प्रिय भैया खरी खरी जी,


प्रिय भैया खरी खरी जी,

आशा है आप कुशल से होंगे। मैने अपनी पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी देखी थी:

पते की बात लिखी है आपने रीता दीदी पर क्या आपने घायलो के लिये कुछ किया क्या? या ज्ञान जीजाजी ने????? या कुछ करेंगे क्या??????

आपका प्रश्न बड़ा स्वाभाविक है। कई लोग निस्वार्थ हो कर कुछ करने को समाज सेवा का भी नाम देते हैं। काफी मुश्किल है यह कार्य और अकेले में तो यह बहुत कठिन हो जाता है। ज्ञान की रेलवे की नौकरी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया, बहुत अनुभव दिये और बहुत आत्म-संतुष्टि भी। रेलवे में “महिला समाज सेवा एवं कल्याण समिति” जैसी संस्था है। यह “चाय-समोसा” समिति नहीं है।

मैं नहीं चाहता था कि रीता पाण्डेय इस टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करें। पर उन्होंने व्यक्त करने का मन बना लिया तो मेरे पास विकल्प नहीं है उसे न प्रस्तुत करने का।

इस पोस्ट में कई बातें ऐसी हैं जो मुझे अवसाद ग्रस्त कर देती हैं। मैं उन्हे भूलना चाहता हूं।

मेरी पत्नी मुझसे ज्यादा मजबूत इन्सान है। इस तथ्य को कुबूल करने में मुझे कोई झिझक नहीं है।

यह मूलत: रेल कर्मचारियों के परिवार के लिये कार्य करती है। अगर महिलायें वास्तव में कुछ समाज कल्याण की ओर उन्मुख हैं तो इस संस्था के माध्यम से अपनी रचनात्मकता को विस्तार दे सकती हैं। मुझे याद है कि इसी संस्था से जुड़े होने के कारण मैने उदयपुर में कई दिन लगा कर स्कूल टेक्स्ट-बुक्स के ऑडियो टेप तैयार किये थे – जिससे अंध विद्यालय के बच्चे अपनी परीक्षा की तैयारी कर सकें। और मुझे सुखद आश्चर्य हुआ था कि उन्होंने टेप की कितनी कापियां बना ली थीं। कितना प्रयोग कर रहे थे वे। 

रेल दुर्घटनायें तो रेल चलने से जुड़ी ही रहती हैं। किसी रेल दुर्घटना होने पर जब रेल कर्मचारी और अधिकारी साइट रेस्टोरेशन के लिये जूझ रहे होते हैं, तब महिला समिति पीड़ितों के लिये रक्तदान, भोजन का इन्तजाम और अन्य प्रकार से मदद का काम संभालती है। इसके अलावा मुझे याद है कि हम लोगों ने पैसा और सामान इकठ्ठा कर उड़ीसा के चक्रवात, पूर्वी तट पर आई सुनामी या कच्छ/भुज के भूकम्प के लिये सहायता भेजने का काम किया था। अनेक दिन हम सवेरे से देर शाम तक इस काम पर लग जाते थे। मेरे बच्चे कुछ बड़े हो गये थे, लिहाजा समय निकालने में इतनी परेशानी नहीं होती थी। भुज के भूकम्प के समय तो आस पास के मण्डलों से रेल महिलायें मौके पर जा कर खुद काम कर रही थीं। स्काउट-गाइड के बच्चे और किशोर हमारे इस बारे में विशेष सहायक होते हैं।

एक रेल दुर्घटना ने तो मेरे परिवार का जो नुक्सान किया है, वह शब्दों में समेटना मेरे लिये कठिन है। उस घटना का जिक्र मैं चिकित्सकों के व्यवहार की वजह से कर रही हूं। भुसावल में मेरा बेटा मौत से जूझता पड़ा था। सही निर्णय के अभाव में २२ घण्टे निकल गये। वहां इलाज की मूल सुविधायें नहीं थीं। तुरत सीटी-स्कैन (जिसकी सुविधा न थी) कर आगे का इलाज तय होना था। न्यूरो सर्जन वहां उपलब्ध न थे। पर अस्पताल वाले न कुछ कर रहे थे, न कोई वैकल्पिक योजना सोच पा रहे थे। हम उसे अपने रिस्क पर भुसावल से ले कर जळगांव पंहुचे – एक न्यूरोसर्जन के पास। वे न्यूरोसर्जन देवतुल्य थे हमारे लिये। ठीक इसी तरह इन्दौर के चोइथराम अस्पताल में जो डाक्टर मिले, वे भी देवतुल्य थे। उन्होंने मेरे बेटे के सिर का ऑपरेशन किया। हम उसके बाद मुम्बई के एक न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेने गये – बंगलोर में निमहंस जाने के पहले। ये सज्जन अपने एक एक मिनट का पैसा लेते थे पर जबान से जहर उगल रहे थे। उन्होंने हमें झटक दिया और हमने उन्हें। आखिर वे मेरे भगवान तो न थे! मेरे भगवान से जो बात हुई थी, उसके अनुसार उन्होंने हमें दिलासा दी थी कि हमारे जद्दोजहद की सीमा हमारी हार जीत का फैसला करेगी। और मैं अपनी जीत मान कर चल रही थी।

