कुछ (नये) लोग

सवेरे अपने डिब्बे से बाहर यह दृष्य दिखा।

सवेरे अपने डिब्बे से बाहर यह दृष्य दिखा।

कल शनिवार 14 दिसम्बर को मैं वाराणसी में था। सवेरे स्टेशन पर अपने डिब्बे के बाहर दृष्य साफ़ था। कोई कोहरा नहीं। सूरज निकल चुके थे। स्टेशन पर गतिविधियां सामान्य थीं। कबूतर दाना बीन रहे थे। अभी उनके लिये यहां बैठने घूमने का स्पेस था। दिन में ट्रेनों की आवाजाही और यात्रियों की अधिकता के बीच उनके लिये जगह ही न बची पायी मैने।

दिन में वाराणसी में जितना भी पैदल या वाहन से चला सड़कों पर; उसमें पाया कि अव्यवस्था पहले से ज्यादा है और लोग पहले से अधिक, पहले से ज्यादा बेतरतीब। बाबा विश्वनाथ की नगरी उनके त्रिशूल पर टिकी है और उन्ही के कानून कायदे से चल पा रही है। अर्बनाइजेशन के सारे सिद्धान्त यहां फ़ेल हैं। 🙂

वाराणसी जंक्शन स्टेशन।

वाराणसी जंक्शन स्टेशन।

निधि की बनायी स्पेशल बेक्ड पावभाजी की तरकारी। अभी इसका नामकरण नहीं हुआ।

निधि की बनायी स्पेशल बेक्ड पावभाजी की तरकारी। अभी इसका नामकरण नहीं हुआ।

सवेरे नाश्ते पर मेरे छोटे साले साहब – विकास दुबे ने आमन्त्रित किया था। उनकी पत्नी, निधि की रसोई में जादू है। मेरे ख्याल से मास्टर शेफ़-ओफ़ की प्रतियोगिता में वे बड़ी आसानी से मैदान मार सकती हैं। पता नहीं कि उस दिशा में उन्होने प्रयत्न किया या नहीं, पर एक कोशिश तो होनी ही चाहिये। उन्होने एक सामान्य नाश्ते के अनुष्ठान को इतनी ऊंचाई पर पंहुचा दिया मानो पांच सितारा होटेल में फाइव-कोर्स नाश्ता हो। … एक पाव-भाजी के साथ वाली सब्जी में भी बेक्ड वेजिटेबुल का अनूठा प्रयोग था। लाजवाब पोहा, गाजर का हलवा …

सिद्धार्थ (बायें) और बलबीर जी।

सिद्धार्थ (बायें) और बलबीर जी।

विकास के दो मित्र मिलने आये – सिद्धार्थ सिंह और बलबीर सिंह बग्गा। दोनो फेसबुक पर सक्रिय हैं। सिद्धार्थ जी तो मेरे स्टेटस और मेरी ब्लॉग पोस्टें रुचि से पढ़ते हैं, ऐसा उन्होने बताया। सही भी लगा – वे मेरे बारे में बहुत जानकारी रखते हैं – जो इण्टरनेट पर उपलब्ध है। सिद्धार्थ जी से मिल कर प्रसन्नता और आत्म संतोष की अनुभूति हुयी जो एक ब्लॉगर को आजकल की कम टिप्पणी के समय में यदा-कदा ही होती है। लगता है, ब्लॉग देखने पढ़ने वालों की संख्या और नियमित पढ़ने वालों की संख्या कम नहीं है। शायद बढ़ भी रही है। यह जरूर है कि इण्टरेक्शन फेसबुक/ट्विटर के माध्यम से अधिक है। बलबीर सिंह जी भी गर्मजोशी की ऊर्जा से भरपूर लगे। कभी कभी इस प्रकार से मिलना ताजगी दे जाता है। इसके लिये विकास, निधि, सिद्धार्थ और बग्गा जी को बहुत धन्यवाद।

