जंगल की वनस्पतियों पर शोध ग्रंथ

"विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।

“विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।

मैने श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से उनके शोध कार्यों पर लिखी उनकी पुस्तकों पर जिज्ञासा जताई थी।

कुछ दिनों बाद मुझे एक अनजान नम्बर से फोन आया। बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के सेण्ट्रल रीजनल सेण्टर, इलाहाबाद से श्री अर्जुन तिवारी फोन पर थे। उन्होने बताया कि कुछ समय बाद वे अपने विन्ध्य की वनस्पतियों पर अध्ययन वाली पुस्तक मुझे भिजवा देंगे।

लगभग 15 दिन बाद वह पुस्तक मेरे हाथ में थी।

मेरा सोचना था कि यह लगभग 50-100 पेज की कोई पुस्तिका होगी। ऐसी पुस्तिका, जो लोग कम से कम मेहनत में लिखते-छपवाते हैं कि लेखक होने का नाम भर हो जाये और कहने को हो कि वे शोध कर सामग्री पब्लिश कर चुके हैं। ऐसी पुस्तकें लोगों पर रुआब डालने भर का काम करती हैं।

पर यह पुस्तक – विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान – एक पुस्तिका नहीं, ए-4 साइज बड़े आकार के 400 से अधिक पेजों का भारी भरकम शोध ग्रन्थ निकला। छ व्यक्तियों के कई वर्षों की जंगल छानने, पारम्परिक चिकित्सकों के मिलने, नोट्स बनाने और वनस्पतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने का नतीजा था। यह पुस्तक तो आगे आने वाले चिकित्सकीय शोध के कई अध्यायों को ट्रिगर कर सकती है।


महुआ बड़ा मिठहुआ भाई
लाटा, ड़ोभरी खा बनाई
भुरकुन्ना खुरमा डोभराऊरा
खा रसखीर मौहारी भउरा
येखे फर का तेल निकारी
यामा न घाले कोउ कुल्हारी।
महुआ कितना मीठा पदार्थ है कि इससे लाटा, डोभरी भुरकुन्ना, सुरमा रसखीर, गौहारी आदि तरह तरह के व्यंजनों को बना कर खाया जाता है। इसके फल से तेल भी निकलता है। इस लिये ऐसे उपकारी पेड़ को कोई कुल्हाड़ी न चलाये।

(पुस्तक से)


पुस्तक की एक् प्लेट

पुस्तक की एक् प्लेट

वनवासी वे हैं, जो अपनी समस्त आवश्यकताओं के लिये वन पर निर्भर हैं। निर्भर हैं तो वन के प्रति उनमें माता-पिता जैसा भाव है। वृक्षों के प्रति आदर। उनका रहन-सहन, भोजन, दवा-दारू, देवी-देवता सब का आधार वन है। जंगल का वे आवश्यकता से अधिक दोहन/शोषण नहीं करते।

पुस्तक में यह और वन से सम्बन्धित अनेकानेक जानकारियां; अनेकानेक आयाम स्पष्ट होते हैं। यह सर्राटे से पढ़ी जा सकने लायक पुस्तक नहीं है। सन्दर्भ-ग्रंथ है; जिसपर बार बार लौटा जाये।

यह पुस्तक रीवां सम्भाग के रींवा, सतना, शहडोल, अनूपपुर, सीधी और उमरिया जिलों के वनो के जैवविविधता बहुल 22 क्षेत्रों के दो वर्षों तक सघन भ्रमण, स्थानीय जानकारों और पारम्परिक चिकित्सकों से सम्पर्क से निकली संतृप्त जानकारी का संग्रह है। इसमें दो सौ से अधिक स्थानीय जानकारों, वैद्यों, वन कर्मियों आदि की सूची है जिनके साथ सम्पर्क से इस पुस्तक की सामग्री बनी है। बड़े ही वैज्ञानिक तरह से अध्ययन किया गया है, इस ग्रंथ के लिये।

इस पुस्तक पर छ लेखकों के नाम हैं। सर्वश्री प्रवीण चन्द्र दुबे, के के खन्ना, आरएलएस सिकरवार, आरएन सक्सेना, बीएल पाण्डेय और अर्जुन प्रसाद तिवारी। इनमें से मैं श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से मिला हूं। और अर्जुन तिवारी से फोन पर चर्चा हुई है। अन्य सज्जनों से भी मुलाकात की इच्छा है।

इस ब्लॉग पोस्ट में पुस्तक की सामग्री परिचय के बारे में अगर मैं कहना शुरू करूं तो उसे 500-1000 शब्दों में समेट नहीं सकता। अत: उसका प्रयास नहीं करूंगा। प्रवीण जी और अर्जुन ने मुझे यह भरोसा दिया है कि इस पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध करा देंगे। तब, जब भी समय मिला, मैं इसके अंशों से आप पाठकगणों को जानकारी देता रहूंगा।

