कोयले की संस्कृति


दामोदर नदी

कोयला शुष्क है, कठोर है रुक्ष है। जब धरती बन रही थी, तब बना कोयला। उसमें न आकृति है, न संस्कृति। उसमें प्रकृति भी नहीं है – प्रकृति का मूल है वह।

आकृति, प्रकृति और संस्कृति दिखे न दिखे, आजकल विकृति जरूर दीखती है। भेड़ियाधसान उत्खनन हो रहा है। दैत्याकार उपकरण दीखते हैं। कोयले की धूल दीखती है। सड़क के किनारे मुझे गायें दिखी नहीं। अगर होंगी भी तो सतत कोयले की धूल के कारण भैंसों में तब्दील हो गयी होंगी।

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दामोदर नदी के किनारे एक परित्यक्त कुआँ

मैं अन्दरूनी इलाकों में नहीं गया। सड़क का साथ छोड़ा नहीं। लिहाजा दिखा भी उतना ही, जो सामान्यत दीखता है पर्यटक को। घुमक्कड़ी करने वाले को कहीं और दीखता। उसको शायद विकृति की बजाय प्रकृति और संस्कृति दीखते!

धनबाद – भारत की कोयला-राजधानी, बोकारो और फुसरो (कोयला उत्खनन का मूल) में मुझे एथेनिक गांव कहीं नजर आये। खपरैल कुछ घरों में दिखी भी, पर साथ साथ दीवारें ईंटों की थीं। उनपर रंग भी गंवई नहीं थे – केमीकल पेण्ट थे। औरतें घरों के दरवाजों दीवारों पर चित्र उकेरती हैं। वैसा कहीं पाया नहीं। लोटा-गगरी-मेटी दीखते हैं गांवों में। पर यहां अधिकतर दिखे प्लास्टिक के डिब्बे और बालटियां। हां बांस की दउरी, मोनी, डेलई जैसी चीजें नजर आईं। मुर्गियों को चिकन की दुकानों पर ले जाने के लिये बड़े आकार की झांपियां बांस की तीलियों की बनी थीं।

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धनबाद के पहले ट्रेन की खिड़की से दिखा दृष्य

गांव और मूल संस्कृति कहीं होगी जरूर, पर कोयले की अर्थव्यवस्था ने उसे दबोच रखा है। दीखती ही नहीं! कोयला बाहर से लोगों को लाया। मेरी पत्नीजी बताती हैं कि फुसरो में उत्खनन बन्द हुआ तो लोग बस गये। ज्यादातर बाहर के लोग। इलाहाबाद या आस पास के गांवों में धोती कुरता में लोग मिल जायेंगे। यहां तो कोई एथिनिक पोषाक नजर नहीं आती। स्थानीय लोगों से बातचीत नहीं हुई, अत: कह नहीं सकता कि उनकी बोली में हिन्दी को समृद्ध करने के लिये क्या है। पर स्थापत्य, वेश, स्मारक, पुस्तकालय … इन सब के हिसाब से जगह रीती दीखती है। धनबाद में स्टेशन के आसपास कुछ सुन्दर चर्च दिखे। पर अपने अतीत में गुमसुम बैठे।

मोदी कहते हैं वाइब्रेण्ट गुजरात। वाइब्रेण्ट झारखण्ड कहां है। न भी हो तो कहां हैं भविष्य की सम्भावनायें। मेरा नाती भविष्य का नेता होगा झारखण्ड का। कैसे लायेगा यहां वाइब्रेंसी? कौन डालेगा इस सुप्त प्रकृति में संस्कृति के प्राण!

कुछ चित्र इन जगहों के –

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धनबाद में पानी के लिये इकठ्ठा लोग

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मुर्गियों के लिये बांस की बनी झांपियां

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सड़क की दशा अच्छी है, फिर भी मरम्मत का काम होता है। बेहतर सड़कें, बेहतर भविष्य?

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एक सड़क के किनारे चाय की दुकान पर खाद्य सामग्री


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30 thoughts on “कोयले की संस्कृति

  1. थीम को लेकर आप हमेशा से ही बहुत पेक्यूलियर रहे हैं. बार-बार थीम का बदलना मुझे तो नहीं जमता. ब्लौग का साइडबार भी उसका एक अंग प्रतीत होने लगता है जो ऐसी थीम्स में नदारद हो जाता है. मैं तो उसे नीचे तक जाकर देखने की जहमत नहीं उठाता. बेहतर हो कोई एक थीम लम्बे समय तक पकड़कर बैठ जाएँ. मेरी थीम ‘मिस्टीक’ आजमाकर देखें, उसमें बहुत कस्टमाइजेशन हैं.

    यह हैडर लाजवाब है. इसकी खासियत यह है के इसमें हर व्यक्ति कुछ न कुछ कर रहा है, जो लोग बैठे हैं वे भी कहीं कुछ देख रहे हैं. पानी से प्रेत की तरह बाहर आता व्यक्ति हैडर का केन्द्रीय पात्र है.

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    • कुछ अर्से से अपने में प्रयोग धर्मिता लेखन/पोस्ट में नहीं हो रही है। ब्लॉग उस मायने में थका चल रहा है। जो कुछ हो रहा है, वह इस तरह के थीम ट्वीक्स में हो रहा है। और यह बहुत अच्छा नहीं है। 😦
      हेडर तो मुझे ज्ञानोक्ति का ज्यादा जम रहा है! 🙂
      (वह मैं बदलता नहीं, अगर आपने About पेज पर टिप्पणी न की होती!)

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    • मदारी पर पोस्ट बनाने के लिये मसाला और चाहिये था। वह मिल नहीं पाया। कुछ कल्पना से ठेलना पड़ेगा! 🙂

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      • सर , आपकी पोस्ट पड़ने का मतलब होता है , अल्लाहाबाद को पड़ लेना , साथ ही में शिवकुटी , तेलियरगंज , मोतीलाल एन आई टी पड़ लेना .
        और मानसिक चिंतन भी कर लेना , सामजिक मुद्दों पर .

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      • आपके जैसे 100 पाठक हों जो शिवकुटी/इलाहाबाद/तेलियरगंज/मोतीलाल एन आई टी में रुचि वाले हों तो तर जाये ब्लॉग!
        लोग रुचि वाले होंगे, पर पठन की आदत नहीं है उनमें

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  2. निराशाजनक स्थिति है….अब तो आस बाँधने की भी हिम्मत नहीं पड़ती..कुछ सूझे तब तो आदमी आस भी बांधे…

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  3. ज्ञान जी जहाँ काम मिलेगा गाँव के बाहर के लोग तो आयेंगे ही । विकास का ही बाय प्रॉडक्ट समझ लीजिये इसे ।

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    • जी हां। मैं इसे गलत भी नहीं कह रहा। मैं केवल स्थिति बयान कर रहा हूं।
      यही लोग जब नेटिव हो जायेंगे और उन्हे धन्धे की जद्दोजहद के बाद समय मिलेगा, तब वे अपने रिफाइण्ड टेस्ट्स की तरफ ध्यान देंगे।

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