कर्जन ब्रिज से गंगा पार, पैदल

कर्जन ब्रिज का पहला स्पान दिख रहा है मोड़ पर।

कर्जन ब्रिज का पहला स्पान दिख रहा है मोड़ पर।

अपनी मां के कूल्हे की हड्डी के टूटने के बाद के उपचार के सम्बन्ध में नित्य फाफामऊ आना-जाना हो रहा है। अठ्ठारह नवम्बर को दोपहर उनका ऑपरेशन हुआ। सफ़ल रहा, बकौल डाक्टर। [1] उन्नीस नवम्बर को सवेरे उनके पास जाने के लिये मैने नये पुल पर वाहन से जाने की बजाय ऐतिहासिक कर्जन ब्रिज से जाने का विकल्प चुना।

कर्जन ब्रिज वाहनों के लिये बन्द है। उसपर केवल साइड से दोपहिया वाहन आ-जा सकते हैं। मुख्य मार्ग पर ब्रिज के दोनो ओर बन्द गेट है और ताला लगा है। लोग उसपर सवेरे सैर के लिये आते जाते हैं।

सवेरे वहां पंहुचने का नियत समय मैने साढ़े छ रखा था, पर लगभग आधा घण्टा देर से पंहुचा। मेरे वाहन चालक मोहन ने मुझे तेलियरगंज की तरफ पुल के मुहाने पर छोड़ दिया और खुद दूसरी ओर मेरी पत्नीजी के साथ मेरी माता जी के पास चला गया अस्पताल। कर्जन ब्रिज के बन्द गेट के पास राजा भैया का एक बड़ा सा पोस्टर स्वागत कर रहा था। पूर्व में महाबीरपुरी की ओर रेलवे लाइन पार एक मन्दिर के पीछे सूर्य चमक रहे थे (यद्यपि मेरे स्मार्टफोन में मौसम कोहरे की घोषणा कर रहा था)। समय था – 7:02 बजे।

पुल पर घूमने वालों की संख्या भी बहुत नहीं थी। आस-पास के लोगों में सवेरे की सैर का बहुत चलन नहीं लगता। ब्रिज के दोनो ओर जिगजैग तरीके से चलते हुये दोनो ओर के चित्र लेने में मुझे असुविधा नहीं थी।

कर्जन ब्रिज का गूगल मैप।

कर्जन ब्रिज का गूगल मैप। नया रोड ब्रिज चन्द्रशेखर आजाद सेतु के नाम से जाना जाता है।

सम्भवत: नया सड़क पुल (चन्द्रशेखर आजाद सेतु) बनने के बाद कर्जन ब्रिज पर सड़क यातायात 1990 के आस पास बन्द हुआ था। उसके बाद रेल का नया पुल बना और रेल यातायात उसपर 26 अक्तूबर 1996 को शिफ्ट किया गया। सन् 1990 से 2006 तक यह पुल सड़क यातायात के लिये बन्द रहा। हिन्दुस्तान टाइम्स का नेट पर उपलब्ध एक पन्ना बताता है कि  जून 2006 में एक समारोह में उत्तरप्रदेश के मन्त्री उज्ज्वलरमण सिंह जी ने इसके जीर्णोद्धार के बाद पुन: इसे सड़क यातायात के लिये खोला एक समारोह में। पर कुछ ही साल सड़क यातायात चला होगा इसपर। मुझे याद है कि कुछ साल पहले मेरी कार इस पुल पर से गुजरी थी। पिछले डेढ़ साल से यह पुल पुन: बन्द दशा में है।

रेल-कम-रोड ब्रिज होने और रोड इसकी दूसरी मंजिल पर होने के कारण यह काफी ऊंचा हो जाता है। इसलिये साइकल पर पैडल मारते लोग इसपर नहीं दिखते। ऊंचाई के कारण कई लोगों को इसपर चलते नीचे गंगा नदी की ओर झांकने से झांईं छूटती होगी।

झांईं, आपको मालुम है झांईं क्या होता है? नहीं मालुम तो ऊंची अट्टालिका से नीचे झांक कर देखिये।