— बात बम धमाके की हुई थी। बनारस में स्टेशन की लॉबी में और संकटमोचन के परिसर में बम फटे थे। ज्ञान उस दिन घर पंहुचे ही थे कि टीवी पर यह समाचार आने लगा। ये तो उल्टे पैर भागे। सड़क सेफ न लगी तो रेल पटरी के किनारे-किनारे पैदल चलते स्टेशन पंहुचे। ट्रेन के सघन तलाशी, घायलों को अस्पताल भेजना, मृत शरीर और अंगों को मोर्चरी रवाना करना; यह सब काम निपटा कर जब ज्ञान घर वापस आये तो रात के दो-तीन बज चुके थे।

एक दिन बाद हम अस्पताल गये घायलों को देखने। बहुत दर्दनाक दृश्य था। अचानक एक परिचित चेहरा दिखा। वह हमारे वाणिज्य विभाग का कर्मचारी था। उसके दोनो बेटे संकटमोचन के धमाके में घायल हो गये थे। बड़े को तो डिस्चार्ज कर दिया गया था फर्स्ट एड के बाद। पर छोटे का पैर बुरी तरह घायल था। डाक्टर साहब ने हमें बताया कि अगर उसका पैर काट दिया जाये तो शायद जान बच जाये। पिता भाव शून्य आंखों से देख रहा था। मैं चाह कर भी उस पिता को यह सलाह न दे पाई कि वह पैर का ऑपरेशन कराने दे। चार दिन बाद उस बेटे की मृत्यु हो गई। बारूद का जहर पूरे शरीर में फैल गया था।

तो भैया खरी खरी, यह मेरा अपना भोगा यथार्थ है। जिन्दगी की जद्दोजहद से खुरदरी जमीन पर चलने की आदत पड़ गई है। खरी खरी सुनने पर कभी कभी मौन टूट जाता है।

कभी इलाहाबाद आयें तो मिलियेगा।

आपकी बहन,

रीता पाण्डेय। 


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37 thoughts on “प्रिय भैया खरी खरी जी,

  1. रीता दीदी, आपका धन्यवाद इतना सब लिखने और अपने समर्थको से गाली पडवाने के लिये। पर आपसे अनुरोध है कि आप टिप्पणी फिर से पढे। मैने पूछा है कि आपने मुम्बई हादसे मे पीडित लोगो की मदद करने के बाद क्या ब्लाग लिखकर लोगो से ऐसा करने की अपील की है या ऐसे ही लिख दिया है? अभी तक प्रश्न अनुत्तरित है। यह आपकी मर्जी है आप जवाब दे या नही।ज्ञान जीजाजी अक्सर सडक पर पडे गरीबो की लाचारी पर लिखते रहे और उनकी तस्वीरे छापते रहे है पर कभी उन्होने लिखा नही कि उन्हे कुछ दिया क्यो नही। किसी की मजबूरी पर ब्लाग लिखकर आह-उह करना उन्हे खूब आता है। हमने सोचा शायद आपने भी ऐसा ही किया हो? आपके समर्थको की ओर से नये दौर की प्रायोजित गालियो की प्रतीक्षा मे—

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  2. आपको पता नहीं कि आपके उत्‍तर ने ‘दो कौडी’ को अमोल कर दिया । मानव मनोविज्ञान में ‘श्रेष्‍ठता-बोध’ (सुपीरीयरिटी काम्‍पलेक्‍स) की चर्चा नहीं मिलती । वहां केवल ‘हीनता-बोध’ (इनफीरीयरिटी काम्‍पलेक्‍स) उपलब्‍ध है । सुपीरीयरिटी काम्‍पलेक्‍स शब्‍द सम्‍भवत: ‘लोक कुम्‍हार के चाक पर गढा गया’ है । कई लोग अपना सुपीरीयरिटी काम्‍पलेक्‍स प्रकट करने के चक्‍कर में अन्‍तत: अपना हीनता बोध ही उजागर कर रहे होते हैं ।ऐसी टिप्‍पणियों को नजरअन्‍दाज करना ही श्रेष्‍ठ प्रत्‍युत्‍तर होता । जिसके मां-बाप ने नाम ही ऐसा ‘खोटा’ रखा कि उजागर करने में शर्म आए, वह बेचारा खरी-खरी कहने का पाखण्‍ड करने के सिवाय और कर ही क्‍या सकता है ।आपने अकारण ही अपात्र को सम्‍मानित कर दिया ।आपका सबसे बडा परीक्षक आपका ‘स्‍व’ है । हममें से किसी को आपसे (या किसी और से) कोई सवाल पूछने का अधिकार नहीं है । हम सब अपने आप के प्रति उत्‍तरदायी हैं । हम क्‍या हैं और हमने क्‍या किया है, यह हम जानते हैं और हमारा ईश्‍वर ।हीनता बोध का मरीज, विकृत मानसिकतावाला व्‍यक्ति कैसा आचरण करता है, यह इस प्रसंग से सार्वजनिक हो गया ।कृपया विचलित न हों । ईश्‍वर के सिवाय किसी और के प्रति आप जवाबदेह नहीं हैं ।

