डिसऑनेस्टतम समय – क्या कर सकते हैं हम?

मेरा देश और उसके लोग। न भूलूं मैं उन्हे!

तरुण जी ने पिछली पोस्ट (डिसऑनेस्टतम समय) पर टिप्पणी मेँ कहा था:

Edmund Burke का एक अंग्रेजी quote दूंगा:
“The only thing necessary for the triumph of evil is
for good people to do nothing.”

समाज की इस दशा के लिए कोई और नहीं हम खुद ही जिम्मेदार है
खासकर पिछली पीढ़िया।
इसे ठीक भी हमें ही करना होगा!
क्यों नहीं आप इस तरह के सुझाव आमंत्रित करने के लिए एक पोस्ट लिखे |
मेरे सुझाव:
१. इसकी शुरुआत अपने आसपास अपने सहकर्मियों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार का विरोध कर के शुरू कर सकते हैं ।
२. ट्रैफिक पोलीस के द्वारा पकडे जाने पर पैसा देने की जगह फाइन भरें।

पाठक कह सकते हैं कि “इन जरा जरा से प्रयत्नों से क्या बनेगा, जब लोग देश लूटे जा रहे हैं!” “जरूरत तो इन बदमाशों को फांसी चढ़ाने की है।” “यह देश रहने लायक नहीं है।”  “गलती तो तभी हुई जब हमें इस देश में जन्म मिला।” आदि आदि!

पर मेरे विचार से तरुण जी बहुत सही कह रहे हैं। अगर बहुत मूलभूत बदलाव लाने हैं तो पहल व्यक्ति के स्तर पर ही करनी होगी। एक लम्बी यात्रा की शुरुआत एक छोटे से पहले कदम से होती है। हम रोज रात सोने के पहले मनन करें कि आज कौन सा ईमानदार काम हमने किया।

मैं यहां थियरी ऑफ ऑनेस्टॉलॉजी पर प्रवचन नहीं करने जा रहा। और शायद मैं उसके लिये सक्षम भी नहीं हूं। पर मैं जो कुछ कर सकता या कर रहा हूं; उसपर कह सकता हूं।

1. सरकार (पढ़ें एम्प्लॉयर) मुझे तनख्वाह देती है। मैं सोचता हूं कि वह मेरी योग्यता के अनुपात में बहुत ज्यादा नहीं है। पर मैं उसे ईमानदार कॉण्ट्रेक्ट के रूप में स्वीकार करता हूं और करता आया हूं। अत: यह मेरे उस कॉण्ट्रेक्ट का अंग है कि मैं जो भी काम करूं, उससे सरकार को मेरी तनख्वाह और मुझे दिये पर्क्स से कहीं ज्यादा लाभ मिले और मैं किसी व्यक्ति/सरकार से अनुचित लाभ (पढ़ें रिश्वत) न लूं।

2. मैं “ईमानदारी की नौटंकी” करने से परहेज करूं। ईमानदारी व्यक्तित्व नहीं, चरित्र का अंग बनना चाहिये।

3. मेरे प्रभावक्षेत्र में कुछ लोग हैं। कुछ युवा और बच्चे मुझसे प्रेरणा ले सकते हैं। उनके समक्ष मेरे व्यवहार या बोलचाल से यह न लगे कि मैं अनैतिकता को सहता/सही समझता हूं। अन्यथा उन्हे ऐसा करने का एक बहाना मिल सकेगा।

———–

आप क्या जोड़ेंगे अपने बिन्दु; मित्रवर?


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44 thoughts on “डिसऑनेस्टतम समय – क्या कर सकते हैं हम?

  1. कुछ बेहद आसान चीज़ों से शुरुआत की जानी चाहिए. उनमें मैं शामिल करता हूँ अपने घर और परिवेश में साफ़-सफाई रखना, यातायात के नियमों का पालन करना, सही समय पर कार्यस्थल पहुंचना और समयावधि में सभी कार्य पूरा करना. दूसरों पर नियम थोपने से पहले खुद पर उन्हें डटकर लागू कर लेना.

