महानता के मानक

यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की अतिथि पोस्ट है। प्रवीण बेंगळुरू रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल वाणिज्य प्रबन्धक हैं। प्रवीण इस विषय पर दो और पोस्टें प्रस्तुत करेंगे -एक एक दिन के अंतराल पर।

विषय यदि एब्स्ट्रैक्ट हो तो चिन्तन प्रक्रिया में दिमाग का फिचकुर निकल आता है। महानता भी उसी श्रेणी में आता है। सदियों से लोग इसमें जूझ रहे हैं। थोड़ी इन्ट्रॉपी हम भी बढ़ा दिये। बिना निष्कर्ष के ओपेन सर्किट छोड़ रहे हैं। सम्हालिये।
सादर, प्रवीण|

महानता एक ऐसा विषय है जिस पर जब भी कोई पुस्तक मिली, पढ़ डाली। अभी तक पर कोई सुनिश्चित अवधारणा नहीं बन पायी है। इण्टरनेट पर सर्च ठोंकिये तो सूचना का पहाड़ आप पर भरभरा कर गिर पड़ेगा और झाड़ते-फूँकते बाहर आने में दो-तीन दिन लग जायेंगे। निष्कर्ष कुछ नहीं।

तीन प्रश्न हैं। कौन महान हैं, क्यों महान हैं और कैसे महान बने? पूर्ण उत्तर तो मुझे भी नहीं मिले हैं पर विचारों की गुत्थियाँ आप के सम्मुख सरका रहा हूँ।

कैसे महान बने – लगन, परिश्रम, दृढ़शक्ति, …….. और अवसर । एक लंबी कतार है व्यक्तित्वों की जो महानता के मुहाने पर खड़े हैं इस प्रतीक्षा में कब वह अवसर प्रस्तुत होगा।

क्यों महान हैं – कुछ ऐसा कार्य किया जो अन्य नहीं कर सके और वह महत्वपूर्ण था। किसकी दृष्टि में महत्वपूर्ण और कितना? “लिम्का बुक” और “गिनीज़ बुक” में तो ऐसे कई व्यक्तित्वों की भरमार है।

कौन महान है – इस विषय पर सदैव ही लोकतन्त्र हावी रहा। सबके अपने महान पुरुषों की सूची है। सुविधानुसार उन्हें बाँट दिया गया है या भुला दिया गया है। यह पहले राजाओं का विशेषाधिकार था जो प्रजा ने हथिया लिया है।

पता करना चाहा कि इस समय महानता की पायदान में कौन कौन ऊपर चल रहा है बिनाका गीत माला की तरह। कुछ के नाम पाठ्यक्रमों में हैं, कुछ के आत्मकथाओं में, कुछ के नाम अवकाश घोषित हैं, कुछ की मूर्तियाँ सजी है बीथियों पर, अन्य के नाम आप को पार्कों, पुलों और रास्तों के नामों से पता लग जायेंगे। लीजिये एक सूची तैयार हो गयी महान लोगों की।

क्या यही महानता के मानक हैं?

विकिपेडिया पर उपलब्ध पाराशर ऋषि/मुनि का इन्दोनेशियाई चित्र। पाराशर वैषम्पायन व्यास के पिता थे।

Parasara-kl

पराशर मुनि के अनुसार 6 गुण ऐसे हैं जो औरों को अपनी ओर खीँचते हैं। यह हैं:

सम्पत्ति, शक्ति, यश, सौन्दर्य, ज्ञान और त्याग

इन गुणों में एक आकर्षण क्षमता होती है। जब खिंचते हैं तो प्रभावित होते हैं। जब प्रभाव भावनात्मक हो जाता है तो महान बना कर पूजने लगते हैं। सबके अन्दर इन गुणों को अधिकाधिक समेटने की चाह रहती है अर्थात हम सबमें महान बनने के बीज विद्यमान हैं। इसी होड़ में संसार चक्र चल रहा है।

पराशर मुनि भगवान को परिभाषित भी इन 6 आकर्षणों की पूर्णता से करते हैं। कृष्ण नाम (कृष् धातु) में यही पूर्णता विद्यमान है। तो हम सब महान बनने की होड़ में किसकी ओर भाग रहे हैं?

