कोलाहलपुर और मुर्दहिया

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कोलाहलपुर में लगभग 400 घर हैं। उसमें से 3 घर सवर्णों के हैं। मुझे बताया गया कि शेष चमार हैं। कुछ खेती में लगे हैं। कुछ बुनकर हैं – कालीन बनाने वाले सेंटर पर जा कर आठ घंटे कालीन बुनते हैं। कुछ मजदूरी करते हैं।
मैंने तुलसीराम की मुर्दहिया के कण तलाशने की सोची। पर लगा कि गाँव वैसा नहीं है।
यह विचार आया कि शायद अब हालात बदले हों। पहले सामाजिक और आर्थिक हालात भयावह रहे हों।

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उस दिन मुझे गंगा किनारे शाम को मिल गए रामधनी। उनकी उम्र मेरे बराबर लगभग साठ साल की है। तुलसीराम भी लगभग इतनी उम्र के होते।
लगा कि कोलाहलपुर को मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने के लिये रामधनी एक सही पात्र होंगे। वैसे भी रामधनी स्पष्टवक्ता लगे। अच्छी याददाश्त वाले भी। यह विचार मन में पुख्ता हो रहा है की रामधनी के विस्तृत इंटरव्यू ले कर उसके आधार पर एक श्रंखला लिखी जा सकती है।
रामधनी के दो लड़के हैं, दोनों बुनकर। वे अब मोतियाबिंद के आपरेशन के कारण बुनकर के काम से संन्यास ले चुके हैं। उनके कहे अनुसार उनका घर संपन्न नहीं हो तो विपन्न भी नहीं है।
भविष्य में मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने की संभावनाएं बनती हैं – आखिर मुझे भी व्यस्त रहने को कुछ काम चाहिए! कि नहीं?

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One thought on “कोलाहलपुर और मुर्दहिया

  1. आप मुर्दहिया का सीक्वेल लिख पाएंगे . आपमें वह ज़रूरी प्रेम और आवश्यक निस्पृहता है . कच्चा माल प्रदान करने और प्रमाणीकरण के लिए रामधनी मिल ही गए हैं . मुर्दहिया की उत्तरकथा की प्रतीक्षा रहेगी . अपने तटों पर बहते-उमड़ते-घिरते जीवन को लिपिबद्ध करने में गंगा माई आपको सफलता प्रदान करें !

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