दीपक पटेल जी की सोच


दीपक पटेल जी कौन हैं – पता नहीं। मेरी राजभाषा बैठक के दौरान इधर उधर की वाली पोस्ट में बापू के लिखे के अनुवाद पर उनकी रोमनागरी में हिन्दी टिप्पणियां हैं। कोई लिंक नहीं है जिससे उनका प्रोफाइल जाना जा सकता। पर उन्होनें जो टिप्पणियों में लिखा है; उसके मुताबिक वे बहुत प्रिय पात्र लगते हैं। उनकी हिन्दी का स्तर भी बहुत अच्छा है (बस, देवनागरी लेखन के टूल नहीं हैं शायद)। ऐसे लोग हिन्दी में नेट पर कण्ट्रीब्यूटर होने चाहियें।

मैं तो उनकी टिप्पणी पर फुटकर विचार रखना चाहूंगा:

  1. बापू हमारे राष्ट्रपिता ही नहीं, हमारी नैतिकता के उच्चतम आदर्श हैं। भारत में जन्मने के जो भी कष्ट हों; हममें अन्तत: वह गर्व-भाव तो रहेगा ही कि यह हमारा वह देश है, जहां बापू जन्मे, रहे और कर्म किये। उनके आश्रम में उनकी वस्तुयें देखी परखी हैं और एक रोमांच मन में सदैव होता है कि इतना सरल आदमी इतना ऊंचा उठ गया। हमें उन लोगों से मिलने का भी गर्व है जो कभी न कभी बापू के सम्पर्क में आये थे।
  2. बापू की भाषा – मैं उनकी अंग्रेजी की बात कर रहा हूं, इतनी सरल है कि समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। शुरू में, स्कूली दिनों में, जब हमें अंग्रेजी कम आती थी तो गांधीजी की आत्मकथा और अन्य पतली-पतली बुकलेट्स जो उन्होंने लिखी थीं, मन लगा कर पढ़ते थे जिससे कि अंग्रेजी सीख सकें। बापू के कहे का आशय समझ में न आ सके – यह अटपटा लगता है। यह तो तभी हो सकता है जब किसी बन्दे का एण्टीना बापू के सिगनल पर शून्य एम्प्लीफिकेशन और राखी सावन्त के सिगनल पर 10K का एम्प्लीफिकेशन फैक्टर रखता हो। पर ऐसा व्यक्ति वास्तव में बिना सींग-पूंछ का अजूबा ही होगा।
  3. इस ब्लॉगजगत में कई विद्वान ऐसे होंगे जो मरकहे बैल की तरह बापू को गरिया/धकिया सकते हैं। बापू को आउट डेटेड बता सकते हैं। बापू तो हिन्दी की तरह हैं – मीक और लल्लू! पर क्राइस्ट की माने तो भविष्य मीक और लल्लू का ही है। और एक प्रकार से सदा रहा है। बस – मीक और लल्लू के बदले कायर न पढ़ा जाये। मुझे बापू जैसा साहसी वर्तमान युग में देखने को नहीं मिला। जो आदमी अपनी न कही जा सकने वाली गलतियां भी स्वीकारने में झेंप न महसूस करे, उससे बड़ा साहसी कौन होगा? और मित्रों, हम साहस हीनता (दुस्साहस नहीं) से ही तो जूझ रहे हैं?

दीपक पटेल जी की सोच को मेरी फुटकर पोस्ट ने टिकल किया; यह जान कर मुझे प्रसन्नता है। बापू की वर्तमान युग में प्रासंगिकता पर चर्चा होनी चाहिये और कस कर होनी चाहिये।

ब्लॉगजगत में महाफटीचर विषयों पर अन्तहीन चर्चा होती है। बापू जैसे सार्थक चरित्र पर क्यों नहीं हो सकती?!


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21 thoughts on “दीपक पटेल जी की सोच

  1. ज्ञान जी, आप की बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ. जिस देश में “गांधी” और “गंगा” हों, उस देश में जन्मने का अर्थ ही अलग है …… जहाँ तक बापू पर चर्चा की बात है, तो किसी सार्थक चर्चा के लिए इस से उपयुक्त विषय और क्या हो ?

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  2. आप बिल्कुल सही कह रहे हैं । जिसे दुनिया ने माना उसे हम न मानें तो बेवकूफ कौन हुआ ?

