पतझड़

कब होता है पतझड़?
ऋतुयें हैं – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त वसन्त। पतझड़ क्या है – ऑटम (Autumn) शरद भी है और हेमन्त भी। दोनो में पत्ते झड़ते हैं।

झरते हैं झरने दो पत्ते डरो न किंचित। रक्तपूर्ण मांसल होंगे फिर जीवन रंजित। 

यह ट्विटरीय बात ब्लॉग पोस्ट पर क्यों कर रहा हूं? अभी उपलब्धि/लेखन/पठन के पतझड़ से गुजर रहा हूं। देखें कब तक चलता है!
Autumm
औरों की ब्लॉग पोस्टें देखता हूं – सदाबहार नजर आती हैं। चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग। कविता कहते सुनते वाहावाही करते लोग। कैसे लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को और सदा निवसते हैं वसन्त में!


Advertisements

36 Replies to “पतझड़”

  1. पतझड के समय पानी पड जाये तो "पतझड" पर "पानी पड जाता है" और तुरंत नये पत्ते आ जाते हैं. अत: सोचा कि निम्न बात कह कर आप के लेखक-मन को जरा सींच दूँ:भौतिकी के मेरे प्रोफेसर साहित्य में काफी रुचि लेते थी. वे इलाहबाद के थे और उनका कहना था कि इलाहबाद हिन्दी साहित्य का केंद्र है और वहा साहित्य के अनुरूप अच्छा माहौल है.क्या आप एक आलेख में इस विषय पर कुछ प्रकाश डालेंगे ?सस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.Sarathi.info

    Like

  2. श्री गिरिजेश राव की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी: टिप्पणी पोस्ट नहीं हो पा रही, छेपने का कष्ट करें:+++++++++++++++++++++++++++++पतझड़ की चर्चा मैंने अपनी ताजी पोस्ट में की है। लिंक नहीं दूँगा नहीं तो कहेंगे प्रचार कर रहा है।शरद हेमंत की ठिठुरन भी http://kavita-vihangam.blogspot.com की कविता 'रात' में है। (यह प्रचार है। चचा अब अन्ना चुप हैं तो कोई बड़ा ब्लॉग तो चाहिए न प्रचार करने के लिए !) आप हमको हाँकने के लिए अलग 'लउरी' का प्रयोग करिए। ई आरोप खारिज कि 'लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को'' । फोटो तो हरियाली का ही लगाए हुए हैं आप बात पतझड़ की -उलटबाँसी, वह भी मगहर में नहीं शिवकुटी में? धरम का टंटा के मुआमले में हम अवधिया जी से सहमत थे – उपेक्षा करो।अब वह आजिज आ कर ट्रैक बदल रहे हैं। मुझे लगता है जो लोग लड़ सकते हैं, उन्हें लड़ना चाहिए – अपने अपने तरीके से। मैं भी लड़ता रहता हूँ। इस्लाम का जो रूप आजकल स्वच्छ रूप धरे आ रहा है, वह पूरी मानवता के लिए खतरनाक है – खुद मुसलमानों के लिए भी। मेरे आदर्श तो क़ुरबानी मियाँ और बाउ हैं। +++++++++++++++++++++++++++++(मेरा कथ्य – फोटो पतझड़ का ही है! एक सज्जन के ई-मेल से प्राप्त चित्र का परिवर्तित रूप। पेंड़ पर हरे पत्ते हैं पर पीतवर्ण पत्ते झड़े भी हैं। पतझड़ है – पर ठूंठ नहीं!)

    Like

  3. सावन भादो में लगाये पौधे अब जमीन पकड चुके है . धान की बालियाँ अपना रंग बदलने को आतुर है . प्रक्रति का अजब नज़ारा नजर आ रहा है लेकिन पतझड़ — कल चेक करूँगा गाँव जाकर .

    Like

  4. शब्दों में कम पर सोचने के लिए मजबूर कर देने वाली एक बेहद सार्थक पोस्ट.. कम से कम एक ब्लोगर के लिए..

    Like

  5. टिप्पणियों में आयीं कवितायेँ पढ़ कर प्रसन्न हूँ – प्रवीण भाई की रचना की अंतिम लाइन " मैं उत्कट आशावादी हूँ।" बहुत पसंद आयी ………….ई स्वामी जी की भेजी हुई भी उम्दा लगी – हमारे यहां पतझड़ की सुन्दरता , देखने लायक होती है — मानो प्रकृति शीत लहर से पहले रंगबिरंगी परिधान में सज कर , दर्पण निहार रही हो — – लावण्या

    Like

आपकी टिप्पणी के लिये खांचा:

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s