एक विभागीय हिन्दी पत्रिका से अपेक्षा


कुछ दिन पहले यहां पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय में राजभाषा की त्रैमासिक बैठक हुई। बैठक में सामान्य आंकड़ेबाजी/आंकड़े-की-बाजीगरी के अलावा वाणिज्य विभाग के हिन्दी कार्यों की प्रदर्शनी थी। महाप्रबन्धक महोदय ने उसका निरीक्षण किया और ईनाम-ऊनाम भी दिया। रूटीन कार्य। हिन्दी की बैठकें रूटीनेत्तर कम ही होती हैं।

रेल रश्मि। पूर्वोत्तर रेलवे की त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका।  वेबज़ीन/नेट-पत्रिका बननी चाहिये?
रेल रश्मि। पूर्वोत्तर रेलवे की त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका।
वेबज़ीन/नेट-पत्रिका बननी चाहिये?

एक बात हुई। महाप्रबन्धक महोदय ने हिन्दी पत्रिका के स्तरहीनता पर टिप्पणी की। वे छाप-छपाई और गेट-अप की बात कर रहे थे। मुझे लगा कि कितना भी हो, छपी पत्रिका का इम्पैक्ट अब वैसा नहीं रहा। अगर पत्रिका वेब पर आ जाये और उसपर पाठकीय इण्टरेक्शन भी हो सके तो उसकी पठनीयता कई गुणा बढ़ जायेगी। मैने अपना यह विचार व्यक्त भी किया।

पत्रिका के कण्टेण्ट के बारे में भी चर्चा हुई। सपाट कहानी, कविता, हास्य आदि की मंघाराम असॉर्टेड बिस्कुट छाप पत्रिका – जो सामान्यत: होती हैं; पाठक के लिये रोती हैं।  आवश्यकता है कि रेल कर्मियों को उनकी रुचि के अनुसार बांधा जाये। उनके कार्य सम्बन्धी लेखन, विभागीय पत्रकारिता, अंतरविभागीय जानकारी आदि का होना पत्रिका को पुष्ट करेगा बनिस्पत लिक्खाड़ साहित्यकारों की दोयम दर्जे की नकल प्रस्तुत करने के। कई अन्य ने और मैने भी ऐसे विचार रखे। इन विचारों को व्यापक समर्थन मिला हो, बैठक में; वह मैं नहीं कहूंगा। पर विरोध नहीं हुआ।


रेलवे हिन्दी संकाय (?) चिरकुट साहित्य का लॉंचपैड है। भारत की बड़ी आबादी रेलवे का अंग है और वह हिन्दी में अभिव्यक्त होती – करती है। पर उस अभिव्यक्ति को यह संकाय सहारा देता या परिमार्जित करता हो, ऐसा नहीं लगता। यह आंकड़े चर्न करने और हिन्दी सेवा की खुशफहमी अहसासियाता विभाग है। पता नहीं, मुझे मु.रा.धि. बनाते समय मेरी हिन्दी पर इस आशय की पुरानी सोच का किसी को पता है या नहीं – अमूमन मुझे लगता है; कि हिन्दी में मुझे रेलवे के इतर लोग ही देखते-जानते हैं। इस लिये स्थापित हिन्दी के प्रति मेरी उदग्रता रेलवे में ज्ञात न हो, बहुत सम्भव है। पर कुछ समय से रेलवे वृत्त में भी लोग (कर्टसी फेसबुक/ट्विटर) पहचानने लगे हैं। ऐसे में शायद नेट पर रेलवे हिन्दी की उपस्थिति बेहतर बनाने में शायद मैं और (अब होने जा रही) मेरी टीम कुछ कर पाये।

बस मुझे मलाल रहेगा कि हिन्दी एस्टेब्लिशमेण्ट की अब मैं खुल्ला खेल फर्रुक्खाबादी आलोचना नहीं कर पाऊंगा! 😆


महाप्रबन्धक महोदय ने बताया कि आगे आने वाले समय में मुझे मुख्य राजभाषा अधिकारी, पूर्वोत्तर रेलवे का कार्य भी देखना है। अत: मेरे पास अवसर है कि अपने सोचे अनुसार यह वेबज़ीन लॉंच कर सकूं। अपनी बनने वाली टीम को इस विषय में गीयर-अप होने के लिये मैं कहने जा रहा हूं।

