भाग ४ – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ

यदि आपको गाडियों का शौक है तो अवश्य एक बार वहाँ (कैलीफोर्निया) हो आइए।

कारों की विविधता, गति, शक्ति और अन्दर की जगह और सुविधाएं देखकर मैं तो दंग रह गया।
शायद ही कोई है जिसके पास अपनी खुद की कार न हो।

औसत मध्यवर्गीय परिवार के तो एक नहीं बल्कि दो कारें थी। एक मियाँ के लिए, एक बीवी के लिए।


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की उनकी कैलीफोर्निया यात्रा के दौरान हुये ऑब्जर्वेशन्स पर आर्धारित चौथी अतिथि पोस्ट है।


गैराज तो इतने बडे कि कम से काम दो कारें अगल बगल इसमें आसानी से खड़ी की जा सकती हैं।

गैराज के अन्दर जगह इतनी कि भारत में तो इतनी जगह में एक पूरा घर बन सकता था।
हवाई अड्डे से पहली बार जब घर पहुँचे थे, बेटी ने कहा कि गैराज का दरवाजा, पास आते ही अपने आप खुल जाएगा। हमें याद है हमने उस समय क्या कहा था – “हद है आलस्य की भी। गाडी के बाहर निकलकर झुककर दरवाजा उठा भी नहीं सकते क्या, जैसा हम भारत में करते हैं?”

फ़िर जब गैराज का दरवाजा देखा तो समझ गया। इतना बडा था कि इसे खोलने के लिए बिजली की जरूरत पडती थी। हम उठा नहीं सकते थे।

चित्र देखिए। एक में बन्द गैराज के सामने हम खडे हैं, दूसरे में खुली हुई खाली गैराज और तीसरे में गैराज में गाडीयाँ खडी हैं।

garage outside view
garage inside view

कारों में GPS का अनुभव पहली बार किया। कहीं भी निकलते थे तो इसे साथ ले जाते थे। अपरिचित स्थानों पर बडे काम की चीज है। सारे इलाके का मैपिंग इतना अच्छा है कि पता टाइप करने पर, यह गैजेट आपको रास्ता बता देता है स्क्रीन पर और कहाँ किस दिशा में मुड़ना है यह भी आवाज करके बताता है।

टी वी देखने के लिए तो अपने पास बहुत समय था पर वहाँ के प्रोग्राम को हमें देखने में कोई रुचि नहीं थी। वहाँ भी बहुत ज्यादा समय विज्ञापन (ads) खा जाते हैं। भारत के समाचार तो बिलकुल नहीं के बराबर थे वहां। सारा समय या तो Mexico gulf Oil spill  या ओबामा पर केन्द्रित था।

टी वी सीरयल देखने की कोशिश की पर अच्छे सीरयल भी हम देखकर आनन्द नहीं उठा सके क्योंकि सिचयुयेशन और पात्रों के साथ हम अपने को आइडेण्टीफाई नहीं कर पाए।

बस एक विशेष सीरियल नें हमारा दिल जीत लिया और वह है “Everybody Loves Raymond”| केवल इस सीरियल में सिचयुयेशन्स हमारे भारतीय परिवारों  जैसी ही थीं और हमने इस सीरियल के ४० से भी ज्यादा एपीसोड्स देखे।

इसके अलावा सार्वजनिक लाईब्ररी से DVD मंगाकर देखते थे। समय बहुत था यह सब देखने के लिए।
ईंटर्नेट के माध्यम से भी हम फ़िल्में सीधे स्ट्रीमिंग (Direct Streaming)  करके, टी वी पर देखते थे।

एक और बात हमने नोट की; इतने घर देखे पर कहीं भी कपडे घर के बाहर रसी (clothesline)  पर टंगे नहीं देखे। धूप होते हुए भी लोग वाशिंग मशीन के बाद ड्रायर (dryer) का प्रयोग करते थे। मुझे लगा कि व्यर्थ में उर्जा बरबाद हो रही है। क्यों घर के पीछे खुली हवा और धूप में  कपडों को सूखने नहीं देते?

