैसा उनका रूपांतरण होता है – वह भयावह है। सुकुमार बच्चे वहां सबसे बुरे प्रकार के नशेड़ी, यौन शोषित, अपराधी और हत्यारे तक में मॉर्फ होते पाये गये हैं।

जी हां। हम सब जानते हैं कि मणियवा खूब मराया गया (मार खाया) है। एक दो साल और मरायेगा। फिर मणियवा गायब हो जायेगा?! कौन कब तक मार खा सकता है? हां, जिन्दगी से मार तो हमेशा मिलेगी!


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अब देखिये, चाहता था हैरीपॉटरीय तिलस्म। अनूप शुक्ल ने बताया हामिद का चिमटा और छूटते ही लिख बैठा मणियवा की अभाव-शोषण ग्रस्त दास्तान। पता नहीं, गंगा किनारे मणियवा को यूं ही टहलते हैरीपॉटरीय तिलस्म दिखता होगा उसको अपने अभाव के रिक्ल्यूज़ के रूप में। हर घोंघे-सीपी में नया संसार नजर आता होगा।

बचपन में हमने भी उस संसार की कल्पना की है, पर अब वैसा नहीं हो पाता!


इस पोस्ट के लिये चाय की केतली और ग्लास रखने के उपकरण का चित्र चाहिये था। मेरे दफ्तर की केण्टीन वाला ले कर आया। केतली खूब मांज कर लाया था। उसे मेरा चपरासी यह आश्वासन दे कर लाया था कि कोई परेशानी की बात नहीं है – तुम्हारी फोटो छपेगी; उसके लिये बुलाया है।

आप केण्टीन वाले का भी फोटो देखें। वह तो शानदार बालों वाला नौजवान है। पर उसके पास तीन चार छोटे बच्चे हैं काम करने वाले – मणि की तरह के।

और हां मणियवा भी काल्पनिक चरित्र नहीं है – पर जान बूझ कर मैं उसका चित्र नहीं दे रहा हूं।


भूमिगत जल और उसका प्रदूषण



आज बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में आप श्री पंकज अवधिया द्वारा भूमिगत जल और उसके प्रदूषण पर विस्तृत जानकारी उनके नीचे दिये गये लेख में पढ़ें। इस लेख में जल प्रदूषण पर और कोणों से भी चर्चा है। उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं।


भूमिगत जल क्या हमेशा प्रदूषण से बचा रहता है? क्या हम बिना किसी जाँच के इसका उपयोग कर सकते हैं ? बहुत वर्ष पहले मैने एक भू-जल विशेषज्ञ से यह प्रश्न किया था। उनका जवाब वही था जो हमने पाठ्य पुस्तको मे प ढ़ा था। मतलब भूमिगत जल प्रदूषण से मुक्त रहता है। इसी विश्वास के साथ हम पानी का उपयोग करते रहे पर आज जब छत्तीसगढ के शहरों मे भूमिगत जल मे तरह-तरह की अशुद्धियाँ मिल रही हैं और लोग बीमार प रहे है तो अचानक ही हमे अपनी ग लती का अहसास हो रहा है कि हमने एक अधूरे विज्ञान पर विश्वास किया। राज्य मे चूने पर आधारित भू-रचना है। वर्षा का जल कार्बन डाई-आक्साइड के साथ मिलकर तनु अम्ल बनाता है। यह अम्लीय पानी चूने मे जगह बनाता जाता है और नीचे एकत्र हो जाता है। भूमि के अन्दर छोटे-छोटे पोखर होते है जिन्हे एक्वीफर कहा जाता है। यह आपस मे जुड़े होते है। आप इस चित्र को देखे तो आप को पता चलेगा कि कैसे प्रदूषक आपके साफ-सुथरे जल को दूषित कर सकते हैं


««« आप संलग्न थम्बनेल पर क्लिक कर “Living on Karst – A reference guide” नामक वेब पन्ने पर जायें। वहां पृष्ठ 4 के अंत मे बने रेखाचित्र को देखे कि भूमिगत पानी का प्रदूषण कैसे होता है।


सघन बस्तियों मे प्रदूषण की समस्या कई गुना ब जाती है। छत्तीसगढ मे बते शहरीकरण के कारण हजारों बोरवेल अमृत की जगह जहर दे रहे हैं । पूरे देश मे कमोबेश यही स्थिति है। नाँन पाइंट पाँल्यूशन की बात दुनिया भर में हो रही है। इस लिंक पर क्लिक कर आप उस विषय पर एक इण्टरेक्टिव फ्लेशप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन को भी देख सकते हैं।


पिछले एक दशक से भी अधिक समय से मै जल से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। मानसून की पहली वर्षा की प्रतीक्षा पारम्परिक चिकित्सक बेसब्री से करते रहते हैं । अलग-अलग वनस्पति से एकत्र की गयी पहली वर्षा का जल नाना प्रकार के रोगों की चिकित्सा में प्रयोग होता है। विशेष पात्रो में इस जल को एकत्र कर लिया जाता है फिर साल भर विभिन्न तरीकों से इसका उपयोग होता रहता है। आप इस कड़ी पर जाकर यह जानकारी पा सकते हैं कि कैसे अलग-अलग वनस्पति से एकत्र किया गया जल रोगों से मुक्ति दिलवाता है।


