आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?!


कोई मुश्किल नही है इसका जवाब देना। आज लिखना बन्द कर दूं, या इर्रेगुलर हो जाऊं लिखने में तो लोगों को भूलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। कई लोगों के ब्लॉग के बारे में यह देखा है।
वैसे भी दिख रहा है कि हिन्दी में दूसरे को लिंक करने की प्रथा नहीं है। सब अपना ओरीजनल लिखते हैं और मुग्ध रहते हैं। ज्यादा हुआ तो किसी ऑब्स्क्योर सी साइट को जिसमें कोई जूस वाली चीज छपी हो, को हाइपर लिंकित कर दिया। कुछ घेट्टो वाले ब्लॉग परस्पर लिंकित करते हैं। उनका महन्त सुनिश्चित करता है कि उसके रेवड़ के लोग परस्पर एक दूसरे की मुगली घुट्टी पियें। बाकी इण्डिपेण्डेण्ट ब्लॉगर को तो लोग लिंक भी कम करते हैं, और उसे भुलाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
हमारी दशा गुट निरपेक्ष वाली है। जैसे नॉन अलाइण्ड मूवमेंण्ट का कोई धरणी-धोरी नहीं, वैसे हम जैसे की भी डिस्पेंसिबिलिटी ज्यादा है।
हमारा सर्वाइवल तो हमारे ब्लॉग कण्टेण्ट और हमारी निरंतरता पर ही है।
चलिये “जरूरत” पर एक क्षेपक लिया जाये।

दो घोड़े बोझ लाद कर चल रहे थे। एक ठीक चल रहा था। दूसरा अड़ियल था। बार बार अड़ने पर मालिक ने उसका बोझा धीरे धीरे उतार कर दूसरे पर लाद दिया। अड़ियल वाला प्रसन्न हो गया! उसने आगे वाले को कहा – बेटा, और बनो शरीफ, और लदवाओ बोझ! मुझे देखो, मैं कितने मजे में चल रहा हूं!horse_3
गन्तव्य पर पंहुचने पर मालिक ने सोचा कि “जब बोझ एक ही उठाता है तो दूसरे की क्या जरूरत? बेहतर है कि सारा दाना-पानी मैं एक को ही दे दूं और दूसरे को मार कर उसका मांस और खाल वसूल कर लूं!”
और उसने अपने नेक विचार पर अमल किया! (लेव टॉलस्टॉय की एक कथा से)

खैर, इस क्षेपक का हिन्दी ब्लॉगरी से कोई लेना देना नहीं है। यहां कोई मालिक नहीं और कोई किसी की खाल नहीं उतारने वाला।
पर जो बात मैं अण्डर लाइन करना चाहता हूं, वह यह है कि अपने कृतित्व से हमें औरों की नजर में अपनी जरूरत बनाये रखनी चाहिये। इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में बचे रहने और आगे बढ़ने का वह एक अच्छा तरीका है।
आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?! या इससे भी मूल सवाल – क्या आप इस बारे में सोचते हैं?


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30 thoughts on “आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?!

