गुटखा – पानमसाला


श्री योगेश्वर दत्त पाठक। हमारे वाणिज्य निरीक्षक।

हमारे मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक (माल यातायात) सुश्री गौरी सक्सेना के कमरे में मिले श्री योगेश्वर दत्त पाठक। श्री  पाठक उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय के वाणिज्य निरीक्षक हैं। उनके काम में पार्सल से होने वाली आय का विश्लेषण करना भी है।

श्री पाठक जागरूक प्रकार के इंसान हैं। अपने आस पास, रेलवे, खबरों आदि को देखते समझते रहते हैं। उन्होने बताया कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि पानमसाला बनाने वाली कम्पनियां उसे प्लास्टिक पाउच में नहीं बेच सकतीं। पानमसाला बनाने वाली कम्पनियां कानपुर में बहुत हैं। इस निर्णय से उनके व्यवसाय पर कस कर लात पड़ी। उन्हे अपने पाउच के डिजाइन बदलने में परिवर्तन करने में तीन महीने लगे। इन तीन महीनों में बाजार में गुटखा (या पानमसाला) की उपलब्धता कम हो जाने के कारण लोगों की गुटखा सेवन की प्रवृत्ति में अंतर आया। कई लोग गुटखा-पानमसाला से विमुख हो गये।

कानपुर से रेल पार्सल के रूप में बहुत सा गुटखा/पानमसाला बाहर जाता है। कानपुर की पार्सल आय लगभग एक करोड़ रुपये प्रतिमास हुआ करती थी, जो श्री पाठक के अनुसार अब पैंसठ लाख तक गिर गयी है। यह पानमसाला यातायात में भारी कमी होनेके कारण हुआ है। श्री पाठक ने बताया कि यह लोगों के पानमसाला सेवन की प्रवृत्ति में कमी के कारण भी हो सकता है। अब प्लास्टिक की बजाय पेपर के पाउच में बनने के कारण इसकी कीमत 1 रुपये से बढ़ कर दो रुपये हो गयी है। इसके अलावा पहले प्लास्टिक पाउच होने के कारण शेल्फ लाइफ आसानी से 6 महीने हुआ करती थी, पर अब पेपर पाउच में गुटखा डेढ़ महीने में ही खराब होने लगा है। निश्चय ही लोग गुटखा विमुख हुये हैं।

श्री पाठक ने बताया कि उत्तरप्रदेश में पिछली सरकार ने गुटखा पर उत्पादकर भी बहुत बढ़ा दिया था। अत: कुछ पानमसाला यूनिटें यहां से हट कर उत्तराखण्ड (या बेंगळूरु ?) चली गयी हैं।

कोटेश्वर महादेव, शिवकुटी के प्रांगण में माला-फूल बेचने वाली मालिन। इनके पास गुटखा/पानमसाला के पाउच भी मिल जाते हैं। गुटखा भक्त सेवन करते हैं, शिव नहीं!

यह सूचना मिलने पर मैने कोटेश्वर महदेव मन्दिर के प्रांगण में फूल बेचने वाली महिला (जो सिगरेट-पानमसाला भी रखती है) से दो पाउच गुटखा खरीदा – राजश्री और आशिकी ब्राण्ड के। दोनो दो रुपये के थे। इनके पाउच पर मुख के केंसर का चित्र लगी चेतावनी भी थी। ये पाउच कागज के थे। आशिकी ब्राण्ड का पूर्णत: कागज था पर राजश्री ब्राण्ड के कागज पर एक चमकीली परत (शायद उसमें अल्यूमीनियम का अंश हो) थी।

मालिन जी से खरीदे दो रुपये वाले दो गुटखा पाउच।

मैने मालिन जी से पूछा गुटखा की बिक्री के बारे में। उन्होने बताया कि पिछले साल दो-तीन महीने तो ये पाउच आने बन्द हो गये थे। पर अब तो आ रहे हैं। लोग खरीदते भी है। उनके अनुसार बिक्री पिछले साल जैसी ही है – “सब खाते हैं, किसी को बीमारी की फिकर नहीं”!

