रेल इंस्पेक्शन स्पेशल


निरीक्षण स्पेशल का ब्रेकवान - गार्ड साहब का डिब्बा।
निरीक्षण स्पेशल का ब्रेकवान – गार्ड साहब का डिब्बा।

परसों 21 फरवरी को मैं गोण्डा-लखनऊ खण्ड में निरीक्षण के लिये बने दल में बतौर परिचालन विभाग के विभागाध्यक्ष, शामिल था। इस क्षेत्र से परिचय का मेरा पहला मौका।

श्री के के अटल, महाप्रबन्धक, पूर्वोत्तर रेलवे ने दस दिन पहले मुझसे कहा था कि 20 तारीख तक पूर्वोत्तर रेलवे पर अपना पदभार संभाल लूं, जिससे कि इस निरीक्षण में शामिल होने से अन्य विभागाध्यक्षों से मेरा परिचय भी हो जायेगा और वातावरण का अहसास भी। इसको ध्यान में रख कर मैं दो दिन पहले ही गोरखपुर आ गया और इस निरीक्षण में शामिल हो पाया।

परसों सवेरे साढ़े छ बजे रेस्ट हाउस से निकला। निरीक्षण की ट्रेन तैयार थी और लगभग नियत समय पर चली। कुल 14 डिब्बों की गाड़ी। इसमें एक छोर पर इंस्पेक्शन कार (जिसमें चेयर कार की तरह बैठने की सीटें होती हैं और अंत में एक तरफ शीशे की बड़ी खिडकी होती है जिससे बैठे अधिकारी पीछे की रेल पटरियों का चलते हुये निरीक्षण कर सकें) और दूसरी छोर पर ब्रेकवान लगा होता है।

गाड़ी गोरखपुर से गोण्डा तक बिना रुके चली। गोरखपुर से निकलते समय कोहरा था, जो काफी समय तक साथ रहा। डेढ़ घण्टे बाद जब ठीक से दिखने लगा सूरज की रोशनी में, तो मैने पाया कि ट्रैक के साथ साथ समतल भूमि पर खेत थे, पानी पर्याप्त था। खेत हरे भरे थे। गन्ने की फसल परिपक्व थी – कटने की तैयारी में। सरसों के फूल पीले थे। मोहक! उसके अलावा गेंहूं के पौधे हरी चादर के रूप में थे। तीनों फसलें लगभग बराबर बराबर।

गन्ने की फसल तैयार है और कट रही है। यह ट्रॉली गन्ने से लदी जाती देखी मैने गोण्डा के पास।
गन्ने की फसल तैयार है और कट रही है। यह ट्रॉली गन्ने से लदी जाती देखी मैने गोण्डा के पास।

मेरे साथ रेल डिब्बे में श्री अरविन्द कुमार थे – मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक। वे बता रहे थे कि कैसे उन्होने ई-मेल के माध्यम से कागज के प्रयोग में कटौती की है और सम्प्रेषण/निर्णय की प्रक्रिया त्वरित की है। मैं उन्हे अपने सोशल मीडिया और ब्लॉग के प्रयोगों के बारे में बता रहा था। उनके पास सम्प्रेषणीय कनेक्टिविटी के, और उस कनेक्टिविटी से अपने विभागीय कार्य में दक्षता बढ़ाने के कई विचार हैं। उन्हे केवल तकनीकी प्रयोग और पॉसिबिलिटीज़ का सम्पुट मिलना चाहिये। हम दोनो ने पाया कि तकनीकी पक्ष पर एक पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन ऑर्गेनाइज कर आपस में ब्रेन-स्टॉर्मिन्ग होनी चाहिये।

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गोण्डा में बैण्ड से स्वागत।
गोण्डा में बैण्ड से स्वागत।

