मन्दिर पर छोटी छोटी चीजें गुम जाने का समाजशास्त्र


कोटेश्वर महादेव पर फूल-माला-पूजा सामग्री देने वाली महिला।
कोटेश्वर महादेव पर फूल-माला-पूजा सामग्री देने वाली महिला।

मालिन बैठती है कोटेश्वर महादेव मन्दिर के प्रांगण में। घिसा चन्दन, बिल्वपत्र, फूल, मालायें और शंकरजी को चढ़ाने के लिये जल देती है भक्तजनों को। एक तश्तरी में बिल्वपत्र-माला-फूल और साथ में एक तांबे की लुटिया में जल। भक्तों को पूजा के उपरांत तश्तरी और लुटिया वापस करनी होती है।

मैने उससे पूछा – लुटिया और तश्तरी वापस आ जाती है?

आ जाती है। साल भर में तीन चार लुटियाँ और आधादर्जन तश्तरियाँ लोग ले कर चल देते हैं। वापस नहीं आतीं। ज्यादातर भीड़भाड़ वाले दिनों में होता है।

मैं मालिन का चित्र लेता हूं। उसे कौतूहल होता है – फोटो कैसी आयी। अपनी फोटो मोबाइल में देख कर संतुष्ट हो जाती है वह!

कोटेश्वर महादेव मन्दिर।
कोटेश्वर महादेव मन्दिर।

उधर सीढ़ियों के नीचे पण्डाजी की चौकी है। गंगा स्नान के बाद भक्तगण पहले उनकी चौकी पर आ कर शीशे-कंघी से अपनी सद्य-स्नात शक्ल संवारते हैं। फिर हाथ में कुशा ले कर संकल्प करते हैं। पण्डाजी करीब 20 सेकेण्ड का मंत्र पढ़ते हैं संकल्प के दौरान। उसके पश्चात संकल्प की राशि और/या सामग्री सहेजते हैं। भक्त वहां संकल्प से निवृत्त हो कर कोटेश्वर महादेव मन्दिर में शिवलिंग को जल चढ़ाले के लिये अग्रसर हो जाते हैं।

पण्डाजी से मैं पूछता हूं – साल भर में कितनी कंघियां शीशे गायब होते हैं?

यही कोई दस-पन्द्रह। नया शीशा ज्यादा गायब होता है। नयी कन्घी भी। लोग बालों में  कंघी फेरते फेरते चल देते हैं। ज्यादातर मुख्य स्नान के दिनों में।

मजे की बात है, शीशा कंघी गायब होते हैं। संकल्प करने की कुशा नहीं गायब होती। कुश की दूब में किसको क्या आसक्ति! 😆

पण्डाजी की चौकी पर सजी कंघियां और शीशे!
पण्डाजी की चौकी पर सजी कंघियां और शीशे!

गायब होने की मुख्य चीज है – मन्दिर पर उतारे चप्पल-जूते! या तो गायब होते हैं या नये चले जाते हैं, पुराने वहीं रह जाते हैं! वासांसि जीर्णानि यथा विहाय की तर्ज पर… भक्तों की आत्मायें पुरानी-जीर्ण चप्पलें त्याग कर नई चप्पलें ग्रहण करते हैं भगवान शिव के दरबार में। कुछ लोग इस प्रॉसेस में मुक्ति पा जाते हैं और बिना चप्पल जूते के अपने धाम लौटते हैं धर्म का “यशोगान” करते हुये।

जूते चप्पल गुमने के आंकड़े देने वाला मुझे कोई नजर नहीं आया। वैसे वहां इसकी चर्चा छेड़ी जाये तो पण्डाजी की चौकी के पास जुटने वाली सवेरे की गोष्ठीमण्डली रोचक कथायें बता सकती है चप्पल चौर-पुराण से!

उसके लिये; आप समझ सकते हैं; मेरे पास इत्मीनान से व्यतीत करने वाला समय होना चाहिये। जो अभी तो नहीं है मेरे पास। पर आशा है, भविष्य में कभी न कभी मिलेगा जरूर!