इलाहाबाद – फैजाबाद के लगभग 156 किलोमीटर सिंगल लाइन के लिये यह कर्जन ब्रिज 1901 में स्वीकृत हुआ। छ-सात साल में बन कर तैयार हुआ। एक किलोमीटर लम्बे इस ब्रिज में कुल 2181 फ़िट के 15 स्पान हैं। इसके खम्बे कम पानी के स्तर से 100फिट नीचे तक जाते हैं। पुल नदी की आधी चौड़ाई पर है। शेष आधा रास्ता दोनो तरफ़ जमीन के भराव से बना है। इस पर लगभग 9 दशक तक रेलगाड़ी चली। जैसा कि इण्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी है; लोगों ने पी.आई.एल. लगाईं इसपर सड़क यातायात पुन चालू करने के लिये। किसी ढंग के प्रान्त का मामला होता या पर्यटन के प्रति जागरूक शहर होता तो इसकी आज जैसी उपेक्षित दशा न होती। और तो और इसपर सवेरे सैर करने वालों की अच्छी खासी भीड़ लगती। उस भीड़ पर आर्धारित कई दुकानें/कारोबार होते। पर यह जो है, सो है।

कर्जन ब्रिज की सड़क समतल और ठीक ठाक लगती है। दोनो ओर की रेलिंग मजबूत दशा में है। यद्यपि उसकी पेण्टिंग नहीं हुई है और ऐसा ही रहा तो कुछ ही सालों में जंग लगने से क्षरण बहुत हो जायेगा।

इलाहाबाद की ओर से इसपर चलने पर इसके और चन्द्रशेखर आजाद सेतु के बीच मुझे मन्दिर, घाट, घाट पर पड़ी ढेर सारी चौकियां और नदी के किनारे किनारे चलती पगडण्डियां दिखी। ऊपर से देखने पर दृष्य मनमोहक लगता है।  दाईं ओर रेल लाइन है। रेल पुल और इस ब्रिज के बीच झाड़ियां हैं। रेल ब्रिज शुरू होने पर सिगनल नजर आता है। उसके परे महाबीर पुरी की बस्ती है; जिसके बारे में मुझे बताया गया कि वह आधी तो रेलवे की जमीन दाब कर अवैध बसी है। टिपिकल यूपोरियन सिण्ड्रॉम!

रेल ब्रिज की तरफ़ मुझे गंगाजी के उथले पानी में मछली पकड़ने के लिये बड़े बड़े पाल डाले दिखे। इससे बहुत कम मेहनत में पकड़ी जाती है मछली। मल्लाहों की इक्का-दुक्का नावे ं भी इधर उधर हलचल कर रही थीं। मल्लाहों की दैनिक गतिविधि में बहुत विविधता है। अनेक प्रकार से वे मछली पकड़ते हैं। नदी के आर पार और धारा के अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकार का परिवहन करते हैं। उनके कार्य का प्रकार भी सीजन के अनुसार बदलता रहता है। इन्ही मल्लाहों की साल भर की गतिविधि पर बहुत रोचक दस्तावेज लिखा जा सकता है। उस देखने-लिखने के काम को भी अपनी विश लिस्ट में जोड़ लिया जाये। 🙂

अगहन का महीना है। इस समय नदी में पानी अधिक नहीं है। दिनों दिन कम भी हो रहा है। पुल के दोनो ओर मुझे ऐसा ही दिखा। बीच में उभरे द्वीप भी नजर आये। फाफामऊ की ओर दायीं ओर अधिक नावें, अधिक घाट, अधिक चौकियां दिखीं। फाफामऊ की ओर कछारी सब्जी की खेती भी दिखी। उनकी रखवाली को मड़ईयां भी थीं। कछारी खेतों में कई जगहों पर गोबर की खाद के ढेर थे बिखेरे हुए। सवेरे तो नहीं देखा, पर दिन में आते जाते दिखा कि फाफामऊ की ओर, महाबीर पुरी के सामने गंगापार लोग ट्रेक्टर से या पैदल भी अर्थियां भी ले जा कर गंगा किनारे दाह संस्कार कर रहे थे। अर्थात इलाहाबाद की ओर रसूलाबाद का श्मशान घाट है और दूसरी ओर यह महाबीर पुरी के अपोजिट वाला दाह स्थल। उसका नाम भी पता करना शेष है।