    और रात को सोने से पहले यह मनन करना कि आज कहीं कोई बेईमानी तो नहीं कर बैठे 😉

    अपन तो वैसे भी तीन सालों से अपने ब्लौग के माध्यम से सकारात्मकता, उत्पादकता और प्रेरणा का सन्देश दे रहे हैं. यदि इससे इक्का-दुक्का लोग भी स्वयं में कुछ परिवर्तन ला पा रहे हैं तो अपना काम पूरा.

    फुरसतिया जी की किसी पोस्ट में कही गयी उस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि ईमानदार आदमी को बेख़ौफ़, धाकड़ और बेईमानों से एक कदम आगे की सोच रखनेवाला होना चाहिए, अन्यथा उसकी ईमानदारी गयी तेल लेने.

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    • जीहां। अगर ईमानदार इस लिये कि लल्लू हैं और बे-ईमान नहीं बन सकते तो क्या फायदा ईमानदारी का! 🙂

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  2. अगर नेता-अधिकारी बेईमान है तो प्रश्न यह है वे आए कहाँ से. किसी अन्य ग्रह से नहीं आए हैं. हमारी संस्कृति ही भ्रष्ट है. जनता बदलेगी तो शासन बदलेगा. बात खत्म.

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  3. भ्रष्टाचार के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है कि लोग हताश और निराश हो गए हैं.. उन्हें लगता है कि भ्रष्टाचार का हिस्सा बनने के अलावा उनके पास और कोइ चारा नहीं है.. शिकायत भी करें तो किससे करें.. हमें थोड़ा सा धीरज रखना चाहिए.. अगर छोटे स्तरों पर हमसे कोइ अनुचित मांग करता है तो कम से कम किसी ऊपर वाले से एक बार शिकायत तो कर ही देनी चाहिए… कार्रवाई हो या न हो… हमें अपना कर्तव्य निभाना चाहिए.. पहले ही सोच लेंगे कि कुछ नहीं होने वाला तो सच में कुछ नहीं होगा..

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    • हताशा और निराशा तो है सतीश जी। वह भी तब, जब लगने लगता है कि सिस्टम बदलेगा नहीं!

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  4. बिना कुछ स्वयं किये हुये किसी को दोष देना ठीक न होगा। हम थोड़ा डोलते हैं तो लोग हिलाने लगते हैं।

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  5. सहमत हूँ, पर भ्रष्टाचार के रास्ते सरकार खुद बनाती है, आपके महकमे की ही एक घटना है, अलवर जाना था, श्रीमती को पैसे दिए की देल्ही छावनी से अलवर के लिए टिकट ३ टिकट ले आओ, पर पता नहीं कैशियर को क्या कंफुसन हो गयी, की टिकट तो एक मिला पर पैसे ३ टिकट के काट लिए. और हम भी जल्दबाजी में ट्रेन मैं बैठ गए……. जब टी टी महोदय आये, तो टिकट देख कर बदतमीजी करने लगे, ४-५ लोग और भी आ गए और टी टी महोदय को ३०० रुपे देने के लिए कहने लगे, पर मुझे उसकी बदतमीजी का जवाब देना था, तो बोला की तुम पर्ची बना दो….. और उसने १४६५ रुपे की पर्ची बनाई, जहाँ ४८ रुपे का एक टिकट था, वहाँ पर १४६५ रुपे दिए, और यही मामला ३०० रुपे में भी सुलत रहा था, बस सर जी सरजी कहना पड़ता, अब आप बताइये रेलवे का ये कौन सा विधान है, अगर जुर्माना ही लगाना है तो डबल पैसा ले लो तीन गुना ले लो……. कम से कम उस टी टी को लोग ३०० रुपे तो नहीं देंगे.
    यही हाल दिल्ली ट्रेफिक पोलिस का था, जुरमाना ६०० रुपे हुवा तो सिपाही आँख दिखने लगे, कम से कम २०० रुपे में छोड़ते थे……… अब यही १०० रुपे है तो कोई बात नहीं, बन्दा पैसा देकर रसीद ही लेता है.

