संगम, जल कौव्वे और प्रदीप कुमार निषाद की नाव


और ये कव्वे से मिलती जुलती आवाज करते उड़ रहे जल कौव्वे।

संगम क्षेत्र में जमुना गंगाजी से मिल रही थीं। इस पार हम इलाहाबाद किले के समीप थे। सामने था नैनी/अरईल का इलाका। दाईं तरफ नैनी का पुल। बस दो चार सौ कदम पर मिलन स्थल था जहां लोग स्नान कर रहे थे।

सिंचाई विभाग वालों का वीआईपी घाट था वह। मेरा सिंचाई विभाग से कोई लेना देना नहीं था। अपनी पत्नी जी के साथ वहां यूं ही टहल रहा था।

वीआईपीयत उत्तरोत्तर अपना ग्लिटर खोती गई है मेरे लिये। अन्यथा यहीं इसी जगह मुझे एक दशक पहले आना होता तो एक दो इंस्पेक्टर लोग पहले से भेज कर जगह, नाव, मन्दिर का पुजारी आदि सेट करने के बाद आया होता, आम जनता से पर्याप्त सेनीटाइज्ड तरीके से। उस वीआईपीयत की सीमायें और खोखलापन समझने के बाद उसका चार्म जाता रहा। 😦 

एक दो नाव वाले पूछ गये – नाव में चलेंगे संगम तक? पत्नीजी के पूछने पर कि कितना लेंगें, उन्होने अपना रेट नहीं बताया। शायद तोल रहे हों कि कितने के आसामी हैं ये झल्ले से लगते लोग। पर एक बोला आइये वाजिब रेट 200 रुपये में ले चलता हूं, अगर आप दो ही लोगों को जाना है नाव पर। पत्नीजी के बहुत ऑब्जेक्शन के बावजूद भी मैने हां कर दी।

उसने नाम बताया प्रदीप कुमार निषाद। यहीं अरईल का रहने वाला है। एक से दूसरी में कूद कर उसकी नाव में पंहुचे हम। बिना समय गंवाये प्रदीप ने पतवार संभाल ली और नाव को मोड़ कर धारा में ले आया।

बहुत से पक्षी संगम की धारा में थे। नावों और आदमियों से डर नहीं रहे थे। लोग उन्हे दाना दे रहे थे। पास से गुजरती नाव के नाविक ने पूछा – दाने का पैकेट लेंगे? पक्षियों को देने को। दस रुपये में तीन। मैने मना कर दिया। दाना खिलाऊंगा या दृष्य देखूंगा।

प्रदीप निषाद ने बताया कि ये जल कौव्वे हैं। साइबेरिया के पक्षी। सर्दी खत्म होने के पहले ही उड़ जायेंगे काशमीर।

कश्मीर का नाम सुनते ही झुरझुरी हो आयी। आजकल बशरत पीर की किताब कर्फ्यूड नाइट्स पढ़ रहा हूं। भगवान बचाये रखें इन जल कौव्वों को आतंकवादियों से। उन्हे पता चले कि संगम से हो कर आ रहे हैं तो इन सब को हिंदू मान कर मार डालेंगे! 😆

प्रदीप कुमार निषाद बहुत ज्यादा बात नहीं कर रहा था। पूछने पर बता रहा था। सामने का घाट अरईल का है। माघ मेला के समय में वहां शव दाह का काम नहीं होता। वह सोमेश्वर घाट की तरफ होने लगता है। यह नाव बारहों महीने चलती है। बारिश में भी। तब इसपर अच्छी तिरपाल लगा लेते हैं। वह यही काम करता है संगम पर। पर्यटक/तीर्थ यात्री लोगों को घुमाने का काम। सामान्यत: नाव में दस लोग होते हैं। लोग संगम पर स्नान करते हैं। उसने हमें हिदायत दी कि हम नहीं नहा रहे तो कम से कम नदी का जल तो अपने ऊपर छिड़क लें।

मैने अपने ऊपर जल छिड़का, पत्नीजी पर और प्रदीप निषाद पर भी। ऐसे समय कोई मंत्र याद नहीं आया, अन्यथा ज्यादा आस्तिक कर्मकाण्ड हो जाता वह!

