पंड़िला महादेव

ज्यादा दूर नहीं है यह जगह। इलाहाबाद की सहसों तहसील में है। तेलियरगंज, इलाहाबाद (जिसके पास फाफामऊ पुल है) से चार-पांच किलोमीटर दूर होगी। शरीर और मौसम दुरुस्त हो तो पैदल दबाया जा सकता है। मौसम तो दुरुस्त था, पर मेरा शरीर उतना नहीं। अत: पैदल नहीं वाहन से गया। वापसी में जरूर फाफामऊ के पुल पर पैदल आया।

लाक्षागृह (हंडिया, सिरसा या पनासा के पास गंगा के उत्तरी भाग में स्थान) से पाण्डव सुरंग के माध्यम से भागे जब विरोचन के बनाये लाख के महल में उन्हे मारने के लिये आग लगाने का षडयंत्र किया था दुर्योधन ने। सुरंग से निकल कर रातों रात जंगल में चलते चले गये। सवेरा होने पर वे पाण्डवेश्वर (पंड़िला) पंहुचे। वहां उन्होने शिव पूजन किया। वही स्थान पंड़िला महादेव है।

रात भर में 35-40 किलोमीटर चले होंगे पाण्डव, अन्धेरे और जंगल में। जबरदस्त ऊर्जा रही होगी उनमें और जीवित बच निकलने की अदम्य इच्छा भी। पंडिला जाते समय मैं यही विचार रहा था। रास्ते में मुझे फाफामऊ रेलवे स्टेशन और एक रोड ओवर ब्रिज दिखा। फाफामऊ रेलवे जंक्शन है। यहां से रेलवे लाइन जंघई-वाराणसी, इलाहाबाद-प्रयाग और सुल्तानपुर के लिये जाती हैं। एक तरफ की रेल लाइन पर लेवल क्रॉसिंग गेट भी था। अगर यह मेरे जोन में होता तो लगे हाथ मैं उसका निरीक्षण कर डालता और एक दिन का यात्रा भत्ता भी कमा लेता! 🙂

रास्ते में खेत थे। सरसों, आलू और अरहर को चीन्ह रहा था मैं। एक जगह तो काफी पहले की बोई सरसों में फूल भी आ गये थे। अरहर के पौधे मेरी ऊंचाई तक पंहुच रहे थे। आलू के पौधे भी स्वस्थ थे। आलू के भाव गिर गये हैं। पता नहीं किसान नफा कमा पायेगा उनमें या नहीं। वैसे गांव जो रास्ते में पड़े, वहां गरीबी थी जरूर, पर विकट गरीबी कहीं नजर नहीं आयी। समाजवादी पार्टी के बैनर-पोस्टर थे, जिनपर जो विधान सभाई उम्मीदवार का चेहरा था, वह वीरप्पन जैसा लगता था। सटीक चेहरा – राजनीति उत्तरोत्तर वीरप्पनाइज्ड होती गयी है उत्तर प्रदेश में!

गाय गोरू स्वस्थ थे और लोगों से ज्यादा स्वस्थ स्वच्छ लगे देखने में।

पंडिला गांव एक साधारण सा लगा। ऐतिहासिक या पौराणिक मन्दिर होने के कारण देशी पर्यटन प्रबन्धन जैसे खुद ब खुद पनपता है, वैसा दिखा पंडिला में। धर्मशालायें, दुकानें और बिजली-पानी की बेसिक सुविधाओं का होना वहां किसी योजना के तहद नहीं, यूं ही उग आया सा लगता था। हिन्दू धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं के बेतहाशा उमड़ने और आम जनता में सफाई के प्रति कोई झुकाव न होने से जो अराजकता उपजती है वह वहां पर्याप्त थी। अथवा भग्वद्गीता की भाषा में कहें तो अपर्याप्त (असीमित) थी।

दूकानें ठीक ठीक थीं, पर मन्दिर निहायत गन्दा था। शिव मन्दिरों में आराध्य देव को जल चढ़ाने की जो परम्परा है, वह पानी-धूल-कीचड़-फल-फूल यत्र तत्र सर्वत्र बिखेरे थी। आवारा कुकुर आराध्य देवों पर से लपक लपक कर प्रसाद ले रहे थे। उनको कोई बाहर करने वाला नहीं था। कोई व्यवस्था नहीं थी जूते चप्पलों को देखने सहेजने की। अत: मैं और पत्नीजी बारी बारी से मन्दिर में गये। दूसरा व्यक्ति जूते अगोरता रहा।

