ई पापा बहुत हरामी हौ!


मणियवा का बाप अस्पताल में भरती था। करीब सप्ताह भर रहा खैराती अस्पताल में। वहां मुफ्त खाना तो मिलता था, पर सादा। पीने को कुछ नहीं मिलता था। छूटने पर घर आते ही पन्नी (कच्ची शराब की पाउच) का सेवन किया। सेवनोपरान्त अपनी पत्नी पर कुण्ठा उतारने को प्रहार करने लगा। पत्नी बचने को बेबन्द भागी। सड़क पर निकल आयी। इस आस में कि कोई तो बीच बचाव करेगा।

मणियवा पीछे-पीछे थोड़ी दूर गया। फिर रुक गया। थोड़ी देर सोचता रहा। गहरी सांस ले कर बोला – “ई पापा बहुत हरामी हौ“। बोला बुदबुदा कर नहीं, तेज आवाज में जिसे हर कोई सुन ले।

मुझे मालूम है कि यह जरा सी पोस्ट आपको सन्दर्भ स्पष्ट हुये बिना समझ नहीं आयेगी। बच्चे का बाप द्वारा शोषण समझने के लिये पुरानी पोस्ट पढ़नी होगी। अन्यथा अपने पिता के लिये सात-आठ साल का बच्चा इतनी तल्खी से यह शब्द कैसे बोल सकता है? बड़ा अटपटा सा लगता है इतने छोटे बच्चे में इतने क्रोध-कुण्ठा-घृणा का होना।

मुझे लगता है कि कुछ लोग पुराने लिंक पर क्लिक करने की जहमत नहीं उठाते। अत: मैं पुरानी पोस्ट “मणियवा खूब मार खाया” का पूरा आलेख नीचे टीप देता हूं –


मणियवा का बाप उसे मन्नो की दुकान पर लगा कर पेशगी 200 रुपया पा गया। सात-आठ साल के मणियवा (सही सही कहें तो मणि) का काम है चाय की दुकान पर चाय देना, बर्तन साफ करना, और जो भी फुटकर काम कहा जाये, करना। उसके बाप का तो मणियवा को बन्धक रखवाने पर होली की पन्नी (कच्ची शराब) का इंतजाम हो गया। शांती कह रही थी कि वह तो टुन्न हो कर सड़क पर लोट लोट कर बिरहा गा रहा था। और मणियवा मन्नो की दुकान पर छोटी से गलती के कारण मार खाया तो फुर्र हो गया। उसकी अम्मा उसे ढ़ूंढ़ती भटक रही थी। छोटा बच्चा। होली का दिन। मिठाई-गुझिया की कौन कहे, खाना भी नहीँ खाया होगा। भाग कर जायेगा कहां?

शाम के समय नजर आया। गंगा किनारे घूम रहा था। लोग नारियल चढ़ाते-फैंकते हैं गंगा में। वही निकाल निकाल कर उसका गूदा खा रहा था। पेट शायद भर गया हो। पर घर पंहुचा तो बाप ने, नशे की हालत में होते हुये भी, फिर बेहिसाब मारा। बाप की मार शायद मन्नो की मार से ज्यादा स्वीकार्य लगी हो। रात में मणियवा घर की मड़ई में ही सोया।

कब तक मणियवा घर पर सोयेगा? सब तरफ उपेक्षा, गरीबी, भूख देख कर कभी न कभी वह सड़क पर गुम होने चला आयेगा। और सड़क बहुत निर्मम है। कहने को तो अनेकों स्ट्रीट अर्चिंस को आसरा देती है। पर उनसे सब कुछ चूस लेती है। जो उनमें बचता है या जैसा उनका रूपांतरण होता है – वह भयावह है। सुकुमार बच्चे वहां सबसे बुरे प्रकार के नशेड़ी, यौन शोषित, अपराधी और हत्यारे तक में मॉर्फ होते पाये गये हैं।

जी हां। हम सब जानते हैं कि मणियवा खूब मराया गया (मार खाया) है। एक दो साल और मरायेगा। फिर मणियवा गायब हो जायेगा?! कौन कब तक मार खा सकता है? हां, जिन्दगी से मार तो हमेशा मिलेगी!


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14 Replies to “ई पापा बहुत हरामी हौ!”

  1. सच, स्वर्ग या नरक यहाँ इसी धरा पर भोगते हैँ इन्सान -कब मिटेगा तमस ? कब भोर होगी जहाँ ऐसे अत्याचार न होँ :-(( लावन्या

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  2. भईयाक्या पता कल को यही मणियवा अपने बाप का गुस्सा अपने बेटे पर उतारने लगे? आभाव ग्रस्त जीवन का ये कडुआ सच है…ये एक अंतहीन कड़ी है जो सदियों से चलती आ रही है और जब तक भूख गरीबी रहेगो चलती रहेगी… संवेदनशील रचना.नीरज

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  3. मार्मिक है ,दुखदहै।दिल्ली में इस तरह के बच्चों के लिए कई परियोजनाएं चल रही हैं। एक सलाम बालक ट्रस्ट है, बटरफ्लाई संगठन है। और भी होंगे। इलाहाबाद में भी होंगे इस तरह के संगठन।

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  4. पांडेजी मनिया भी जिंदा रहेगा ओर उसका बाप भी बस सूरते बदल जायेगी …..भूख का राक्षस मरता नही है…..

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  5. यह व्यवस्था अमानवीय करण करती है। उसी का नतीजा है यह। मुन्शी प्रेमचन्द जी की कहानी ‘कफन’पढ़ें

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  6. Great sir,jindagi yah bhi hai.Aur sach kahen to aabadi ka 30 pratishat yahi jindagi jeeta hai.Lekin inke saath baith baat kar dekhiye aur poochiye ki is jindagi se chutkara paane ko mar jana pasand karoge???swikarne se pahle aapko hi pagal thara dega aur yadi bhoole se khatra mahsoos hua ki kahin yah mujhe is jindagi ki trasdi se bachane ke liye isi jindagi se mukt to nahi kara dega to nishchit maniye ki aapki jindagi ka ant kar aram se kisi mahanagar jakar apni jindagi ko kanoon ke hathon bacha lega.Lekin apne bhar itna kiya ja sakta hai ki hai ki maniyava ke baap ka to kuch nahi kiya ja sakta par maniyava ko ek sahi jindagi dene ka prayas kar use gunda mavali banne se bachaya ja sakta hai.

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