गंगा के पानी की पम्पिंग कर सिंचाई



गंगाजी की रेती के कछार में लोग नेनुआ, लौकी, कोंहड़ा, तरबूज, खीरा और ककड़ी की खेती करते हैं। यह काम दीपावली के बाद शुरू होता है। इस समय यह गतिविधि अपने चरम पर है।

आप इस विषय में कई पहले की पोस्टें गंगा वर्गीकरण पर खंगाल सकते हैं।

मैने पिछली पोस्ट में बताया था  कि गंगाजी की रेती में कल्लू के खेत में पानी का कुंआ है। लोगों को गगरा-मेटी से इस प्रकार के कुंये से पानी निकाल कर सिंचाई करते मैने देखा था। Continue reading “गंगा के पानी की पम्पिंग कर सिंचाई”

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जकड़े हुये राणा प्रताप



एक समय था, जब शहरों में चिड़ियां और कौव्वे बहुतायत से थे और चौराहे पर लगी मूर्तियां उनकी बीट से गंदी हुआ करती थीं। अन्यथा उनको इज्जत बक्शी जाती थी।

अब चिड़ियां कव्वे गायब हो गये हैं। सो बीट की समस्या कम हो गई है। पर इज्जत-फिज्जत भी गायब हो गई है। उसका स्थान ले लिया है शुद्ध छुद्र राजनीति ने। Continue reading “जकड़े हुये राणा प्रताप”

डिसऑनेस्टतम समय – क्या कर सकते हैं हम?


मेरा देश और उसके लोग। न भूलूं मैं उन्हे!

तरुण जी ने पिछली पोस्ट (डिसऑनेस्टतम समय) पर टिप्पणी मेँ कहा था:

Edmund Burke का एक अंग्रेजी quote दूंगा:
“The only thing necessary for the triumph of evil is
for good people to do nothing.”

समाज की इस दशा के लिए कोई और नहीं हम खुद ही जिम्मेदार है
खासकर पिछली पीढ़िया।
इसे ठीक भी हमें ही करना होगा!
क्यों नहीं आप इस तरह के सुझाव आमंत्रित करने के लिए एक पोस्ट लिखे |
मेरे सुझाव:
१. इसकी शुरुआत अपने आसपास अपने सहकर्मियों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार का विरोध कर के शुरू कर सकते हैं ।
२. ट्रैफिक पोलीस के द्वारा पकडे जाने पर पैसा देने की जगह फाइन भरें।

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नत्तू पांड़े स्काइप पर



स्काइप पर नत्तू पांड़े का स्नैप-शॉट उनके पिताजी के साथ

नत्तू पांड़े अब हफ्ते में दो दिन स्काइप के माध्यम से मिलते हैं। उनके पापा (विवेक पाण्डेय) रात में लौटते हैं कामकाज से निपट कर। तब वे पन्द्रह-बीस मिनट के लिये नत्तू को ऑनलाइन कराते हैं। शुरू में वीडियो – बातचीत नत्तू पांड़े को अटपटी लगती थी; पर अब माहिर हो चले हैं नत्तू इस विधा के!

आज होली के दिन उनको रंग लगाया था वहां फुसरो (बोकारो) की बालमण्डली ने। तब तो वे ऑनलाइन नहीं हुये पर शाम के समय साफ सुथरे बन कर अपने दांत, कान, नाक, चोटी आदि फरमाइश पर दिखाने लगे।

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शिवकुटी, नारायणी आश्रम और राणा का इतिहास खण्ड



मैने कभी नहीं सोचा कि मैं इतिहास पर लिखूंगा। स्कूल के समय के बाद इतिहास बतौर एक डिसिप्लिन कभी देखा-पढ़ा नहीं। पर यहां इलाहाबाद के जिस शिवकुटी क्षेत्र में रहता हूं – गंगा के तट पर कोई चार-पांच सौ एकड़ का इलाका; वहां मुझे लगता है कि बहुत इतिहास बिखरा पड़ा है। बहुत कुछ को बड़ी तेजी से बेतरतीब होता जा रहा अर्बनाइजेशन लील ले रहा है। अत: यह जरूर मन में आता है कि इससे पहले कि सब मिट जाये या विकृत हो जाये, इसको इस ब्लॉग के माध्यम से इण्टरनेट पर सहेज लिया जाये।

मेरा किसी व्यक्तिगत काम के सन्दर्भ में श्री सुधीर टण्डन जी से मिलना हुआ। श्री टण्डन इलाहाबाद के प्रतिष्ठित टण्डन परिवार से हैं। मेरे घर के पास का रामबाग उन्ही की पारिवारिक सम्पत्ति है। (विकीमेपिया पर मेरी प्रस्तुत यह सामग्री देखने का कष्ट करें, जिसमें रामबाग की प्लेक के चित्र हैं। प्लेक में रामबाग के मालिक श्री रामचरन दास के साथ उसका सन भी लिखा है – सन 1898!)

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इण्टरनेट पर हिन्दी



वर्डप्रेस पर मैने प्रारम्भ से देखा कि ब्लॉग पोस्ट लिखते ही उसके हिन्दी होम पेज पर पोस्ट ऊपर दीखने लगती है। वर्डप्रेस पर हिन्दी में बहुत कम लिखा जा रहा है। उत्कृष्टता की कोई स्पर्धा ही नहीं है। उसके अनुसार हिन्दी ब्लॉगिंग, ब्लॉगिंग समग्र के हाशिये पर भी नहीं है। बहुत लिद्द सी दशा! Sad smile

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डेमॉर्की के निहितार्थ



karchhanaजनवरी में बीस दिन जी-ग्रुप के लोग बिछे रहे रेल पटरी पर। एक तरफ रेल परिचालन पर कोहरे की मार और दूसरी तरफ दिल्ली-बम्बई का ट्रंक रूट अवरुद्ध किये जी-ग्रुप के लोग। लोगों को असुविधा के साथ साथ अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव। अब एक हफ्ते से ज्यादा समय हो गया, माल यातायात वहन का पीक समय है, और जे-ग्रुप के लोग उत्तर-प्रदेश/हरियाणा/राजस्थान के कई रेल खण्डों पर पसरे पड़े हैं। अपनी जातिगत मांगों को ले कर। सवारी गाड़ियां अपने रास्ते से घूम कर चल रही हैं। बिजली घरों में कोयला नहीं पंहुच पा रहा, या पंहुच भी रहा है तो 200-300 किलोमीटर अधिक दूरी तय करने के बाद।

जी-ग्रुप और जे-ग्रुप। मैं जानबूझ कर उनके नाम नहीं ले रहा। इसी तरह के अन्य ग्रुप हैं देश में। कुछ दिन पहले यहां करछना पर किसान पसर गये थे पटरी पर। Continue reading “डेमॉर्की के निहितार्थ”