गुटखा – पानमसाला

श्री योगेश्वर दत्त पाठक। हमारे वाणिज्य निरीक्षक।

हमारे मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक (माल यातायात) सुश्री गौरी सक्सेना के कमरे में मिले श्री योगेश्वर दत्त पाठक। श्री  पाठक उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय के वाणिज्य निरीक्षक हैं। उनके काम में पार्सल से होने वाली आय का विश्लेषण करना भी है।

श्री पाठक जागरूक प्रकार के इंसान हैं। अपने आस पास, रेलवे, खबरों आदि को देखते समझते रहते हैं। उन्होने बताया कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि पानमसाला बनाने वाली कम्पनियां उसे प्लास्टिक पाउच में नहीं बेच सकतीं। पानमसाला बनाने वाली कम्पनियां कानपुर में बहुत हैं। इस निर्णय से उनके व्यवसाय पर कस कर लात पड़ी। उन्हे अपने पाउच के डिजाइन बदलने में परिवर्तन करने में तीन महीने लगे। इन तीन महीनों में बाजार में गुटखा (या पानमसाला) की उपलब्धता कम हो जाने के कारण लोगों की गुटखा सेवन की प्रवृत्ति में अंतर आया। कई लोग गुटखा-पानमसाला से विमुख हो गये।

कानपुर से रेल पार्सल के रूप में बहुत सा गुटखा/पानमसाला बाहर जाता है। कानपुर की पार्सल आय लगभग एक करोड़ रुपये प्रतिमास हुआ करती थी, जो श्री पाठक के अनुसार अब पैंसठ लाख तक गिर गयी है। यह पानमसाला यातायात में भारी कमी होनेके कारण हुआ है। श्री पाठक ने बताया कि यह लोगों के पानमसाला सेवन की प्रवृत्ति में कमी के कारण भी हो सकता है। अब प्लास्टिक की बजाय पेपर के पाउच में बनने के कारण इसकी कीमत 1 रुपये से बढ़ कर दो रुपये हो गयी है। इसके अलावा पहले प्लास्टिक पाउच होने के कारण शेल्फ लाइफ आसानी से 6 महीने हुआ करती थी, पर अब पेपर पाउच में गुटखा डेढ़ महीने में ही खराब होने लगा है। निश्चय ही लोग गुटखा विमुख हुये हैं।

श्री पाठक ने बताया कि उत्तरप्रदेश में पिछली सरकार ने गुटखा पर उत्पादकर भी बहुत बढ़ा दिया था। अत: कुछ पानमसाला यूनिटें यहां से हट कर उत्तराखण्ड (या बेंगळूरु ?) चली गयी हैं।

कोटेश्वर महादेव, शिवकुटी के प्रांगण में माला-फूल बेचने वाली मालिन। इनके पास गुटखा/पानमसाला के पाउच भी मिल जाते हैं। गुटखा भक्त सेवन करते हैं, शिव नहीं!

यह सूचना मिलने पर मैने कोटेश्वर महदेव मन्दिर के प्रांगण में फूल बेचने वाली महिला (जो सिगरेट-पानमसाला भी रखती है) से दो पाउच गुटखा खरीदा – राजश्री और आशिकी ब्राण्ड के। दोनो दो रुपये के थे। इनके पाउच पर मुख के केंसर का चित्र लगी चेतावनी भी थी। ये पाउच कागज के थे। आशिकी ब्राण्ड का पूर्णत: कागज था पर राजश्री ब्राण्ड के कागज पर एक चमकीली परत (शायद उसमें अल्यूमीनियम का अंश हो) थी।

मालिन जी से खरीदे दो रुपये वाले दो गुटखा पाउच।

मैने मालिन जी से पूछा गुटखा की बिक्री के बारे में। उन्होने बताया कि पिछले साल दो-तीन महीने तो ये पाउच आने बन्द हो गये थे। पर अब तो आ रहे हैं। लोग खरीदते भी है। उनके अनुसार बिक्री पिछले साल जैसी ही है – “सब खाते हैं, किसी को बीमारी की फिकर नहीं”!

खैर, मालिन का परसेप्शन अपनी जगह, पानमसाला यातायात कम जरूर हुआ है। दाम बढ़ने और पाउच की शेल्फ लाइफ कम होने से गुटखा कम्पनियों को लात अवश्य लगी है। दुकानों/गुमटियों पर जहां पानमसाला के लटकते पाउचों की लड़ियों के पीछे बैठा दुकानदार ठीक से दिखता नहीं था, अब उतनी लड़ियां नजर नहीं आती गुमटियों पर।

गुटखा नहीं खा रहे तो क्या खा रहे हैं लोग? सुश्री गौरी सक्सेना (जिन्होने हाल ही में चुनार तक की सड़क यात्रा की है) की मानें तो अब कस्बाई गुमटियों पर भी पाउच कम दीखे, उनमें सामने अंगूर रखे दिखे। अंगूर अब शहरी उच्च-मध्यम वर्ग की लग्जरी नहीं रहे – वे गांव-कस्बों तक  पंहुच गये हैं।

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Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://halchal.blog/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyan1955

19 thoughts on “गुटखा – पानमसाला”

  1. aapka blog aur neeche ki tippaniya padh k 1 hollywood ki film yaad aa gayi- “Thank you for smoking”. Kabhi moka mile to avashya dekhiyega. Halaanki saar uparlikhit baato se ekdum vipreet hai, lekin sikke ka dusra pehlu wahi hai.

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  2. सरकार के आंकड़े कहते हैं कि इससे पैदा होने वाली बीमारी के इलाज पर उससे अधिक धन खर्च हो जाता है जितना इन उत्पादों से टैक्स मिलता है. इसके बाद भी इनके उत्पादों को बंद न किया जाना क्या दर्शाता है.

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  3. Business will teach people how to smoke and then how to stop by by marketing their products.This way business creates jobs and effects people’s life.

    http://tinyurl.com/c8ezqsx

    ભારત કી સરલ આસાન લિપિ મેં હિન્દી લિખને કી કોશિશ કરો……………….ક્ષૈતિજ લાઇનોં કો અલવિદા !…..યદિ આપ અંગ્રેજી મેં હિન્દી લિખ સકતે હો તો ક્યોં નહીં ગુજરાતી મેં?ગુજરાતી લિપિ વો લિપિ હૈં જિસમેં હિંદી આસાની સે ક્ષૈતિજ લાઇનોં કે બિના લિખી જાતી હૈં! વો હિંદી કા સરલ રૂપ હૈં ઔર લિખ ને મૈં આસન હૈં !

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  4. सबको बनारसी मगही पान तो मिलता नहीं…सादी सुर्ती अउर तीन सौ नम्बर का जर्दा डाल के, का करें बिचारे! गुटखे पर मरे जा रहे हैं। सलिल भैया अंगूर की बेटी छोड़ डिरेक्ट अंगूर सेवन पर जोर दे रहे हैं। ब्लॉग जगत साधूओं का अखाड़ा हो गया है का…? हाय राम ! कहां जांय ?

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