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बनारस और मोदी


पच्चीस अप्रेल को बनारस में था मैं।

एक दिन पहले बड़ी रैली थी नरेन्द्र मोदी की। उनका चुनाव पर्चा भरने का रोड शो। सुना और टेलीवीजन पर देखा था कि बनारस की सड़कें पटी पड़ी थीं। रोड शो का दृष्य अभूतपूर्व लग रहा था। इस लिये पच्चीस अप्रेल को उत्सुकता थी वहां का हाल चाल और लोगों का विचार जानने की।

टेक्सी चालक - धनुरधारी।
टेक्सी चालक – धनुरधारी।

सवेरे सवेरे पहले बनारसी से सम्पर्क बना अपने टेक्सी चालक से। नाम था धनुरधारी। यहीं भदोही के चौरीबाजार का रहने वाला। पूछते ही बोला – पचास परसेण्ट में मोदी हैं और बचे पचास में बाकी सब। फिर सोच कर परिवर्तन किया – यह तो कल से पहले की बात थी। कल के बाद तो साठ परसेण्ट मे‍ मोदी और बकिया चालीस में और सब। अजय राय का कुछ बोट होगा। केजरीवाल का नावैं नहीं है।

धनुरधारी के अनुसार भाजपा नहीं है। जो है सो मोदी है।

रास्ते भर जो कुछ धनुरधारी ने कहा; उससे प्रमाणित था कि वे मोदी के फैन हैं।

मोदी का ऑटो पर पोस्टर।
मोदी का ऑटो पर पोस्टर।

एक ऑटो के पीछे मोदी का पोस्टर था। दिल्ली में ऐसे पोस्टर झाड़ू दल के दिखते थे। झाड़ू देखने में उतना सुन्दर नहीं लगता। दिल्ली में झाड़ू लगाने का मौका भी मिला था, पर उसकी सींकें ही बिखर गयीं। पोस्टर में मोदी के दाढ़ी के बाल और कमल का फूल भव्य लग रहे थे। कई होर्डिंग्स में अजय राय नाव पर बैठे – आधे ध्यानमग्न और आधा काईंयां माफिया की छवि प्रस्तुत करते अपने को बनारसी विरासत का लम्बरदार घोषित करते दिखा रहे थे। कहीं कहीं ढेर सारे नेताओं की फोटो युक्त समाजवादी नेता के होर्डिंग थे। धनुरधारी ने बताया कि ये सिर्फ होर्डिंग भर में ही हैं। समाजवादी का होर्डिंग सन 1995 के जमाने के होर्डिंग जैसा पुरनिया डिजाइन का था।

नारियल-चुनरी के दुकानदार। दुर्गाकुण्ड पर।
नारियल-चुनरी के दुकानदार। दुर्गाकुण्ड पर।

दुर्गा कुण्ड के पास नारियल चुनरी बेचने वाले एक फुटपथिया दुकानदार से मैने पूछ लिया मोदी का हाल। उनके मुंह में पान या खैनी था। जिसे उन्होने बड़े इत्मीनान से गटका और थूंका। फिर बताया – फंस गये हैं मोदी।

कैसे?

यहीं दुर्गाकुण्ड के पासई में केजरीवाल आसन जमाये है। झाड़ू से डण्डा किये है। गांव देस में अजय राय के लाठी-बन्दूक वाले कब्जियाये हैं। मोदी तो बाहर से आ कर फंस गये हैं। पार न पायेंगे।

पर केजरीवाल और अजय राय एक साथ तो होंगे नहीं?

मेरा प्राइमरी की गणित का सवाल उस दुकानदार को पसन्द नहीं आया। एक थूक और निगल-थूंक कर उसने कहा – कुच्छो हो, आप देखियेगा सोरह को मोदी का हाल।

मेरे साथ मेरे साले थे – विकास दूबे। आजकल भाजपाई हैं। उनके अनुसार सब सनाका खा गये हैं मोदी का रोड शो देख कर। कह रहे हैं कि भीड़ शहर की नहीं बाहर से बुलाई थी। इतनी भीड़ के लिये न कोई स्पेशल ट्रेन चली, न ट्रेनों में भीड़ नजर आयी। न कहीं बसों का जमावड़ा हुआ। तो क्या हेलीकाप्टर से आयी भीड़ बाहर से। … सब बनारसी लोग थे। अपने से निकले। पूरा शहर मोदी मय है। सभी आलोचकों का फेचकुर$ निकल रहा है!