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    • विचित्र लगता है। शायद खुन्दक वश बन्दे ने ट्रेन के स्टार्टिंग स्टेशन से टिकट बनाया और उसपर पेनाल्टी भी लगाई।
      इन छुद्र रिश्वतखोरी को विभागीय स्तर पर (अपने नीचे के स्टाफ को टेक अप कर) शायद मैं निपट लूं, पर व्यापक छुद्रता से निपटना मुझे नहीं आता। 😦
      और आगे आने वाले समय में समाज में यह सब झेलना होगा – यह सोच कर मन व्यथित भी होता है।
      जब यह पोस्ट लिखी तो यह अपेक्षा थी कि इस प्रकार की बेइमानी से निपटने पर पाठक अपना मत व्यक्त करेंगे।

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      • @अपेक्षा थी कि इस प्रकार की बेइमानी से निपटने पर पाठक अपना मत व्यक्त करेंगे।

        हमने किया था, मगर तब वर्डप्रैस ने स्वीकारा नहीं और आपका ईमेल पता मिला नहीं, सो आपको फेसबुक संदेसा में भेजा था, लगता है अब तक मिला नहीं.

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        • अनुराग जी, गलती मेरी है। मैं आजकल असक्रियता के चलते अपना फेसबुक अकाउण्ट भी चेक नहीं करता नियमित रूप से। 😦
          आपकी टिप्पणी वहां है और मैं नीचे प्रस्तुत कर रहा हूं (और; जैसा आपने टिप्पणी में लिखा है; आपकी पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी) –

          आपकी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं कर पा रहा हूँ। इसलिये ईमेल भेज रहा हूँ।

          ईमानदारी पर तो शायद मैं पूरी किताब लिख सकता हूँ। अभी के लिये कुछ अनुभवजन्य सूत्र:
          – ईमानदारी साहस और शक्ति दोनों ही मांगती है। कठिनाई सहने की आदत डालिये।
          – जब कोई रिश्वत मांगने पर अड ही जाये तो स्पष्ट बता दीजिये कि 1. उसकी मांग नाजायज़ है, 2. आपके काम में कठिनाई भले ही आये, आप रिश्वत जैसे गिरे हुए काम में साझेदार नहीं हो सकते।
          – बेईमानों की संगत छोडिये, उनके गलत तरीके के विरोध का कोई अवसर मत छोडिये।
          – इमानदारी का अर्थ असहयोग, द्रोह, बेरुखी या अक्खडपन नहीं है। प्रेम-सरोवर को बहता रहने दें।
          – बेईमान लोग बेईमानी से सफल नहीं होते, वे सफल होते हैं, नैटवर्किंग से। आप ईमानदार लोगों को बढावा दीजिये और उनकी नैटवर्किंग करते रहिये।
          – अपने व्यवहार पर नज़र रखिये। हो सकता है कि आप अपनी बेईमानी को ईमानदारी समझ रहे हों।
          – बेईमानी केवल आर्थिक नहीं होती, उसके अनेकों रूप हैं, हाँ सबसे मुखर रूप आर्थिक ही है।
          – दुनिया के हर अपराध के लिये बहाना ढूंढा जा सकता है। ईमानदार को बहाने की ज़रूरत नहीं पडती।
          – स्वामिभक्ति, परिवारवाद, अन्धविश्वास आदि बुराइयों को पहचानकर उनसे दूर रहें (सत्यनिष्ठा)
          – संशय की स्थिति में “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” को उदात्त करके बेईमानी के दूरगामी परिणामों के बारे में सोचिये।
          – याद रखिये कि ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। चोर-बेईमान भी अपने साझीदारों से ईमानदारी की अपेक्षा रखते हैं।
          बाकी बातें मेरी आगामी पुस्तक में 😉

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    • हर महकमे में जुर्माने की व्यवस्था कुछ सोच कर बनाई गयी है. कहीं यह हास्यास्पद भी हो जाती है जैसे बड़े गंभीर अपराधों के विधि में कैद के साथ मामूली जुर्माना भी होता है जो कहीं से तर्कसंगत नहीं लगता.

