ये हैं हमारे गंगा स्नान करने वाले “सभ्य” लोग

शिवकुटी के सवर्णघाट पर नित्य 200-300 लोग पंहुचते होंगे। नहाने वाले करीब 50-75 और शेष अपने घर का कचरा डालने वाले या मात्र गंगातट की रहचह लेने वाले।

ये लोग अपेक्षकृत पढ़े लिखे तबके के हैं। श्रमिक वर्ग के नहीं हैं। निम्न मध्यम वर्ग़ से लेकर मध्य मध्यम वर्ग के होते हैं ये लोग। कुछ कारों में आने वाले भी हैं।

ये लोग जहां नहाते हैं, वहीं घर से लाया नवरात्रि पूजा का कचरा फैंक देते हैं। कुछ लोगों को वहीं पास में गमछा-धोती-लुंगी समेट कर मूत्र विसर्जन करते भी देखा है। बात करने में उनके बराबर धार्मिक और सभ्य कोई होगा नहीं।

गंगामाई के ये भक्त कितनी अश्रद्धा दिखाते हैं अपने कर्म से गंगाजी के प्रति!

आज मैने एक चिन्दियां समेटने वाले व्यक्ति को भी वहां देखा। वह उनको आग लगा कर नष्ट करने का असफल प्रयास कर रहा था। कम से कम यह व्यक्ति कुछ बेहतर करने का यत्न तो कर रहा था!

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28 Replies to “ये हैं हमारे गंगा स्नान करने वाले “सभ्य” लोग”

  1. हमारी एक बुआ जो दिवंगत हो चुकी हैं, वे हरिद्वार आदि की यात्रा से जब वापस आईं तो उन्होंने सबको बड़े मजे लेकर बताया कि वे तो गंगा/यमुना में नहाने के दौरान ही मल-मूत्र विसर्जन कर देतीं थीं. वे बतातीं थीं और आसपास के बड़े-बूढ़े ठठाकर हँसते थे. केवल हम जैसे किशोर-युवक ही उसे बुरा मानते थे. अब मेरे बच्चे उसे सुनें तो छी-छी करें!
    यही पीढ़ी दर्जन भर बच्चे पैदा करके उन्हें घर के बाहर नाली पर हगाती थी. वही संस्कार अभी भी मौजूद हैं. घर से निकलते समय दो मिनट को बाथरूम हो लेने की बजाय दुनिया भर को संडास बना दिया है भारतीयों ने. इसीलिए वी एस नैपौल जैसे दोयम दर्जे के लेखक इण्डिया को जायंट शिट-होल बताते आये हैं.

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    1. कचरे की समस्या आदिकाल में भी रही होगी। पर अब यह बढ़ गई है। शायद कचरा दिमाग में ज्यादा घुस गया है।

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  2. गंगा माँ के आँचल में अपने पाप और कूड़े फेंक कर जाते सभ्रांत वर्ग को बहुत कुछ सोचने को विवश करती यह पोस्ट और चिंदियाँ बटोरने वाला यह व्यक्ति।

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  3. सभ्य लोग सिर्फ कचरा करते हैं, उसे समेटने की जिम्मेदारी तो वर्णविहीनों (कमीनों) की है। सभ्य लोग कचरा हटाएंगे या फैलाएंगे नहीं तो स्थानच्युत न हो जाएंगे?

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  4. अंधविश्वास के मामले में तो हम “एक अन्य कट्टर पंथ” को भी मीलों पीछे छोड़ गए हैं. जिस प्रकार भौतिक चीजों को पाने से हम खुश हो जाते हैं उसी प्रकार हम ये भी मानते हैं कि भगवान को भी उनके “भौतिक आइटमों” (जैसे चुनरी,फूल इत्यादि) की बहुत जरुरत है और ये गंगामाई भगवान तक उनके “आइटम” पहुँचाने का शॉर्टकट !