[$फेचकुर देशज शब्द है। बदहवासी में जो मुंह से झाग/लार निकलता है, वह फेचकुर कहलाता है।]

दुर्गाकुण्ड के आसपास का नजारा देखा मैने। कुण्ड में पानी था। पर गन्दा। मन्दिर औसत सफाई वाला। इससे ज्यादा साफ करने के लिये बनारसी कल्चर में आमूलचूल बदलाव जरूरी है – बहुत कुछ वैसा बदलाव जैसी आशा मोदी से बदहाल यूपी कर रहा है। ढेरों औरतें बच्चे भीख मांग रहे थे। भीख मांगने में उनका पेशा ज्यादा नजर आ रहा था। चेहरे पर लाचारी नहीं झलक रही थी। कई औरतें भीख मांग रही थीं – कई के गोद में बच्चे थे और कोख में भी। दुर्गामाई लगता है पर्याप्त देती हैं। एक ने उनसे पूछा – मजूरी क्यों नहीं करती? उसने उत्तर देने का कष्ट नहीं किया।

दुर्गाकुण्ड, बनारस का शिलापट्ट।
दुर्गाकुण्ड, बनारस का शिलापट्ट।

उत्तरप्रदेश/बनारस में बहुत कुछ बदलाव की आशा लगाये है। पर बदलाव कोई और आ कर करे। वे खुद जस हैं, तस रहना चाहते हैं। अपने में बदलाव कोई नहीं करना चाहता। मोदी चुनाव जीत भी गये तो उत्तरप्रदेश बदलना उनके लिये आसान न होगा। ऐसा मुझे लगा।

 वाराणसी स्टेशन पर एक खम्भे पर झाड़ू दल का स्टिकर।
वाराणसी स्टेशन पर एक खम्भे पर झाड़ू दल का स्टिकर।

जय गुरुदेव भण्डारे का निमंत्रण


वे दो लोग मिलने आये आज (अप्रेल 22’14)। जय गुरुदेव के भण्डारे का निमंत्रण देने। भण्डारा मथुरा में है। सो गोरखपुर से वहां जाने का सवाल ही नहीं। वैसे भी जय गुरुदेव के नाम से कोई रेवरेंस नहीं बनती मन में। कौतूहल अवश्य होता है कि कैसे इतनी जबरदस्त फॉलोइंग है।

उन दोनो व्यक्तियों को देख कौतूहल का कदाचित शमन हुआ हो, ऐसा नहीं। दोनो ही विचित्र लग रहे थे। उनमें से बड़े – श्री आनन्द बहादुर सक्सेना, टाट का कुरता पहने थे। जूट के बोरे की तरह खुरदरा और झीना नहीं था। पर था टाट ही। सक्सेना को लगा कि मैं टाट के बारे में नहीं जानता हूंगा। पर जब समझ आ गया कि मैं इतना बड़ा साहब नहीं हूं कि यह न जानूं, उन्होने मुझे समझाना बन्द कर दिया।

श्री आनन्द बहादुर सक्सेना - टाट का कुरता पहने।
श्री आनन्द बहादुर सक्सेना – टाट का कुरता पहने।

मेरे पूछने पर यह जरूर बताया कि टाट का वस्त्र महीन नहीं है। टाट खरीद कर अपने नाप का सिलवाया है। बना बनाया नहीं आता। चुभता है शरीर पर। और गरमी में टाट गरम; सरदी में ठण्डा रहता है। बारिश के मौसम में नमी सोखता है और जल्दी सूखता नहीं। “औरत जैसे नथुनी, झुमका, कंगन आदि पहनती है जो शरीर पर बोझ भले लगते हैं, पर उसे हमेशा उसके सुन्दर होने का अहसास कराते रहते हैं, उसी तरह यह चुभने वाले कपड़े हमेशा अहसास कराते रहते हैं उस भगवान का…।” मुझे टाट के प्रयोग का एक दार्शनिक कोण बांटने का प्रयास किया सक्सेना जी ने। फिर जोड़ा – “हम तो फौजी हैं, रिटायर्ड। जैसा गुरू का हुकम, वैसा करते हैं। कोई सवाल पूछने की गुंजाइश नहीं छोड़ते।” मुझे लगा कि सक्सेना टाट पहनने को कहीं किसी स्तर पर अतार्किक मानते हैं , पर उसे अनुशासन के नाम से जस्टीफ़ाई कर रहे हैं।