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  3. विचारोत्तेजक ,एक लेखक के तौर पर भी बापू का मूल्यांकन शुरू हो चुका हुआ है -मेरे पिता जी बापू की अंग्रेजी पढ़ने को उकसाते रहते थे ….उसकी सहजता ,सरलता के वे कायल थे -मैंने पाया है कि किसी विषय का धुरंधर विद्वान् ही संदर्भगत बात को सरल शब्दों मे कह सकता है -बापू के लेखन से यही बात चरितार्थ होती है -यह भी तय है कि वे एक गंभीर अध्येता थे -क्या पश्चिम ,क्या पूर्व ,क्या प्राचीन ,क्या अर्वाचीन ,सभी वांग्मय उन्होंने पढ़ बांच डाला था -उनके लेखन मे यह पल पल इंगित होता है -आपने ठीक कहा बापू जैसा साहसी व्यक्ति शायद ही कोई रहा हो जो अपनी कमजोरियों को सहज ही व्यक्त कर देते थे -कोई दुराव छुपाव ,पाखंड तो उनके व्यक्तित्व मे लगता ही नही -उनका जीवन एक खुली किताब है .ऐसी महान शख्सियत पर चर्चा शुरू करने के लिए धन्यवाद …….

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  4. ज्ञान जी, बापू को समझने की जरुरत है, आज के परिप्रेक्ष्य में। उन की उस ताकत को जानने की जरुरत है, जिसने टुकड़े-टुकड़े भारत को एक कर दिया। भारत को भारत बनाया। आलोचना तो सभी की की जा सकती है। लेकिन सब से कुछ न कुछ सीखा भी जा सकता है। भूतकाल का कोई भी नेतृत्व आज की परिस्थितियों पर खरा नहीं उतर सकता। नए नेतृत्व को नया होना होगा। वह भूतकालीन-वर्तमान आदर्शों से ही निर्मित होगा। दीपक पटेल भी मिल ही जाएंगे।

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  5. आज फिर जख्‍़म हरे कर देने वाला वाक्‍या अ‍ाखिर उठा ही गया। आज के ही दिन अर्थात 23 मार्च 1931 को गांधी जी की ऐतिहासिक भूल के परिणाम स्‍वरूप भगत सिंह ,सुखदेव व राजगुरू को फाँसी हुई थी। गांधी की के कारण आज इतिहास इन वीरों को खो बैठा। गांधी की बात सिर्फ किताबों तक ही ठीक लगती है अगर वास्‍तविकता में देखा जाये गांधी जी ने कभी भी राष्‍ट्र के समक्ष्‍ा अपने अहं को सर्वोपरी रखने की कोई कसर नही छोड़ी थी। मुझे कहने में कतई संकोच नही कि गांधी का भारत और भारतीय प्रेम के मध्‍य बहुत बड़ी राजनैतिक सोच रही थी। जिसमें काग्रेसी सत्‍ता के परिणाम स्वरूप उनके अलोचनात्‍मक कार्यो पर पर्दे डाले गये।

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  6. Mrs. Asha Joglekar जी के प्रति, रही बात दुनिया मनती है तो दुनिया अपनी बहूँ-बेटियों को नंगा घूमा रही है तो हम भी धूमने चल दें, तो मुर्ख वो हुये कि हम ? arvind mishra जी के प्रतिगांधी जी एक अच्‍छे व्‍यक्तित्‍व हो सकते है, व्‍यक्ति नही। दिनेशराय द्विवेदी जी के प्रतिगाधी जी की चलती तो भारत को कईयों पाकिस्‍तान देखने पड़ते, यही तो आप शिक्षा प‍द्यति की भूल है कि सरदार पटेल जिन्होने सम्‍पूर्ण भारत को एक किया उनहे कोई याद नही करता है। गाधी माहत्‍म के आगे भी दुनिया जहाँ देश के सच्‍चे सपूतों ने देश के जिये काम किया है। दिनेश भाई की हार्दिक स्‍वागत है।

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  7. ह्म्म, इन दीपक पटेल जी का कमेंट मेरे कबीरपंथ वाले लेखों पर रेगुलर आय। हमनें इनका पता ठिकाना पूछा तो जनाब ने कमेंट में ही अपना मूल पता और वर्तमान पता पोस्टल एड्रेस समेत दे डाला।फ़िर एक दिन इन्होनें ऑर्कुट पर मेरी प्रोफाईल ढूंढ कर एड किया तब हमें मालूम चला कि ये सज्जन हैं छत्तीसगढ़ में राजिम के पास एक छोटे से गांव के, वर्तमान में कुवैत में कहीं नौकरी बजा रहे हैं। बड़े अच्छे बंदे लगे बातचीत से!!