मन्दिर में पण्डाजी ने मेरे कपड़े या वेश देख फुर्ती से मेरे माथे पर तिलक लगाया और कहा कि जो श्रद्धा हो दे दें। श्रद्धा न दिखाने पर उन्होने अपना आग्रह पुन: दोहराया और जब उसका भी असर मुझपर न पड़ा, तो उन्होने मुझे मायूसी और हिकारत के मिले जुले भाव से देखा। — बाकी लोग श्रद्धा से झुके जा रहे थे, पर वातावरण की गन्दगी, भीड़ और पण्डा का मोलभाव मुझे जल्दी से मन्दिर के बाहर ले आया। समझ नहीं आता किसे दोष दूं – अपने को या वातावरण को। शायद खुद को ही दोष देना चाहिये। पंड़िला में इस्कॉन मन्दिर या किसी गुरुद्वारे जैसी स्वच्छता-व्यवस्था की अपेक्षा ले कर तो जाना बनता नहीं था…

मन्दिर की परिधि में इधर उधर मूर्तियां या उप-मन्दिर थे। श्रद्धालु उन पर बिना भेद भाव के जल-दूध-अक्षत-प्रसाद-फूल चढ़ा रहे थे। एक थाले में तो मुझे कुछ खण्डित मूर्तियां दिखीं जो किसी प्राचीन मन्दिर के अग्र भाग पर सजावट के लिये कभी लगी रही होंगी। उन्हो यहां रख दिया गया है और उनकी भी पूजा होने लगी है। औरतें पूजा कर उस थाले से हटीं कि एक झड़ें रोयें और पीठ पर घाव युक्त कुत्ता उनपर चढ़ाये प्रसाद पर मुंह मारने लगा। घोर अराजक श्रद्धा का माहौल!

पास में कई समूह में स्त्रियां कढैया चढ़ कर कचौरी-पूड़ी छानने में व्यस्त थीं। परिवार के लोग सब्जी काटने, बनाने में लगे थे। किसी देवी देवता को रोट चढ़ा कर पूजा करने और उसके बाद धार्मिक-पिकनिक का कार्यक्रम था उन सब का। भारत में पर्यटन, आमोद-प्रमोद आदि धर्म की कीली के इर्द-गिर्द घूमते हैं। शायद यही कारण है कि गन्दगी या अराजकता लोगों को परेशान नहीं करती!

पत्नीजी और मैं मन्दिर के बाहर पूजा सामग्री, प्रसाद और टिकुली-कंघी की दुकानों को निहारते लौट आये। सब से किनाए पर एक मुस्लिम की दुकान थी। वह, उसकी पत्नी और बच्चा बैठे थे दुकान में। पूजा के दीपदान, कड़छी, चाकू, पौनी, मथनी, ताम्बे की लुटिया आदि बेच रहे थे वे। हिन्दू मन्दिर के पास एक मुस्लिम की दुकान देख भारत की धार्मिक विविधता और सहिष्णुता पर मन प्रसन्न हुआ। उसके आगे एक जय मां शारदा चाऊमिन कार्नर का ठेला भी था – यानी विकट देसी जगह में विलायती चाऊमिन नामक चीज भी थी। भारत को मॉर्डनाइज होने से कोई रोक नहीं पायेगा। देवी मैय्या को कढ़ैया चढ़ाने के बाद चाउमीन खाने का भी प्रबन्ध जिस धर्म स्थान पर हो; वह अपनी गन्दगी/अराजकता के बावजूद इक्कीसवीं शती में आ ही गया है। — काश पंडिला में जब पाण्डवों ने पूजा की थी, तब यह चाऊमिन होता! वृकोदर तो पूरी ठेला सामग्री अकेले सरपोट ले गये होते तब!