जय गुरुदेव के बारे में जितना ज्ञात है, उससे ज्यादा मिथक बुना गया है उनके व्यक्तित्व पर। विकीपेडिया के पेज के अनुसार वे राधास्वामी सम्प्रदाय की एक शाखा के व्यक्ति हैं। करीब (?) 116 वर्ष की उम्र में 18मई, 2012 में उनका निधान हुआ। उनका नाम तुलसीदास था। इमरजेंसी के दौरान सरकार का विरोध करने और दूरदर्शी नामक राजनैतिक पार्टी बनाने के कारण उन्हें जेल में डाल दिया गया था बीस महीने के लिये। छूटने पर इन्दिरा गांधी उनसे मिलने आयी थीं। मथुरा में उनके आश्रम में। बाबा ने उन्हे आशीर्वाद दिया था पर यह कहा था कि उनके परिवार में से अगर कोई प्रधानमन्त्री बनने का प्रयास करेगा तो परिणाम घातक होंगे। 

बाबा की याद में मथुरा में भण्डारा होता है और मेला लगता है। 

जय गुरुदेव। लगता नहीं टाट पहने हों!
जय गुरुदेव। लगता नहीं टाट पहने हों!

बाबा के चेला लोग टाट पहनते हैं। पर मुझे संजय अग्रवाल ने फेसबुक में यह बताया कि जयगुरुदेव खुद टाट नहीं पहनते थे। उनके चित्र से भी ऐसा नहीं लगता कि वे टाट पहने हों। चित्र के अनुसार उनके वर्तमान शिष्य श्री  भी टाट पहने नहीं नजर आते।

फेसबुक पर श्री तेजनारायण राय का कमेण्ट है – चेले का टाट बनाम गुरु का ठाट!  


श्री धर्मवीर पाण्डेय
श्री धर्मवीर पाण्डेय

उनके साथ, एक जवान आदमी थे, धर्मवीर पांडेय। दोनो बरेली से आये थे। धर्मवीर ने भी अजीबोगरीब वेश बना रखा था। सिर पर आम आदमी पार्टी छाप टोपी। एक सफेद जैकेट, जिसपर शाकाहार और पर्यावरण के बारे में कुछ नारे लिखे थे।  टोपी पर भी शाकाहार के प्रचार में कुछ लिखा था। जयगुरुदेव के शाकाहार मुहिम का प्रचार करने वाले व्यक्ति थे धर्मवीर। उनसे बातचीत में लगा कि वे समर्पित कार्यकर्ता हैं। पर इस स्तर का समर्पण कैसे है – वह स्पष्ट नहीं हो पाया। इस्लाम के विषय में भी इस प्रकार का समर्पण हिन्दू समझ नहीं पाते और नासमझी में उसे “बर्बर” धर्म की संज्ञा देने लगते हैं!

जैसे लोगों के बीच में ये लोग मिलते जुलते और प्रचार करते होंगे, उनके बीच इनका अजीबोगरीब वेश उन्हे कौतूहल का विषय जरूर बनाता होगा और उस कौतूहल के कारण लोग उन्हे सुनने को तैयार होते होंगे। … यह वेश एक प्रकार से विज्ञापन का जरीया है – बहुत कुछ पेटा वाली निर्वस्त्र सन्नारियों की तरह का!

भण्डारे का निमन्त्रण पत्र देना गौण बात थी। असल मकसद अनुरोध करना था कि जयगुरुदेव मेने के अवसर पर मथुरा में बहुत से लोग इकठ्ठा होंगे। उनके आने-जाने के लिये विशेष गाड़ियों की व्यवस्था के लिये वे चीफ ऑपरेशंस मैनेजर साहब से अनुरोध करना चाहते थे। और मैं संयोग से वह चीफ ऑपरेशंस मैनेजर के पद पर आसीन था। बरेली में किसी ने उन्हे सलाह दी थी कि आप लोग गोरखपुर जाइये, वहीं से स्पेशल गाड़ियां चलाने का निर्णय होगा। अत: उन दोनो ने बरेली से गोरखपुर की 500 किलोमीटर की यात्रा की। उनका यह काम इज्जतनगर मण्डल स्तर पर ही हो जाना चाहिये था…

खैर, मुझको यह नहीं लगा कि सक्सेना और पांण्डेय को यात्रा करने में कोई झिझक/असुविधा/समस्या थी। उनके लिये यह निर्धारित/आदेशित कार्य था; जो उन्हे करना था। वे मेरे चेम्बर में बैठने और अपनी बात कहने का अवसर पा गये, यह अनुभव कर वे प्रसन्न ही लग रहे थे। कहें तो गदगद।

भण्डारे का सूचना पत्र। इसमें जय गुरुदेव के साथ पंकजजी महराज का चित्र भी है। खबरों के अनुसार पंकजजी बाबा के सारथी रह चुके थे।
भण्डारे का सूचना पत्र। इसमें जय गुरुदेव के साथ पंकजजी महराज का चित्र भी है। खबरों के अनुसार पंकजजी बाबा के सारथी रह चुके थे।

लाहे लाहे नेटवर्किंग करो भाई!