      जुर्माना अधिक होना ही चाहिए ऐसा मेरा मानना है. यदि यह कम भी हो तो कोई इसे तवज्जोह नहीं देगा और लोग नियम तोड़ने में हिचकेंगे नहीं. लेकिन दीपक बाबा जी के मामले में यह बड़ी ज्यादती भी है. उनका कहना सही है की मूल राशि का दो या तीन गुना भी वे देने को तैयार हो जाते लेकिन यहाँ तो दस गुने से भी ज्यादा हो गया.

      जुर्माना ज्यादा इसलिए रखा जाता है कि दूध के जले लोग आइन्दा छाछ को भी फूंककर पियें. यदि मेरे साथ यह घटना होती तो सच कहूं मैं इसे मेरे द्वारा बरती गयी छोटी असावधानी का बड़ा दंड मानकर उसे भुगतने को तैयार ही हो जाता भले ही मुझे फिर रास्ते भर श्रीमती जी का प्रवचन सुनना पड़ता. मुझे तो अक्सर ही लताड़ा जाता है कि मैं चुंगीनाके पर अपना विभागीय पहचान पत्र नहीं दिखाता.

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  6. मैं ये मानता हूँ कि किसी भी आदमी की तरक्की के पीछे दो बड़ी वजहें होती है. fear & greed (१. डर २. लालच). “डर” इस बात का किसी वो व्यक्ति जिससे हम मन ही मन जलते हैं और इर्ष्या रखते है वो हमसे आगे न निकल जाये या हम उससे पीछे न रह जाएँ और “लालच” ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का जिससे अपना लाइफस्टाइल स्तर ऊँचा हो जाये और जीवन आराम तलब हो जाये. dishonest के पीछे भी मुझे यही कारण लगता है . यही चीज इनसान को बेईमान बनने तक पर मजबूर कर रही है .सरकारी नौकरी पेशा लोग रिश्वतखोरी का तथा व्यापारी वर्ग टैक्स चोरी , मिलावटखोरी इत्यादि तरीकों का सहारा लेकर अपने झूठे स्वाभिमान को बनाये रखने की कोशिश करते रहते हैं और मजे की बात ये कि काफी हद तक कामयाब भी रहते हैं.

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    • समाज में औरों से तुलना करने और पड़ोसी से बेहतर हैसियत दिखाने की भावना निश्चय ही बड़ा घटक है बेईमानी का। फ्र्यूगेलिटी और अपनी चादर में रहना ही व्यक्तिगत महानता है!

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  7. आज के लेख ने ,विचार ने मन मोह लिया, जी हमे खुद से ही शुरुआत करनी होगी, यह मै भी हमेशा ही कहता हुं, रात सोने से पहले हमे अपनी सारे दिन की दिनचर्या पर एक बार सोच लेना चाहिये सच्चे मन से कि आज हम ने कोन कोन से अच्छॆ ओर गलत काम किये,धन्यवाद

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  8. भ्रष्टाचार का मामला जितना चिंताजनक है उतना ही रोचक भी है। भ्रष्टाचार केवल धन का ही नहीं मन का भी होता है। सीधे सीधे भगवान को ऑफर किया जाता है…..बाकायदा डील होती है कि अगर मेरा फलां काम हो गया तो आपको इतना चढ़ावा चढ़ाउंगा……..अप्रत्यक्ष तौर पर इसका मतलब यह है कि यदि काम नहीं किया तो कुछ नहीं चढ़ाउंगा 🙂