महानता के विषय में मेरा करंट सदैव शार्ट सर्किट होकर कृष्ण पर अर्थिंग ले लेता है।

और आपका?


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73 thoughts on “महानता के मानक

  1. “महानता के विषय में मेरा करंट सदैव शार्ट सर्किट होकर कृष्ण पर अर्थिंग ले लेता है। और आपका?”

    निस्संदेह. अभी और आगे पढने की उत्सुकता है. शायद आगे दिमाग का फिचकुर निकल आये!:)

    “Be not afraid of greatness: some are born great, some achieve greatness, and some have greatness thrust upon them.” – William Shakespeare

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    • वाह, निशान्त – आत्मोन्नति के लिये एक बढ़िया कोट दे दिया!

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      • पता नहीं, पर मुझे लगता है कि महानता थोपी नहीं जा सकती । यदि थोपी जा सके तो थोपने वाला उससे भी महान होगा । कालिदास पर विद्वता थोपी गयी थी शास्त्रार्थ में । वह अपवाद था ।

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        • हमारे समाज मे तो महानता थोपी भी जाती है… हम जैसे ही किसी अच्छे पद पर पहुचते है – डेमी गाड टाईप… लोग हमसे महानता की उम्मीदे रखते है… हमारे कई क्रिकेटर, फ़िल्मस्टार तो इन्ही उम्मीदो का बोझ उठा नही पाते ..

          हमारे UP-Bihaar के समाज मे तो बचपन से महान बनना भी सिखाया जाता है… पिताजी मेरे लिये कामिक्स के नाम पर ’गीताप्रेस’ की किताबे लाते थे… (मुझे भी लगता है चरित्र निर्माण मे ऐसी किताबो की भूमिका हमेशा रहेगी..) बचपन से ही श्रवण कुमार, कैसाबियानका टाईप लोगो के बारे मे पढा है.. लेकिन आज मेरी ’महानता’ का स्टेट्स क्या है.. कह नही सकता क्यूकि ज़िन्दगी जीते वक्त ये लोग काफ़ी पीछे छूट जाते है..

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      • मैं असहमत हूँ प्रवीण। महानता थोपे जाने के उदाहरण अनेक हैं, भले ही उनकी डिग्री अलग-अलग रही हो महानता की, थोपे जाने की और महानता पाने की लालसा की।
        कथाओं में मैं गिनाना चाहूँगा -“मैं आज़ाद हूँ” और “गाइड” के नायकों के चरित्र। वास्तविक जीवन में मैं गिनाना चाहूँगा, पूरे आदर के साथ श्री राजीव गान्धी, सुश्री सोनिया गान्धी और श्री मनमोहन सिंह के नाम।
        मेरी नज़र में इन सभी को थोपी हुई महानता के कारण मसीहा बनने का दायित्व निभाना पड़ा। बाद में तो आदत हो जाती है और आनन्द-सुख प्राप्ति के बाद, जब महानता का नशा तारी होता है तो ऐसा ही लगता है व्यक्ति को कि मैं तो जन्म से महान था, पहचानने में दुनिया ने देर की।
        असहमत होने के मौलिक अधिकार का प्रयोग मैंने कर लिया है, अब आपकी बारी है।

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      • अवसर मिलने व महानता थोपने में अन्तर है । जो परिस्थियों थोपी जैसी लगती हैं वह दैवीय अवसर के रूप में भी देखी जा सकती हैं । महानता का उदय तो अवसर को निभाने के बाद होता है ।
        असहमति चिन्तन के एक स्तर ऊपर जाने पर वाष्पित हो जाती है । विनम्रता उससे भी ऊपर का स्तर है । वहाँ तो हार में भी उतना आनन्द है जितना जीत में ।

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    • अवसर सामने हो तो आप निर्णय न लेकर कट भी सकते हैं । कुछ को अवसर बोझ लगता है, कुछ आतुर रहते हैं अपने को सिद्ध करने के लिये और कुछ के लिये स्थितिपरक निर्णय लेना एक आदत बन जाती है ।