खैर, मालिन का परसेप्शन अपनी जगह, पानमसाला यातायात कम जरूर हुआ है। दाम बढ़ने और पाउच की शेल्फ लाइफ कम होने से गुटखा कम्पनियों को लात अवश्य लगी है। दुकानों/गुमटियों पर जहां पानमसाला के लटकते पाउचों की लड़ियों के पीछे बैठा दुकानदार ठीक से दिखता नहीं था, अब उतनी लड़ियां नजर नहीं आती गुमटियों पर।

गुटखा नहीं खा रहे तो क्या खा रहे हैं लोग? सुश्री गौरी सक्सेना (जिन्होने हाल ही में चुनार तक की सड़क यात्रा की है) की मानें तो अब कस्बाई गुमटियों पर भी पाउच कम दीखे, उनमें सामने अंगूर रखे दिखे। अंगूर अब शहरी उच्च-मध्यम वर्ग की लग्जरी नहीं रहे – वे गांव-कस्बों तक  पंहुच गये हैं।

सूखती खेती


महीना भी नहीं हुआ। मैने 29 फरवरी को पोस्ट लिखी थी – सब्जियां निकलने लगी हैं कछार में। इस पोस्ट में था –

शिवकुटी के घाट की सीढ़ियों से गंगाजी तक जाने के रास्ते में ही है उन महिलाओं का खेत। कभी एक और कभी दो महिलाओं को रेत में खोदे कुंये से दो गगरी या बाल्टी हाथ में लिये, पानी निकाल सब्जियों को सींचते हमेशा देखता हूं। कभी उनके साथ बारह तेरह साल की लड़की भी काम करती दीखती है। उनकी मेहनत का फल है कि आस पास के कई खेतों से बेहतर खेत है उनका।

पर पिछले कई दिनों से उन औरतों या उनके परिवार के किसी आदमी को नहीं देखा था खेत पर। कुंये के पास बनी झोंपड़ी भी नहीं थी अब।  आज देखा तो उस खेत के पौधे सूख रहे हैं। आदमी था वहां। कान्धे पर फावड़ा रखे। खेती का निरीक्षण कर रहा था। उससे मैने पूछा कि खेती को क्या हुआ?

गंगा नदी के पीछे हटने के कारण सूखते खेत में खड़ा, अपनी खेती और दिहाड़ी/नौकरी के बीच झूलता व्यक्ति।

बहुत वाचाल नहीं था वह, पर बताने लगा तो बता ले गया। गंगाजी इस बार उम्मीद से ज्यादा पीछे हट गयी हैं। जब खेत बनाया था तो कमर तक (ढाई-तीन फिट) खोदने पर पानी आ गया था। अब पानी नीचे चला गया है। उसने अपना हाथ उठा कर बताया कि पानी इतना नीचे (लगभग सात-आठ फिट) पर मिल रहा है। सिंचाई भारी पड़ रही है। औरतों के बस की नहीं रही। वह स्वयम इतना समय दे नहीं पा रहा – काम पर भी जाना होता है। काम पर न जाये तो 300 रुपये रोज की दिहाड़ी का नुक्सान है।

कुल मिला कर अपेक्षा से कहीं अधिक गंगाजी के और सिमट जाने और खेत में काम करने वालों की कमी के कारण खेती खतम हो रही है। उसने बताया – कोंहड़ा तो अब खतम ही मानो। लौकी बची है – वह उस हिस्से में है जो गंगाजी की जल धारा के करीब है।

मैने उस व्यक्ति से डीजल पम्प के जरीये पानी देने के विकल्प की बात की। पर उसका कोई सीधा उत्तर नहीं दिया उसने। लगा कि यह विकल्प उसके पास उपलब्ध है ही नहीं।

ऐसा नहीं कि सभी के खेत सूख रहे हों। कुछ लोग हार बैठे हैं, कुछ रेत के कुओं को और गहरा कर मिट्टी के घड़ों से सींचने में लगे हैं और कुछ ने डीजल पम्प से सिंचाई करने या (गंगा में मिलने जा रहे) नाले के पानी को मोड़ कर सिंचाई करने के विकल्प तलाश लिये हैं।

सब्जियों की कैश क्रॉप और दिहाड़ी/नौकरी के बीच झूलता वह व्यक्ति! मुझे उससे सहानुभूति हुई। पर सांत्वना के रूप में क्या कहूं, यह समझ नहीं आया। सिर्फ यही कह पाया कि चलिये, अपनी लौकी की फसल को देखिये।

