संकर दुकान कब खोलिहैं!


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सामू ने बाल काटने में बिगाड़ दिया है। साला बकलोल बना दिया है!

शंकर पासवान का हेयर कटिंग सैलून है मेरे घर के पास नुक्कड़ पर। लम्बे अर्से से दुकान बन्द थी। शंकर का ब्याह था। व्याह के बाद हनीमून। परिणाम यह हुआ कि मेरे बाल झपोली बन गये। एक आध बार तो शैम्पू पिलाना पड़ा उन्हे। अन्यथा लट पड़ने के चांसेज़ थे।

अंतत: आज पता चला कि शंकर ने दुकान खोल ली है फिर से। अपने लिये सीट आरक्षित करा कर वहां पंहुचा तो देखा कि शंकर अपने सांवले रंग के बावजूद स्मार्ट लग रहा था। शादी के बाद लोग स्मार्ट हो जाते हैं क्या? अपनी याद नहीं, इस लिये पूछ रहा हूं।

सैलून में एक लड़का-कम-जवान विभिन्न मुद्राओं में शीशे में अपना चेहरा देख रहा था। बोलता जा रहा था –

संकर भाइ, एतना दिन क्या कर रहे थे तुम? पता होता तो सामू से बाल न कटवाये होते। साला बिगाड़ कर धर दिया है। बकलोल बना दिया है।

बकलोल पर जोर देने के लिये विभिन्न प्रकार के वाक्यों में बकलोल शब्द का बारम्बार प्रयोग किया उसने। यह करते हुये अपने हाथों से अपने बालों को बार बार सेट करता जा रहा था।

संकर भाइ, मैं दो-तीन-पांच दिन इंतजार कर सकता था। पता होता कि आने वाले हो। हम तो सोचे कि हनीमून का मामला है, पता नहीं कब आयें संकर भाइ। पर पता होता तो सामू को कतई अपना बाल न छूने देते। साला, बकलोल बना दिया है!

संकर भाइ तुम्हे तो हर कोई पूछ रहा था – संकर दुकान कब खोलिहैं। पूरा शिवकुटी में आदमी औरत सब पूछ रहे थे।  समझो कि पूरे शिवकुटी में तुम्हारे बराबर कोई नहीं है बाल काटने में। तुम्हें जो ट्रेनिंग दिये होंगे वो जरूर बड़े उस्ताद होंगे!

मैं महसूस कर रहा था कि इस लड़के के कथन में दिली सच्चाई थी। पूरा वातावरण शंकरमय था उस दुकान में। फिर शंकरमय वातावरण का लाभ उठाते हुये वह लड़का बोला – भूख भी लगी है संकर भाइ। बीस रुपिया — जलेबी आये!?

मेरे बाल कट चुके थे। वहां ज्यादा रुकने का औचित्य नहीं था, यद्यपि मुझे अन्दाज था कि शंकर अपनी प्रशंसा के बाद, हनीमून से लौटने के बाद उस लड़के को जलेबी जरूर खिलायेगा। चलते चलते उस लड़के की फोटो खींच ली। तड़ से वह बोला फोटो खींच रहे हैं क्या? काहे? मैने कहा, बस तुम्हारी शक्ल अच्छी लग रही है।

वह शंकर को पोलसन[1] लगा रहा था, मैने उसे लगा दिया। वापस लौटते उसके शब्द मन में घूम रहे थे – हर कोई पूछ रहा था – संकर दुकान कब खोलिहैं।

मैं भी पूछ रहा था। अंतत: खुल ही गई दुकान।


[1] आशा है आपको पोलसन मक्खन की याद होगी। बम्बई के ब्राउन एण्ड पोलसन के मक्खन की दुकान अंतत: अमूल के आने पर चल न पाई। शायद अब भी आता हो बम्बई में। पर मक्खन लगाने के नाम पर पोलसन बरबस याद आ जाता है।


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47 Replies to “संकर दुकान कब खोलिहैं!”