धूप छांव का मौसम था। आसमान में हलके बादल थे। लगभग चालीस पचास नावें चल रही थीं संगम क्षेत्र में। ज्यादातर नावों पर काफी लोग थे – अपने अपने गोल के साथ लोग। प्रसन्न दीखते लोग। प्रसन्नता संगम पर घेलुआ में मुफ्त बंट रही थी।

दृष्य इतना मनोरम था कि मुझे अपने पास अच्छा कैमरा न होने और अच्छी फोटो खींच पाने की क्षमता न होने का विषाद अटैक करने लगा। यह अटैक बहुधा होता है और मेरी पत्नीजी इसको अहमियत नहीं देतीं। सही भी है, अहमियत देने का मतलब है पैसा खर्च करना कैमरा खरीदने पर!

करीब आधा घण्टा नाव पर संगम में घूम हम लौटे। प्रदीप अपेक्षा कर रहा था कि मैं बकसीस दूंगा। पर मैने उसे नियत 200 रुपये ही दिये। वह संतुष्ट दिखा।

संगम क्षेत्र का आनन्द देख लगा कि फिर चला जाये वहां!

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पुला पर रेलगाड़ी


कन्धे पर बच्चा और नेपथ्य में फाफामऊ पुल।

छोटा सा बच्चा अपने अभिभावक के साथ गंगा किनारे खड़ा था और नदी की गतिविधियों पर तरह तरह के सवाल पूछ रहा था। अवधी-भोजपुरी में बात कर रहा था। बहुत मीठी आवाज थी उसकी। नाव, चिड़ियाँ, किनारे की खेती आदि के बारे में प्रश्न कर रहा था और अभिभावक बहुत प्रेम से उत्तर दे रहा था।

इतने में फाफामऊ पुल पर ट्रेन आने की आवाज हुई। अभिभावक ने कहा – देखअ, गाड़ी आवत बा।

केहर?

पुला पर।

बच्चे को पुल नहीं दिखा साफ साफ। अभिभावक ने उसे कन्धे पर उठा कर दिखाया। गाड़ी देखते ही उसके बारे में बहुत सवाल प्रारम्भ हो गये उस बच्चे के। गाड़ी कहां जा ता (फैजाबाद, बस्ती); कब पंहुचे (कुछ देर बाद, दुपहरिया में); घरे जाये (जाये, तोहके बईठाइ देयी?); गाड़ी बहुत बड़ी बा (हां, पसीजड न होई)।

बच्चा प्रसन्न हो गया गाड़ी देख कर। वापसी में फुदकता पैदल आ रहा था। उसकी पैण्ट सरक रही थी। बार बार उसे खींच कर ठीक कर रहा था। मैने उससे नाम पूछा तो बताया – ओम, ओम नम: शिवाय। फिर एक ही सांस में अपने भाई बहन और कुनबे के लोगों के नाम भी बताने लगा। गांव का नाम भी बताया – भलुहा। अभिभावक ने स्पष्ट किया कि सिद्धार्थ नगर में गांव है। उसके बारे में बता रहा है।

अब पुल से उसका परिचय हो गया था। उसकी तरफ देखते हुये बोला – पुला बहुत बड़ा बा। रेलगडियऊ बहुत बड़ी रही।

रेल, नाव, पुल, नदी का तिलस्म बहुत होता है। मुझ अधेड़ को भी मैस्मराइज करता है तो बच्चे को तो करता ही है।  

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फाफामऊ पुल

इलाहाबाद के उत्तर में गंगानदी के उस पार है फाफामऊ। फाफामऊ को इलाहाबाद से जोडते हुये पहले एक रेल-कम-रोड पुल था। वह अभी भी है, जिसपर हल्के वाहन आते जाते हैं। इस पुल के एक तरफ रेल का नया पुल और दूसरी तरफ रोड का नया पुल बन गये हैं। नीचे के चित्र में रोड के नये पुल से फोटो खींचा गया है। बीच में रेल-रोड का पुराना पुल है और उसके पार रेल का नया पुल।

यह फाफामऊ के रोड के नये पुल से खींचा गया चित्र है। बीच में गंगा नदी पर रेल-रोड का पुराना पुल है और उसके पार रेल का नया पुल। दाईं ओर इलाहाबाद है और बाईं ओर फाफामऊ।

कन्दमूल-फल, चिलम और गांजा


वह लड़का बारह-तेरह साल का रहा होगा। एक जैकेट और रफू की गई जींस का पैण्ट पहने था। माघ मेला क्षेत्र में संगम के पास सड़क के किनारे अखबार बिछा कर बैठा था। खुद के बैठने के लिये अखबार पर अपना गमछा बिछाये था।

वह कन्दमूल फल बेच रहा था। सफेद रंग की विशालकय जड़ का भाग सामने रखे था और पांच रुपये में तीन पीस दे रहा था। बहुत ग्राहक नहीं थे, या मेरे सिवाय कोई ग्राहक नहीं था।

माघ मेला क्षेत्र में कन्दमूल फल बेचता लड़का

मैने कौतूहल से पूछा – क्या है यह?