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  2. हर एक के लिये महानता का पैमाना अलग होता है । कोई किसान इसलिये किसी को महान मानेगा कि उसके कर्जे उस मुख्यमंत्री ने माफ कर दिये……..लेकिन वहीं पर एक बैंकर कभी भी उस मुख्यमंत्री को पसंद नहीं करेगा जो किसानो को कर्ज दिलवाना अपना फर्ज समझता है लेकिन दयार्द होकर या वोट के चक्कर में उनके कर्जे माफ करवा देता है।

    इसी तरह और भी मुद्दे हैं। कोई किसी को महान मानता है तो वही दूसरे लोग उसे निकृष्टता की श्रेणी में रखना पसंद करते हैं।

    बढ़िया पोस्ट है।

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    • कोई किसी को महान मानता है तो वही दूसरे लोग उसे निकृष्टता की श्रेणी में रखना पसंद करते हैं।
      हां, शायद ऐसे में पुस्तक प्रमाण या Law of Averages ले कर चलना होगा।

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      • यह सम्भवतः तब होता है जब महानता की विराटता को संकुचित करने के प्रयास होते हैं । जब पूरे को समेट पाने की क्षमता न हो तो हाथी की पूँछ को ही हाथी समझ लिया जाता है ।

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      • हां, शायद ऐसे में पुस्तक प्रमाण या Law of Averages ले कर चलना होगा।

        ये बड़ी मुश्किल बात है, कहीं कहीं गांधी जी ने आत्मस्वीकृति के तहत ब्रह्मचर्य वाले प्रयोग किये हैं जिन्हें पढ़ कर उनकी महानता पर शक होता है और दूसरी ओर टनो गांधीजी की महानता पर लेख लिखे गये हैं। अब मैं यदि उनकी आत्मस्वीकृति पढ़ता हूँ तो उनकी महानता पर मेरा मन प्रश्न खड़ा करता है और यदि टनों लिखित गांधी प्रशंसावली पढ़ता हूँ तब आत्मस्वीकृति वाला प्रश्न एक और प्रश्न खड़ा करता है कि क्या मैं झूठा हूँ ?

        ऐसे में एक बीच का रास्ता यह है कि महान अमहान के लफड़े में न पड़ जो जैसा दिखे उस प्रजाति का ठीकठाक बंदा मान लूँ ।

        बाकि तो जब तक किसी के कर्म को खुद न देख लूँ…..खुद न जान लूँ ….महान कहना जल्दबाजी होगी। और जब महान मानना ही हो तो सेफ पैसेज के तहत मिथक या ईश्वरीय गुणों वाले बुद्ध, कृष्ण , राम आदि को मान लेना ज्यादा उचित होगा….बनिस्पत उन लोगों के जिनके बारे में इतिहास पुस्तकों में विभिन्न सरकारी प्रभावों के तहत कागद कारे किये गये हों।

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        • जहाँ तक सीखने की बात है, हमें हर उस व्यक्ति से सीखना चाहिये हमसे अधिक योग्य हो । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महानता का विषय इसलिये गम्भीर हो गया है क्योंकि उनके मानक बदल दिये गये हैं । न्याय तो हर क्षेत्र में होना चाहिये ।

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  3. @महानता के विषय में मेरा करंट सदैव शार्ट सर्किट होकर कृष्ण पर अर्थिंग ले लेता है।
    जे गरीब पर हित करे, ते रहीम बड़ लोग ।
    कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग ।।

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      • तरना नहीं है। कृष्ण्मय होना है, कृष्णार्पित होना है, कृष्ण होना है।
        अब? बस चलते रहना है…
        कृष्णत्व की ओर।

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    • त्याग को पहले मैं आकर्षण का विषय नहीं समझता था । तेन त्यक्तेन भुन्जीथाः को समझने में वर्षों लग गये । बाद में समझ आया कि मर्म तो यही है, अन्तिम आकर्षण ।

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      • नेति-नेति भी इसी का प्रकारान्तर है। समझ का ही तो खेल है भाई। जीवन कहो या दुनिया, ये और कुछ नहीं, हमारी समझ – हमारा परसेप्शन है।

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  4. बरसों पहले एक स्थान पर कोई जातीय समारोह हो रहा था वहाँ एक धनवान अंधा बुजुर्ग बैठा था। उस से कम बुजुर्ग जो काम में लगा था, लगातार उस की प्रशंसा किए जा रहा था
    -आप ने तो जाति के नाम को रोशन किया है, आप बड़े महान हैं।
    जब भी वाक्यांश पूरा होता अंधा बुजुर्ग टेक देता
    -इस में क्या शक है?