  1. प्रसन्नता किसी भी इंसान को सुन्दर बनाती हो शायद। भारत-नेपाल का सौन्दर्य और पर्व-त्योहारों की अधिकता का सम्बन्ध ज़रूर होगा। तभी तो पश्चिम को मातृ-दिवस, पितृ-दिवस आदि इन्वैंट करने पडे – खुशी तो चाहिये ही।

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    1. अनुराग जी, प्रसन्नता व्यक्त होने में अधिक और बोझिल शब्दों की मोहताज भी नहीं होती। इसी लड़के को देख लें!

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  2. बकलोल का अर्थ क्या कहा जाये शायद कहना असंभव है, क्योंकि यह एक क्षैत्रिय भाषा का शब्द लगता है जो कि परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न अवसरों और विभिन्न संवादों में उपयोग किया जा सकता है, पर शब्द अच्छा लगा। पोलसन तो वाकई हमने पहली बार सुना, आज पता चला कि अमूल और घर के बटर के अलावा भी कोई बटर बाजार में उपलब्ध है।

    हम ऐसे जलेबी खानेवालों से सावधान रहने की कोशिश करते हैं।

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    1. बकलोल यूनीक चीज़ है। मूर्ख भी नहीं है। मूर्ख छाप है।
      अगर आप ऐसे जलेबी खाने वालों से सावधान रहते हैं तो अपनी प्रशंसा को भी विथ अ पिंच ऑफ साल्ट लेते होंगे। अन्यथा लोग प्रशंसा में गार्डन गार्डन हो जाते हैं!

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  3. मेरे लिए भी नया शब्दज्ञान है -‘पोलसन’ । अस्तु हम अभी नयी पीढ़ी के ही कहे जाएंगे। यह मक्खन जो लोग प्रयोग करते थे वे अब पुराने हो गये है। 🙂

    पूरब के देहाती शंकर को संकर ही बनाकर बुलाते हैं। महादेव जी भला करें।

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    1. पढ़ा – महफूज़ अली जी बता रहे हैं पोलसन गोरखपुर में मिलता है, महराजगंज में मिलता है।

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  4. पुणे में हमारे एक मित्र ने किसी से एक बार डिलीट करवा दिया था फोटो. बिना पूछे खिंच कैसे लिया?. डिलीट करो 🙂
    ये ट्रिक नहीं आती थी खींचने वाले को.

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    1. बस बस! ऐसे में पोलसन लगाओ और इससे पहले कि व्यक्ति पोलसन से उबरे, सटक लो वहां से! 🙂

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  5. आफ्टर हनीमून इफेक्ट एक तरह से लैक्ज़ेटिव का काम किया… शादी के बाद तो इन्सान स्मार्ट हो ही जाता है… ऐसा हम भी बहुत लोगों को देखा हूँ… आप भी हुए होंगे….वैसे फोटो में आप अभी भी बहुत स्मार्ट लगते हैं… ग्रेसफुल…. हमें लोग कहते हैं कि शादी करने का ज़रूरत नहीं है…. क्यूंकि वैसे ही बहुत ही स्मार्ट हूँ… (इसे मुग़ालता भी कह सकते हैं)…. ब्राउन एंड पोलसन से याद आया…. कि हम इस ब्रैंड से बहुत डरता था …. बचपन में … काहे से कि… हम पोलसन को पौइज़न पढ़ता था…. क्यूंकि पोलसन स्मॉल लेटर में लिखा होता था… तो हमें पोलसन पौइज़न नज़र आता था…. और हम ना उसका मक्खन खाता था.. ना ही कस्टर्ड…… और ना ही सूफ्ले ….. और अब यह सब खाने का हमारा उम्र निकल गया… ब्राउन एंड पोलसन अब भी आता है… उसे हम गोरखपुर में देखा हूँ…. और महाराजगंज में भी… पोस्ट पढ़ कर ऐसा लगा कि ब्राउन एंड पोलसन का स्टैनdard गिर गया है…. जो महाराजगंज में भी मिल रहा है… एक बात तो है…. आप पूरा पोस्ट पढने को मजबूर कर देते हैं… हम बहुत ही कम लोगों का पोस्ट पूरा पढ़ता हूँ… इनफैक्ट…हम जिन लोगों पढ़ता हूँ पूरा…… उनका नाम हमारा तीन ऊँगली के वर्टिकल लाइंस में ही पूरा हो जायेगा… बहुत कम लोगों में यह क्वालिटी होता है कि बाँध पायें….. और आप तो पूरा बहाव ही बाँध देते हैं… (डैम इट)…….

