क्या सच है?


पिछली बार भी वे ईद से पहले आये और इसी तरह का ऑपरेशन किया था। इसकी पूरी – पक्की जांच होनी चाहिये और यह सिद्ध होना चाहिये कि पुलीस ने जिन्हें मारा वे सही में आतंकवादी थे।" – सलीम मुहम्मद, एक स्थानीय निवासी।  
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एस ए आर गीलानी, दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक, जिन्हें २००१ के संसद के हमले में छोड़ दिया गया था, ने न्यायिक जांच की मांग करते हुये कहा – "इस इलाके के लोगों को बहुत समय से सताया गया है। यह नयी बात नहीं है। जब भी कुछ होता है, इस इलाके को मुस्लिम बहुल होने के कारण निशाना बनाती है पुलीस।"
एनकाउण्टर के बारे में पुलीस के कथन पर शायद ही कोई यकीन कर रहा है।
सिफी न्यूज़

Ridiff Encounter 
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इन्स्पेक्टर मोहन लाल चन्द शर्मा, एनकाउण्टर में घायल पुलीसकर्मी की अस्पताल में मृत्यु हो गयी


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38 thoughts on “क्या सच है?

  1. इस पूरे वाक़ये में एक ही बात संतोष की है कि इंस्पेक्टर शर्मा को सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही ने श्रद्धांजलि दी है. क्या ही अच्छा हो जो उनमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ कड़े क़ानूनी प्रावधानों पर भी सहमति हो जाए, जैसा अमरीका, ब्रिटेन और अन्य आतंकवादपीड़ित राष्ट्रों ने किया है. कहने की ज़रूरत नहीं कि किसी विशेष क़ानून के साथ उसके दुरुपयोग को असंभव बनाने वाले उपाय भी लगाए जाएँ. ख़ुशी की बात है कि चुनावी साल होने के बावजूद सरकार के भीतर एक कोने से ही सही, आतंकवादरोधी विशेष क़ानूनी प्रावधानों के पक्ष में कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं!

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  2. शर्माजी की जान चली गयी, फिर भी इसे नकली मुठभेड़ मानने वाले या तो अंधे या बेवकूफ। पुलिस हमेशा सही नहीं होती पर हमेशा गलत भी नहीं होती। कबीर कौशिक की फिल्म सहर में फर्जी एनकाऊंटर में कुछ पुलिस वाले एक गैंगस्टर को मार गिराते हैं। एक वकील साहब उन्हे डिफेंड तो करते हैं, पर उनसे कहते हैं कि आईडियली यह सब नहीं होना चाहिए। इसके जवाब में पुलिस चीफ कहते हैं कि आईडियली यह नहीं होना चाहिए, पर हमें आइडियल कंडीशंड तो दीजिये।

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  3. विषय अति गंभीर है. सुबह से एक से अधिक बार टिप्पणी लिखने की सोची पर आक्रोश की अधिकता से स्वर ज्यादा कड़वा होता देख रुक गए.स्वर्गीय श्री शर्मा जी को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, उनका बलिदान स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा. पर एक प्रश्न साथ-साथ उभरता है, ऐसे खतरनाक ऑपरेशन में शामिल होने से पहले बुलेट प्रूफ़ जेकेट क्यों नहीं धारण की गयी? चार गोलियां उनके पेट में लगीं. देशभक्तों को अपनी जान के साथ ऐसा खिलवाड़ करने की क्या जरूरत है? आतंकवाद के खिलाफ लडाई जीती जायेगी आतंकवादियों को ख़त्म करके ना की स्वयं शहीद होकर.

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  4. शर्माजी की जान चली गयी, फिर भी इसे नकली मुठभेड़ मानने वाले या तो अंधे या बेवकूफ।(आलोक पुराणिक) वे न अन्धे हैं न बेवकूफ़, बल्कि वे हमें ऐसा समझ रहे हैं। क्योंकि हम अफ़जल को फाँसी नहीं दे पा रहे। वोट की खातिर देश का बेड़ा गर्क करने को तैयार हैं,भले ही यह वोट भी एक छलावा हो। सेकुलरवाद के ढोंग में जिए जा रहे हैं, आतताइयों की मर्जी पर।देश के दुश्मनों को पहचानना जब इतना सरल हो गया है तब भी कहने से डरते हैं, आँखें मूँद कर अन्धेरा होने का भ्रम पालते हैं।। पोलिटिकली करेक्ट बनने के चक्कर में। हाय रे राजनीति, और हाय रे देश के नेता…। डूब मरें ये।

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  5. .@ शिव भाईक्या स्वाधीनता संग्राम ( ? ) का हमारा इतिहास यह सनद नहीं देता, कि इक़बाल व ज़िन्ना किन वज़हों से भटक गये ? नेता जी बोस क्यों कांग्रेस से बिछड़ गये ? मृत्योपरांत उनके अवशेष किस पैंतरे के तहत नेपथ्य में रखे गये । डेढ़ दो वर्ष में ही ज़िन्ना की आसन्न मृत्यु की पक्की सूचना के बावज़ूद भी बंदरबाँट स्वीकार क्यों किया गया ? यह तो सुदूर अतीत की बातें हैं, 1984 में 5000 सिक्खों के संहार में अहिंसक हिंदू सक्रिय थे, या कोई और ? बाकायदा वोटर लिस्ट से उनकी शिनाख्त करवाने वाले कौन और कैसे लोग थे ? बोया बीज बबूल का… आम कहाँ से होय ? दुर्भाग्य से इस अप्रिय सच में कबीर का कोई स्थान नहीं है, फिर भी यह सच तो है ही !