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    • दो तीन विदाई समारोहों में मुझे भी ‘बड़े महान हैं’ की प्रशंसोक्ति मिल चुकी है । शुक्र है कि ‘थे’ नहीं लगाया ।

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  5. यही पोस्ट ‘मानसिक हलचल’ पर भी है और वहां भी टिप्पणियां आ रही हैं.
    इधर नवीनता भा रही है, वहां पुरानापन अपनी ओर खींच रहा है.
    क्या सोच रहे हैं. ऐसा कब तक चलाएंगे?

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  6. One step at a time-लेते हुए लगा हूँ…प्रोसिजर जान लिया है बस इम्प्लिमेन्टेशन की तैयारी है. ज्ञात यह भी करना है कि महानता को संज्ञा मानूँ या विशेषण!!

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    • महानता की ऊँचाईयों पर इन दोनों में भेद नहीं क्योंकि कोई भेद करने वाला नहीं । पदार्थ व ऊर्जा में कोई भेद नहीं । नाम और रूप में कोई भेद नहीं । ठीक उसी तरह, जिस तरह आपके प्रश्न व उत्तर में भेद नहीं ।

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  7. Greatness is subjective. अलग समाजों में, अलग अलग परिस्थितियों व संदर्भों में, महानता के अर्थ बदलते रहते हैं. बहुत कठिन है कोई सर्वग्राह्य परिभाषा दे पाना.

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    • तभी ग्रेटनेस ह्यूमेनिटीज के डोमेन में है। और मानव सदा इसको परिभाषित करने – नापने में लगा रहेगा! 🙂

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    • तभी न दिमाग का फिचकुर निकल गया ! अगली पोस्ट में आपका प्रश्न ही उठाया है । जो सर्वग्राह्य परिभाषा दे दे उसे यूनीफाइड थ्योरी का प्रणेता घोषित कर देना चाहिये । सबजेक्टिव विषयों का सबसे अधिक दुरुपयोग भी होता है ।

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      • प्राकृतिक सौन्दर्य !
        यह किस कवि की कल्पना का चमत्कार है,
        ये कौन चित्रकार है ?

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        • Intentions my dear Watson! Intentions!
          What if intentions are not there to help African kids?
          So Great-ness also has to do with intentions. Intentions may be driven by any of the many forces, which are ever-varying with dimensions (time-place etc.)
          So Greatness has a lot to do with the indices selected as per prevalent values.
          The figure considered in Victorian times was Meena-kumari type and a shortwhile ago it was size ZERO.
          मगर प्रवीण भाई, मज़ा नहीं आ रहा यहाँ अंग्रेज़ी लिखने में। ऐसा लग रहा है साफ़-सुथरे तरणताल में स्याही की बोतल उड़ेल दी…

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  8. अच्‍छी पोस्‍ट। विचार लिखकर रख लिए हैं। बार-बार अध्‍ययन करते रहेंगे। आभार।

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    • विचार मन्थन से कुछ अमृत निकले तो हमें भी चखाईयेगा ।

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  9. महानता निश्चित ही व्यक्ति सापेक्ष और समय सापेक्ष होती है…पर आपने बताया नहीं कि क्यों आपका महानता के विषय में करेंट शार्ट सर्किट होकर कृष्ण पर अर्थिंग ले लेता है…’कृष्‌’ धातु के ‘आकर्षण’ अर्थ के कारण ? या कृष्ण के व्यक्तित्व के कारण…मुझे तो हमेशा से कृष्ण का व्यक्तित्व आकर्षित करता है. कृष्ण के नाम में प्रयुक्त ‘कृष’ धातु तो ‘नक्‌’ प्रत्यय के साथ काले रंग के अर्थ में निश्चित हो गई है.