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  6. बकलोल सुना है और बोला है आज पढ़ा पहली बार है। अजीब लग रहा है। शब्‍द के अर्थ ढूंढने लगा हूं। ऐसा लग रहा है जैसे यह भी एक विशिष्‍ट शब्‍द हो…

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  7. जौने सैलून में मन जो है फिट्ट हो जाए आदमी के ओंही जाना चाहिए. लड़िका दुसरा सैलून में बार कटा के धोखा खा लिया. एहीं से सब अपना-अपना शंकर खोजि के रखते हैं. पौलसन के बारे पहिले नहीं सुने रहे. फोटो खींचने का तरीका सीखना ही पड़ेगा. हम तो डेराते रह जाते हैं और कहीं खींचने का मन भी करता है ता खींच नहीं पाते.

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    1. ब्लॉग के लिये मैने भी अपना शिव खोज रखा है। गाहे बगाहे टिप्पणी जो कर जाये! 🙂

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  8. उत्सुकता तो संकर का फोटो देखने की है. देखें तो कि शादी के बाद उसकी रंगत में क्या निखार आया है… भले ही शादी के पहले की फोटो नहीं देखी.

    घर के बड़े बुजुर्ग बताते थे पहले ओवलटीन आता था. पोलसन तो पहली बार सुना.

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    1. शंकर तो जच रहा था, मानो जवानी का अमिताभ बच्चन।
      पुरानी ब्राण्डों के नाम पर याद आते हैं – मंघाराम के बिस्कुट, कोलिनास टूथपेस्ट, राकेट या सनलाइट साबुन, पांच सौ पचपन बार (जिसे धागे से काट कर टुकड़े किये जाते थे) , मोती सोप, बन्दर छाप काला दंत मंजन —
      वुडवर्ड का ग्राइपवाटर और मुगली घुट्टी 555 तो शायद अब भी आते हैं!

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  9. जहाँ राजनीतिज्ञों के आते ही लोग बुदबुदाने लगते हैं, वहीं पर संकर के इन्तजार में लोग पगलाये हैं। तुलना बिना किसी पूर्वाग्रह के है।

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  10. बाल कटाना भी पूरा लभेड़ है. आप यूं ही कभी भी किसी से भी बाल नहीं कटा सकते. इसे से दुखी होकर मैं तो अब अपने बाल ट्रिमर से अपने आप ही काट लेता हूं. भले ही बहुत अच्छे नहीं कटते पर आजतक किसी ने टोका भी नहीं. यह एक लिब्रेशन सा लगता है मुझे.

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  11. पोलसन अब बम्बई में भी नहीं मिलता, अमुल ही अमुल है

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    1. नेट से पता चलता है कि ब्राउन एण्ड पोलसन ब्राण्ड तो अब यूनीलीवर के पास है।
      लगता है ब्रांडों की हिस्ट्री एक रोचक विषय होगा!

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  12. अरबन डीक्सनरी मे बकलोल दिया है।
    http://www.urbandictionary.com/define.php?term=Baklol

    A Baklol is a person who is supposed to be stupid. It is a Bihari word, generally used by the people of Bihar and Eastern Uttar Pradesh in India.

    मजे की बात यह है कि बकलोल शब्द का प्रयोग मैने आस्ट्रेलिया मे वियतनाम मूल के कलीग को भी इसी अर्थ मे करते देखा है। पता करना पढे़गा उसने यह शब्द कहां से सीखा। यह संभव है कि किसी भारतीय की संगत मे सीखा हो।

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    1. जय हो!

      एक खांटी देशज शब्द अर्बन डिक्शनरी में! और मुझे लगने लगा है कि हिन्दी लेक्सिकोग्राफर्स बहुत बढ़िया काम नहीं कर रहे। बकलोल हैं सब! 🙂

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      1. आशीष जी और आप दोनों की जय हो…

        अभी दिए हुए लिंक पर गया था.. वहां उदाहरण दिया है You baklol! Mind your lnguage.