गोण्डा में लखनऊ रेल मण्डल के अधिकारी मिले। महाप्रबन्धक महोदय का आरपीएफ बैण्ड ने स्वागत किया और वर्दीधारी कर्मियों ने गार्ड-ऑफ ऑनर दिया। उसके बाद निरीक्षण प्रारम्भ हुआ। महाप्रबन्धक महोदय ने क्र्यू लॉबी में चालकों और सहायक चालकों से आमने सामने बातचीत कर उनकी समस्यायें सुनीं। उनका विचार था कि लोको पाइलट/सहायक को पर्याप्त निर्धारित रेस्ट और मांगने पर छुट्टी मिल जानी चाहिये। श्री अटल, मैकेनिकल इंजीनियरिंग के अफसर हैं और अपनी विभागीय पोस्टिंग्स में ट्रेन चालकों इस केटेगरी के साथ काफी इण्टरेक्ट किया होगा। अत: उनकी जरूरतों और समस्याओं के प्रति उनका सहृदय होना समझ आता है। पर उन्हे मैने अन्य स्ट्रीम के लोगों के प्रति भी तर्कसंगत और सहृदय पाया।

 एक सहायक चालक से बतियाते श्री अटल, महाप्रबंधक
एक सहायक चालक से बतियाते श्री अटल, महाप्रबंधक

शीर्ष नेतृत्व में सभी के प्रति समभाव और दक्षता का सम्मान एक महत्वपूर्ण गुण है। कर्मचारी और अन्याधीनस्थ यह सूंघते-भांपते रहते हैं और नेतृत्व के प्रति इसी आधार पर अपनी राय कायम करते हैं। रेलवे के डिपार्टमेण्टल तरीके से बंटे होने का यही तोड़ है कि शीर्ष नेतृत्व सभी को उनके संकीर्ण विभागीय लक्ष्यों के टकराव से ऊपर खींचते हुये समदर्शिता बनाये रखे। खैर, मेरा यह पोस्ट रेलवे की आन्तरिक संरचना पर प्रकाश डालने के लिये नहीं है। वह लिखने का अभी समय नहीं आया! 😆

 गोण्डा के पास लेवल क्रासिंग गेट पर टोपी पहने गेटमेन
गोण्डा के पास लेवल क्रासिंग गेट पर टोपी पहने गेटमेन

गोण्डा स्टेशन निरीक्षण के आगे निर्धारित लेवल क्रासिंग गेट – मानव रहित और मानव सहित, दोनो प्रकार के; ट्रैक की गोलाई, पुल आदि के निरीक्षण किये गये। मानव सहित रेलवे लेवल क्रॉसिंग गेट पर गेट मैन टोपी पहने थे। वह मुझे बेहद आकर्षक लगी। सामान्यत: गेटमैन लाल फेंटा या साफ़ा बांधे रहते हैं। यहां उनकी टोपी नेपाली टाइप थी। शायद नेपाल नजदीक होने का असर हो। उनके औजार चमकदार और साफ़ सुथरे थे। वे तानव में लग रहे थे, पर सवालों के जवाब सही सही दिये। लेवल क्रासिंग गेट आकर्षक था और ईनाम का हकदार भी।

समपार फाटक पर रेलवे गेटमैन के औजार
समपार फाटक पर रेलवे गेटमैन के औजार
मानव रहित गेट पर निरीक्षण देखती तमाशबीन भीड़।
मानव रहित गेट पर निरीक्षण देखती तमाशबीन भीड़।

मानव रहित लेवल क्रासिंग भी हेक्सागोनल टाइल्स लगा होने के कारण सतह से समतल था। दोनो ओर सड़क ढलान पर थी और इस जगह पर लेवल क्रासिंग हटा कर लिमिटेड हाइट सब-वे बनायी जा सकती है जो सड़क और रेल यातायात दोनो के लिये फायदेमन्द है। भविष्य में शायद ऐसा करने की योजना भी हो।

आगे एक बड़े पुल के निरीक्षण का कार्यक्रम था। घाघरा नदी पर 61मीटर 17 स्पान का एक पुराना पुल है, जिसपर सिंगल लाइन के जमाने से रेल जाती रही है। उसी के बराबर एक दूसरा पुल भी बनाया गया है रेल दोहरीकरण के काम में। दोनो पुल लगभग बराबर हैं और पास पास भी।