पानी की कमी से बरबाद हुआ कोंहड़े का खेत।

फांसी इमली


फांसी इमली एक इमली के वृहदाकार पेंड़ का ठूंठ है। यह सुलेम सराय इलाहाबाद में मेरे दफ्तर के रास्ते में बांई ओर पड़ता है। वाहन ज्यादातर वहां रुकते नहीं। बहुत कम लोगों ने इसे ठीक से नोटिस किया होगा।

कहते हैं कि इस पेड़ से सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद अंग्रेजों ने अनेक लोगों को फांसी पर लटकाया था। जो टीन का बोर्ड वहां लगा है, उस पर 100 लोगों की फांसी की बात कही गई है।

ठूंठ (जिससे सट कर एक पीपल का वृक्ष पनपा हुआ है) को बीचों बीच रख कर एक चबूतरा बना दिया गया है। पास में रानी लक्ष्मीबाई और मौलवी लियाकत अली (?) के सन्दर्भ में एक शहीद स्मारक बनाने का यत्न किया गया है जो काफी सतही प्रयास लगता है। इस फांसी इमली के चबूतरे पर कभी हेलमेट, कभी सस्ते खिलौने और कभी भर्ती बोर्डों के फार्म बेचने वाले अपना मजमा लगाये मिलते हैं। पास में ही एक बोर्ड है जो दुर्घटना बहुल क्षेत्र की चेतावनी देता है। दुर्घटनायें इस लिये होती हैं कि इस जगह से वाहन तेजी से गुजरते हैं।

अपने शहीदों और शहीद स्थलों की जितनी इज्जत भारतीय करना जानते हैं वैसी ही इज्जत इस स्थल की होती दीखती है! 😦

मैने अपना वाहन रोक कर इस स्थान के चित्र लिये। भर्ती बोर्ड के फार्म बेचने के लिये दो व्यक्ति वहां अपना पीले रंग का टेण्ट तान रहे थे। उनके बैग अभी नहीं खुले थे। पास में उनकी मोटर साइकल खड़ी थी। हो सकता है पुलीस वाले को चबूतरे पर दुकान लगाने का किराया भी देते हों वे। एक ठेले वाला ज्यूस बेचने का तामझाम सेट कर रहा था। एक दो गुमटियां भी आस पास बनी हुई थीं।

सब कुछ सामान्य था वहां। शहीद स्मारक जैसी गम्भीरता वहां नदारद थी।

अंग्रेजों ने सन सत्तावन के बाद यहां काफी नर हत्यायें की थीं – उसके बारे में कोई संशय नहीं है। अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा की पुस्तक The Last Bungalow – Writings on Allahabad में प्रस्तावना के लेख में है –

अंग्रेजों के जमाने के इलाहाबाद के सिविल लाइंस के इलाके के पूर्ववर्ती आठ गांव हुआ करते थे। उनको अंग्रेजों ने 1857 के विप्लव के बाद सबक सिखाने के लिये जमीन्दोज़ कर दिया था। गदर का एक इतिहासकार लिखता है – “बच्चों को छाती से लगाये असहाय स्त्रियों को हमारी क्रूरता का शिकार बनना पड़ा। और हमारे एक अफसर ने बताया –

एक ट्रिप मैने बहुत एंज्वॉय की। हम स्टीमर पर सिखों और बन्दूकधारी सैनिकों (Fusiliers) के साथ सवार हुये। हम शहर की ओर गये। सामने-दायें-बायें हम फायर करते गये, तब तक, जब तक कि “गलत” जगह पर पंहुच नहीं गये। जब हम वापस किनारे पर लौटे, तब तक मेरी दुनाली से ही कई काले लोग खतम हो चुके थे। 

कुल मिला कर 1857 के बाद का वह समय, जब इस फांसी इमली से लोगों को फांसी दी गयी होगी, बहुत ही दर्दनाक समय रहा होगा इलाहाबाद के लिये।

हे राम! 