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  5. मेरे ख्‍याल में इस सोच को बदलने में समय लगेगा… पर हम इंतजार नहीं कर सकते… जो कुछ भी है जल्‍दी होना चाहिए वरना हुए नुकसान की भरपाई असंभव हो जाएगी… पढ़ा-लिखा और सभ्‍य समाज समझदार भी हो ये जरूरी नहीं है… लोग अपने व्‍यक्तिगत प्रयास कर रहे हैं पर समाज पर व्‍यापक रूप से प्रभाव डाल सकने वाला कोई व्‍यक्तित्‍व जब तक इस ओर सक्रिय भूमिका में नहीं आता बड़ा बदलाव आना मुश्किल लगता है… धार्मिक नेता नोट बटोरने और राजनीतिक महात्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने लगे हैं….

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  6. कुछ समय पहले मैंने ये पोस्ट लिखी थी इस उम्मीद में कि किसी की तो नजर पड़ेगी|

    जल शुद्धिकरण का पारम्परिक ज्ञान नदियों को कर सकता है प्रदूषणमुक्त

    http://paramparik.blogspot.com/2011/03/blog-post.html

    छोटा सा विचार है इस लेख में| हो सकता है बात दूर तलक चली जाए|

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    1. आपके उक्त लेख में निर्मली के वृक्षों की उपयोगिता और जल शुद्धिकरण का पारम्परिक मिश्रण का विचार बहुत अच्छा लगा। –

      “मेला स्थलों में बेची जा रही पूजन सामग्री के साथ जल शुद्धिकरण के लिए उपयोगी पारम्परिक मिश्रण का एक पैकेट मुफ्त में दिया जा सकता है ताकि जब इन्हें नदी में विसर्जित किया जाए तो पारम्परिक मिश्रण भी पानी में चला जाए और इस तरह असंख्य लोगों के माध्यम से नदी के साफ़ होने की प्रक्रिया चलती रहे| एक बार पूजन सामग्री का हिस्सा बनाने के बाद यकीन मानिए पीढीयों तक यह परम्परा के रूप में जारी रहेगी और हमारी नदियाँ बची रहेंगी| “

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  7. ‘सभ्य’ लोग ही तो पर्यावरण का हनन कर रहे हैं… कभी गणॆश चौथ के नाम पर तो कभी दुर्गाष्टमी के नाम पर तो कभी पूजा-अर्चना के नाम औ…. और तो और मृतकों के नाम पर!!!!!!!!

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  8. हमारे यहां, कहीं भी कुछ भी फेंक देना हमारी आदत का हिस्सा ही नहीं है, शायद यह हमारी सांस्कृतिक विरासत भी है. यह परंपरा हमारे घरों से ही शुरू हो जाती है…. कौन उठकर जाए रसोई में/ रसोई के पास रखी कचरा-टोकरी तक… यहीं कहीं रख लो बाद में फेंक देंगे, यही कोशिश रहती है. बहुत कम घर मिलेंगे जिनके हर बेडरूम में कचरा-टोकरी भी रखी जाती हो.

    नदियों / सड़को / रास्तों / पार्कों का क्या है, ये सब जगहें तो होती ही कुछ भी फेंक देने के लिए हैं, चाहे वह माचिस की तीली हो चाहे सिगरेट का टुकड़ा, चाहे किसी चीज़ का छिलका हो या कोई दूसरा कागज़/पोलीथीन… हमारे व्यवहार से तो कम से कम से कम यही लगता है.

    जैसे हमारे यहां सड़कों के किनारे भरोसेमंद नालियों की परंपरा नहीं है वैसे ही सार्वजनिक स्थानों
    पर कूड़ेदानों की बात भी हास्यास्पद लगती है. दिल्ली में कई जगह कूड़ेदान लगाए तो गए हैं पर जब से कनाटप्लेस के कूड़ेदान में किसी भले आदमी ने बाम्ब रख दिया था तब से इन कूड़ेदानों को भी उल्टा रखा जाता है कि कोई इनमें कूड़े की जगह फिर से बाम्ब न डाल दे…. कोई क्या करे इस मानसिकता का…. संसद में भी आतंकवादी घुसे थे, शुक्र है कि संसद-भवन ही नहीं ढहा दिया ये सोच कर कि कौन जाने फिर संसद-भवन पर आतंकवादी हमला हो गया तो (!)…न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.