कन्दमूल फल। उसके अन्दाज से यह लगता था कि मुझे रामायण की समझ होनी चाहिये और जानना चाहिये कि राम-सीता-लक्षमण यह मूल खाते रहे होंगे। कौतूहल के वशीभूत मैने पांच रुपये में तीन पतले पतले टुकड़े – मानो ब्रिटानिया के चीज-स्लाइस हों, खरीद लिये। पूछा – और क्या बेच रहे हो?

उसके सामने दो तीन और सामान रखे थे। छोटी छोटी खूबसूरत चिलम थीं, पीतल के लोटे थे और दो कटोरियों में कुछ पत्थर जैसी चीज।

वह बोला – चिलम है। फिर खुद ही स्पष्ट करता बोला – वह जिससे गांजा पीते हैं

गांजा? तुम्हारे पास है?

लड़का बोला – हां। फिर शायद उसने मुझे तौला – मैं पर्याप्त गंजेड़ी नहीं लगता था। शायद उसे लगा कि मैं इस विधा का सही ग्राहक नहीं हूं। लपेटते हुये बोला – गांजा नहीं, उसको पीने वाली चिलम है मेरे पास

मुझे समझ में आया कि सड़क के किनारे कन्दमूल फल ले कर बैठा बालक फसाड (मुखौटा) है गांजा बेचने के तंत्र का। पूरे सीनेरियो में कोई आपत्तिजनक नहीं लगेगा। पर पर्दे के पीछे बैठे गांजा-ऑपरेटर अपना काम करते होंगे।

मुझे जेम्स हेडली चेज़ या शरलक होम्स का कीड़ा नहीं काटे था। काटे होता तो चिलम खरीदने का उपक्रम कर उस लड़के से बात आगे बढ़ाता। वैसे भी मेला क्षेत्र में टहलने के ध्येय से गया था, गांजा व्यवसाय पर शोध करने नहीं! सो वहां से चल दिया। कन्दमूल फल की स्लाइसों की हल्की मिठास का स्वाद लेते हुये।

पर मुझे इतना समझ में आ गया था कि गांजा बेचना हो फुटकर में, तो कैसे बेचा जाये! 😆

नत्तू पांड़े और प्रसन्नता


कचरे की टोकरी से कौतुक करते गोल-मटोल नत्तू पांड़े।

मेरी बिटिया और मेरा नाती विवस्वान (नत्तू पांड़े) यहां हमारे पास एक महीना रहे। वह महीना भर प्रसन्नता का दौर रहा। मेरी पत्नीजी को सामान्य से कहीं अधिक काम करना पड़ता था, पर मुझे कभी यह नहीं लगा कि वह उनको बोझ लग रहा था। मेरी बिटिया ने मेरे लड़के को उसके कमरे से बेदखल कर दिया था (उस कमरे में वह और नत्तू पांड़े जम गये थे!)। पर मेरे लड़के को कोई कष्ट नहीं था। विवस्वान मेरे लैपटॉप, प्रिण्टर, कागज, किताबें और  घर में बने मेरे होम-ऑफिस के कोने से छेड़ छाड़ करता था। पर वह मैं सहर्ष सह ले रहा था।

यह सब हो रहा था प्रसन्नता के साथ।

प्रसन्नता क्या होती है?