  1. रुकिये..रुकिये, रुकिये ! पता नहीं, यहाँ क्या क्या चल गया अब तक ? सुबह तो अच्छा भला छोड़ कर गया था, अभी आया तो ‘ हलचल ‘ पर इतनी हलचल मची दिख रही है । अब बड़े लोगों के बीच मैं क्या बोलूँ, किंतु कुछ विरोधाभास दिख रहा है.., सो कहूँ ? गुरुजी, यदि कंटेंट की छलनी उठा ली जाये , तो संदर्भित करने योग्य मात्र दो प्रतिशत ब्लाग भी छन के नहीं निकल पायेगा । मेरा निट्ठल्ला और आपका हलचल तो शायद सबसे पहले ही बीन-फटक में ही अलग हो जाये ! इसलिये मुझ जैसे मूढ़मति छलनी को बोलना चाहिये भी कि नहीं ? इस पर भले बाद में एक ब्लाग बना लीजियेगा, पर मुझे तो यह एक निर्मम तथ्य दिखता रहा है कि जो स्त्री अपने पति से महीने में दस बार जतलाती है कि वह उस पुरुष के बिना जी नहीं पायेगी, वह उसी के म्रूत्यु के बाद बीस वर्षों से भी अधिक तक जी कैसे लेती है ? ठीक है, स्वेच्छा से मृत्यु का वरण उसके बस में नहीं । किंतु नेहरू के बाद कौन-या अटल बिहारी के बाद कौन ..सरीखे प्रश्नों के तो आप सब साक्षी रहे होंगे ! फिर ? यह मुग़ालता ( उर्दू है, श्री विश्वना्थ जी ! ) कोई क्यों पाले कि वह ब्लाग पर अमरत्व पा लेगा ? भले ही वह दिन में दस पोस्ट ठोके । ऎसा उतावलापन ( अधैय..श्री विश्वनाथजी ! ) और आत्ममुग्धता मुझे केवल इसी नवोदित हिंदी ब्लागजगत में ही दिखता है । मैं अंग्रेज़ी ( अंग्रेज़ी की हिंदी..आँग्ल चलेगा ? ) ब्लाग्स ( इसकी हिंदी क्या है..श्रीमान ! ) कुछ न कुछ पढ़ता ही रहा हूँ, साथ में बाँग्ला पर भी निग़ाह ( ? हिंदी ) डाल लेता हूँ, थर्ड क्लास ( eng.) के अनारक्षित डिब्बे में घुसने जैसी गुत्थमगुत्था..घुसते ही अगले को घुसने से रोकने की तत्परता एवं अपना स्थान सुनिश्चित करने जैसी काकदृष्टि कहीं और नहीं देखी ।जो आज टिप्पणी पर कुछ और कह रहे हैं, वही कल किन्हीं व्यक्ति विशेष से टिप्पणी न आने की गुहार लगाते देखे गये थे । यह कैसा विरोधाभास है, और कैसी हलचल ( उर्दू शब्द है जी ! ) है, यहाँ ?अनुराग की बात से मैं सहमत हूँ, हिंदी व आँग्ल भाषा के स्वनामित साहित्यकार चेतन भगत के लेखन को पल्प-फिक्शन ( अंग़्रेज़ी शब्द है, भाई ) कह कर ख़ारिज़ ( उर्दू ) कर देते हैं, भगत के स्वास्थ्य पर कोई अंतर नहीं पड़ता, उनका लेखन चालू आहे ( चलिये उर्दू न सही मराठी तो भारतीय है, ना ! ) ।कुल मिला कर यह अपने अपने कुँये से टर्राने जैसी बात है, टर्राते रहोगे तो सुने जाओगे । बस इतना ही करो..शाश्वत होने की चिंता में क्यों मरे जा रहे हैं, हम लोग ?

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  2. एक बात पूछना तो भूल ही गया, यहाँ अड़ियल घोड़े की प्रासंगिकता यदि कुछ अनुसंधानकिया जाये, तो अड़ियल घोड़ा ही मेरा हीरो ( अंऽग्रेज़ीऽऽ ! ) होगा । जिस मालिक ने बनायाहै..उसके आगे अड़ी की न ले । बंदे की इच्छा अपने पर क्यों लदने दे ?ब्लागर पर मेरा मालिक मेरी सोच और मेरा मन है…लेकिन हलचल वाला मन नहीं ?कहीं मैं, ज़्यादा ( यानि कि अधिक ) तो नहीं बोल गया, इतने मूर्धन्यों के बीच ( मध्य ) ?

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  3. जो आपका मुख्य कर्मक्षेत्र है, उसमे आपको “इन्डिस्पेन्सेबेल” होना चाहिये कम से कम तब तक तो जब तक आप वहां रहे उसके बाद की भगवान् जाने | सच में बड़ा अच्छा लगता है किसी पुराने अच्छे शोध कार्य को देखकर कि आज भी हजारों लोग उस शोधपत्र को रेफर कर रहे हैं |ब्लागिंग तो ईश्वर की माया है कहीं धूप कहीं छाया है 🙂 बाकी बड़े बड़े ब्लागरों ने बहुत कुछ कह दिया है हम तो पढ़कर ही समझने का प्रयास कर रहे हैं |

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  4. aadarniye Gyaan jiNAMANइन्डिस्पेन्सेबेल jesa topic uthakar aur uski itni shaandaar vivechna subhhan-allah Mubarkbaad kubool karen(Aafaque Ahmed)

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  5. “…९०% तो कचरा ही है….”आह! मैंने बहुत पहले 80 प्रतिशत को कचरा कहा था (मेरी अपनी पोस्टें सम्मिलित,)तो लोगों ने मुझे घोर गालियाँ दीं. आप अभी तक कैसे बचे हुए हैं घोस्ट बस्टर जी?

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