भारत में पहली मानसूनी वर्षा मे नहाने की परम्परा सदा से रही है। इससे गर्मी मे होने वाले फोडे-फुंसी से निजात मिलती है। मेरे एक जापानी मित्र भारत के इस ज्ञान से अभिभूत हैं। वे कहते हैं कि जापान मे तो पहली वर्षा होते ही हम शरीर को ढ़ंक लेते हैं कि कही अम्लीय वर्षा से नाना-प्रकार के रोग न हो जायें । औद्योगिक प्रदूषण जो बढ गया है। अब धीरे-धीरे भारत मे भी यही हाल हो रहा है।


भारत मे नदियों का जाल फैला हुआ है। गंगा जल के औषधीय महत्व को तो हम सब जानते हैं । देश के पारम्परिक चिकित्सक प्रत्येक नदी के पानी के औषधीय गुणों के विषय मे जानते हैं वे रोग विशेष से प्रभावित रोगियों को विशेष नदी का पानी पीने की सलाह देते हैं । वे बताते हैं कि जिस प्रकार के वनो से बहकर नदी पहाड़ों से मैदानो मे आती है उसके औषधीय गुण भी वैसे ही हो जाते हैं । मुझे याद आता है कि बस्तर मे इन्द्रावती नदी के किनारे निर्मली नामक वृक्ष पहले बहुत होते थे। यह वही निर्मली है जिसका प्रयोग पी ढ़ि यों से आदिवासी गन्दे जल को साफ करने में करते रहे हैं। इस नदी के जल का उपयोग दवा के रुप मे होता था। आज निर्मली के वृक्ष काटे जा चुके हैं और नदी की स्थिति हम सभी जानते हैं । जैसा कि आप जानते हैं, मैं मधुमेह से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर एक रपट तैया र कर रहा हूँ। इस रपट मे बीस से अधिक छोटी-बडी नदियों के जल के औषधीय उपयोग का वर्णन मैने किया है। यह अपने आप मे अदभुत ज्ञान है। उदाहरण के लिये पैरी नामक नदी का जल उन वनस्पतियों के साथ दिया जाता है जो कि श्वाँस और मधुमेह रोगों से प्रभावितों के लिये उपयोगी हैं


देश के पारम्परिक चिकित्सक कुँओं के पास पीपल प्रजाति के वृक्षो की उपस्थिति को अच्छा मानते है। गूलर के साये मे स्थिति कुँ ए के जल का सबसे अच्छा माना जाता है। तालाबों के आस-पास इन वृक्षों की उपस्थिति देखी जा सकती है। यह विडम्बना ही है कि इनके महत्व मे बारे में नयी पीढ़ी को बताने हेतु बहुत कम प्रयास हो रहे हैं मुझे नही लगता कि अपने पूर्वजो की दूरदर्शिता के कारण जी रहे हमारी पीढी के लोग कभी पीपल और गूलर जैसे नये वृक्षों को लगाने का पुण्य कार्य करेंगे। इसका खामियाजा वर्तमान और आने वाली पीढी को भुगतना होगा।


जल संरक्षण के नाम पर देश भर मे करोड़ों फूँके जा रहे हैं। पंचतंत्र के रट्टू तोते की तरह सब चिल्ला रहे हैं। शिकारी आता है, जाल फैलाता है, जाल मे नही फंसना चाहिये पर कोई भी शिकारी को देखकर भाग नही रहा है। हम खूब व्याख्यान दे रहे हैं कि जल को बचाना चाहिये। बीच-बीच मे सूखे गले को तर करने हम सत्व विहिन बोतल बन्द पानी भी पी लेते हैं पर कभी अपनी दिनचर्या से समय निकालकर विशेष प्रयास नहीं करते हैं। जल के नाम पर असंख्य संगठन कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं। जितना पैसा आज तक इन्हे प्रचार के लिये दिया गया है उसका आधा भी जमीनी कार्य मे लगा दिया जाता तो आज देश की स्थिति कुछ बदली-बदली नजर आती।


निर्मली पर शोध आलेख

गूलर (डूमर) पर शोध आलेख


पंकज अवधिया

© लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


पंकज अवधिया जी की उक्त पोस्ट ने मुझे चिंता में डाल दिया हैं। मेरे घर में पानी की सप्लाई के दो सोर्स हैं। एक तो म्यूनिसिपालिटी की पाइप की सप्लाई है, जो लोगों द्वारा टुल्लू पम्प लगा कर पानी खींचने की वृत्ति के कारण बहुत कम काम आती है। दूसरा सोर्स बोरवेल का है। उससे पानी तो पर्याप्त मिलता है, पर उसके स्थान और एक छोटे सेप्टिक टेंक में दूरी बहुत ज्यादा नहीं है। यद्यपि कभी समस्या जल प्रदूषण के कारण पेट आदि की तकलीफ की नहीं हुई, पर सम्भावना तो बन ही जाती है कि प्रदूषक जमीन के नीचे के जल तक पंहुच जायें।

हमारे घर में तो सेप्टिक टेंक को री-लोकेट करने के लिये स्थान उपलब्ध है; और एक योजना भी हम लोगों के मन में है। लेकिन शहरी रिहायश में बहुधा लोगों की जल-मल निकासी उनके पानी के सोर्स से गड्डमड्ड होती ही है और जल प्रदूषण से हैजा जैसी समस्यायें आम सुनने में आती हैं।
पता नहीं समाधान क्या है?