अन्य चीजें बराबर हों तो परिवार प्रसन्नता देता है। हां, वास्तव में।

मैने कहीं पढ़ा था कि इस समय जो पीढ़ी अधेड़ हो रही है, जो पर्याप्त आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कर चुकी है, जिसने इतना जोड़ लिया है कि वह अपने वृद्धावस्था और स्वास्थ्य के लिये खर्च करने में सक्षम है, वह नहीं चाहती कि अपने नाती-पोतों को पाले जिससे कि उनके बेटा-बहू नौकरी कर सकें। शहरी अपर मिडिल क्लास में यह द्वन्द्व चल रहा है। बहू यह सोचती है कि सास ससुर उसके बच्चों को देखने का पारम्परिक धर्म नहीं निभा रहे। सास ससुर मान रहे हैं कि पूरी जिन्दगी मेहनत करने के बाद अब उनके पास अपना समय आया है जिसे वे अपने हिसाब से खर्च कर सकें – घूमने, फिरने, पुस्तकें पढ़ने या संगीत आदि में। वे एक और जेनरेशन पालने की ड्रज़री नहीं ओढ़ना चाहते।

पारिवारिक समीकरण बदल रहे हैं। पर इस बदलते समीकरण में न तो बहू-बेटा प्रसन्न रहेंगे, न नाती-पोते और न बाबा-दादी। आधुनिकता में प्रसन्नता केजुयेलिटी होगी/रही है।

परिवार टूट रहे हैं। लोग स्वतंत्रता अनुभव कर रहे हैं। भाई, बहन भतीजे, पड़ोसी, दूसरे शहर में काम करता रिश्तेदार या अमरीके में बसा सम्बन्धी अलग थलग होते जा रहे हैं। कई से तो हम कई दशकों से नहीं मिले। फोन आ जाता है तो दस बार “और क्या हालचाल है” पूछने के अलावा गर्मजोशी के शब्द नहीं होते हमारे पास।

हम पैराडाइज़ में अपनी न्यूक्लियर फैमिली के साथ दो-तीन हजार का लंच कर खुश हो लेते हैं। पर उसी दो-तीन हजार में एक्टेण्डेड फैमिली के साथ कम्पनीबाग में छोले-भटूरे खाने की प्रसन्नता खोते जा रहे हैं।

प्रसन्नता के घटकों में परिवार प्रमुख इकाई है। शायद हां। शायद नहीं।

कुछ और सोचा जाये। या आप बतायेंगे?


नत्तू पांड़े संवाद, जो कविता हो सकता है –

मामा बॉल
धपाक
माथा फूट
हम गिल
एते
चोट्ट
मामा पोंपों सुई
पैले

(मामा ने बॉल फेंकी, जो धपाक से मेरे माथे पर लगी। माथा फूट गया। मैं गिर पड़ा। ऐसे चोट लगी। मामा को उसकी तशरीफ पर सूई लगा दो बतौर पनिशमेण्ट, पहले! )



मेक्सिको और प्रसन्नता –

मेक्सिको की दशा भारत/पूर्वांचल/बिहार से मिलती जुलती है। पर वहां के लोग विश्व के प्रसन्नतम लोगों में हैं। नेशनल जियोग्राफिक की डान बटनर की लिखी पुस्तक का अंश में उद्धृत कर रहा हूं –

कोई मुगालता न रखें, मॉटेरे, मेक्सिको  में और आसपास गम्भीर समस्यायें हैं। बहुत से गांवों में बच्चे कुपोषण और शिक्षा की कमी से पीड़ित हैं। कुशल और प्रतिभावान आदमी और औरतें शराब  और जींस बनाने की फैक्टरी  में काम करने को अभिशप्त हैं। उनकी आकान्क्षायें और स्वप्न धूमिल हो रहे हैं। जो अधिक दुर्भाग्यशाली हैं, वे सोचते हैं कि परिवार छोड़ कर दूर सन्युक्त राज्य अमेरिका चले जायें काम धन्धे की तलाश में। तब भी, सारी बाधाओं – बढ़े हुये भ्रष्टाचार, कम विकास और सवालों के घेरे में आती शासन व्यवस्था – के बावजूद ये मेक्सिको वासी प्रसन्नता की सम्पदा का आशीर्वाद पाये हुये लोग हैं।

और कारण क्या हैं इनकी प्रसन्नता के? डान बटनर इस प्रसन्नता के कारण बताते हैं –

  1. सूर्य की रोशनी की बहुतायत।
  2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना।
  3. नैसर्गिक हास्य। अपने आप पर, बढ़े टेक्स पर और यहां तक कि मौत पर भी हंस लेने की वृत्ति। 
  4. बस कामचलाऊ पैसा। 
  5. धार्मिकता। 
  6. बहुत अधिक सामाजिकता। 
  7. परिवार को सबसे ज्यादा प्राथमिकता। और
  8. अपने आस पास की अच्छाई पर संतोष 