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[इस स्लाइड-शो में एक बोर्ड पर लिखा मोबाइल नम्बर है। मैने उन सज्जन से बात की। कोई वकील राम सिंह जी थे। उन्होने कहा कि अपने निजी प्रयास से इस इमली के पेड़ के नीचे चबूतरा बनवाया है, एक भारत माता की और एक भगत सिंह जी की मूर्तियां लगाई हैं। वे इस स्थान का उद्घाटन स्थानीय विधायक या किसी अन्य से कराने का यत्न कर रहे हैं। वे इस बात से भी छुब्ध हैं कि जहां चौक के नीम के वृक्ष, जिससे भी बहुत से लोगों को फांसी दी गयी थी, का रखरखाव होता है; प्लेक भी लगा है; वहीं यह स्थान उपेक्षित है।

यह पूछने पर कि क्या यह 1857 का इमली का वृक्ष है; श्री रामसिंह जी ने बताया कि भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जी भी इस स्थल पर आये थे, पर स्थल का रखरखाव नहीं हुआ। शायद स्थान की ऐतिहासिकता के बारे में कुछ और सामग्री जुटाने की जरूरत हो। पर यह तो है कि कई वृक्ष रहे होंगे जिनसे अंग्रेजों ने विप्लव के बाद लोगों को फांसी दी होगी, वह भी बिना किसी न्याय प्रक्रिया के। ]

कछार रिपोर्ताज – 3


कोई अपने प्रिय जानवर को रात में दफना गया है गंगाजी की रेती में। यह काला कुकुर खोदने का प्रयास कर रहा है कब्र।

बहुत कम होता है, या हूं कहूं कि शिवकुटी के इस हिस्से में पहली बार देखा – कोई अपने प्रिय (शायद पालतू जानवर) को दफना गया था रेत में। एक गेरुआ कपड़ा और गेन्दा की माला थे कब्र के ऊपर। एक काला कुत्ता कब्र खोदने का प्रयास कर रहा था। भगाने पर भी वहीं आ जा रहा था। अगर वह खोद पाया तो शव की दुर्गति तय है। पर मरे की क्या दुर्गति?

यह देखा कि कई साल से लोग मिट्टी की गगरी या प्लास्टिक की बाल्टी से रेत में आठ-दस फीट गहरे खोदे कुंये से पानी निकाल कर अपनी कछार की सब्जियां सींचते रहे हैं। पिछली साल राम सिंह जी को डीजल के पम्प से सिंचाई करते देखा था। इस साल उनका लड़का कल्लू बता रहा था कि तीन अलग अलग जगह खेती करने के कारण वह ठेले पर सिंचाई पम्प रख कर इस्तेमाल कर रहा है। पर इस साल पम्प इस्तेमाल करने वाला वह अकेला नहीं है। मैने देखा कि कई अन्य ने रेत में खुदाई कर गंगाजी के पानी की पम्पिंग व्यवस्था कर ली है और लम्बी कोलेप्सेबल पाइप का प्रयोग कर दूर तक सिंचाई कर ले रहे हैं। शायद लम्बे पाइप से एक दूसरे का खेत भी सींच ले रहे हैं। इससे मैनुअल लेबर की जरूरत कम हुई है और फसल की क्वालिटी बेहतर लग रही है।

पिछले साल की पोस्ट पर मैने पम्प से सिचाई को ‘लीप फारवर्ड’ कहा था। उस पर अशोक पाण्डेय की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी थी – 

ज्ञान दा, आप जिस ‘तकनीकी लीप फार्वर्ड’ की बात कर रहे हैं, उसके लिए चीन को धन्‍यवाद देना चाहिए। ये चायनीज डीजल इंजन पंपिंग सेट है। वजन मात्र 50-55 किलो, डीजल की खपत मात्र आधा लीटर प्रति घंटा, कीमत मात्र 10 से 12 हजार रुपए। जब से भारत में यह आयी है, खेतों की सिंचाई में किसानों को काफी सुविधा हो गयी है। छोटी-छोटी चीजें ही खेती में क्रांति लाती हैं। चाइनीज सेट और प्‍लास्टिक के पाइप से किसान कहां से कहां तक पानी पहुंचा दे रहे हैं… आज से एक दशक पहले तक किसानों को एक जगह से दूसरी जगह तक पानी पहुंचाने के लिए खेत में कच्‍ची या पक्‍की नाली बनानी पड़ती थी। .. खैर बात हो रही थी चायनीज पंपिंग सेट की..करीब डेढ़ साल पहले मैंने इस पर एक पोस्‍ट लिखी थी –  http://khetibaari.blogspot.com/2009/08/blog-post.html तब सरकार इस पर अनुदान नहीं देती थी, लेकिन अब इस पर भी अनुदान मिलने लगा है। हालांकि सारा अनुदान व्‍यापारी झटक जाते हैं, लेकिन तब भी यह उपकरण हिन्‍दुस्‍तानी मॉडल से काफी सस्‍ता पड़ता है। इसीलिए किसानों में तेजी से यह लोकप्रिय हो गया है।

