ज्ञान धर दुबे

मेरे समधी हैं श्री ज्ञान धर दुबे। मिर्जापुर के पास धनावल गांव है उनका। एक बरसाती नदी पर जलप्रपात बनता है – बिण्ढ़म फॉल। उससे लगभग तीन किलोमीटर पश्चिम-उत्तर में है उनका गांव। उनकी बिटिया बबिता से मेरे लड़के का विवाह हुआ है पिछले महीने की चौबीस तारीख को। विवाह के बाद कल वे पहली बार अपनी बिटिया (और हम सब से) मिलने आये थे हमारे घर शिवकुटी।

हमारे घर आये श्री ज्ञानधर दुबे।

श्री ज्ञानधर बहुत संकोची जीव हैं। बहुत ही कम बोलते हैं। उनके साथ उनके ताऊ जी के लड़के श्री सतीश साथ थे और अधिक बातचीत वही कर रहे थे। ज्ञानधर किसान हैं और जैसा लगता है, पूरी मेहनत से किसानी करते हैं। उनके पास एक ट्रेक्टर है – नया ही है। मैने पूछा कि उनकी खेती के अतिरिक्त ट्रेक्टर कितना काम करता है? अपना सवाल मुझे सही उत्तर के लिये री-मार्शल भी करना पड़ा। उनका जवाब था कि जितना समय वे अपनी खुद की खेती पर देते हैं, उतना ही ट्रेक्टर प्रबन्धन पर भी लगता है। वे सवेरे नौ बजे से काम पर लग जाते हैं और दोपहर के भोजन के समय एक घण्टा आराम के अलावा सूर्यास्त तक काम पर रहते हैं। यह जरूर है कि किसानी के लिये कई ज्यादा गतिविधि के समय होते हैं, और कई आराम के। यह फसल रोपाई का समय है – कस कर मेहनत करने का समय!

श्री ज्ञानधर मेहनती भी हैं और दूसरो की सहायता करने वाले भी। मुझे याद है कि एक बात, जिसके आधार पर मैने उनके परिवार से सम्बन्ध करने का निर्णय लिया था, वह थी बबिता का यह कहना कि उसके पिताजी रात बिरात भी अपने आस पास वालों की सहायता करने को तत्पर रहते हैं।

मैने ज्ञानधर जी से कहा कि गांव में रहने के अपने आकर्षण हैं। मेरे पिताजी ने टोका – गांव में बीमार होने पर इलाज करा पाना मुश्किल है। इसपर श्री ज्ञानधर का स्वत: स्फूर्त उत्तर था – पर गांव में आदमी बीमार भी कम होता है। कई लोग उनके कहे से सहमत न हों, पर जब मैं अपनी सात दवा की गोलियां सवेरे और तीन शाम को लेने की बात याद करता हूं, तो लगता है कि कहीं न कहीं उनकी बात में सच्चाई है।

उनके गांव में दिन में दो-तीन घण्टा बिजली आती है। घर के पास लगभग ६००-८०० मीटर तक पक्की सड़क नहीं है। किसानी के बाद अनाज रोक कर रखना – तब तक, जब तक दाम अच्छे न मिलें, उनके लिये बहुधा सम्भव नहीं होता। फिर भी, उनकी जीवन शैली मुझे ललचाती नजर आती है। उसमे एक विविधता पूर्ण अन्तर है और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को कम करने की बाध्यता भी। दोनो में अपनी चुनौती भी है और एक तरह की मोनोटोनी तोड़ने का कम्पल्शन भी।

मुझे याद है कि एक बात, जिसके आधार पर मैने उनके परिवार से सम्बन्ध करने का निर्णय लिया था, वह थी बबिता का यह कहना कि उसके पिताजी रात बिरात भी अपने आस पास वालों की सहायता करने को तत्पर रहते हैं।

मेरे आस पार रेल की पटरियां हैं। उनके पास बिण्ढ़म और टाण्डा फॉल हैं, सिरसी डैम है, उत्तर में गंगा नदी हैं और दक्षिण में शोणभद्र…। मेरे पास सभ्यता की जंजीरें हैं, उनके पास प्रकृति का खजाना…

खैर, मैं मैं रहूंगा और ज्ञानधर ज्ञानधर रहेंगे। ज्ञानदत्त ज्ञानधर नहीं हो सकते। पर ज्ञानदत्त के पास सपने देखने की आजादी है, जो (शायद) जायेगी नहीं…

गूगल अर्थ पर बिण्ढ़म फॉल का दृष्य। यह स्थान श्री ज्ञानधर दुबे के गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर है।
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Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://halchal.blog/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyan1955

22 thoughts on “ज्ञान धर दुबे”

  1. सच है ग्रामीण जीवन की चुनौतियाँ और आकर्षण दोनों ही नागर जीवन से भिन्न हैं। लेकिन यह सच है कि अपने ही ग्रामीण क्षेत्र के नियोजन का अधिकार उनके पास कम और नज़दीकी नगर के पास अधिक होता है, लिहाज़ा वे पिछड़ते हैं। अरविन्द पाण्डेय जी की बूटी वाली बात भी (कम से कम उत्तर प्रदेश के) गाँवों के बारे में काफ़ी हद तक सही लगती है। बचपन में मैं कभी गाँव में ही बसने की बात करता था तो मेरे एक परनानाजी यह समझाकर मना करते थे कि गाँव में रहकर सज्जन स्वभाव बरकरार रखना अधिक कठिन है।

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  2. पंजाब में मैंने देखा कि किसान अलसुबह से लेकर ज्यादा से ज्यादा दोपहर ग्यारह बारह बजे तक खेतों में व्यस्त रहते हैं, खेती के स्टाईल में या शायद तकनीक का अंतर हो सकता है|
    ज्ञान धर जी संकोची होने के बावजूद दूसरों की सहायता को हर समय तत्पर रहते हैं, ये दो गुण(यानी डबल क्वालिटी) हो गए|
    गुलाब जामुन तो खैर सभीको आकर्षित करते ही होंगे, क्या धनावल वाले और क्या इलाहाबाद वाले, ‘ बिण्ढ़म फॉल’ का आकर्षण धनावल वालों के लिए भी वैसा ही होगा जैसा हम जैसों के लिए है?

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