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  8. कतिपय राजनीतिक दलो ने बापू को अपनी बपौती बना रखा है जिसके कारण वोट के चक्कर मे बाकी दल चाहकर भी उनकी तारीफ नही कर पाते है। मैने तो पूरी दुनिया मे ऐसे महापुरुष के बारे मे नही सुना है। काश मै उस समय पैदा हुआ होता। रही बात आलोचना की तो लोगो ने तो भगवान तक को नही छोडा है। उनकी भी गलती नही क्योकि जो गलत सूचना उत्तेजक रुप से दिमाग मे डाली जाती है- उसका ही यही परिणाम है। जो लोगो गाँधी जी के समकालीन है वे उनके खिलाफ उतना नही बोले जितना हमारी आज की पीढी विशेषकर युवा बोल रहे है। यदि वे एक महिने भी बापू की तरह जी कर देखे तो उन्हे अपनी गल्ती का अहसास हो जायेगा। आज अलग-अलग क्रांतिकारियो को अपने हित के लिये धडो मे बाँट लिया गया है और रोटी सेकी जा रही है। एक क्रांतिकारी की तुलना दूसरे से करने वाले यदि आज समाज के लिये कुछ करके दिखाये फिर बोले तो उनकी सुनी भी जाये पर खाली बेसिर पैर की बात का भारतीय जन-मानस पर शायद ही कोई प्रभाव पडे।

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  9. चर्चा को चर्चा का रूप देने के लिए प्रमेन्द्र जी को बधाई. अन्यथा तो बहस केवल गांधी के स्तुति-गान तक सीमित रह जाती है. हालांकि उनकी (प्रमेन्द्र जी की) बातों से पूरी तरह साम्य रखना कठिन प्रतीत होता है.

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  10. विद्वान तो नहीं हूं, लेकिन गांधी को लेकर मरकहा बैल आप मुझे ज़रूर कह सकते हैं।यह महात्मा व्यक्तिगत रूप से बहुत श्रेष्ठ रहा होगा, लेकिन इसने भारत देश का बहुत नुकसान किया ह। दलाली की राजनीति इसी शख्स की संस्कृति का नतीजा है।

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  11. बापू इतना बड़ा व्यक्तित्व हैं कि उनका पूरा मूल्यांकन कर पाना भी किसी साधारण व्यक्तित्व के बूते की बात नहीं है। बतौर पत्रकार बापू ने इतना लिखा है कि बड़के बड़के पत्रकार हांफ जायेंगे उसका एक चौथाई भी लिखने में। ऐसे कई व्यक्तित्व हुए हैं, जिनका बतौर पत्रकार, लेखक मूल्यांकन होना बाकी है। शांति कुंज के आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा शुरु की गयी पत्रिका अखंड ज्योति अब दस लाख हर महीने छपती है। मेरे ख्याल में यही एक रिकार्ड है। बापू का बतौर पत्रकार लेखक मूल्यांकन होना बाकी है। उनके द्वारा संपादित कितने ही अखबार हैं। चलिये इस तरह से बात तो शुरु हुई। अपने एंटीना का एंप्लीफिकेशन सब तरफ झक्कास है जी।

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  12. अनिलजी से सौ प्रतिशत सहमत और बहुत प्रतिशत प्रेमेन्द्रजी से भी।गांधीजी किताबों में और गांधीगिरी फिल्मों में ही अब ठीक लगती/ते है।

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  13. अच्छा, चर्चा हो रही है. एक बात है, चर्चा न हो मजे की बातें जानने के लिए मिलें ही नहीं. अब देखिये न, ये चर्चा न हुई होती तो पता कैसे चलता कि गाँधी केवल व्यक्तिगत रूप पर श्रेष्ठ थे. मतलब ये कि सार्वजनिक तौर पर तो ‘खतम’ रहे होंगे. दूसरा ये कि दलाली की राजनीति उन्होंने ही शुरू की. ये दलाली वाली बात सुनकर एक बार के लिए लगा कि किसी और गांधी की बात हो रही है. लेकिन महात्मा शब्द लगा हुआ है तो बापू के बारे में ही बात हो रही होगी. वैसे अनिल जी को हाथों-हाथ ये भी बता देना चाहिए था कि किसके दलाल थे. विद्वान् नहीं है तो क्या हुआ. इतनी बात तो पता होगी ही.महान लोगों के बारे में एक बात कही जाती है.Great men are remembered for their failures and ordinary for their triumphs.