शैलेश-रूपेश के लाये कीनू।

शैलेश-रूपेश के लाये कीनू।

दोपहर में शैलेश और रूपेश जी से मुलाकात हुई। दोनो सज्जन आजकल भाजपा की आई.टी. सेल का उत्तरप्रदेश का काम संभाल रहे हैं और उनसे बात कर लगा कि पारम्परिक राजनीति करने वाले पुरनिया छाप लोगों को छकाने के लिये खूब खुराफ़ात करते रहते हैं। मुझे फिक्र है कि ओल्ड-स्टाइल जिला-कस्बा स्तर का नेता कभी इन्हे अकेले में धुन न दे! 🙂

ये कीनू ले कर आये थे जिसमें से कई खाये गये (ज्यादा मैने खाये!)। दो मेरे घर तक भी पंहुच गये। इन्होने मुझे बाटी-चोखा समारोह में आने के लिये भी कहा – जो कभी न कभी होगा जरूर – वहीं वाराणसी/काशी/अस्सी के आसपास!

ऐसी मुलाकातें कुछ कुछ अन्तराल पर होती रहें!

नाश्ते के बाद निधि द्वारा फल का आग्रह।

नाश्ते के बाद निधि द्वारा फल का आग्रह।


हम लोगों से क्यों मिलते हैं?

कभी समय होता है और हम एकांत चाहते हैं। कभी समय होता है जब हम पुस्तकों का सानिध्य तलाशते हैं। कभी समय होता है, जब हम लोगों से मिलना चाहते हैं। 

पहले का याद नहीं आता। पर अब लगता है कि मैं स्थानों को देखना चाहता हूं, या लोगों से मिलना चाहता हूं; वह मुख्यत इस कारण से है कि मैं स्थानों या लोगों के बारे में लिख या कह सकूं। मजे की बात है कि कई बार लिखने या कहने में शब्दों की इनएडेक्वेसी भी नजर आती है मुझे। और तब मैं पुस्तकों/शब्दकोष/थेसॉरस का सानिध्य लेना चाहता हूं। ऐसे में ट्रेवलॉग्स बहुत काम के लगते हैं मुझे। सो पुस्तकों में भी ट्रेवलॉग्स का पठन बढ़ता गया है उत्तरोत्तर।

मैं देखना चाहता हूं, मैं मिलना चाहता हूं, मैं वर्णन करना चाहता हूं। मैं – एक आम आदमी। जिसके पास देखने की इनेएडेक्वेसी है। जिसका अटेंशन स्पान संकुचित है। जिसके पास रिटेण्टिविटी की इनएडेक्वेसी है – जिसको सही नोट्स लेना/संजोना नहीं आता। जिसके पास शब्दों की इनएडेक्वेसी है। जो भेडियाधसान शब्द तलाशता-बनाता है। … मजे की बात है कि वह भी ब्लॉग और सोशल मीडिया के युग में मिलने-देखने और एक्स्प्रेस करने की लग्ज़री ले पा रहा है! 

यह रोचक है। बहुत ही रोचक! 

मैं निधि दूबे के लंच और शैलेश पांड़े के बाटी-चोखा की सोचने लगता हूं। मैं लोगों से मिलना चाहता हूं।

शाम कामायनी एक्स्प्रेस से लौटानी में बनारस से निकलने पर दिखा सूर्यास्त का दृष्य।

शाम कामायनी एक्स्प्रेस से लौटानी में बनारस से निकलने पर दिखा सूर्यास्त का दृष्य।


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4 thoughts on “कुछ (नये) लोग

  1. ‘मैं लोगों से मिलना चाहता हूँ ।’ यह हुआ इस आत्मीय लेख का भरत-वाक्य और एक स्वयं-घोषित अंतर्मुखी की छलकती आत्मस्वीकारोक्ति । अंतर्मुखी व्यक्ति में मिलने की चाह जागे तो यह मनुष्यता का विस्तार है । कि यह जीवन अब भी सुंदर और जीने लायक बना हुआ है। अत्यन्त शुभ लक्षण !

    वैसे कलकत्ता आए बहुत दिन हो गए हैं ।

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