IMG_20140408_184917फ़ेसबुक में यह प्रवृत्ति देखता हूं। लोगों के पास आपका कहा, लिखा और प्रस्तुत किया पढ़ने की तलब नहीं है। आप उनका फ़्रेण्डशिप अनुरोध स्वीकार करें तो दन्न से मैसेंजर में उनका अनुरोध आता है फोन नम्बर मांगता हुआ।

वे नेट पर उपलब्ध मूल भूत जानकारी भी नहीं पढ़ते। मसलन वे मेरे बारे में जानना चाहें तो मेरे ब्लॉग-फेसबुक-ट्विटर पर मेरे विषय में तो मैने इतना प्रस्तुत कर दिया है कि कभी कभी मुझे लगता है कि मैने अपने घर की दीवारें ही शीशे की बना दी हैं। यही नहीं, मन में जो भी चलता है, वह भी नेट पर है। कच्चा और अधपका विचार भी प्रस्तुत है। कुछ लोग कहते हैं यह खतरनाक है। इसका मिसयूज हो सकता है। पर जो है, सो है। मैं अपने को बदल नहीं पाता प्रस्तुति में।

But this request of phone number in nanoseconds of “friendship” puts me off! लाहे लाहे नेटवर्किंग करो भाई! इतना भला/बढ़िया नेटवर्किंग माध्यम उपलब्ध कराया है भगवान ने अपने नेटावतार में, उसका धन्यवाद दो, इज्जत करो और इण्टरनेट पर हो रहे सम्प्रेषण यज्ञ में अपनी आहुति दे कर जो परिपक्व मैत्री का फल प्राप्त हो, उसे प्रसाद की तरह ग्रहण करो।

मैत्री परिपक्व होने के लिये समय दो भाई। सीजनल सब्जी भी फलीभूत होने में महीना-डेढ महीना लेती है। यह मानवीय रिलेशनशिप का मामला है प्यारे, मैगी का टू-मिनट इन्स्टेण्ट नूडल बनाने का विकृत पाकशास्त्रीय प्रयोग नहीं!

जीवन में जितने अच्छे लोग मिले हैं, उसमें से बहुत से नेट की नेटवर्किंग के माध्यम से मिले हैं। उनकी विचारधारा, तहज़ीब, शब्दों में ताकत और दूसरे के कहे को सुनने समझने का माद्दा, विशाल हृदयता… बहुत से गुणों के धनी पाये हैं। पर नेट पर उपलब्ध सामग्री को बहुत बारीकी से ऑब्जर्व करते हैं। सर्च इंजन के सही उपयोग करते हैं। वे ऐसी सामग्री उपलब्ध कराते हैं जो आपके जीवन में वैल्यू एड करती है। आपस में बात करना तो तब होता है जब एक समझ डेवलप हो जाती है व्यक्तित्व के विषय में।

फेसबुक का अकाउण्ट बना लेना भर आपको नेटवर्किंग में सिद्धहस्त नहीं बनाता। कत्तई नहीं।

लाहे लाहे नेटवर्किंग करो भाई!!!

बंगाली कुटुम्ब के रात्रि-भोज में


श्री लाहिड़ी के यहां रात्रि भोज।
श्री लाहिड़ी के यहां रात्रि भोज।

बहुत बड़ा कुटुम्ब था वह। कई स्थानों से आये लोग थे। पिछले कई दिन से यहां पर थे – श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी के पौत्र शुभमन्यु (ईशान) के उपनयन संस्कार के अवसर पर। संस्कार 4 अप्रेल को हुआ था। पांच अप्रेल की रात समारोह के समापन के अवसर पर एक भोज समारोह था। सब उसी में इकठ्ठा थे।