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  14. अभी ऑर्कुट पर दीपक साहेब का मुझे स्क्रेप आया कि वह दीपक शर्मा है दीपक पटेल नही!! मुआफी चाहूंगा!

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  15. हमारे देश की जीवित स्मृति के कुछ ही सौभाग्य हो सकते हैं – जैसा आपने लिखा महात्मा गांधी उनमें सर्वोच्च कहे जाएँ तो अतिशयोक्ति न होगी – खासकर उस समय में, जब व्यक्तिगत / पारिवारिक / निजी स्वार्थों के बहुतायत नीति, राजनीति और नेतृत्व के पर्याय बन चुके हैं – या जुगाड़, विस्फोट और विध्वंस के बीज, रचनात्मक नवनिर्माण को खा चबा रहे हैं – किसी भी और विदुजन का किसी भी कारण/ अकारण बापू का आकलन जो भी हो – मेरे निजी मत में शंख-पद्म सर्वदा इकाई से ऊपर रहेंगे क्योंकि कसौटी पर किसी और को उतने खरे के कम से कम आस-पास तो पहुंचना चाहिए – उम्मीद का बेहतर रास्ता बापू के आस पास से ही निकलेगा – आपने सही लिखा है – पूर्ण सहमति – मिश्रा जी ने बहुत अच्छी प्रतिक्रिया भी दी है उनको भी बधाई – मैं महात्मा गांधी को कमज़ोर नहीं मानता बल्कि हमेशा दिनकर जी की “हिमालय” बापू से जोड़कर स्मृति में रखता हूँ – याद दिलाए रखने का शुक्रिया – सादर – मनीष