पुल पार  कर इंस्पेक्शन स्पेशल रुकी तो बहुत से अधिकारी-कर्मचारी इस स्थान के चित्र लेने लगे। मोबाइल और टेबलेट्स ने बहुत से आशु-फोटोग्राफर बना दिये हैं पिछले कुछ वर्षों में। उनकी दक्षता और उनका अनाड़ीत्व देखते ही बनता है। … मैने अनुमान लगाया कि अगर एक किलोबाइट एक किलोग्राम वजन बराबर हो, तो जितने चित्र इस निरीक्षण में खींचे जा रहे हैं, वे शायद एक मालगाड़ी (3500टन) के बराबर हों – या उससे भी ज्यादा!


घाघरा नदी पर पुराना पुल
घाघरा नदी पर पुराना पुल

घाघरा का पाट काफी चौडा है। गंगा जितना नहीं, पर नदी बड़ी और आकर्षक है। बताया गया कि इस साल बाढ़ में काफी पानी था। फिर भी, कछार एक विशालकाय पाकड़ का वृक्ष मुझे सही सलामत दिखा। इतना बड़ा पेड़ तो लगभग सौ साल का होगा। न जाने कितनी बड़ी बड़ी बाढ़ झेली होंगी उसने।

घाघरा कछार में बड़ा पाकड़ का वृक्ष
घाघरा कछार में बड़ा पाकड़ का वृक्ष
घाघराघाट स्टेशन का बाहरी दृष्य
घाघराघाट स्टेशन का बाहरी दृष्य

पाकड़ – छिउल(पलाश), बरगद, पीपल, गूलर, आम और शमी की तरह का पवित्र वृक्ष एक हिन्दू के लिये। उस बड़े पाकड़ को देख मन हुआ कहने को – पाकड़ायै नम:! घाघराघाट-चौकाघाट के घाघरा दर्शन/निरीक्षण के बाद निरीक्षण स्पेशल लखनऊ तक लगभग बिना रुके आयी। गोमतीनगर में कुछ समय रुकी। यह स्टेशन नया बना है। निकट भविष्य में शायद यहां कुछ ट्रेने रुकने भी लगें। इसके आसपास की जमीन की कीमत यहां रुकने वाली ट्रेनों के समानुपाती वृद्धि करेगी – या शायद उसके वर्ग के अनुपात में! 🙂

मैं जानता हूं कि निरीक्षण के बारे में मैने बहुत कुछ नहीं लिखा है। पर जो भी ऊपर है, उससे आपको कुछ अन्दाज तो हो ही जायेगा। वही ध्येय है!


निरीक्षण (नियमित और आकस्मिक दोनो प्रकार के) करने और उसके माध्यम से नियंत्रण करने, काम करने की रेलवे की पुरानी परम्परा रही है। वह उपयोगी है, या नहीं, इसपर बहस होती रहती है। अन्य संस्थानों की बजाय रेलवे का तंत्र बहुत व्यापक है और पिरामिड बहुत स्टीप (Steep) है। अत: अन्य संस्थानों की बजाय कार्यप्रणाली में अंतर तो होंगे ही। पर निरीक्षणों के स्वरूप में बदलाव पर चर्चा तो चल ही सकती है। चलेगी ही।


निरीक्षण समाप्ति पर परमानेण्ट वे सुपरवाइजर के रजिस्टर समेट ले जाता ट्रॉलीमैन।
निरीक्षण समाप्ति पर परमानेण्ट वे सुपरवाइजर के रजिस्टर समेट ले जाता ट्रॉलीमैन।
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क्या कहूं?