जैसे सुरुचि की बंगला लोगों से अपेक्षा की जाती है, वैसी वहां दिख रही थी। सब कुछ व्यवस्थित और सभी कुछ आधुनिक वर्तमान में होते हुये भी परम्परा का निर्वहन करता हुआ। नयी पीढ़ी के दम्पति भी थे और अधेड़-वृद्ध भी। नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ियों का भरपूर और अनुकरणीय सम्मान करती दिखी। बच्चे कम दिखे – पूर्वांचली/यूपोरियन स्थानीय कुटुम्ब होता तो उनकी विशाल और अराजक (?) उपस्थिति होती जो यह भी अण्डर्लाइन करती कि यहां के लोग अपने बच्चों को उपयुक्त संस्कारयुक्त बनाने में रुचि नहीं रखते और मेहनत भी नहीं करते।

भोजन के समय श्री मैत्रा, श्रीमती मैत्रा और मेरी पत्नीजी।
भोजन के समय श्री मैत्रा, श्रीमती मैत्रा और मेरी पत्नीजी।

भोज में इग्यारह वर्षीय ईशान (पुत्र श्री अचिन्त्य लाहिड़ी) भी था। उपनयन के समय उसका मुण्डन हुआ था। इसलिये सिर पर लाल रंग का साफा पहने था। सुरुचिपूर्ण वेश। बालक प्रसन्न था – अपने चित्र-वीडियो खिंचा रहा था और बीच बीच में परिचय कराने पर आदर से लोगों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद भी ले रहा था। चरण स्पर्श की उत्तरप्रदेश में जो दुर्गति इस परम्परा की उपेक्षा करने और फंस जाने पर घुटना छूने भर की भदेस परिणिति में नरज आती है, वह नहीं थी उसमें।

उपनयन संस्कार का वीडियो।
उपनयन संस्कार का वीडियो।
सफ़ेद कमीज में श्री प्रतुल लाहिड़ी।
सफ़ेद कमीज में श्री प्रतुल लाहिड़ी।

श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी से मुलाकात हुई। लाहिड़ी जी ने बताया कि बंगाली गोरखपुर में सन् 1802 में आये। उनका परिवार तो यहां 1887 में आया और उनके पहले पर्याप्त संख्या में बंगाली आ चुके थे। सन् 1886 में – उनके परिवार के आने के पहले – गोरखपुर में दुर्गापूजा प्रारम्भ हो चुकी थी। श्री लाहिड़ी गोरखपुर के बारे में एनसाइइक्लोपीडियक जानकारी रखते हैं। उन्होने वेस्ट-डिस्पोजल, खरपतवार से कम्पोस्ट खाद बनाना और उसमें लगे लोगों को जीविका प्रदान करना, उनके स्वास्थ के विषय में जागरूक प्रयास करना आदि अनेक कार्य किये हैं। गोरखपुर के पुरातत्व के बारे में उन्हे गहन जानकारी है।

मैने श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी जी से अनुरोध किया कि भविष्य में मैं उनके साथ समय व्यतीत कर उनसे गोरखपुर और यहां के बंगाली समाज के बारे में जानकारी लेना चाहूंगा। सहर्ष स्वीकार किया उन्होने मेरे अनुरोध को।

श्री लाहिड़ी के विवेक होटल के लॉन में यह समारोह हो रहा था। एक कोने में प्रोजेक्टर स्क्रीन पर ईशान के यज्ञोपवीत संस्कार का वीडियो चल रहा था। सिर मुंड़ाये बालक को स्त्रियां हल्दी लगा रही थीं। सिर पर जल डाला जा रहा था। हवन का समारोह था। बालक कभी परेशान तो कभी प्रसन्न नजर आ रहा  था। सुन्दर चेहरे पर निश्छल मुस्कान थी… परम्परा निर्वहता सुरुचिपूर्ण समारोह, सुघड़ वीडियो।


उत्तर प्रदेशीय कुटुम्ब का समारोह होता तो भांय भांय म्यूजिक और चिंचियाऊ आवाज में डीजे बजता। इतना शोर होता कि आपस में बातचीत करना कठिन होता। बच्चे कोल्ड-ड्रिंक और खाने की चीजें लिये चलते-धकियाते-दौड़ते और जोर जोर से चिल्लाते दीखते। हवन और मन्त्रोच्चार बोझ से फास्ट-फारवर्ड मोड में चल रहे होते। 😦 