फिलहाल तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि अत्यंत प्रभावित हूं इस अध्ययन-सन्दर्भ-ग्रंथ से।


अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।

अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।

मैने अर्जुन तिवारी से फोन पर बातचीत की। वे बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के इलाहाबाद केन्द्र में शोध कार्य कर रहे हैं। [ प्रवीण चन्द्र दुबे जी ने मुझे फोन पर कहा था – बड़ा ही अच्छा लड़का है। इसके लिये कोई अच्छी लड़की हो तो बताइयेगा! 😆 ]

अर्जुन से मैने पूछा कि जितना पारम्परिक ज्ञान उन्होने अनेक जनजातीय लोगों/वैद्यों/जानकारों से एकत्र किया है, उसमें से कितना, बकौल उनके, आयुर्वेद ने अपने में समाहित किया है?

अर्जुन का विचार था कि अभी बहुत कुछ वैज्ञानिक/आयुर्वेदीय अध्ययन बाकी है। लगभग 40 प्रतिशत ज्ञान किसी न किसी तरह से आयुर्वेदीय औषधियों-पद्धतियों में है। एलोपैथिक दवाओं में भी बहुत सी का मूल ये जड़ी-बूटियां ही हैं। पर बहुत से वनस्पतीय-पारम्परिक ज्ञान का वैलीडेशन होना शेष है। उस दिशा में बहुत प्रयास नहीं हुये हैं। पर अब आयुष मंत्रालय की स्थापना हुई है तो आशा की किरण नजर आती है।

उदाहरण के लिये अर्जुन ने बताया कि जनजातीय लोग भस्म-कन्द नामक जड़ी का प्रयोग केंसर के लिये करते आये हैं। उज्जैन में एक बीएमएस डाक्टर से उन्हे प्रवीण जी ने मिलवाया था। उन डाक्टर साहब ने  बताया था कि भस्म-कन्द का सफल प्रयोग उन्होने कई केंसर रोगियों पर किया था।

पर जन जातीय लोग भस्म-कन्द का सूरन के विकल्प के रूप में अपने भोजन में प्रयोग करते आये हैं। व्यापक दोहन हो चुका है इस वनस्पति का और यह एंडेंजर्ड प्रजाति में आ गयी है। इसको बनाये रखने के प्रयास की आवश्यकता है।

अर्जुन ने एलोपैथी और आयुर्वैदिक दवाओं में वनस्पति के प्रयोग पर अपने विचार व्यक्त किये। एलोपैथी में वनस्पति का संश्लेषित रूप प्रयोग होता है। आयुर्वेदिक औषधि में वनस्पति अपनी मूल दशा में रहती है। भारत में आयुर्वेदिक दवाओं की मूल समस्या उनमें कठोर क्वालिटी कण्ट्रोल का न होना है। उनकी फार्मास्युटिकल कम्पनियां जड़ी-बूटियों की गुणवत्ता से समझौता करती हैं। (उदाहरण के लिये अशोकारिष्ट में वे अशोक के उस प्रकार का प्रयोग कर रही हैं, जिसमें औषधीय गुण नगण्य़ हैं।) कई बार पुरानी जड़ी-बूटियों का प्रयोग कर लिया जाता है। वे कुशल प्लाण्ट टेक्सोनॉमिस्ट अपनी दवाओं के उत्पादन में नहीं रखतीं।

'विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक का एक पेज-अंश

‘विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक का एक पेज-अंश


अर्जुन तिवारी से बातचीत कर मुझे लगा कि वनस्पतियों के पारम्परिक ज्ञान का अध्ययन और उसका आयुर्वेद/एलोपैथ के साथ सही संश्लेषण समय की मांग भी है और वर्तमान सरकार की सोच के अनुसार एक महत्वपूर्ण घटक भी – जनता के स्वास्थ्य के लिये।

अर्जुन निकट भविष्य में वैज्ञानिक पद के लिये चयन में जायेंगे। उन्हे शुभकामनायें!


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3 thoughts on “जंगल की वनस्पतियों पर शोध ग्रंथ

  1. सहमत. आयुर्वेद में दवाइयों का कोई क्वालिटी कंट्रोल नहीं है इसलिए यह पैथी बदनाम है.

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  2. पढ़कर अच्छा लगा। आयुर्वेक उत्पादकों, वितरकों और व्यवसाइयों पर भी उसी प्रकार की नियमावली और नियंत्रण की आवश्यकता है जैसी एलोपैथिक उत्पाद के क्षेत्र में है।

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