प्रियंकर कहते हैं, मैं कवि हृदय हूं; भले ही कितना अपने आप को छिपाने का प्रयास करूं। मैं सहमत होने का जोखिम नहीं लूंगा। ढेर सारे कवियों की कवितायें सुनने और उन्हे एप्रीशियेट करने का बर्डन उसमें निहित है। दूसरे यह निश्चित है कि वे समझ में नहीं आतीं।

प्लेन/सिंपल सेण्टिमेण्टालिटी समझ में आती है। पर कवियों का शब्दों से खेलना समझ नहीं आता। दूसरे; कविता के अवगुण्ठन में अपना अतिसाधारणपन छिपाना तो और भी खलता है।

कविता, फोटोग्राफी और यायावरी – अभिव्यक्ति के माध्यमों के तकनीकी विकास के कारण सतही बनते जा रहे हैं। लोग शब्दों, चित्रों और पर्यटन से ज्यादा से ज्यादा खेलने लगे हैं। उनमें गुणवत्ता की ऐसीतैसियत साफ़ झलकने लगी है।


कल गोरखपुर में पहला दिन था। जगह साफ़ सुथरी लगी। मौसम भी (अपेक्षाकृत) खुला था। सवेरे कुछ कोहरा था पर दिन में साफ़ आसमान के साथ धूप थी। पर थकान थी और नये स्थान पर अकेले आने में उदासी भी।

पत्नीजी, जैसी भी हों भला हो (ऑन रिकार्ड, वह मुझसे कहीं बेहतर इन्सान हैं और ज्यादा जिम्मेदार भी), एक उम्र के बाद उनके बिना काम चलता नहीं। वह उम्र हो गयी है मेरी… हर दस मिनट में फोन करने की नौबत आ रही है – वह फलानी चीज कहां पैक की है तुमने? मिल नहीं रही मुझे। कभी मन होता है कि उनका फोन मिला कर कहूं कि राममिलन को फोन पर पोहा बनाने की रेसिपी बता दें कि उसमें हल्दी, नमक के अलावा और क्या/कितना मिलाना है!

एक उम्र के बाद आदमी का तबादला नहीं ही होना चाहिये!

….

कल शाम को समधी जी फोन कर हाल-चाल पूछे। उन्हे पहले नहीं मालुम था कि मेरा तबादला हो रहा है। बोले – भईया यह तबादला हुआ कैसे और किसने किया? यह बताने पर कि फाइल तो मन्त्री जी तक जाती है, बोले अरे, रुकवाने के लिये वे कुछ बोलते। बताया होता तो। सांसद समधी होने में यही पेंच है। लूप में रहना चाहते हैं! यद्यपि न उन्होने मेरे काम धाम में बेफालतू सलाह दी है और न मैने उनसे राजनीति डिस्कस की है। हम दोनो के क्षेत्र अलग हैं। प्रवृत्तियां अलग और एक्स्पर्टीज़ अलग। भगवान ने हम दोनो को कैसे और क्यों जोड़ा यह भगवान जी ही बता सकते हैं। बाकी, हम दोनो में समीकरण ठीकैठाक है और आत्मीय। भगवान उन्हें आगे मन्त्री बनायें तो उनके थिंक-टैंक में जुड़ने की सोच सकता हूं! 😆


सवेरे के साढ़े आठ बज गये। रात में कोहरा था। सूरज चटक उग रहे हैं पर पत्तियों से कोहरे की बूंदें अभी सूखी नहीं! Feb20 1413

जात हई, कछार। जात हई गंगामाई!


जात हई, कछार। जात हई गंगामाई।

जा रहा हूं कछार। जा रहा हूं गंगामाई!

आज स्थानान्तरण पर जाने के पहले अन्तिम दिन था सवेरे गंगा किनारे जाने का। रात में निकलूंगा चौरी चौरा एक्स्प्रेस से गोरखपुर के लिये। अकेला ही सैर पर गया था – पत्नीजी घर के काम में व्यस्त थीं।

DSC_0060कछार वैसे ही मिला, स्नेह से। गंगा माई ज्यादा बोलती नहीं हैं। उन्हे सुनने के लिये कान लगाने पड़ते हैं। धीरे धीरे बह रही थीं। सूर्य चटक उगे थे। साफ सुबह। ज्यादा सर्दी नहीं। हल्की बयार। स्नानार्थी कम थे। नावें भी कम। कोई धारा में नहीं – किनारे बंधी थीं। कल्लू की मड़ई के पीछे सूर्योदय भव्य था। कोई था नहीं मड़ई में।IMG-1392686520916-V