मैने वृकोदर भीम की चाऊमिन खाते कल्पना की। पता नहीं, माता कुंती यह खाने की परमीशन उन्हे देती या नहीं! 😆

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Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://halchal.blog/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt

28 thoughts on “पंड़िला महादेव”

  1. आपका हेडर बहुत सुन्दर बन पड़ा है, मालगुडी डेज की तरह इलाहाबाद डेज् 🙂

    हेडर में एक बकरी नज़र आ रही है। हो सके तो फ्रेम में बकरी को थोड़ी और जगह दें….हेडर और भी चौचक हो उठेगा 🙂

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    1. बोकरिया थोड़ी और घुस पायी है हेडर में! और उसके चलते गंगाजी/आसमान की जगह कट गयी! 🙂

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      1. ओह, लगता है पहले ही ठीक था, नाहक आपको परेसान कर दिया 😦

        आसमानी अनंत ज्यादा अच्छा लग रहा था 🙂

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      2. ओह, आपके उहापोह का काट मैने यह निकाला कि हेडर रेण्डम कर दिया है। हर बार अलग इमेज नजर आयेगी। कभी बकरी, कभी आसमान और कभी और कुछ!

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      3. @हिन्दू मन्दिर के पास एक मुस्लिम की दुकान देख भारत की धार्मिक विविधता और सहिष्णुता पर मन प्रसन्न हुआ।

        pta nahin kyon … par samajh nahin aata … aisa ulta kyon nahin hota .. ki masjid ke bahar ek hindu kee dukan.

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      4. जहां सहिष्णुता होगी, जहां भरोसा होगा, वहां होगी दुकान। व्यवसाय भरोसे पर चलता है, अतिवादी भावना पर नहीं!

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  2. आवारा गाय, बन्दर और कुत्तों को तो सभी अनदेखा कर सहन कर लेते हैं अपने देश में|

    देखिये ना कैसे बेफिक्री से चल रही गाय ट्रेन के आगे

    और कैसे नही रुकती है ट्रेन इंसान के लिए (यह श्रीलंका की घटना है)

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  3. लाक्षाग्रह के सुरंग के निशान क्या अब भी वहां मौजूद हैं? इससे महाभारत की ऐतिहासिकता तो सिद्ध होगी ही॥

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    1. लाक्षागृह तो माइथॉलॉजिकल है। पर लच्छागिर की जगह पर कछारी मिट्टी फट जाती है और गह्वर बन जाते हैं।

      अत: सुरंग या खोह जैसी बनावट का सरलता से बनना, बना पाना सम्भव है। आदमी छिप कर बहुत दूर तक जा सकता है। जहां सुरंग न हो, वहां आदमी की ऊंचाई से ज्यादा ऊंचा सरपत छिपा लेता है!

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  4. पडिला महादेव का दर्शन आपने करा दिया. इलाहाबाद जिले का होने के कारण इस नाम से परिचित था. झड़ें रोयें और पीठ पर घाव युक्त कुत्तों की मौजूदगी का आपने ऐसा जीवंत चित्रण किया है कि अब शायद ही वहां कभी जाने का मन हो.

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  5. खूब लिखा है पंडिला के बारे में. गन्दगी और कुकुर परेशानी का सबब हुए होंगे आपके लिए !

    अच्छा – एक बात, यह “पौनी” क्या होता है ?
    मनोज

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  6. देर से देखा…आज का दिन ही कुछ अच्छा गुजरे…यही कामना है वरना तो लोग अधेड़ घोषित किये ही दे रहे हैं इस जवान को!! आखिर उम्र ही कितनी है….. 🙂

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    1. बड़े बेकार लोग हैं – अच्छे भले किशोर को अधेड़ बता देते हैं।
      क्या बतायें, कभी कभी हमसे भी उम्र का आकलन करने में मिस्टेक हो जाती है! 🙂

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  7. नौकरी अभी कितने दिन की और है ? मुझे लगता है अब आपको पूरे तौर पर गंगा घाटी के बनते-बिगड़ते चलायमान सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष पर नियमित लेखन करना चाहिए . पंड़िला महादेव से झंड़िला श्वानदेव तक का ऐसा चुटीला और अंतर्दृष्टिपूर्ण सांस्कृतिक लेखन और कहां मिलेगा . अपने समय का — इस संक्रांतिकाल का — सच्चा सांस्कृतिक दस्तावेज है यह लेखन जिसका सही अकादमिक महत्व दस-बीस बरस बाद समझ में आना शुरू होगा .

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  8. is bar mai bhi jaunpur me trilochan mahadev ke darshan ke liye gaya tha.
    kuch aisa hi drushy waha pare bhi dikha.
    waha log pidhiyose mandir ke liye mukadama toh lad rahe hai magar saf safai par kisi ka dhyan nahi hai.

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