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  16. Gyanjee,Bahut bahut dhanyavad ki aapko meri hindi achhi lagi (Likhana to main hindi ka star chahta tha, lekin yah “star” agar romanagari mein hai to * (star) ho jata hai, aur anuvadak ke liye ek samasya khadha kar jata hai. Jaldi hi main hindi tool vagairah download karane ki koshish karunga aur phir shayad anuvadak ko samasya nahin hogi) Shayad aisa hi main kuchh kahana chahta tha, Bapujee ke liye. Vyakti, vyaktitva, sanstha shayad in sabse upar hain Bapujee. Mujhe garv hai ki un jaisa vyakti mere desh Bharat mein paida hua, jisne poori duniya ki soch kum se kum kahane ke liye hi sahi badal di, aur log Ahimsa, satyagrah ke bare mein agrah karne lage. Bapu ki pustaken maine bhi padhi hain bahut adkik nahin thodha bahut. Angrejee lekin mujhse tab bhi na seekhe gayi.Ganheejee ki pustak ka jikr thoda baad mein abhi is hi tippdi mein neeche karata hun. Apki purani post “sex” aur “gender” ka confusion kadha kar gayi thi. Aisa hi kuchh confusion apni college ke “ragging” vagairah main hota tha. Bapujee ne “sex” shabd ka prayog kiya bharteya parivesh main, bharteey sandarbh mein, apne updesh mein, jo paschatya sandarbh mein bilkul uchit tha. Lekin anuvadak agar videsh nahin gaya hai, to use “sex” ka matalab “intercourse” hi lagega, “gender” nahin, aur agar vah Bapujee ke mantabya ko samajh sakne ka madda rakhata hota, to shayad “anuvadak” na hota, balki vah bhi Hindi ya Angreje mein updesh de raha hota. Atev, yahan par updeshak, jo bharteey aur paschatya donon sandarbhon se avgat hai, ko bharteey parivesh mein bharteey bhasa aur paschimi parivesh mein paschimi bhasa ka prayog karana chahiye. Aur agar bhasa ka prayog na kar saken to angreji to aise bolen, ki aur jyada confusion na ho. Agar yah confusion anuvadak ya kisi bharteey vyakti ko videsh mein ho to phir bhi samajh mein aata hai, lekin agar uske apne desh mein ho to unuvadak ko galat thahrana mere samajh mein uchit nahin hai. Is hi sandarbh mein, kuchh chaunchak-rochak baten batana chahunga yahan par. Ek angrej saheb airport par pahunche aur ek achhe khase bhale bharteeya (samajh lijiye, mujhse he) puchhe “where is the rest room”. Jabab tha, “there is nothing like rest room here, you can rest whereever you want”. To yahan par samasya anuvadak ki nahin hai, varan parivesh ki hai. Use kya pata ki angrej logon ko pharig hone ki jagah ko rest-room kahate hain. Agar Gandhijee ka updesh kuchh aisa hota hi ki “There should be rest-room for the fair sex”. to pata nahin kya anuvad hota. Ek aur kafi prasidh ukti hai (jo meri dharm (ya adharm) patni hamesha hi bolti rahati hain. )Apne mashhoor bharteeya dhavak Shree Milkha Singh jee jab Olympic main daudhne gaye the aur shyad kahin kafi saf-suthri jamin pakar pair pasar rahe the, kisi angrej ka saval aaya. “Are you resting(h)?” apne angrejee lahaje mein. Milkha Singh jee ne jabab diya, “No, No, I am Milkha Singh.” “Res Sing(h) might be somewhere else.” Yahan par bhi garbari anuvad ki nahin thi, bas parivesh ki hai. Chaliye ab thodha Bapu ki bhi baten kar lete hain. Bapu mahan hain, mahatma hain, lekin phirbhi mera unse thodha sa matbhed hai. “Mahatma” ka sambodhan unhen “Gurudev” ne diya tha. “Gurudev” ne hi unhe “Sabarmati” ashram kholne ki prerna di thi. Shayad aap sabko maloom hi hoga “kaise”. Maine unki mashhur kitab “My experiments with truth” bhi padhi huyee hai. Mujhe Gandhijee se kuchh asahamati hai yahan par, jabki main unki bahut izzat karata hun. Unhonne sari duniya ko padhaya, aur apni pustak mein apni patni ko anpadh batate hain, are bhaiya, poori duniya ko padha rahe ho, mahanta free main bante ja rahe ho, apni patni ko bhi thodha padha dete, to anpach na kahte. Shayad patni ki galti rahi ho, aur padhne ke liye taiyar na huyee ho. Khair, khud to apne padhne us jamane mein England gaye. Beton ko madarsa mein padhane par tule huye hain. Kitabi, college gyan mithya, sachha yah sansar hai, jiska marm is madarse mein milega. Patni ke tabiyat kharab hai, mar rahi hai, behosh hai Africa main, Doctor ne bola, beef-tea se kuchh aram mil sakata hai. Patni to tea ke vishay mein han-na kar sakane ke halat mein thi nahin, parantu Gandhijee ka jabab. “Patni bahut dharmik hai, vah mar sakati hai, lekin beef-tea nahin pee sakati hai”. Dal mein namak nahin khana hai, to phir nahin khana hai. Patni agar tatti-ghar saf karane ke liye nahin raji hoti hai, to uska bal pakad ke paraye desh mein ghar se bahar kar dena hai.” Vagairah vagairah, is tarah ki kafi baten hain jo unhonne khud hi apne “sach ke saath prayog” karne ke bare mein likhi hai. Aur main to nahin sahmat ho sakata in sabse. England se padh ke aaye vakalat, badhi muskil mein bhai ne ek asan sa mukdama dilvaya. Vakil saheb ki adalat mein avaj hi nahin nikli. Yah to Premchandjee ke Idgah vali kahani ke vakil ho gaye, jo Hamid ke chimte se darkar avaj hi nahin nikal sake the. In sabke bavjood, Gandhijee ke mahanta mein koi sandeh nahin hai. Aur sabse khas bat yah hai ki, unhonne yah sab baaten apne aap hi apne baren mein likhi hain. Gandhijee jamane se aage the, apne time se kafi aage. aur yah sab kafi had tak unhonne England jane ke karan seekha hoga ho sakta hai apne makan-malkin se. England ka parivesh shayad aisa tha, jahan par bharat ka baniya bachcha ek achhoot ki tarah treat kiya gaya, aur yahan par hi Gandhije ko manushyon ke unch-neech, chhuachhoot se khundak aaye hogi. Gandhijee ke bare mein badhe-badhe logon ne badhi badhi baten likhi-kahi hain. Main bhi un sabse sahmat hun. Lekin agar sochta hun, to samajh nahin pata hun, ki kya aisa baddhapan main apne aap mein ya apne bachhe mein chahunga. Shayad nahin. Isiliye to kahata hun, ki Gandhijee hamsabse (kum se kum mujhse) bahut upar hain. Shayad Albert Einstein ne unhen mahan mante huye aisa kaha tha ki ” Visvas karana bhi muskil hoga ki aisa koi manushya is dharti par paida hua hoga”. Khai yah to “na bhuto na bhavisyete” vali baat hai. Main to bas apni soch rakhi thi, kyonki main to agar kuchh padhata hun to usse sirf bhasa (hindi, angrejee, vagairaha) seekhne ki koshish nahin karata, varan mantbya seekhne ki koshish karata hun, lekin anuvadak banane ke liye taiyar nahin hun. Yah bhav samajhne ka kam main doosron ke lekhan se karata hun, agar main khud hi likhne laga, tab to phir main updeshak ki shredhi main aa jaunga aur vahan pahunch sakane ke liye to abhi bahut kuchh seekhna baki hai.Ek bar aur dhanvad. Holi mubarak ho. Aapki Gujhiya ki photo ne to mere bachpan ke din yaad dila gaye, jab main apne man-bap, bhaiyon ke saath baith Holi mein Gujhiya, Gujhiya machine mein kat-kat kar bheege kapadhe ke neeche rakha karata tha. Phi aalu ke chips-papadh. Phir chaval-sabudana ka papadh. Vaise mahan log jab mahan ban jate hain, to phir apne bare mein ul-joolul sab kuchh likh dalte hain. Jaise http://www.expressindia.com/latest-news/V-S-Naipaul-kept-a-mistress-for-almost-24-years/287179/Ab Dhoni saheb yah kahen ki main to apna is liye dhone rakha ki main bahut kapadha dhoya karata tha, aur Dhobi nahin rakh sakata tha, so Dhoni rakh liya. Aur yahi mera sach ke saath kiya prayog hai, aur is kapadhe dhone ki takat ne meri bajuno mein cricket-shot marne ki takat dee, to mahan cricketer banaya, mandi mein achha paisa dilaya, to kya ham sabhi pog mahan banane ke chakkar main muhalle valon ka bator-bator kar kapadha dhona shurun kar denge. Agar khud mahan banane se thak gaye, to bete ko bulakar bolenge, thodha tumbhi dhonejee ki tarah mahan bano. Yahi guru-mantra hai, Dhonejee ne apne sach ke prayog vali pustak mein likha hai. Mere khyal Dhonejee ko kapadhe dhone vali baat chhupa kar yah likhna chahiye ki unhonne faujiyon ko mehnat-mashakkat karate dekha, mehnat kari, hausala rakha, Jharkhand se Chennai tak jalawa dikhaya.