आधे रास्ते पुल पर चला था कि फाफामऊ की ओर से एक ट्रेन आती हुयी दिखी। दस डिब्बे की पैसेंजर ट्रेन। इस मार्ग पर मुख्य यातायात सवारी गाड़ियों का ही है। महीने में पच्चीस-तीस माल गाड़ियां – औसत एक मालगाड़ी प्रतिदिन गुजरती है इस मार्ग पर।

दो सज्जन फाफामऊ के छोर पर पुल पर दिखे| सिंथेटिक चटाई बिछाकर सूर्योदय निहारते ध्यान लगाने का अभ्यास करते। वे वास्तविक साधक कम विज्ञापनी छटा अधिक दे रहे थे। उनके नाइक-एडीडास छाप जूते किनारे पर थे। एक सज्जन अधिक चकर पकर ताक रहे थे। बीच में उन्होने अपने बालों पर कंघी भी फेरी। ध्यान लगाते हुये भी आने जाने वालों को दिखने वाले अपनी छवि के बारे में जागरूक थे वे।

फाफामऊ छोर पर पुल के शुरू में एक छोटा बन्दर किसी की बिखेरी लाई खाने में व्यस्त था। मेरे फोटो लेने से कुछ सशंकित हुआ। पर सतर्कता बरतते हुये भी लाई खाना जारी रखा। उसके आगे पुल के अन्त की सड़क पर एक दूसरा बड़ा बन्दर भी दिखा। मुझे लगा कि कहीं वह मेरी ओर न झपटे। पर वह रेलिंग से कूदा और तेज कदमों से पुल पार कर दूसरी ओर चला गया। मेरा वाहन कर्जन पुल के बन्द गेट के बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैने समय देखा – सवेरे के 7:35 बजे। मुझे आराम से चित्र लेते हुये पुल पार करने में 33 मिनट लगे थे। इस दौरान पुल पर पांच मोटर साइकलें और एक मॉपेड गुजरे थे। लगभग 5 मिनट में एक दुपहिया वाहन। साइकल वाला कोई नहीं था।

कुल मिला कर यातायात नगण्य़ है कर्जन पुल पर। फिर भी (या इस कारण से) इतिहास के साथ आधा घण्टा गुजारना, साथ चलना अच्छा लगा मुझे। उसका कुछ अंश शायद आप को भी लगे।

मैने जो चित्र लिये, उनका एक स्लाइड-शो नीचे लगा रहा हूं, कैप्शन्स के साथ।

——————–

[1] कालान्तर में अम्माजी को न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गयी और वे वहीं अस्पताल में आई.सी.यू. में भर्ती हैं 20 नवम्बर से।

——————-

This slideshow requires JavaScript.

Advertisements

3 thoughts on “कर्जन ब्रिज से गंगा पार, पैदल

  1. इस पुल के आसपास हम रहे चार साल। आते-जाते भी रहे इसपर से। 1983 में भारत दर्शन साइकिल यात्रा की शुरुआत से पहले इसी पुल से होते हुये प्रतापगढ़ तक गये और वापस आये थे। तीन महीने का भारत दर्शन करके इसी पुल के पास फ़ाफ़ामऊ लेने आये थे दोस्त लोग।

    और भी न जाने कितनी यादें जुड़ी हैं इस पुल से। आपका ‘ब्रिजलॉग’ बांचकर मन खुश हुआ।

    आपको याद हो तो कभी इस ब्लॉग के लेखक GD कभी लिखा कहा करते थे कि अंग्रेजी में अभिव्यक्त करना उनके लिये सहजतर है।

    हमारा मानना था कि अपनी भाषा आप खोज लेंगे।

    आज का आपका लेख बांचकर वह सब याद आ गया। बाकी त जो है सो है ही।

    Like

  2. एक एक पल का ब्यौरा विस्तार से लिखा है आपने, लगा कि जैसे हम ३३ मिनिट आपके साथ उधर पुल पर ही थे ।

    Like

आपकी टिप्पणी के लिये खांचा:

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s