समारोह का समय कार्ड में शाम साढ़े सात बजे छपा था। हम – हमारे चीफ माल यातायात प्रबन्धक श्री आलोक सिंह, मेरी पत्नी रीता पाण्डेय और मैं – जब सवा आठ बजे पंहुचे तो लगभग 30-40 लोग लान में बैठे थे। धीरे धीरे लोग आये। भोजन प्रारम्भ होते समय काफी लोग थे। और जब हम विदा लेने लगे तो वह विस्तृत जगह भरी हुई थी। पूरे समारोह में हम लोगों की मेजबानी श्रीमती और श्री ए.के. मैत्रा ने की। श्री ए.के. मैत्रा रेलवे के अतिरिक्त सदस्य (यातायात) हैं। ये दम्पति भी विद्वता और अनेक गुणों से सम्पन्न हैं। उनके विषय में अलग से लिखूंगा।

इस भोज में उपस्थित होना और उसमें भी चुपचाप अलग थलग बैठने की बजाय लोगों से बातचीत करना/जानकारी लेना मेरी सामान्य प्रवृत्ति के विपरीत था। पर मैने वह किया।

नयी जगह – गोरखपुर – में मैं अपने को सयास बदलने का प्रयास कर रहा हूं, शायद। और ब्लॉग पोस्टों में भी आगे दिखे वह! सम्भवत:!

भोज के अन्त में था ताम्बूल। क्या शानदार है तम्बोली!
भोज के अन्त में था ताम्बूल। क्या शानदार है तम्बोली!

 

झरे हुये पत्ते


गोल्फारी में पत्तों का ढेर
गोल्फारी में पत्तों का ढेर

रेलवे कालोनी, गोरखपुर में पेड़ बहुत हैं। हरा भरा क्षेत्र। सो पत्ते भी बहुत झरते हैं। सींक वाली बेंट लगी बड़ी झाड़ुओं से बुहारते देखता हूं सवेरे कर्मियों को।

बुहार कर पत्तों की ढेरियां बनाते पाया है। पर उसके बाद प्रश्न था कि क्या किया जाता है इन सूखी पत्तियों का? कहीं कहीं जलाया हुआ देखा – पर वैसा बहुत कम ही दिखा। जलाने पर वृक्षों तक लपट जाने और उनकी हरी पत्तियां झुलसने का खतरा रहता है।

देहात होता तो लगता कि भुंजवा अपनी भरसाईं जलाने के लिये प्रयोग करता होगा पत्तियां। यहां तो इन पत्तियों से कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है या फिर कहीं और ले जाई जा सकती हैं डिस्पोजल के लिये।

उस दिन सवेरे वह ठेला गाड़ी वाला दम्पति दिखा जो पत्तियों के बड़े गठ्ठर बना कर लाद रहा था ठेले पर। आदमी को जल्दी थी लाद कर जाने की और मेरे सवालों का जवाब देने में रुचि नहीं थी उसे। पर इतना बताया कि पत्तियां भट्टे पर जाती हैं। आंवा बनाने के लिये। भट्टे पर पत्तियां, उपले और कोयला इस्तेमाल होता है खपरैल या मिट्टी के बरतन पकाने में।

 पत्तियों के गठ्ठर ले जाने वाले दम्पति।
पत्तियों के गठ्ठर ले जाने वाले दम्पति।

पर यह व्यक्ति पत्तियां सीधे भट्टे पर ले जाता है या ले जा कर किसी मिडिलमैन को बेचता है यह नहीं पूछ पाया उससे। यह भी नहीं पता कर पाया कि रेलवे के साथ कैसा सम्बन्ध है उसका। कुछ प्रश्न अनुत्तरित भी रहने चाहियें भविष्य के लिये।


हमारे हॉर्टीकल्चर इंस्पेक्टर श्री रणवीर सिंह ने बताया कि मैन-पॉवर की कमी से पत्तियों का उपयोग खाद बनाने में नहीं हो पा रहा। पत्तियां सफाई वाले ही साफ कर डिस्पोज करते हैं। स्वास्थ्य निरीक्षक महोदय ने बताया कि पत्तियां वे ट्रॉली-ट्रेक्टर ट्रॉली में भर कर फिंकवाते हैं। शायद दोनों में तालमेल हो तो खाद बनायी जा सकती है! 