पानी के तीन स्रोत देखे हैं मैने यहां कछार में – गंगाजी की बहती धारा, रेत खोद कर निकाला गया पानी और शिवकुटी/सलोरी/चिल्ला/गोविन्दपुरी के नाले का पानी। नाले का पानी उन स्थानों पर सिंचाई के काम आता है, जहां से गंगा की जल धारा बहुत दूर हो गयी है और जहां कछार करार के नजदीक है। नाले के पानी को विभिन्न नालियों में मोड़ने का काम भी खेती करने वाले करते हैं। आधुनिक भगीरथ!

कछारी खेती मॉर्डनाइज हो रही है। लोग भी हो रहे हैं। पण्डाजी की चौकी पर बैठा मैं वापसी में सुस्ता रहा था कि कई लोगों ने सूचना दी कि नागनथवा को कल बहुत पीटा लोगों ने। एक महिला सिर पर बोरी रखे आयी और पण्डाजी को बताने लगी – अप तो दस सवा दस बजे चले जाते हैं। यह दोपहर में हुआ। नगनथवा को कुछ लोगों ने दो लाठी मारा। सिर में भी और पैर में भी।

नगनथवा पर विशद चर्चा हुई। उसके पास बकरियां हैं। शायद कछार के किसी के खेत में हिल गयी रही हों। यह भी हो सकता है कि कच्ची शराब का मामला हो। आस पास तो तीन चार जगह बनती है। पीने वाले इकठ्ठे हो जाते हैं और बहुधा मार पीट का मामला बन जाता है। जब शराब नहीं बनती, लोग सामान्य दिखते हैं। शराब बनने लगती है, तो लोगों (पीने वालों) के चेहरे ऐसे दीखते हैं जैसे चुचका आम!

अचानक रावत जी आ गये। पहाड़ के रहने वाले हैं और यहां उनकी कोई दुकान है। उन्होने कहा कि कछार का यही हाल यहां से मुरादाबाद तक का है। वहां पास में है हरथल। कच्ची शराब वहां भी बहुत बनती है गंगा के कछार में – कईं कोई रोक टोक नहीं प्रशासन की। और वहां, जहां शराब बनती है, पीने वाले मतवाले रहते हैं। आस पास कोई घर नहीं, जहां चोरी न हुई हो। चोरी कर के ही पीने वाले शराब पाने का जुगाड़ करते हैं।

नगनथवा किस चक्कर में मराया, यह तो पता नहीं। पर उसके बहाने कछार की पर्याप्त सोशियो-पोलिटिको-इकनॉमिक चर्चा हो गई।

मैं फिर घर चला आया मालगाड़ियों का प्रबन्धन देखने। बहुत कुछ वैसे जैसे विक्रम और वेताल वाला वेताल हर कहानी के बाद पेंड़ पर जा कर उल्टा टंग जाता है! 😆

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कछार रिपोर्ताज – 2


शिवाकान्त जी मिले। सिर पर साफा बान्धे। हाथ में गंगाजल ले जाने के लिये जरीकेन। यह जगह उन्हे इतनी अच्छी लगती है कि गांव जाने का मन नहीं करता!