    जब भी विदेश जाना होता है दो बातें साफ अलग दिखती हैं, हर जगह कूड़ेदान और सड़क पर अपनी लेन में बिना हार्न बजाए चलती/ खड़ी गाड़ियां…. हो सकता है कि बहुत सी बातें सीखने के लिए अभी हम पूरी तरह विकसित देश होने की प्रतीक्षा कर रहे हों…

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    1. मेरे घर के पास नगरपालिका ने कुछ समय से कचरापात्र रखे हैं। एक कचरा इकठ्ठा करने वाला भी आने लगा है। पर लोग कचरापात्र तक जाते नहीं। कचरा इकठ्ठा करने वाला चला जाता है; उसके बाद अपने मनमर्जी समय पर घर से निकलते हैं और कचरा सड़क के किनारे ही फैंकते हैं।
      आखिर सवाल उनके मौलिक अधिकार का जो है! 😆

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  9. जी, याद आये राजकपूर और उनकी फिल्म… “राम तेरी गंगा मैली” और इस फिल्म का गीत … राम तेरी गंगा मैली हो गयी – पापियों के पाप धोते धोते… हर हर गंगे..
    पता नहीं क्यों…हम लोग सदियों से ऐसा ही करते हैं, और सदियों से हमारी आस्था नहीं बदली… कोई प्रशन चिन्ह हो तो जाकर हरिद्वार देख लें, खासकर सावन में.

    हर हर गंगे,
    जब भोले बाबा..

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    1. कितना अच्छा हो कि हर ब्लॉगर अपने पास की नदी से लोगों की बदतमीजी का प्रमाण ब्लॉग पर प्रस्तुत करे।
      लोग नदियों को मार रहे हैं। लोग तालाबों को लील रहे हैं! 😦

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  10. हजारों लाखों पौंड खर्च करके ब्रिटेन में रहनेवाले भारतीयों ने अपने सम्बन्धियों की अस्थियों को थेम्स में प्रवाहित करने का अधिकार प्राप्त कर लिया लेकिन इसपर वहां के लोगों ने बड़ी हायतौबा मचाई.
    मुकदमेबाजी पर प्रति-व्यक्ति कुछ सौ पौंड खर्च करने से उनके अस्थि विसर्जन के लिए भारत यात्रा पर हजारों पौंड तो बच ही गए.
    लेकिन इस लिटिगेशन से यह जानकारी मिली कि वहां हर कोई अपनी मनमानी नहीं कर सकता. कोई दूरदराज में चोरी छुपे गन्दगी फैलाए या अपना घर गन्दा रखे पर सार्वजनिक स्थलों पर लोग अनुशासित रहते हैं.

    काजल कुमार जी का कमेन्ट बेहतरीन है. मुझे फिर मेरे एक परिचित याद आ रहे हैं जिन्होंने बेखटके हमारे सोफा के बाजू में अपनी नाक साफ़ करने की गुस्ताखी कर दी थी और बदले में चार बातें सुनकर नाराज़ हो गए थे.
    एक और परिचित संतरा खाते समय अधचूसी फांकें पच्च-पच्च जमीन पर फेंकते गए जबकि उनके सामने ही मैं संतरे के छिलकों की कटोरी बनाकर उसमें जूठन-बीजे आदि डालता रहा.
    अब ऐसी व्यक्तियों को कुछ समझाइश देने पर वे इसे अपना अपमान मानकर अंड-बंड बकने लगते हैं. बड़ी मुश्किल है.

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    1. भ्रष्टाचार के विषय में बहुत हायतोबा है – और (सही में) लग रहा है कि अति हो गई है भ्रष्ट आचरण में। वही दशा स्वच्छता के प्रति उपेक्षा और दुराग्रह भरे आचरण की भी है। इस क्षेत्र में भी आत्मानुशासन विलुप्तप्राय है!