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    • व्यक्तित्व कृष्ण के लिये छोटा शब्द लगता है।
      मैं तो श्री अरविन्द के कहे पर यकीन करता हूं कि कृष्ण ने जो गीता में कहा है उसका प्रकटन तो अभी आगे आना है!
      कृष्ण की विलक्षणता तो उत्तरोत्तर चमत्कृत करती है!

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      • हाँ, सहमत हूँ आपकी बात से…व्यक्तित्व शब्द कृष्ण के लिये बहुत छोटा है…एक विराट्‌ पुरुष के लिये यह शब्द नहीं प्रयुक्त करना चाहिये.

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      • आराधना के लिए ‘व्यक्तित्व’ की नाप श्रीकृष्ण के संदर्भ में करना चाहूँगा। रोक नहीं सकता स्वयं को, क्योंकि आसक्ति भले ही अन्य कई जगह और भी हो, पर ‘मोह’ मेरा कृष्ण से ही है।
        शंकराचार्य को पढ़ा होगा – उनकी टीका गीता पर…
        “नारायणऽपरोव्यक्त…”
        उस स्थान पर निष्कर्ष निकलता है कि नारायण अपने संपूर्ण स्वरूप के चौथाई अंश को ही लाते हैं प्रयोग में और भू-शक्ति से युत होकर उसका आधा अर्थात् कुल का आठवाँ भाग ही प्रकट या व्यक्त स्वरूप में है। शेष अव्यक्त स्वरूप है। इस आठवें भाग को सम्पूर्ण चराचर को अपने में समोए हुए विराट स्वरूप में अर्जुन को दिखाया श्रीकृष्ण ने।
        अब हमारा दु:ख 😦 ये है कि हम अर्जुन तो हैं नहीं – उतना सीधापन – उतना आर्जव लेकर हम जी न पाएँगे, ऐसा लगता है। कैसे देख पाएँ व्यक्त स्वरूप? तब जान पाएँ, शायद, कृष्ण का ‘व्यक्तित्व’…
        हम तो समुद्र – पहाड़ के आगे ही अपनी क्षुद्रता के अहसास में निमग्न हो लेते हैं और इसी में मस्त हैं 🙂

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  10. महानता आजकल भी फ़ैशन मे है.. थरूर टवीट करके महान बनने की कोशिश करते है तो मोदी जुगाडू आईपीएल का अरेन्जमेन्ट करके..
    मेरे हिसाब से ’चरित्र’ महानता का निर्माण करता है.. (शायद ’त्याग’ से आपने वही कहने की कोशिश की हो…)
    जो लोग चरित्र बचा ले गये वो आज भी महान है नही तो अभी हाल मे ही कई लोगो की महानता छिनते हुये देखा है..

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    • अगली पोस्ट आपके हाथ तो नहीं लग गयी, आईफोन एचडी की तरह । त्याग के प्रति आकर्षण अन्य आकर्षणों से अधिक पवित्र होता है । अन्य में ईर्ष्या घुल सकती है, त्याग में आदर है ।

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    • चरित्र बचे न बचे… छिपा ले जाने में सफल हैं जो अपना चरित्र, व्यक्त नहीं करते-अगर व्यक्तित्व को न पहचान पाएँ लोग तो महानता क़ायम रहती है। महानता का ‘व्यक्त’ होने से, ख़ासकर सेलेक्टिवली व्यक्त होने से बड़ा सीधा सम्बन्ध है।

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  11. काला रंग अपने में सब रंगों को समाहित किये हुये है । ब्लैक होल तो न केवल सबको अपनी ओर खींचता है वरन अपने में समाहित कर लेता है । कृष्ण को जितना समझने का प्रयास करता हूँ उतनी जिज्ञासा बढ़ जाती है । हर बार गीता मे नये अर्थ निकल आते हैं । यह आकर्षण नहीं तो और क्या है ? इन 6 ऐश्वर्यों के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि कृष्ण ने न केवल इनका पूर्णता से प्रदर्शन किया वरन एक आदर्श स्थापित कर गये लघु-देवों के लिये ।
    त्याग को पहले मैं आकर्षण का विषय नहीं समझता था । तेन त्यक्तेन भुन्जीथाः को समझने में वर्षों लग गये । बाद में समझ आया कि मर्म तो यही है, अन्तिम आकर्षण ।
    कृष्ण के जीवन से यह जाना ।