परोक्ष रूप से, और शायद सीधे सीधे भी, प्रसन्नता के मामले में बहुत कुछ कहे जाने की आवश्यकता/सम्भावना है।

महिषासुर


महिषासुर - पहले पहल की फोटो

काफी समय हुआ जब देखा था कि विसर्जित देवी प्रतिमा का एक अंश गंगा नदी के किनारे पड़ा था। विसर्जन में यह धारा में बह नहीं पाया था। और घाट पर मारा मारा फिर रहा था। अनुमान था कि इसका उपयोग जवाहिरलाल कभी न अभी अलाव जलाने में कर लेगा। पर वैसा हुआ नहीं। कछार में खेती करने वाले इसको खींच कर इधर उधर करते रहे।

पुरानी पोस्ट कार्तिक अमावस की सांझ पर टिप्पणी में अभिषेक ओझा ने कहा भी था –

पता नहीं ऐसा क्यों आया मन में कि मैं होता तो जरूर फूंकता विसर्जित प्रतिमा का अंश… शाम को जलता देख अच्छा लगता.  🙂

जवाहिर को बोलिए ले जाकर ताप लेगा. जाड़ा तो डिक्लेयर कर ही  चुका है.

जब यह पहले पहल दिखा था, तब वर्षा के बाद का समय था। कछार में मिट्टी की एक परत जमा दी थी गंगा माई ने और यह कीचड़ में पड़ा था। धीरे धीरे जमीन सूखी, लोगों ने खेती करना प्रारम्भ किया। आवागमन बढ़ा। खेतों के किनारे सरपत की बाड़ लगी। कोंहड़ा की बेलें लम्बी होने लगीं और उनमें फूल भी लगने लगे।

जैसे यह किंवदंति है कि अपने वीभत्स शरीर के साथ अश्वत्थामा अभी भी जिन्दा है और मारा मारा फिरता है, वैसा कुछ इस महिषासुर के ढ़ांचे के साथ भी हो रहा है। कह नहीं सकते कि यह कब तक चलेगा।

आज देखा तो यह एक सज्जन के खेत में पड़ा था। या सही कहें तो खड़ा था। इसको अलगनी मानते हुये लोगों ने अपने कपड़े टांग रखे थे। जिसे इसका इतिहास नहीं मालुम, उसे यह काम की चीज लग सकता है। कछारी परिदृष्य़ का एक रंगबिरंगा अंग। पर है यह देवी की प्रतिमा का अंग मात्र जिसे नवरात्रि के बाद विसर्जित हो जाना चाहिये था।

अब यह विसर्जित तो होने से रहा। मैं इसके क्षरण का इंतजार कर रहा हूं। कभी न कभी तो यह समाप्त होगा ही।

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ममफोर्डगंज में पीपल का पेड़ और हाथी


यहाँ ममफोर्डगंज में पीपल के पेड़ के नीचे एक हाथी रहता था। चुनाव की घोषणा होने के बाद उसे नहीं देखा मैने। सोचा, शायद बहुजन समाज पार्टी के प्रचार में लग गया होगा।

ममफोर्डगंज, इलाहाबाद में वह स्थान जहां हाथी रहता था, पीपल के पेड़ तले। बहुत दिनों से वह नहीं था यहां।

अन्यथा दफ्तर जाते हुये उसे पीपल के पेड़ के नीचे देखा करता था। एक पैर लोहे के जंजीर से बंधा रहता था। कभी कभी उसका मेक अप किया मिलता था और कभी सादी अवस्था में। एक दो बार उसे सड़क पर चलते देखा था।

पेड़ के नीचे वह पीपल या किसी अन्य पेड़ के पत्ते खाया करता था।

बहुत दिनों से मैं उस हाथी को मिस कर रहा था।

अचानक आज सवेरे मुझे दूर से ही दिखा कि हाथी अपने स्थान पर वापस आ गया है। मोबाइल बड़े मौके पर निकल आया और चलते वाहन से एक तस्वीर ले पाया मैं उसकी। एक दिन पहले ही उस स्थान का चित्र चलते वाहन से लिया था, जब वह नहीं था!