    और भगवान को भी मौज सूझती है……पहली रिक्वेस्ट में काम नहीं करते……..अगली बार भक्त फिर मंसूबा बाँधता है और भगवान को पहले से ज्यादा चढ़ावे का ऑफर देता है…… यही सब के चक्कर में भगवान और ज्यादा रेट बढ़वाते चले जाते हैं 🙂

    सोचता हूं एक दिन एन्टी करप्शन ब्यूरो में भगवान की कम्पलेन कर दूं …… कि काम तो कुछ करते नहीं…..खामखां रेट बढ़वाते चले जाते हैं। इस गहन विश्वास कि ( पैसे से सब काम हो जाता है) को ठेस पहुंचाते हैं और भारतीय संविधान की धारा 5 (C) के तहत किसी के विश्वास को ठेस पहुंचाना फौजदारी केस है, इसमें पांच साल की कैद और दो हजार रूपये जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है 🙂

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  9. बदलाव हमेशा ऊपर से ही सम्भव है, कम से कम इस व्यवस्था में. स्टैण्ड पर निर्धारित पार्किंग फीस २ रुपये है, ठेकेदार चार लेता है. दो रुपये की शिकायत के लिये पच्चीस-तीस खर्च करो, नतीजा सिफर. ठेकेदार जरूर लाखों के वारे-न्यारे कर लेता है. सम्भव ही नहीं है बदलाव. भगत सिंह पड़ोसी के घर में हो तो क्या होगा. हम सब व्यापारी बन गये हैं. आजादी इसलिये मिल सकी कि लोग कम पढ़े-लिखे थे, एक आवाज पर निकल पड़ते थे. आज सब पढ़ गये हैं, सबने अपने स्वार्थमय लक्ष्य निर्धारित कर लिये हैं.

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    • सोचने की बात है कि पढ़ाई ने लोगों को स्वार्थी बना दिया है!
      यह तो है कि साक्षर लोग अपने हक की बातें ज्यादा करते हैं।

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  10. मेरे पिताजी एक सरकारी नौकरी से रिटाएर हुए हैं |
    वो हमेशा कहते हैं की ईमान दार वो नहीं जिसने कभी रिश्वत नहीं ली क्योंकि कभी मौका नहीं मिला
    बल्कि वो है जिसने सामने रखी रिश्वत को ठुकरा दिया |
    मेरा मानना है की असली इमानदार वो है जिसने इसके साथ साथ बेईमानी करने वाले को टोका और मना किया |
    उनके आस पास के लोग रिश्वत लेते थे लेकिन उन्होंने कभी दोस्ती या कभी कुछ की वजह से कभी उन्हें कुछ नहीं कहा
    शिकायत करना तो दूर की बात है |
    मुझे लगता है की ये सभी लोगों की इमानदारी की कहानी है |
    हम कभी अपने आसपास हो रहे गलत को लेकर कुछ नहीं बोलते चुपचाप देखते हैं, जैसे की गन्दगी से बच कर निकलते हैं |
    हम सब को बुरे को वहीँ टोकना होगा जहाँ हम उसे होते हुए देखते हैं, तभी कुछ हो सकता है |

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    • मैं आपके जैसा सोचता था। अब अधिकाधिक आपके पिताजी जैसा सोचता हूं। यह परिवर्तन एक दो साल का नहीं, लगभग एक दशक का है। मेरे लड़के की ट्रेन दुर्घटना के बाद से व्यक्तित्व कुछ शांत सा रहने लगा!

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      • शायद पिताजी का अनुभव भी आपकी तरह ही दशकों में बना हो |
        पर कहीं तो कुछ शुरुवात करनी ही चाहिए |
        जब बेईमान लोगों को लगेगा की समाज में लोग उन्हें टोकते हैं
        उनका बहिष्कार करते हैं, उनका विरोध करते हैं तभी शायद वो रुकेंगे
        नहीं तो उन्हे क्या पड़ी है रुकने की |
        वैसे भी समाज में ऐसे लोगों की संख्या अब criticla mass पार कर गयी है
        तभी हम देखते हैं की जो रिश्वत पहले चोरी छुपे मांगी जाती थी अब सीना थोक कर सबके सामने मांगी जाती है
        और ना देने पर काम होता ही नहीं है |