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    • प्रवीण जी टिप्पणियों में ही इतना व्याख्यायित किये दे रहे हैं कि अगली पोस्टें पढने का अनुभव हो रहा है 🙂

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      • आदरणीय ज्ञानदत्त जी के प्रयोग को पूर्णता से निभा रहे हैं । पूर्ण परिचर्चा । टिप्पणियों पर भी । टिप्पणियाँ पोस्ट का अंग बनती जा रहीं हैं ।

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        • वाह ! कृष्ण वर्ण को क्या खूब व्याख्यायित किया है प्रवीण जी ने.

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  12. महानता महान हो जाने में भी है और उसे पहचानने, मान्यता देने में भी। बहुधा महानता को मान्यता मिलने के पीछे सार्वभौम ‘आकर्षण’ के साथ-साथ ईर्ष्या का न होना भी ज़रूरी होता है। यह स्थिति तभी आती है जब यह स्वीकार किया जा सके कि जिस गुण से कोई महान है, वह गुण – उस मात्रा में – हम में न तो है, और न विकसित हो पाएगा।
    महानता की अपनी कीमत होती है, जो अदा कर सके वो महान बना रहता है। बहुधा महानता की स्वीकृति इसी कीमत को अदा न कर पाने की विवशता की परोक्ष अभिव्यक्ति भी होती है।
    + + +
    बहरहाल – ये ब्लॉग जँच रहा है, सज्जा और सुविधा – दोनों की दृष्टि से। 🙂

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    • किसी के गुण को स्वीकार कर लेना कठिन है । पर स्वीकार न करने में जो उथल पुथल मन में मचती है, उससे अच्छा है स्वीकार कर लेना । पता नहीं हम नापने लगते हैं और नप जाते हैं । कभी तो लगता है कि चैतन्य महाप्रभु के तृणादपि सुनीचेन को अपना कर सब स्वीकार कर लूँ पर मन है कि मानता नहीं । आपसे शतशः सहमति है ।

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  13. कौन महान हैं, क्यों महान हैं और कैसे महान बने?’
    महानता नितांत दैवी शक्ति युक्त है. महान में महानता के गुण हो जरूरी तो नहीं है. वह तो इसलिये महान है क्योंकि उसे महान बना दिया गया है. ‘कैसे’ शब्द बहुत व्यापक है. हर तरह की महानता अर्जित करने की प्रक्रिया अलग-अलग है.

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    • दैवीय भूमिका तो समझ में आती है और वह भी अवसर के रूप में । अधिक योग्य लोग मुहाने पर बैठे बैठे जीवन बिता देते हैं ।

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  14. महान लोगों मतलब ऐसे लोग जिनको महत्वपूर्ण समझा जाये। इसके बारे में कोई अंग्रेजी के कवि (शायद टी.एस.इलियट)कहिन हैं: Half of the harm in the world is done by the persons who think that they are important (मतलब दुनिया में आधी गड़बड़ी तो महत्वपूर्ण/महान लोगों के चलते हुयी है)

    बाकी आपको अगर हा हा ,ही ही वाले रूट से महान बनने का जुगाड़ सस्ता जुगाड़ चाहिये तो देखिये हम बहुत पहले बता चुके हैं महान बनने का सस्ता/सुलभ उपाय- काम छोड़ो-महान बनो

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    • मतलब दुनिया में आधी गड़बड़ी तो महत्वपूर्ण/महान लोगों के चलते हुयी है

      हमारा तो पहले ही अन्दाज था कि गड़बड़ आपके कारण है! 🙂

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      • मगर बात खुली स्वीकारोक्ति से, अब जाकर!
        और चालाकि ये है कि ज़िम्मेदारी भी सिर्फ़ आधी ही ले रहे हैं, बाक़ी आधी हम लोगों पर डाल रहे हैं गड़बड़ी की, और संदर्भ “इलियट” का।
        अच्छा है आमिर ख़ान नहीं पढ़ रहे वर्ना वो बता देते कि सारी गड़बड़ी से इसी “इडियट” का कुछ लेना-देना नहीं है।

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  15. “महानता के विषय में मेरा करंट सदैव शार्ट सर्किट होकर कृष्ण पर अर्थिंग ले लेता है। और आपका?”
    हमारा कभी कभी डाइवर्ज हो जाता है… पर हाँ कृष्ण पर अक्सर कन्वर्ज होता है. वैसे महाभारत के कई पात्रों पर.
    … महाभारत के कुछ पात्रों का बड़ा सही कम्बीनेशन बन सकता है. कभी इस पर सोचियेगा… कुछ यहाँ से कुछ वहां से.