मैने गंगाजी और कछार के कुछ चित्र लिये। कछार ने एक छोटे मोथा के पौधे का भी सूर्योदय में चित्र लेने को कहा। वह भी लिया। वनस्पति धीरे धीरे बढ़ रही है। जब झाड़ियां बन जायेंगी, तब उनका चित्र लेने जाने कौन आयेगा यहां! शायद कभी कभी मेरी पत्नीजी घूमें उनके बीच। DSC_0062

वहां अपना भी अन्तिम चित्र लेना चाहता था। पत्नीजी नहीं थीं, सो सेल्फी (Selfie) ही लेना पड़ा।Feb14.0976

वापसी जल्दी ही की। आज घर में काफी काम निपटाने हैं इलाहाबाद से प्रस्थान पूर्व। बार बार मुड़ मुड़ कर गंगाजी और सूर्योदय देखता रहा। आखिरी बार आंखों में जितना भर सकूं, उतना समेटने के लिये!

करार पर दिखा दूर बैठा जवाहिर। उसके पास जाने के लिये नाले और कचरे को पार करना पड़ा। कऊड़ा जला रहा था, अकेले। एक हाथ में मुखारी थी। पास में बीड़ी का बंडल और माचिस। शॉल नया और अच्छा था उसके पास। उसे बताया कि अब यहां से तबादले पर जा रहा हूं। पता नहीं, उसने किस भाव से लिया मेरा कहना। जवाहिर ज्यादा कहता नहीं।Feb14.0977

अपनी चौकी पर पण्डा थे। उन्हे भी बताया यहां से जाने के बारे में। उन्होने कन्सर्न जताया कि मेरा परिवार अकेले रहेगा यहां। इस जगह के अन्य लोगों को आगे पण्डाजी बता ही देंगे मेरे जाने के बारे में! Feb14.0980

मलिन अपनी जगह बैठी नहीं थी कोटेश्वर महादेव के फर्श पर। उसका सामान रखा था। उसी का चित्र ले लिया याद के लिये।Feb14.0981

भगवान कोटेश्वर महादेव और हनुमान जी को प्रणाम करते हुये घर लौटा।

बहुत लम्बा समय गंगामाई और कछार की गोद में बीता। भूल नहीं सकता। अब तो वह मेरे मन-शरीर-प्राण का अंग है।

जा रहा हूं कछार, जा रहा हूं गंगा माई। पर जाना कहां? अन्तत तो आपकी ही गोदी में ही रहना, जीना है। इस दुनियां से जाना भी आपकी गोदी से होगा!Feb14.0974

“मेरा कौन पढ़ेगा” : गौरव श्रीवास्तव से मुलाकात


गौरव का फ़ेसबुक स्नैपशॉट
गौरव का फ़ेसबुक स्नैपशॉट

गौरव श्रीवास्तव पढ़ाकू जीव हैं। मोतीलाल नेहरू टेक्नॉलॉजी संस्थान के डॉक्टरेट के रिसर्च स्कॉलर। संकोची व्यक्ति। वे इस ब्लॉग के नियमित पाठक हैं। यहीं पास में उनका कार्य क्षेत्र है – मेरे घर से डेढ़ किलोमीटर दूर। पर मुझसे कभी मिले नहीं। जब उन्हे पता चला कि मैं यहां से गोरखपुर स्थानान्तरण पर जा रहा हूं तो वे मेरे जाने के पहले मुझसे मिलने की ठान लिये। फेसबुक पर उन्होने मुझसे सम्पर्क किया। मैसेज के आदान-प्रदान में फोन नम्बर भी लिये-दिये और शनिवार 15 फरवरी को जद्दोजहद से मेरे घर को तलाश कर मेरे पास थे। हम लोग करीब डेढ़ घण्टा साथ रहे।

गौरव श्रीवास्तव, मेरी पत्नीजी रीता पाण्डेय के साथ
गौरव श्रीवास्तव, मेरी पत्नीजी रीता पाण्डेय के साथ