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  17. Vaise main Shree Mahashaktijee se sahmat hun ki agar Sardar Patel Pradhan Mantri hote, to shayad bharat ka itihas kuchh aur hi bayan kar raha hota. Rahi baat updesh dene ki to “hamare gaon ke Katavaru ne kaha ki hamare Mehraru ke baithe vaste jagah hona chahiye”. Station Master saheb maar kar bhaga diye, shayad vah unko “manushya rupen mrigaschranti” ki tarah laga. Lekin bapu ne jab fair sex ki bat kar di, to anuvadak lagaye ja rahe hain. Shayad ek generation hai, jo Bapujee ke mahan banane ka bodh nahin kar pati. Karan shayad yah hai ki bapujee ne bahut likha hai, lekin apni mahanta ka manual nahin likha. “Ek gaal par thapaadh khao, doosra gaal age karo” vagairah vagairah. Mujhe to nahin lagata ki isse mahanta aati hai. Mahan vyaktiyon ka ek dayitya yah bhi banata hai ki apne mahan banane ke path ke bare mein kuchh kikhen, jise padhkar aam vyakti banana chahe. Apne bachchon ko vaisa banana chahe. Main agar apne 5 varsheey bete ko bolun ki Bapu mahan hain, aur unka ek gun yah tha ki vah ek gaal par chanta khate the do duusra aage kar dete the. Na to vah meri baat manega. Aur agar aisa karne laga to shayad dheenth (Bullied) vagairah kaha jayega. Aapke Yogishvar Krishn se bhi meri kuchh aise hi shikayat hai. Aapke hi ek purani post mein tha ki mahabharat ke yudh mein Yogiraj Krishan ke guidance mein Arjun ne Jayadrath ko aisa mara ki kata hua shir jaydrath ke pita ke paas gira. Ya chakra sudarshan ki baat le lijiye. Kitni achhi guided missile thi yah. Sirf Vanchhit ayakti ko markar vanchhit sthan par fenk sakati thi. Jaise koi dusman desh ka jahaj bharat ke dharati ke upar aaya, use aisa mara ki aska kshatigrast hissa bhi usi desh mein vapas ja gira. Apne desh ki ek khar-patvar bhi nahin jali. Koi radio-activity nahin huyee. Lekin in sabhi astra-shastra ke manual likhe hi nahin gaye. Shayad in sabhi manuals ke achhe documentation ki jarurat thi. Aur shayad is bhasa mein jarurat thi ki uska signal kafi strong hota, aur bina kisi amplification factor ke samajha ja sakata. Aisa bhi kya updesh dena ki jiske liye amplifier ki jarurat aa jaye. Bahas achhi hai, sarthak hai ya nirarthak, is bare mein kuchh nahin kah sakata.