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  11. नदी, पवित्र जलधारा है, लेकिन वह अब लगभग पूरे तौर पर (भूगोल की भाषा वाली नहीं, सचमुच की) ड्रेनेज सिस्‍टम बन गई हैं.

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  12. धर्म से अंधविश्वास और रुढियों को दूर करना ही होगा देश के पर्यावरण के लिए भी , सार्थक चिंतन!

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  13. चिंदियाँ बटोरने वाले में मैंने अपने आपको पाया और लगा मेरी तस्वीर ऐसी ही बनेगी. आभार.

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  14. आपकी चिंता को मात्र गंगामाई तक सीमित न मानते हुये मानव सभ्यता की धुरी रही समस्त नदियों के परिपेक्ष्य मे देख रहा हूँ। ये लिंक देखिये जरा:
    http://www.sikhiwiki.org/index.php/Baba_Balbir_Singh_Seechewal

    इंसान ठान ले तो क्या नहीं कर सकता? वैसे इन संत सींचेवाल जी के द्वारा किये जाये कार्य की जानकारी काफ़ी पहले एक मीडियामैन के ब्लॉग पर भी दी थी, इस उम्मीद से कि वे ऐसे उल्लेख के लिये मेरे मुकाबले एक बेहतर प्लेटफ़ार्म हैं। लेकिन वे और भी बड़े कार्य में व्यस्त रहते हैं, मसलन धर्मनिर्पेक्षता, हिन्दुवादी पार्टियों के असली चेहरे उजागर करना, वगैरह वगैरह।

    ’तथाकथित’ शब्द मुझे बहुत अच्छा लगता है, इसलिये आपके लिखे “सभ्य” के प्रीफ़िक्स करके पढ़ रहा हूँ:)

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    1. संत बाबा बलबीर सिंह के बाते में आपका लिंक पढ़ा। प्रेरक। धन्यवाद।
      कुछ ऐसा ही जोश हमें दो साल पहले आया था गंगा घाट की सफाई का। यह जोश लगभग चार पांच महीने चला। फिर मेरे अस्वस्थता, काम में व्यस्तता आदि के चलते वह नहीं जारी रह पाया। अब भी लोग मिलते हैं तो आग्रह करते हैं कि फिर कुछ किया जाये।
      बाबा सच्चेवाल की तरह हम सब में भाव जगने चाहियें।

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      1. सर,
        आपकी वो पोस्ट पढ़ रखी थी, तभी तो लिंक देने की हिमाकत की है। हमेशा किसी अवतार की राह देखने की बजाय यथासाध्य स्वयं कुछ करने वाले लोग ही सही प्रेरणा देते हैं।
        आपने प्रयास तो किया, लोगों को आज भी याद है और टोकते भी हैं। देखियेगा, किसी दिन कोई चुपचाप से पहल करेगा।

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    2. संजय भाई, संत सींचेवाल जी के बारे में मैंने कहीं प्रिंट मीडिया में पढा था… ध्यान नहीं आ रहा, आपके दिए लिंक पर जाकर देखता हूँ.

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      1. दीपक,
        ’काली बेई’ बहुत मशहूर नदी नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक महत्व जरूर है इसका। जहाँ तक मुझे ध्यान है, सिखों के प्रथम गुरू श्री गुरूनानक देवजी के साथ इसका संबंध रहा है। प्रदूषण और हम लोगों की लापरवाही के चलते यह नदी एक नाले के रूप में तबदील हो गई थी। संत सींचेवाल जी ने अपने अनुयायियों का आहवान किया और इस नदी की सफ़ाई को कार सेवा का दर्जा दिया। संगतें उनके साथ जी जान से जुट गईं और कायापलट कर दिखाया।
        रुचि दिखाई, धन्यवाद।

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  15. कुछ ज्यादा ही सभ्य हैं ये स्नानार्थी। मनुस्मृति में कठोर दण्ड का प्रावधान है जलस्रोत को दूषित करने वालों के लिए।

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