“मेरा कौन पढ़ेगा” कहने वाले बहुत से लोग होंगे। पर सोशल मीडिया के माध्यम से अभिव्यक्ति का जो विस्फोट हम देख रहे हैं, उसमें हम सामान्यजन अपने जीवन में जो भी सामान्यता-असमान्यता से मुखातिब हैं, उससे परिचय पाने को बहुत से लोग उत्सुक होंगे और बहुत से लालायित भी। …इसलिये  “मेरा कौन पढ़ेगा” सार्थक  सही कथन नहीं…


मेरे लिये यह बहुत खुशी का विषय था कि वे मुझसे मिलने आये। हिन्दी ब्लॉगिंग और फ़ेसबुक/ट्विटर की उपस्थिति के कारण लगभग लगभग 15-20 व्यक्ति शिवकुटी में मेरे इस घर में; जिसको ढूंढने के लिये पर्याप्त भटकना पड़ता है – सड़क गली मुहल्ले को बहुधा लोग कन्फ्यूज कर गलत जगह बता देते हैं; मिलने आ चुके हैं। यह एक प्रकार से सोशल मीडिया की सशक्तता का प्रमाण है।

गौरव मुझसे ही मिलने आये हों, ऐसा नहीं है। वे उड़न तश्तरी (समीर लाल) से टोरन्टो जा कर मिल चुके हैं। समीर लाल तो उनसे मिलने के लिये काफी यात्रा कर आये। अनूप शुक्ल से उनकी बहुधा लम्बी बातचीत हुआ करती है। गौरव को यह मलाल है कि अनूप मोतीलाल इन्स्टीट्यूट में एल्यूमिनी मीट में आये थे, पर यहां होते हुये भी वे उनसे नहीं मिल पाये। अनूप उनको उनके पारिवारिक जीवन में भी एक बड़े और सीनियर के रूप में सलाह देते रहते हैं – गौरव ने मुझे यह बताया। और अनूप का यह रोल मुझे बहुत अच्छा लगा। उन्ही की तर्ज पर मैने भी गौरव से कुछ कहा। मुझे लगता है एक पीढ़ी ब्लॉग और सोशल मीडिया के माध्यम से हम में रोल मॉडल्स खोजती-तलाशती है; अगर हम उस रोल-मॉडलत्व को ईमानदारी से अंश मात्र भी निभा पाते हैं तो अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन हुआ वह!

मेरा ब्लॉग गौरव बहुत अर्से से पढ़ते रहे हैं। उन्होने कई पोस्टों और कई पात्रों का जिक्र किया मेरे ब्लॉग की। मेरे कई कथ्यों/टिप्पणियों से परिचय है उनका। वे ऐसे पाठक हैं, जिनपर कोई भी ब्लॉगर गर्व कर सकता है। गौरव अर्से से – कई वर्षों से – मुझसे मिलना चाहते थे; ऐसा मुझे बताया उन्होने।

गौरव प्रशान्त प्रियदर्शी, नीरज रोहिल्ला और अभिषेक ओझा के ब्लॉग भी सतत पढते हैं और इन लोगों के व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ जानते हैं। उनके लेखन से बहुत प्रभावित भी हैं। मैने गौरव से पूछा – वे खुद क्यौं नहीं लिखते? गौरव ने उत्तर दिया – मेरा कौन पढ़ेगा?!

“मेरा कौन पढ़ेगा” कहने वाले बहुत से लोग होंगे। पर सोशल मीडिया के माध्यम से अभिव्यक्ति का जो विस्फोट हम देख रहे हैं, उसमें हम सामान्यजन अपने जीवन में जो भी सामान्यता-असमान्यता से मुखातिब हैं, उससे परिचय पाने को बहुत से लोग उत्सुक होंगे और बहुत से लालायित भी। मसलन गौरव अपने कैरियर बनाने के लिये जिस जद्दोजहद से गुजरे या गुजर रहे हैं और अपने परिवार के साथ जिस सेण्टीमेण्टालिटी के साथ जुड़े हैं, वह जानने और उस पर गहन चर्चा करने को एक पूरी पीढ़ी तैयार बैठी है। उसपर चेतन भगत छाप कालजयी उपन्यास ठेलने में लगे हैं। गौरव कई लोगों के लिये प्रेरणा बन सकते हैं और कई लोगों के रोल मॉडल। इसलिये  “मेरा कौन पढ़ेगा” सार्थक सही कथन नहीं…