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  18. गांधी पर एक बहस भाई सृजन शिल्पी के ब्लॉग पर हुई थी (http://srijanshilpi.com/?p=77#comments) तब हमने भी अपनी समझ मुताबिक भागीदारी की थी . बाद में इन्हीं टिप्पणियों को भाई अफ़लातून जी ने अत्यंत कृपापूर्वक ‘गांधी पर बहस: प्रियंकर की टिप्पणियां’ शीर्षक से अपने ब्लॉग पर भी जगह दी थी :http://samatavadi.wordpress.com/2006/12/01/gandhi-debate/ . गांधी पर आपको (भले ही वे फुटकर विचार क्यों न हों)पढकर अच्छा लगा . पर आज तक यह नहीं समझ पाया हूं कि गांधी में ऐसा क्या था/है कि आरएसएस से लेकर दलितपंथी और लैफ़्ट से लेकर अल्ट्रालैफ़्ट तक उनके सामने पड़ने पर(विचार रूप में)बेचैन हो उठते हैं . क्या गांधी जैसी नैतिक कसौटी उन्हें अपराधबोध से भर देती है ?अपने को ही उद्धरित करने का दुष्कर्म कर रहा हूं :”तरह-तरह के पूर्वग्रहों , अर्धसत्यों और संदेहों से घिरे अविश्वासी मन में गांधी किसी संवाद की तरह नहीं, विवाद की तरह ही रह पायेंगे . पर वे हमारे मन में एक आलोड़न की तरह रहेंगे यह सत्य अटल है .एक राष्ट्रनायक के रूप में गांधी की मानवसुलभ कमजोरियों पर या उनकी तथाकथित गलतियों पर भी चर्चा होनी चाहिये और होती रही है . पर मानवता की जाज्वल्यमान मशाल के रूप में उनका नाम लेते समय उस गरिमा का — उस आभा का — थोड़ा-बहुत नूर हममें भी झलकना चाहिये .”

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  19. गांधी पर बहस अच्छी चल रही है -कभी कभी लगता है गांधी को कोई दूसरा गांधी ही समग्रता मे समझ सकता है या फिर इस शख्सियत को थोडा बहुत समझने के लिए व्यक्ति /व्यक्तित्व मे गांधी-तत्व होना ही चाहिए .अब यह गांधी तत्व क्या है इस पर सादर आग्रह है कि ज्ञान जी चिंतन करें ,यह बहस उन्होंने ही शुरू की है .

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  20. संसार – जमाना कितना ही पछतायेगा,लेकिन अब ऐसा शख्स न जल्दी आएगाजो पाजी को दे अपने दिल के साथ दुआ,लेकिन अविरत लड़ता जाए पाजीपन से. – बच्चन

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