होली के बिहान (9 मार्च) सवेरे घूमने गया तो आसमान साफ था। सूर्योदय मेरे सामने हुआ। ललिमा नहीं थी – कुछ पीला पन लिये थे सूर्य देव। जवाहिरलाल ने अलाव जला लिया था। हवा में कल की अपेक्षा कुछ सर्दी थी। गंगाजी के पानी से भाप उठती दिख रही थी, अत: पानी के ऊपर दिखाई कम दे रहा था।

लौकी की बेलें अधिक फैल रही हैं। कुछ तो सरपत की बाड़ लांघ कर बाहर आ रही थीं। वनस्पति बाड़ की भौतिक सीमा नहीं मानती। पशु काफी हद तक अपने को भौतिक बाड़ के लिये कण्डीशन कर लेते हैं और आदमी एक कदम आगे है – वह अपने मन में ही बाड़ बना लेता है जिसे वह लांघने का प्रयास ही नहीं करता।

सरपत की आड़ से देखने पर सूर्योदय बहुत मोहक लग रहा था। गंगा नदी में काफी दूर हिल कर एक आदमी बहुत देर से शांत पानी में खड़ा पूजा कर रहा था और एक अन्य किनारे पर कोई स्तुति पढ़ रहा था।

सरपत की बाड़ की ओट से निकलता सूरज - गंगा नदी के उसपार!

दूर शिवाकांत जी आते दीखे। उन्होने जब आवाज लगाई स्तुति पढ़ते सज्जन को तो पता चला कि स्तुति करने वाले कोई शुक्ला जी हैं।

शिवाकांत जी बैंक से रिटायर्ड हैं और यहीं शिवकुटी में रहते हैं। कभी कभी अपने पोते के साथ घूमते दीख जाते हैं। आज अकेले थे। सिर उनका गंजा है, पर आज गमछे का साफा बांध रखा था। बहुत जंच रहे थे। हाथ में गंगाजल ले जाने के लिये एक जरीकेन लिये थे। हम बड़ी आत्मीयता से होली की गले मिले। उन्होने बताया कि गंगा किनारे की यह जगह बहुत अच्छी लगती है उन्हे। इतनी अच्छी कि गांव में घर जमीन खेती होने के बावजूद वहां जाने का मन नहीं करता!

वनस्पति बाड़ की भौतिक सीमा नहीं मानती। पशु काफी हद तक अपने को भौतिक बाड़ के लिये कण्डीशन कर लेते हैं और आदमी एक कदम आगे है – वह अपने मन में ही बाड़ बना लेता है जिसे वह लांघने का प्रयास ही नहीं करता।

शिवाकांत पाण्डेय जी में मुझे अपना रिटायर्ड भविष्य दीखने लगा।

कल्लू  बहुत दिनों बाद नजर आया। बेल लगाने के लिये गड्ढ़ा खोद रहा था। बीच में पौधे के लिये परिधि में गहरे खाद डाली जायेगी गोबर और यूरिया की। कल्लू ने बताया कि उसकी मटर आन्धी-पानी-पाला के  कारण अच्छी नहीं हुई पर सरसों की फसल आशा से बेहतर हुई है। कल जो सरसों का कटा खेत मैने देखा था, वह कल्लू का ही था। जो ठेले पर पानी देने का पम्प देखा था, वह भी कल्लू का है। उसने बताया कि इस साल तीन जगह उसने खेती की है। एक तरफ लौकी-कोन्हड़ा है। दूसरी जगह नेनुआ, टमाटर करेला। एक अन्य जगह बींस (फलियां – बोड़ा) है। उसने खीरा-ककड़ी-हिरमाना (तरबूज) और खरबूजे की खेती की भी शुरुआत की है। तीन अलग अलग जगह होने के कारण ठेले पर पानी का पम्प रखे है – जहां पानी देने की जरूरत होती है, वहां ठेला ले जा कर सिंचाई कर लेता है।

एक खेत में एक बांस गड़ा था। उसपर खेती शुरू करते समय लोगों ने टोटके के रूप में मिर्च-नीम्बू बान्धे थे। उसी बांस पर बैठी थी एक चिड़िया। गा रही थी। मुझे देख कर अपना गाना उसने बन्द कर दिया पर अपना फोटो खिंचाने के बाद ही उड़ी!