गौरव के पिताजी यहीं जी.आई.सी. में रसायन शास्त्र के व्याख्याता थे। अब रिटायर्ड हैं। उनके बड़े और छोटे भाई नौकरी में हैं। वे अपनी डॉक्टरेट की रिसर्च पूरा कर रहे हैं। मध्यवर्गीय परिवार अपनी सफलताओं और जद्दोजहद पर चढ़ता-उतरता-रमता रहा है। बड़ी सरलता से, बड़ी स्पष्टता से गौरव ने उन सब के बारे में बताया। पता नहीं गौरव यह जानते हैं या नहीं, वे संकोची और सेण्टीमेण्टल होने के बावजूद (या साथ साथ) अपने को अभिव्यक्त करने में दक्ष हैं। भविष्य में उन्हे अपनी इस दक्षता को और परिमार्जित भी करना चाहिये और दोहन भी।

उनके चलते हुये मेरी पत्नीजी ने उनसे कहा कि वे तो इलाहाबाद में रहेंगी ही – भले ही मैं गोरखपुर में रहूं। गौरव कभी भी घर आ सकते हैं।

अच्छा लगा हम लोगों को गौरव के साथ। स्वागत और शुभकामनायें गौरव!

गौरव श्रीवास्तव। हमारे ड्राइंग रूम में।
गौरव श्रीवास्तव। हमारे ड्राइंग रूम में।

गोरखपुर को प्रस्थान?


सन 2003 के अक्तूबर से लगभग पौने दो साल मैने गोरखपुर में गुजारा था। वहां की कुछ स्मृतियां हैं। रेलवे कालोनी, मोहद्दीपुर में रहते थे हम लोग। घर में लीची और आम के वृक्ष थे। बहुत ज्यादा नहीं घूमा मैं गोरखपुर में और जितना घूमा, उससे कम स्मृतियों में संजोया। एक बार पुन: पूर्वोत्तर उत्तरप्रदेश का वह इलाका देखने और उसके बारे में ब्लॉग पर लिखने का मन था।

इस लिये जब रेलवे के यातायात विभाग के मुखिया श्री देवीप्रसाद पाण्डे ने मुझे वहां पदस्थ करने का प्रस्ताव पिछले महीने किया, तो अपनी बीमार माता, वृद्ध पिता और परिवार की इलाहाबाद में आवश्यकताओं के बावजूद मैने अपनी पत्नीजी से सलाह कर उसे स्वीकार कर लिया।

अब निकट भविष्य में मुझे पूर्वोत्तर रेलवे के परिचालन विभाग का कार्यभार देखना है और मेरा मुख्यालय गोरखपुर होगा।

पूर्वोत्तर रेलवे का नक्शा
पूर्वोत्तर रेलवे का नक्शा

रेलवे के कार्य के अतिरिक्त मेरे पास अवसर होगा तराई का क्षेत्र, गंगा की सहायक नदियां, वाराणसी-गाजीपुर-छपरा-देवरिया-गोरखपुर-बस्ती-गोण्डा-बरेली-उत्तराखण्ड का निचला हिस्सा आदि देखने, समझने और लिखने का।

मेरे मन में कुछ ब्लॉगिंग के प्रॉजेक्ट कुलबुला रहे हैं। रेलवे का काम बहुत समय और ऊर्जा लेगा। निश्चय ही। रेलवे भी मुझे वहां कुछ अपेक्षा में ले कर जा रही होगी। पर व्यक्तिगत तौर पर और क्रियेटिव तौर पर इस अवसर का पूरा उपयोग करना चाहूंगा मैं।