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        • यह कछुये की प्रवृत्ति – जिसमें सज्जनता अंतर्मुखी बनती गयी है, कई दशकों का परिणाम है।
          आपकी क्रिटिकल मास की एनेलॉजी सटीक है।
          पिछले साल हमने लोगों को टोकने, विरोध करने का सिलसिला प्रारम्भ किया था। यह यहां और यहां है। पर वह ज्यादा चला नहीं। वह ऊर्जा भी बहुत लेता है। और कभी कभी प्रश्न उठने लगता है – Is it worth?

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      • आपके बेटे के बारे में जानकार दुःख हुआ |
        अब वो कैसा है?

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      • ज्ञान जी,

        आज इस दिये गये लिंक वाली पोस्ट को पढ़ा और जाना कि आप किस तरह की मानसिक पीड़ा से उस दौर में गुजरे होंगे। बहुत तकलीफ होती है ऐसे समय।

        इस तरह की तकलीफों को मैं भी कुछ कुछ झेल चुका हूं । एक बार तब, जब मेरे बेटे के सिर के पिछले हिस्से में चोट लग गई थी और रविवार का दिन होने से कोई क्लिनिक भी नहीं खुला था । एक दो अस्पतालों में बदहवास अवस्था में दौड़ लगाई गई तिस पर भी जवाब दे दिया गया कि रविवार होने से बड़े डॉक्टर नहीं हैं टांका नहीं लगेगा, सरकारी अस्पताल जाओ औऱ फिर दौड़ा दौड़ी हुई। वहां जाने पर वही जवाब कि डॉक्टर नहीं हैं……मजबूरन एक अदने से कर्मचारी ने खी खी करते हुए टांका लगाया……उपर से टांका लगाने के बाद चाय पानी हेतु कुछ रूपये भी मांगे…..अपनी खुशी से दे दो कहते हुए……ऐसी हालत में समझ सकते हैं कि इंसान किस मानसिक अवस्था में होता है और तिस पर चाय पानी की मांग की जाय तो क्या होता है। चूंकि उस वक्त मेरे बेटे के लिये वही भगवान था, सो कुछ दे दिया गया।

        आज सोचता हूं तो लगता है कि इस तरह की तकलीफें इंसान के धैर्य की परीक्षा ही लेती हैं……कि एक ओर तो परिजन चोट से जूझ रहा हो औऱ उससे उपजे मानसिक संत्रास को झेल ही रहे हो कि तब तक उसी त्रासदी को एन्कैश करता इंसानी जोंक आ जुटता है ।

        कभी कभी बहुत त्रासद हो जाती हैं परिस्थितियां…..बहुत त्रासद।

        आपके बेटे के भविष्य के लिये मंगल कामना करता हूँ, कि फिर से जल्द अच्छे हो जांय।

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  11. कौन कहता है आसमां में हो नहीं सकता सुराख
    एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