आज सवेरे उस हाथी को कई सप्ताह बाद मैने फिर नियत जगह पर देखा। उसके रखवाले-महावत भी वहां थे। प्रसन्नता की बात है न?!

बहुत अच्छा लगा ममफोर्डगंज में उस हाथी को अपने स्थान पर वापस देख कर। उसके रखवाले-महावत भी पास में बैठे दिखे। हाथी अपने कान फड़फड़ा रहा था –

हथिया रे हथिया तोर बड़े बड़े कान। (ओनसे) तोर माई पछोरई नौ मन धान। (हाथी रे हाथी, तेरे बड़े बड़े कान हैं। उन्हे सूप की तरह प्रयोग करते हुये तेरी मां उससे नौ मन धान साफ करती है!) 

हज़रत लाइन शाह बाबा का फकीर


यह शहर का अंत है। शहर का उत्तरी-पूर्वी किनारा। लाइन शाह बाबा की मजार इलाहाबाद के मध्य में है – इलाहाबाद स्टेशन पर। शिवकुटी वहां से लगभग 15-18 किलोमीटर दूर है। वैसे भी यह स्थान शैव मन्दिरों और गंगा के तट के कारण है। किसी इस्लामी या सूफी सम्प्रदाय के स्थान के कारण नहीं। पर लाइन शाह बाबा का यह फकीर यहां यदा कदा चला आता है। उसी ने बताया कि पन्द्रह बीस साल से आ रहा है और हमारे घर से उसे कुछ न कुछ मिलता रहा है।

हजरत लाइन शाह बाबा की मजार का फकीर।

वह बात जिस जुबान में करता है, उसमें उर्दू का बाहुल्य है। कुछ कुछ कम समझ में आती है। पर मैं उसका पहनावा और मैनरिज्म देख रहा था। कुरता-पायजामा पहन रखा था उसने। सिर पर स्कल कैप से कुछ अलग टोपी। गले में लटकाया लाल दुपट्टा। बगल में एक भरा-पूरा झोला और पांव में कपड़े के जूते। एक कद्दू की सुखाई आधी तुमड़ी थी, जिसे एक पेटी से सामने पेट पर फकीर ने लटका रखा था और जिसमें भिक्षा में मिला आटा था। बोलने में और हाथ हिलाने में नाटकीय अन्दाज था उस बन्दे का।

घर के अन्दर चला आया वह। एक कप चाय की मांग करने लगा। उसमें कोई खास परेशानी न थी – मैने अपने लोगों से एक कप चाय बना कर देने को कह दिया। तुलसी के चौरे पर टेक ले कर बैठ गया वह। उसके बाद अपना वाग्जाल बिछाना प्रारम्भ किया उसने।

लाइन शाह बाबा का फकीर। मुझसे यह अनुरोध करने लगा कि वह दो बात कहना चाहता है, क्या घर में आकर एक ईंट पर बैठ सकता है?

आपके लड़के की सारी तकलीफें  खत्म हो जायेंगी। बस एक काले घोड़े की नाल लगवा लें घर के द्वार पर। और फिर अपने पिटारे से एक नाल निकाल कर दे भी दी उसने। मेरी पत्नीजी ने पूछना प्रारम्भ किया – उनका भाई भदोही से विधान सभा चुनाव लड़ रहा है, उसका भला होगा न? फकीर को शायद ऐसी ही तलब की दरकार थी। अपनी प्रांजल उर्दू में शैलेन्द्र (मेरे साले जी) के चुनाव में विजयी होने और सभी विरोध के परास्त होने की भविष्यवाणी दे डाली उस दरवेश ने। उसने लगे हाथ अजमेर शरीफ के ख्वाजा गरीब नेवाज से भी अपना लिंक जोड़ा और पुख्ता किया कि जीत जरूर जरूर से होगी।

यह जीत की भविष्यवाणी और बेटे के भविष्य के प्रति आशावादी बातचीत अंतत: मेरी पत्नीजी को 250 रुपये का पड़ा।

इजाजत पा कर वह फकीर तुलसी के चौरे की टेक लगा कर बैठ गया और फिर उसने वाग्जाल फैलाना प्रारम्भ किया।

हज़रत लाइन शाह बाबा के फकीर नें फकीरी चोले और लहजे को कैसे भुनाया जाता है – यह मुझे सिखा दिया। आज, रविवार, की यह रही उपलब्धि!