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  6. .यार, यह ब्लाग-ओनर के एप्रूवल वाला झमेला बड़ा इरिटेटिंग है !बिल्कुल आब्जेक्शन सस्टेन्ड… व आब्जेक्शन ओवररूल्ड सरीखा !

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  7. जो भी सत्‍ता में आता है, सबसे पहले कानून को रखैल बनाता है । हम सब, इस प्रक्रिया के चश्‍मदीद गवाह बनते हैं और कभी-कभी तो सहायक भी । कानून का शासन स्‍थापित किए बिना कोई बात बनने वाली नहीं । लेकिन वह ‘आकाश-कुसुम’ जैसी ही लगती है ।श्रीविजय वाते का एक शेर सब कुछ कह देता है -चाहते हैं सब कि बदले ये अंधेरों का नजामपर हमारे घर किसी बागी की पैदाइश न हो

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  8. शर्मा जी व उनके जैसे देश के सपूतों को सलाम व श्रद्धांजलि।रहा सवाल सच का तो साहेब सच क्या है और इसे कौन खोज पाया है?

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  9. “इन्स्पेक्टर मोहन लाल चन्द शर्मा, एनकाउण्टर में घायल पुलीसकर्मी की अस्पताल में मृत्यु हो गयी”क्या इसके सच होने पर भी सवालिया निशान है? और अगर सामने वाला गोली चला कर ये काम कर रहा है… तो उसे तो निर्दोष ही कहेंगे शायद ! भारत देश है.

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  10. अब समय कौन साम्प्रदायिक है और कौन सेक्युलर,यह बहस चलानें का नहीं है। इस प्रकार की बहस चलानें वाले न तो समय की नज़ाकत समझ पा रहे हैं और नही स्थिति की गंभीरता का अंदाज। मामला वोट बैंक की राजनीति करनें वालों के हाथों से भी फिसलता जा रहा है यह आनें वाले कुछ महिनों में और गंभीरता से सामनें आयेगा। अपनीं बौद्धिक वाचालता को हमनें लगाम नहीं लगायी तो एक दिन ठगे से खड़े रह कर शायद हाथ भी न मसल पाएँ। मोहन चन्द्र शर्मा की माँ नें रोते-रोते आज तक से कहा कि जो लोग आज अमर रहे के नारे लगा रहे है वह जनता और यह हार चढ़ानें वाले नेता कल के बाद दिखाई भी न देंगे, पाँच अनब्याही बहनों,पत्नी ,और दो बच्चों के साथ बूढे माँ बाप का इकलॊता घर चलानें वाला बेटा था वह। क्या हम उस परिवार की कुछ भी मदद अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर उन के दुख को कम करनें और हारी बीमारी में सांत्वना देने के लिये कर पाँयेंगे? कल मेरे विमतीय मित्र नें कहा कि शर्मा की मृत्यु पर इतना विलाप क्यों? उन्हें सरकार तनखाह किस बात की देती थी? कल ही देर रात एन डी टी वी पर एक मानवाधिकार संस्था के गौतम नवलखा बता रहे थे कि शर्मा के कुछ एनकाउन्टर्स की उन्होंने जाँच की थी और उन्हें अधिकाँश संदिग्ध लगे थे और ज़ामियाँ नगर वाला आज का एनकाउन्टर भी सन्देहों से परे नहीं है? मॄत शरीर के पास खड़ी मोहन चद्र की आत्मा नवलखा की बात सुन कर तो रो ही पड़ी होगी, इस विचार से कि क्या ऎसे कॄतघ्न भी हो सकतें हैं अपनें देश में? क्या भविष्य में कोई माँ अपनें मोहन को हमारी आपकी या फिर देश की रक्षा के लिए जान न्योछावर करनें की प्रेरणा देगी?

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  11. ise encounter shabad dena theek nahi shaad muthbedh zayada achha shabd hai jab dono taraf se goli chali ho to encounter kaisa ho sakta haiaur agar police wale ki death hui to goli duari taraf se bhi chali haiaur jo log hathiyaar rakhe ho kya unke bare main bhi check karne ki zarurat haiajab baat hai

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  12. ऐसे बुद्धि के दरिद्रों पर कोई टिप्पणी करना अपना समय नष्ट करना है!@आलोक पुराणिक:कबीर कौशिक की फिल्म सहर में फर्जी एनकाऊंटर में कुछ पुलिस वाले एक गैंगस्टर को मार गिराते हैं। एक वकील साहब उन्हे डिफेंड तो करते हैं, पर उनसे कहते हैं कि आईडियली यह सब नहीं होना चाहिए। इसके जवाब में पुलिस चीफ कहते हैं कि आईडियली यह नहीं होना चाहिए, पर हमें आइडियल कंडीशंड तो दीजिये।वाकई! वह एक बढ़िया और मर्मस्पर्शी फिल्म थी।

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