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  3. what’up maama u write as a real blogger keep it up. and i think its necessery to recall our past time to time. iam glad that u $papa surrounded with such great people {your blogger friend}. its my thanks to all of them.

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  4. ज्ञान जी ने ठीक ही लिखा है कि कई बातें … अवसाद ग्रस्त कर देती हैं।बेशक खरी-खरी को उनके प्रश्न का उत्तर नहीं मिला,लेकिन उन्हें एक संदेश तो मिल ही गया होगा! लेकिन अपनी टिप्पणी में समर्थक/ प्रायोजक की चर्चा कर वे क्या जाहिर करना चाह रहे हैं?इसी के चलते मुझे एक कथन याद आया कि ‘अपनी सलीब अपने ही कंधों पर ढोनी पड़ती है’

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  5. उफ़्‌… मुझे यहाँ आने में इतनी देर हो गयी। शायद मैं अभी अपने ही अवसाद से नहीं निकल पाया हूँ। ये खरी-खरी साहब तो पक्के नसेड़ी निकले। गाली खाने का नशा…। धत्‌…। अब और मुँह न लगाइएगा जी।रिश्ता भी क्या खूब निकाला है… ‘साला’ बनकर अपनी फजीहत??!!

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  6. मैं तो मानता हूँ की ” मनुष्य अपने विचारों की उपज मात्र है, वह जैसा सोचता है, वैसा वह बन जाता है/”बहरहाल “खरी-खरी” भाई को भी धन्यवाद!!!इसी बहाने और कुछ जानने को मिला !!!!!!!!!!!अफ़सोस हम पड़ोसी होने के बाद भी निमंत्रण न पा सके , इलाहाबाद आकर मिलने का !!!!चलिए !!!!!

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  7. लीजिये खरी-खरी फिर आए हैं. शिवजी मिसिर ही सही कह रहे हैं इन महाराज को बड़ी शंका है. ऐसे लोगों को जवाब नहीं देना ही बेहतर है.

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  8. भाई बहन के बीच में तो हम पडेंगे नहीं . पर इतना कहना उचित होगा कि इतनी छीछालेदर के बाद भी आप के परिवार से सम्बन्ध जुडना खरी खरी के लिए खरा सौदा है 🙂 भाभी जी ने सही किया है . ज्ञान जी को भेज दिया गुरु जी के पास, खुद ब्लॉग पर कब्जा कर लिया ,वह भी बलपूर्वक . हम तो यही चाहते हैं . वे दोनों वहीं ठीक हैं . आप का लिखा अब ज्यादा पढने को मिलेगा ऐसी आशा है 🙂

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  9. “खरी खरी” जी,Quote———————————आपके समर्थको की ओर से नये दौर की प्रायोजित गालियो की प्रतीक्षा मे—————————-Unquoteहम आपको गाली नहीं देंगे।बस आपके लिए हमारी तरफ़ से कुछ प्रश्न पेश हैं:आशा है कि जितनी आसानी से आपने सवाल किये, उतनी ही आसानी से आप इन प्रश्नों का उत्तर भी देंगे।१)आपका असली नाम क्या है?२)आप गुमनाम रहकर एसे सवाल क्यों करते हैं३)यदि हम यह मान भी लें की ज्ञानजी और रीताजी ने ब्लॉग लिखने के अलावा कुछ भी नहीं किया, कृपया यह बताइए की आपने क्या किया?४)यदि कुछ भी नहीं किया तो औरों से यह सवाल करना क्या आप ठीक समझते हैं?

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  10. बेटे की तकलीफ़ तुरंत खत्म न कर पाने पर जो छ्टपटाहट आप दोनों ने महसूस की होगी वो हम अच्छी तरह से महसूस कर सकते हैं, ऐसी ही छ्टपटाहट हमने भी महसूस की थी जब अचानक हमारी मां को लकवा मार गया था और डाक्टरों के लापरवाह एटीट्युड की वजह से वो बच न सकीं। आज तीन साल होने को आये पर आज भी उन डाक्टरों के प्रति क्रोध हमारे अंदर धधकता है।

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