शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 6 #ALAKH2011

नागालैण्ड के मोकोकशुंग जिले के उंग्मा गांव में एक दिन दो रात व्यतीत कर शैलेश ने वापसी की यात्रा प्रारम्भ की। वापसी में व्यथित मन। यात्रा के दौरान मुझे प्रश्न पूछने पड़ रहे थे। वापसी में मन भरा होने के कारण शैलेश के शब्द स्वत: निकल रहे थे ह्वाट्सएप्प पर :-

नवम्बर’17; 2014

शैलेश ने कहा - यहीं कहीं छोड़ चला मैं अपना हृदय। मैं यायावर!
शैलेश ने कहा – यहीं कहीं छोड़ चला मैं अपना हृदय। मैं यायावर!

भैया मैं वापस हो लिया हूं। बस से दीमापुर के लिये। वाया मैरानी। मोकोकशुंग से 212 किलोमीटर है यह। किराया 345 रुपये।

इस इलाके की भोजन की आदतें बहुत स्वस्थ हैं। बहुत सी उबली सब्जियां और हरी पत्तियां। वे लोग पानी की कद्र करते हैं और पारम्परिक तरीकों से वाटर हार्वेस्टिंग करते हैं।

इनको समझने के लिये हमें अपने गहरे पैठे पूर्वाग्रहों, हिंसक भावों और भयों को दरकिनार कर देखना होगा। उससे हम इस स्वर्ग तक पंहुच पायेंगे। … हां, स्वर्ग! मैने इसे सबसे साफ, सुन्दर और मैत्रीवत स्थान पाया है अपनी जिन्दगी में।

यह जमीन लीजेण्ड्स की है – जैसे डाक्टर टालीमेरेन, इम्कॉंग्लीबा आओ और महावीरचक्र विजेता इमलीयाकुम आओ।

यहां परिवार और कबीले के सम्बन्ध प्रगाढ़ हैं और लोग उसमें फख्र करते हैं।

हर जिले की अपनी बोली है और सब में भिन्नता है। एक सूत्र के नागामीज़ भाषा।

यह एक प्रकार का नीम्बू है। यहां दिखा मुझे।

गांव में नीबू जैसे फल का झाड़।
गांव में नीबू जैसे फल का झाड़।

हर गांव में एक द्वार होता है।

हर गांव में एक द्वार होता है नागालैण्ड में
हर गांव में एक द्वार होता है नागालैण्ड में

यह देखिये पारम्परिक पानी की टंकी।

पारम्परिक पानी की टंकी।
पारम्परिक पानी की टंकी।

हां। प्रचुर प्रयोग हुआ है इसमें लकड़ी का!   

यह एक फूल है, जिसे मैं पहचान न पाया।

यह फूल। नाम नहीं पता चला।
यह फूल। नाम नहीं पता चला।

स्क्वाश। एक प्रकार की सब्जी।

स्क्वाश। एक सब्जी।
स्क्वाश। एक सब्जी।

यह है एक पारम्परिक घर में फायरप्लेस।

गांव के एक घर में फायर-प्लेस।
गांव के एक घर में फायर-प्लेस।

पर मुझे जंगल की कटाई कहीं न दिखी।

ये हैं मेरे नौजवान मित्र। अतु के भतीजे। उनके साथ मैं।

शैलेश के जवान मित्र। उंग्मा गांव में अतु के भतीजे।
शैलेश के जवान मित्र। उंग्मा गांव में अतु के भतीजे।

… नागालैण्ड छोड़ते समय ये सभी विचार/लोग/दृष्य मेरे मन में थे।

उत्तरार्ध:

भैया, यायावर शब्द सुना था मैने बचपन से। कौतूहल था उनके प्रति। बड़ा हुआ तो वे लोग, जिन्हे यायावर कहा जाता है, के प्रति सम्मान भी देखा। पर यह कभी न समझ पाया कि इस शब्द का प्रयोग जिसके लिये पहली बार हुआ होगा, उसका हृदय कैसा रहा होगा?!

और बाद में अपने लिये भी इस शब्द के प्रयोग को देखा। मन में आया कि अपने को ही यायावर मान कर अपने ही प्रश्नों के उत्तर दें। तब पाया कि यायावर जहां से गुजरता है, स्वयं को कुछ छोड़ कर आगे बढ़ता है। आगे बढ़ने की उत्कण्ठा और जहां पंहुचा है, वहां से लगाव में बंटा उसका हृदय शायद यायावरी को अपना निमित्त मान कर आगे बढ़ जाता है। ऊपर से निस्पृह पर भीतर पीड़ाओं का कोलाहल लिये!

क्या मैं अपने को स्पष्ट कर पा रहा हूं? इस समय मेरा शरीर वाराणसी की यात्रा कर रहा है। … मैं अपने को नागालैण्ड में छोड़ कर आ रहा हूं। मैं वैसा ही होम सिक महसूस कर रहा हूं, जैसा 1994 में घर से नेवी ज्वाइन करने के लिये जाते समय कर रहा था! 


इसके बाद मैने शैलेश से कुछ स्पष्टीकरण मांगे ब्लॉग पर सामग्री प्रस्तुत करने के लिए। अन्यथा, बहुत ज्यादा इण्टरेक्शन नहीं कर पाया। शैलेश का यात्रा का, ऊपर प्रस्तुत, अंतिम कथ्य पाठकों की प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है।


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Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://halchal.blog/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyan1955

3 thoughts on “शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 6 #ALAKH2011”

  1. बहुत अच्छी यात्रा थी। पूर्वोत्तर के बारे में वैसे भी मुख्यधारा में ज्यादा कुछ पठन सामग्री उपलब्ध नहीं है। यदि कुछ और विस्तृत होती तो और ज्यादा आनंद आता।

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  2. जी हाँ, मानव मात्र एक यायावर ही तो है। जो हम बचपन में छोड़ आते हैं और जीवन पर्यन्त ‘उस’ की चाह लिये यादों में भटकते रहते हैं उस टीस को कोई क्या नाम दे। हमेशा अतीत सुन्दर तो नहीं होता! हाँ मगर बचपन के साथ ऐसा नहीं होता..चलो कह देता हूँ शत प्रतिशत !!
    मैं भी यायावर हूँ। कोई मुझे उस जिंदगी के उजास से मिला दे। मेरे इस मैं को गला दे!!

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