कपडे भी हफ़्ते में एक बार ही धोते थे। हर दिन मैले कपडे इकट्ठा करके एक साथ धोते थे।

हमें तो यह अच्छा नहीं लगा। भारत में हम तो रोज कपडे धोते हैं।

वहां घर/मकान  मजबूत नहीं बनाते हैं। लकड़ी और काँच का प्रयोग कुछ ज्यादा होता है। ईंट, कंक्रीट वगैरह बहुत कम प्रयोग करते हैं। घर का चिरस्थायितत्व/ टिकाऊपन की किसी को परवाह नहीं। घर केवल अपने लिए बनाते हैं, अगली पीढी के लिए नहीं। किसी को अपने मकन/घर से लगाव नहीं होता। कोई यह नहीं सोचता कि अगली पीढी के लिए विरासत में घर छोडें।

जैसा हम कार/स्कूटर खरीदकर कुछ साल बाद बेच देते हैं वैसे ही यह लोग घर बदलते हैं। कारें तो अवश्य बार बार बदलते हैं।

बच्चे १८ साल की आयु में घर से बाहर रहने लगते हैं। माँ बाप के साथ रहना उन्हें अच्छा नहीं लगता। एक उम्र के बाद परिवार में आपसी रिश्ते कच्चे होने लगते हैं।

बिना शादी किए लोग माँ बाप भी बन जाते हैं और समाज में उन्हें किसी से मुँह छुपाने की आवश्यकता नहीं होती।

आज बस इतना ही। हम तो लगातार लिखते रह सकते हैं पर अब सोचता हूँ बहुत लिख लिया। अगली कडी अन्तिम कडी होगी।

शुभकामनाएं
G Vishwanath Small
जी विश्वनाथ


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Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://halchal.blog/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyan1955

19 thoughts on “भाग ४ – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ”

  1. विष्णु बैरागीजी, स्मार्ट इन्डियनजी, अजीत गुप्ताजी, अनूपजी और विनोद शुक्लाजी की बात मानते हुए आगे भी लिखता रहूँगा।प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद। पाँचवी किस्त भी हमने ज्ञानजी को भेज दी है। कृपया प्रतीक्षा कीजिए। शुभकामानाएंजी विश्वनाथ

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  2. "लोगों को पढनेवाले नहीं मिलते जबकि आपको पढनेवालों की संख्‍या अच्‍छी-खासी है। कृपया अपने अनुभवों और सर्वेक्षणों को कडियों मे मत बाँधिये। यदि आपको कोई विशेष असुविधा न हो तो इस क्रम को तब तक निरन्‍तर कीजिए जब तक कि जानकारियॉं समाप्‍त न हो जाऍं।"मैं भी मित्रों की बात से सहमत हूं. अपने सीरियल्स को और बडा करने की कृपा करें. अब आगे जानने का धैर्य चुकता जा रहा है.

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  3. वहाँ सर्व सामान्‍य के लिए यातायात के साधन प्रचुर मात्रा में नहीं हैं तो कार रखना उनकी मजबूरी है, यदि कार नहीं होगी तो वे घर से भी बाहर नहीं निकल सकते। भारत की तरह नहीं है कि घर के बाहर ही ऑटो मिल जाता है। इसीलिए प्रत्‍येक सदस्‍य को गाडी रखनी ही पडती है। कपड़े धोकर उन्‍हें धूप में सुखाने की मनाही है, इसलिए सभी ड्रायर का ही सहारा लेते है। आप समाप्‍त मत करिए लि‍खते रहिए।

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  4. अच्छा लग रहा है, संस्मरण पढना…भले ही बातों की जानकारी हो किन्तु हर व्यक्ति का चीज़ों को देखने का नजरिया अलग होता है…और यही संस्मरण को रोचक बना देता है.

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  5. सभी मित्रों को टिप्प्णी के लिए धन्यवाद।@ विष्णु बैरागी जी और स्मार्ट इन्डियनजी : इस प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद।पाँचवी किस्त भी तैयार है और उसमें मैंने लिखा था कि यह अन्तिम किस्त है पर आपकी की बात मानकर आगे भी लिखूंगा।शुभकामनाएंजी विश्वनाथ

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  6. सही कह रहे हैं आप विश्वनाथ जी । आधुनिकता में सबके आगे है अमेरिका । दुख की बात है कि भारत इसी आधुनिकता की दौड में अपनी अच्छी बातें और संस्कार छोडता जा रहा है । यह बनाये रखने की बहुत जरूरत है ।

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