    – दुष्यंत कुमार

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  12. भारत में या दुनिया में कहीं भी अगर ईमानदारी की कोई इकाई बने तो शायद वह एक मिली हरिश्चन्द्र होगी …हरिश्चन्द्र तो क्या होंगें हम जिन्होंने इमानदारी के चलते घोर दुःख सहे ,श्मशान में नौकरी की और विपन्न पत्नी से खुद के ही बेटे के दाह संस्कार के लिए निर्धारित शुल्क माँगा ….ह्रदय विदीर्ण कर देने वाले इस आख्यान को ही ईमानदारी के संदर्भ में जाना जाता है -हमारे लिए एक मिली हरिश्चन्द्र का भी पैमाना हो तो ठीक ..
    ईमानदारी कहने में आसान है अनुपालन में मुश्किल -और निश्चय ही यह प्रदर्शन की मुहताज नहीं है मगर सरकारी सेवाओं में बार बार कहा जाता है की इमानदार होना ही पर्याप्त नहीं है यह प्रदर्शित भी होनी चाहिए …
    आज के इस तंत्र में अगर हम खुद इमानदार होने की बात करते हैं तो अमूमन यह एक पाखंड ही है …पूरी व्यवस्था -समाज घर परिवार भ्रष्ट हो चुका है ….बेटा बाप पत्नी पति सभी भ्रष्ट हैं -भ्रष्टाचार के नगारखाने में आपकी यह शहनाई कर्णप्रिय तो है मगर सुनने वाले कब तक टिकेगें ?
    मैं ईमानदार होने का ख्वाहिशमंद जरुर रहा हूँ मगर दुर्भाग्य से आज खुद को ईमानदार नहीं कह पा रहा ..
    इसलिए इस चर्चा में देर तक टिकने का साहस भी नहीं है … 🙂

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    • ईमानदारी के मानक के रूप में चाणक्य का दृष्टान्त आता है कि उन्होने एक अतिथि से मिलने के समय सरकारी दिया (जो वे काम करते समय जलाये थे) बुझा कर अपना व्यक्तिगत दिया जलाया। यह एक्स्ट्रीम माना जायेगा। इसी से प्रेरित हो मैने “ईमानदारी की नौटंकी” करने से परहेज की बात पोस्ट में लिखी है।
      आचार्य विष्णुगुप्त का क्लोन बनने की जरूरत नहीं!

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  13. हम हमारा काम एन केन प्रकारेण हो जाये ये चाहते है इसके लिए छोटी मोटी रिश्वत देने के लिए तैयार होते हैं पर जब लेने वाले बड़ा भ्रष्टाचार करते है तो गिरियाने में कोई पीछे नहीं होता. कोई ये नहीं मानता कि कि हमारे किये हुए छोटे भ्रष्टाचार का ये रिजल्ट है.

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  14. लेकिन हाथ पर हाथ रखकर आशा लगाये बैठे रहने से कुछ ठीक नहीं होगा |
    इससे तो स्थिति ख़राब ही होगी | बल्कि इसी वजह से तो आज ये स्थिति बनी है |
    हम लोगों को कुछ तो करना ही होगा |
    और शायद हम सब को अपनी ऊर्जा उसे सोचने में लाकर अमल लाने में लगानी चाहिए |

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    • अगर इतिहास देखें तो भारत के चरित्र में सेल्फ-करेक्टिव एलीमेण्ट तो है। वह इसे बनाना-रिपब्लिक बनने नहीं देगा। अगर लोगों में कसमसाहट है, तो वह इसका प्रमाण है। लोग सोच तो रहे ही हैं अपने अपने प्रकार से।
      दिक्कत यह है कि यह देश चीता नहीं, हाथी जैसा है। अपना समय लेता है क्रिया करने में। 🙂

      कुल मिला कर मेरे पास समाधान नहीं है; पर नैराश्य में भी आशा है!

      और हाँ, अनुराग शर्मा जी की टिप्पणी बहुत काम की लगती है!

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      • अनुराग जी के सुझाव वाकई बहुत अच्छे हैं,
        हमें इमानदार लोगों की networking करनी ही चाहिए,
        जिससे की बेईमानी और बेईमान लोगों से मिलकर निपटा जा सके |

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  15. जब तक हम “काम निकालने ” की प्रवर्ति से निजात नहीं पाते तब तक सुधार असंभव है . रिश्वत लेने वाले हाथ १० तो देने वाले १०० हैं .

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    • काम निकालने तक तो शायद चल भी जाये, पर जब इमारतें और पुल घटिया बनते हैं, दवायें नकली होती हैं, यातायात रुक जाता है, ट्रेने समय पर नहीं चलतीं, डीजल में केरोसीन मिलता है, सही आदमी को रोजगार नहीं मिलता और युद्धक तैयारी में दीमक लगती है; तब दिक्कत होती है! 🙂

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