घाट पर सनिचरा नहीं था

आज सवेरे सब यथावत था। सूरज भी समय पर उगे। घूमने वाले भी थे। घाट पर गंगाजी में पानी कुछ बढ़ा हुआ था। वह भैंसासुर की अर्ध-विसर्जित प्रतिमा पानी बढ़ने के कारण पानी में लोट गई थी।

किनारे पर पण्डा यथावत संकल्प करा रहे थे कार्तिक मास का। पास में सनीचरा रहता था कऊड़ा जलाये। आज वह नहीं था। एक और आदमी कऊड़ा जलाये था।

सनीचरा के सृजक नहीं रहे। “रागदरबारी” सूना है। सनीचरा भी जाने कहां गया आज!

आज सनीचरा नहीं था।
Advertisements

23 Replies to “घाट पर सनिचरा नहीं था”

  1. रागदरबारी के सर्जक नहीं रहे। रागदरबारी तो वैसे ही गूंज रहा है।

    Like

  2. न हुआ फिर न हुआ मीर का अंदाज नसीब!
    .. वह व्यंग्य का अंदाजे-मीर न रहा! नमन कृतिकार को, सृजक ब्रह्म को! विनम्र श्रद्धांजलि!!

    Like

  3. With so much of work, how do you find time for nature also ? That is amazing.

    (I forgot-which key combination is to be pressed for enabling Hindi ?)

    Rawal

    Like

    1. समय तो इस लिये है कि मेरे पास मालगाड़ी परिचालन, पुस्तक पठन और ब्लॉग के अलावा बहुत कम काम हैं! 😆
      इण्डिक आई.एम.ई. में अंग्रेजी/हिन्दी बदल के लिये Shift+Alt का प्रयोग कीजिये।

      Like

  4. श्रीलाल शुक्ल जी तो अमर हो गये हैं। ‘राग दरबारी’ के रचयिता को मेरा कोटि-कोटि नमन!

    Like

  5. सनिचरा के सृजक नहीं रहे तो सनिचरा भी उन्हें फ़ालो कर रहा होगा! श्रीलाळ शुक्ल जी को हार्दिक श्रद्धांजलि॥

    Like

    1. भेद तो शायद कोई नहीं है, यह तो मन है जो अनुपस्थिति को शुक्ल जी से जोड़ कर देख रहा है।
      मन ऐसे ही जोड़ता है घटनाओं को।

      Like

  6. शनीचरा प्रधान: स: एमपीयो: बन गईल है।
    आजकल ओकर नवकंज लोचन कंजमुख कर कंज पदकंजारूणम होत बाटे।

    Like

आपकी टिप्पणी के लिये खांचा:

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s