वापसी में जवाहिरलाल से पूछा कि बाउण्ड्री बनाने का जो काम उसने झूंसी में किया था, उसका पैसा मिला या नहीं? अनिच्छा से जवाहिर ने (रागदरबारी के मंगलदास उर्फ लंगड़ जैसी दार्शनिकता से) जवाब दिया – नाहीं,  जाईं सारे, ओनकर पईसा ओनके लगे न रहे। कतऊं न कतऊं निकरि जाये (नहीं, जायें साले, उनका पैसा उनके पास नहीं रहेगा। कहीं न कहीं निकल जायेगा)। तिखारने पर पता चला कि मामला 900-1000 रुपये का है। गरीब का हजार रुपया मारने वाले पर बहुत क्रोध आया। पर किया क्या जा सकता है। पण्डाजी ने पुलीस की सहायता लेने की बात कही, पर मुझे लगा कि पुलीस वाला सहायता करने के ही हजार रुपये ले लेगा! एक अन्य सज्जन ने कहा कि लेबर चौराहे पर यूनियन है जो इस तरह का बकाया दिलवाने में मदद करती है। जवाहिरलाल शायद यूनियन के चक्कर लगाये। 😦

कुल मिला कर सवेरे की चालीस मिनट की सैर मुझे काफी अनुभव दे गयी – हर बार देती है!

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कछार रिपोर्ताज


कल्लू के सरसों के खेत की कटाई के बाद गट्ठर खेत में पड़ा था।

कल्लू की मटर बेकार हो गयी थी। पर बगल में जो सरसों बोई थी, वह बढ़िया हुई। आज होली के दिन सवेरे घूमने गया तो देखा कि सरसों काट कर गट्ठर खेत में रखे हैं। खेत के आकार के हिसाब से ठीकठाक निकल आयेगी सरसों। इनकी सिंचाई के लिये गंगाजी का पानी नहीं, शिवकुटी, चिल्ला और सलोरी/गोविन्दपुरी के नालों का पानी मोड़ा था कल्लू एण्ड कम्पनी ने। अभी भी वह पानी सब्जियों की सिंचाई के काम आता है। वैसे भी वही पानी कुछ देर बाद गंगाजी में पंहुच कर नाले का पानी नहीं रहता, गंगाजी का पानी हो ही जाता।

सब्जियां लगने लगी हैं। एक लौकी के खेत की सरपत की बाड़ के अन्दर चार बांस गाड़ कर टेण्ट नुमा झोंपड़ी में कोई रखवाली करने वाला सवेरे सवेरे सोया हुआ था। सरपत की बाड़ से सटा कर एक ठेले पर डीजल से चलने वाला पानी का पम्प रखा था। अधिकतर खेती करने वाले गगरी से पानी ला ला कर सब्जियों को सींचते हैं। पम्प से डीजल का खर्चा तो होगा पर मैनुअल लेबर बच जायेगा। पिछली साल रामसिंह जी ने यही इस्तेमाल किया था। इस साल शायद उसका उपयोग और व्यापक हो जाये।

जवाहिरलाल जाती सर्दी में भी सवेरे अलाव जलाने का अनुष्ठान पूरा करता है। आज भी कर रहा था।

रामकृष्ण ओझा नियमित हैं अपनी पत्नी के साथ गंगा स्नान करने में। आज भी वे स्नान कर लौट रहे थे। पण्डाजी के पास उनकी पत्नी ने पॉलीथीन की पन्नी से पाव भर चावल और दो आलू निकाले और संकल्प करने के लिये वे दम्पति गंगाजी/सूर्य की ओर मुंह कर खड़े हो गये और पण्डाजी संकल्प कराने लगे। यह अनुष्ठान भी घाट का नियमित अनुष्ठान है। ओझाजी निपटे ही थे कि एक महिला भी आ गयीं इसी ध्येय से।

दो तीन लोग यह सब देखने, बोलने बतियाने और हास परिहास को वहां उपस्थित थे। मेरा भी मन हुआ कि वहां रुका जाये, पर अपने रेल नियंत्रण के काम में देरी होने की आशंका के कारण मैने वह विचार दबा दिया।

होलिका दहन का मुहूर्त आज सवेरे (8 मार्च) का था। तिकोनिया पार्क में तीन चार लोग रात की ओस से गीली होलिका की लकड़ियां जलाने का यत्न कर रहे थे पर आग बार बार बुझ जा रही थी। मैं तेज पांव घर लौटा और मालगाड़ियां गिनने के अपने काम में लग गया!

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