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    • महाभारत के पात्र बड़े निराले हैं । पढ़िये तो किसी पात्र में आपका आत्म समत्व अनुभव करने लगता है । बहुधा स्वयं को अर्जुन की तरह पाता हूँ । मौका मिला तो आपको कविता पढ़वाऊँगा ।

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  16. Mahanta ya Greatness dar asal Tyaag ( Eesaar Ya kisi buland maqsad ke liye qurbaan ho Jana) mein hi hia.

    Baqi hum jis mahanta ki bat aajkal karte hian wo haqeeqat main perfection hoti hai ya kisi area main unprecedented heights ko chhoo lene ko kahte hain…….jo mere khayal se ghalat hai

    Mahaanta Ya Azmat bina Tyaag aur Qurbani ke ho hi nahi sakti !

    Khalid

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    • त्याग अनिवार्य गुण है। त्याग को अपरिग्रह के अर्थ में लिया जा सकता है।
      त्याग का गुण बढ़ाने का यत्न करें तो अन्य गुण अपने आप जुड़ते चले जायेंगे। नहीं?

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  17. Beshak ! You have hit the nail on the head.

    Yahi buniyad hai azmat ki…..

    Great hona asan nahi…….great bowler hona aur great cricketer hona alag hai , great human being hona ek bohat bari bat hai. Jisne apni zindagi mein qurbani dee hai us per bad mein zamana qurban hua hai. Aur aapki bat ko aage badhaun ko Tyaag paida hi usmein hota .jismein aur oonchee oonchne insani khubiyan( Uchh Manviya gun) maujood hote hai ya ho jati hain……..lihaza aap dekhenge ki koi bad-kirdar ( character-less) aajtak azeem (great )nahi kahlaya .

    azmat ( greatness ) ke lafz se ek sher yaad aa gaya hai, though its not irrelevant but I cant say it relevant as well.

    Hazaron azmatein ( greatnesses) qurbaan us daaman ki azmat per
    Jo majboori ke aalam mein bhi phailaaya nahi jaata

    Shukriya !

    Khalid

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  18. बहुत बहुत सुन्दर पोस्ट – जानती हूँ कि यह कमेन्ट बहुत late है – परन्तु मैं यहाँ पहली बार आई हूँ | अनुराग शर्मा जी की पोस्ट शृंखला से लिंक पा कर – बहुत सुन्दर पोस्ट, बहुत सुन्दर विवेचना | बधाई स्वीकारें |

    परन्तु महानता सिर्फ तब महानता है – जब जो व्यक्ति महान है / कहा रहा है – वह “महान” बनने का इच्छुक न हो – बल्कि निश्चल भाव से स्व-सुख नहीं बल्कि पर-सुख के लिए, जो उसे ठीक लगता हो, वह कर रहा हो | जो अपना कर्म ही “महान” बनने के लिए कर रहा हो – वह तो महान हो ही नहीं सकता कभी |

    सुनने में शायद अजीब लगेगा यह – तथाकथित महानता वह मृगतृष्णा (माया )है जो अक्सर कृष्ण के मार्ग पर जाते व्यक्ति को मार्ग से डिगा देती है | क्योंकि – जब व्यक्ति महान कहलाने लगता है – तो धीरे धीरे वह सुन सुन कर स्वयं भी यह मानने लगता है कि “मैं महान हूँ” और अपनी राह अक्सर खो बैठता है , डिग जाता है | हम जब किसी को भी अपनी सर आँखों पर लेते हैं, तब अनजाने ही हम उसका नुक्सान कर रहे होते हैं |

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