मेरे सहकर्मी श्री कृष्ण मुरारी का विचार है कि पत्तियां स्थानीय कुम्हार ही प्रयोग में लाते हैं। वैसे कुम्हारों को पत्तियों, ईन्धन, पुआल और मिट्टी की उपलब्धता में  दिक्कत आने लगी है और बहुत से अपना पेशा भी छोड़ रहे हैं। 


वहां से आगे बढ़ते है मैने देखा कि अपनी पत्नी पर वह गिजर रहा था, कि जल्दी काम करे, नहीं तो देर हो जायेगी। दोनो कर्मी थे, पर वह अपनी पत्नी का सुपरवाइजर भी था पति होने के नाते! 😆


गोल्फार के चीड़, शालवन और बंसवारी


 

शाल वृक्ष
शाल वृक्ष

प्रवीण पाण्डेय यहाँ थे कल और आज। वाराणसी में पदस्थापित हुये हैं। दोपहर की किसी गाड़ी से जा रहे हैं बनारस। पता नहीं किसी ने सलाह दी या नहीं, कि पहले काशी कोतवाल – काल भैरव को नमस्कार करना चाहिये। फिर उस कर्म क्षेत्र में प्रवेश जो भयंकर अराजकता का सौन्दर्य अपने में समाहित किये है।

Kashi is the order of tremendous disorder. अंग्रेजी में इस लिये लिख रहा हूं कि मेरी पत्नीजी इसपर ध्यान न दें।

उस दिन फेसबुक पर अनूप सुकुल ने काशी के बारे में अण्ड-बण्ड लिखा था तो श्रीमती रीता पांड़े आगबबूला थीं। “इनको गंद नहीं दिखता जो गंगा में मचाया है कानपुरियों ने?!” सुकुल पलट कर रियेक्ट नहीं किये। प्रवीण भी कानपुरिया हैं – कानपुर के आईआईटी के पढ़े, और जब तक बनारस रहें, कम से कम मेरी पत्नीजी के समक्ष काशी की महानता का भजन गाना ही पड़ेगा।

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खैर काशी की बात एक तरफ। यहां गोरखपुर में समरागमन – गर्मियों का आगमन – हो रहा है। आज लंच के लिये घर जाते मेरा वाहन चालू नहीं हुआ और पैदल घर जाना पड़ा। रास्ता कटने में दिक्कत तो नहीं हुई, पर यह जरूर लगा कि वाहन पर निर्भरता खत्म कर गर्मियों के लिये एक साइकल खरीद ली जाये – घर से दफ्तर कम्यूट करने के लिये। एक आध नन्दन निलेकनी छाप फोटो लगाई जा सकेगी साइकल चलाते हुये। अन्यथा इस पारम्परिक रेलवे – पूर्वोत्तर रेलवे में साहेब का साइकल पर चलना प्रोटोकॉल के भयंकर खिलाफ है! 😆

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गोल्फार में चीड़।
गोल्फार में चीड़।

इलाहाबाद के कछार की तरह यहां 100-200 मीटर की एक पट्टी खोज ली है मैने गोल्फ कालोनी में। उसमें साखू (शाल) के विशालकाय वृक्ष हैं और दो पेड़ चीड़ के भी हैं। चीड़ (pine) और देवदार का गोरखपुर जैसे स्थान में होना अपने आप में विस्मय की बात है। हमारे हॉर्टीकल्चर के सीनियर सेक्शन इंजीनियर श्री रणवीर सिंह ने बताया कि चार पांच चीड़ हैं गोरखपुर रेलवे कलोनी में। उन्हे निहारना, चित्र खींचना और ब्लॉग पोस्टों में ठेलना अपने आप में कछार पर लिखने जैसा कार्य है।

माने; प्रयाग में गंगा किनारे का कछार था तो यहां 100-200 मीटर गोल्फ कॉलोनी का गोल्फार!

बांस के कई झुरमुट हैं इस कॉलोनी में महाप्रबन्धक महोदय के आवास “ईशान” में। तेज हवा चलने पर बांस आपस में टकरा कर खट्ट-खट्ट की तेज आवाज करते हैं। असल में उनकी तेज आवाज के कारण ही मेरा ध्यान उनकी ओर गया।  शानदार झुरमुट। गांव में ये होते तो आजी नानी कहतीं – “अरे ओहर जिनि जायअ। बंसवारी में फलनवा परेत और ढिमकिया चुरईल रहथअ! (अरे, उस ओर मत जाना। बंसवारी में फलाने प्रेत और ढिमाकी चुड़ैल रहती हैं!)”

गोल्फार के चीड़, शालवन और बंसवारी! … रहने और लिखने के लिये और क्या चाहिये बन्धु!? गोरखपुर जिन्दाबाद! 

"ईशान" के सामने की ओर बांस का झुरमुट
“ईशान” के सामने की ओर बांस का झुरमुट