        इसका मतलब कोई अरबी यहां आया था और बिहार और उत्तर प्रदेश वासियों से यह सुनकर गया है 🙂

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    1. मिसिर जी ने फोटो लगाई थी क्या – सब्जी खरीदने के पहले और सब्जी खरीदने के बाद की? 🙂

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  13. ‘पोलसन’ शब्द मुम्बई में रहते सुना तो है लेकिन बहुत कम। जहां तक मुझे याद है आमिर और सलमान की फिल्म अंदाज अपना अपना में पुलिस स्टेशन वाले दृश्य में सलमान खान ने इस ‘पोलसन’ शब्द का इस्तेमाल किया है जब आमिर मोटे पुलिस वाले को कहते हैं कि सर आप पुरूष ही नहीं हैं आप तो महापुरूष हैं महापुरूष 🙂

    अक्सर LOL शब्द अंग्रेजी में काफी यूज होता है, अब इसका बक कहां गायब हो गया देखना पड़ेगा 🙂

    फोटो खेंचते समय व्यवहारिक बुद्धि और सामने वाले से पूछ-पछोर होने पर त्वरिक अदाकारी आनी बहुत जरूरी है ताकि सामने वाला विश्वास में आये अन्यथा खदेड़े जाने की संभावना ज्यादा बनती है 🙂

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    1. मेरे विचार में लोल प्रत्यय वाले कुछ और शब्द देशज हिन्दी में होने चाहियें!
      पता करते हैं देशज पण्डितों से! 🙂

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  14. साला बिगाड़ कर धर दिया है। बकलोल बना दिया है।
    यह तो अल्लाहबदी भाषा है . पड़कर मजा आ गया .
    वैसे बाल कटवाने और बकलोल से एक घटना याद आ गयी .
    जब हम लोग इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में थे तो रैगिंग में सबसे पहले बाल ही कटवाए गए थे .
    और जो मह्शय बाल काट रहे थे , उनको सेनिओर्स ने बहुत कड़ी हिदायत दी थी की हम लोगो के बात इतने छोटे कर दिए जाएँ की हम सभी लोग बकलोल लगें.
    रैगिंग की तो बहुत सी बातें है , बाकी फिर कभी .
    वैसे आपने जलेबी का जिक्र कर दिया तो पुरानी यादें ताजा हो गईं.
    अल्लाहाबाद में सुबह दही -जलेबी का नाश्ता याद आ गया.
    और शाम को समोशे और चाय की भी याद आ रही है 🙂

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      1. जी सर , यादें तो हैं ही , और अभी यह मेरे जीवन का एक अंग हैं , क्युएँ की अभी भी मै अन ई टी का शोध छात्र हूँ . ६ महीनो के लिए , बाहर के विश्विवाविद्यालय में आया हूँ , लेकिन बहुत जल्द वापस फिर से अन ई टी ज्वाइन करना है शोध छात्र के रूप में . मै तो आपके निवास से बहुत ही पास में रहता हूँ , अन ई टी हॉस्टल में . इस बार आपसे जरूर मिलूँगा और आशीर्वाद लूँगा . गलती मेरी ही है , मै पिचले दो साल से आप से मिलने की सोंच रहा था , लेकिन संकोंच के कारन कभी मिलने नहीं आया .

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        1. शोध छात्र हो तो शुद्ध जीव हो प्यारे। हम तो जिन्दगी के खटराग में घोर लिप्त – घोर अशुद्ध!
          और हाँ, हम लोग निश्चय ही मिलेंगे!

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  15. अपने सांवले रंग के बावजूद स्मार्ट लग रहा था……क्या मतलब है जी आपके कहने का….जरा स्पष्ट करें!!!

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  16. संकर की दुकान खुल गई, शिव आपके और आपके पास हैं ही – जय भोलेनाथ।

    अनुभव बहुत नहीं है लेकिन देखा है अपनी बीस साल की नौकरी के दौरान कि पोलसन हो या अमूल या सादा पानी, पदार्थ से ज्यादा प्रयोग विधि का ज्यादा महत्व है:)

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  17. इ त बहुते बढियाँ रहल. बकलोल पहिले भी सुनले रहली हम, बहुते बार देवरिया जिला मे तो बहुत चलन बा.
    पौलसन नया बा लेकिन बाढिया लगल.

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