गोल्फार के सफाई वाले

गोल्फार में कार्यरत सफाईवाले।

गोल्फार में कार्यरत सफाईवाले।

शनीवार का सवेरा। दस बज गया था पर धूप नहीं निकली थी। रात में कोहरा नहीं था, पर धुन्ध बनी हुई थी। यकीन इस लिये भी था कि स्मार्टफोन का एप्प भी मिस्ट बता रहा था। कोई काम न हो और मन में उलझन हो, तो सैर पर निकल जाने से बेहतर कुछ नहीं। मैने वही किया। सिर पर कुलही, एक स्वेटर और उसपर जाकिट पहन अपने को सर्दी के खिलाफ सुरक्षित करते हुये निकला। पड़ोसी का नौकर अपने कुकुर को नित्यकर्म करवाने निकला था। उसका फोटो लेने का मन नहीं हुआ, अन्यथा कुकुर – नहीं कुतिया – ने पोज अच्छा बनाया था। गोल्फार में महाप्रबन्धक के घर के पास आधा दर्जन सफाई कर्मी मिले। सर्दी के बावजूद अपने काम में लगे थे। शाल के बड़े बड़े पत्ते रात में चली हवा में गिरे थे। उनका काम उन्हे झाड़ू से बीनना, ढेरी बना कर उनमें आग लगाना था।गोल्फार में पेड़ इतने ज्यादा हैं और उनसे पत्ते इतने ज्यादा झरते हैं कि उन पत्तों को इकठ्ठा कर बढ़िया कम्पोस्ट खाद बन सकती है जो शायद पूरे गोरखपुर के रेल परिसर की बागवानी की खाद की  जरूरतें पूरी कर दे। पर वह नहीं होता। पत्ते जलाये ही जाते हैं और खाद – जितनी भी लगती हो – खरीदनी पड़ती होगी।


गोल्फार

गोल्फार यानि गोल्फ ग्राउण्ड के पास 18-20 रिहायशी मकानों का हरा भरा स्थान। यह नाम मैने गंगा के ’कछार’ के तर्ज पर रखा है।


सफाई वालों की खाद बनाने की मल्टी-टास्किंग नहीं है। मैने कार्यरत सफ़ाई वालों के चित्र लिये। एक जगह एक सफ़ाई वाले ने टहनियां इकठ्ठी कर रखी थीं और पत्तियों को जला कर ताप रहा था। लकड़ियां शायद घर जाते समय उठा कर ले जाये ईन्धन के लिये। एक महिला भी जाती दिखी। उसके हाथ में भी झाड़ू थी। शायद वह भी सफ़ाई कर्मी हो।

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गोल्फार हरा भरा, सुन्दर और स्वर्ग सा लगता है। उसके सौन्दर्य को कायम रखने वाले ये सफाई कर्मी हैं। पता नहीं, स्वर्ग में भी सफाई कर्मी होते हैं या नहीं। होते भी होंगे तो वे भी देवता होते होंगे। (वैसे शीतला माता सफाई की देवी हैं। वे गधे पर सवार हैं। उनके चार हाथों में झाडू, जल पात्र, अनार के बीज और तलवार हैं। स्वच्छता की देवी होने के कारंण वे रोगों का नाश करती हैं।)

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