चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के साथ

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समदर्शी डेमू को अटॆण्ड करते हुये।

लेवल क्रासिंग गेट पर मैं अक्सर निकलता हूं, बटोही (साइकल) के साथ। जब गेट बन्द रहता है तो इन्तजार करता हूं। मेरे सामने साइकल/मोटरसाइकल वाले अपने वाहन तिरछा कर पार हो लेते हैं। चार पहिया वाहन और ट्रेक्टर वाले हॉर्न बजाते रहते हैं। शुरू में गेटमैन ही कहता था कि साहब गाड़ी आने में अभी समय है। आपकी साइकल डंकवा दूं? मैं मना कर दिया करता था। नहीं चाहता था कि कोई यह कहे कि रिटयर्ड रेल का अफ़सर समपार फाटक के नियम पालन नहीं करता।
अब सब समझ गये हैं कि यह व्यक्ति जैसा है, वैसा ही रहेगा।

कई बार वह गेट पर ड्यूटी करते दिखता है। यदा कदा नमस्ते भी कर देता है। थोडा स्थूल है। अधेड़। मेरी तरह उसे भी चलने में दिक्कत होती है – गठिया का मरीज लगता है। काम धीरे करने के कारण कभी कभी वाहन चालक ज्यादा हॉर्न बजाते हैं। पर सामन्यत: इस गेट पर यातायात कम है, सो कोई खास दिक्कत नहीं आती उसे काम करने में।

आस पास के गांव वाले उसके पास अड्डा जमाये रहते हैं। उसका भी मन-मनसायन होता होगा और गांव वाले तो, लगता है, रेल की नौकरी न मिल पाने के कारण यूं ही आसपास रह रेल का काम करने की अपनी साध पूरी करते नजर आते हैं। कभी कभी तो कोई गांव वाला उसकी उपस्थिति में ट्रेन से ऑलराइट सिगनल आदान-प्रदान का यत्न भी करता है।


आज जैसे ही मैं गेट पर पंहुचा, वह गेट बन्द कर रहा था। उसने नमस्ते की और कहा कि थोड़ी देर उसके पास बैठ लूं – जब तक गाड़ी निकले।

कौन सी गाड़ी है?

डेमू। 

वह मेरे लिये स्टूल ले कर आया। टूटा था। “इम्प्रेस्ट से खरीदने को कहा है बड़े बाबू को। खरीदते ही नहीं।” मैं सीमेण्ट के बने चबूतरे पर बैठ गया।

चतुर्थ श्रेणी के रेल कर्मियों के पास इस तरह बैठना विगत कई दशकों में नहीं हुआ। जब मैं जूनियर स्केल का अफ़सर था – सन् 1985-86 के आसपास, तब यार्ड में शण्टिंग कराते समय यार्ड मास्टर और प्वॉइण्ट्समैन आदि से बहुत मेल जोल रहता था। उनके साथ चाय भी पीता था और यदा कदा उनके साथ भोजन भी किया। याद आता है कि बारिश के मौसम में उन कर्मियों को बरसाती नहीं मिली थी तो यार्ड से ही मण्डल रेल प्रबन्धक को एक तल्ख मैसेज भेजने के कारण डीआरएम महोदय ने मुझे अपने चेम्बर में बुलाया था। डांटने लगे तो मैने कहा था, कि प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने के लिये डांट भले लीजिये, पर उन कर्मियों केलिये बरसाती और गम-बूट तो जल्दी दिलवा दीजिये। … पता नहीं , डीआरएम साहब ने मुझे क्या समझ पसन्द किया। वे बहुधा मुझसे बात करने लगे – सबसे सीनियर और सबसे जूनियर अधिकारी का तालमेल।

चबूतरे पर बैठ मैने इस गेट-कर्मी के बारे में पूछा। नाम है प्रेम कुमार समदर्शी। मण्डुआडीह (बनारस) से आता जाता है वह। गठिया का मरीज है – सो घर से आने जाने में दिक्कत होती है। लिहाजा आने पर लम्बे समय तक यहीं रुक जाता है। मैं आशा करता हूं कि सेफ़्टी के आला अफ़सर यह ब्लॉग नहीं पढ़ते होंगे – अन्यथा व्यर्थ की यहां वालों को काम और रेस्ट के नियमों में पेरने लगेंगे।

डेमू आ गयी थी। समदर्शी ऑलराइट दिखाने लगा। गाड़ी लूप लाइन में जा रही थी। “लूप का स्टार्टर बहुत दूर है, साहब। जब तक पार नहीं करेगी, गेट नहीं खुल सकता। पर लोग हल्ला मचाने लगते हैं।”

गेट खुला। मैं अपनी साइकल संभाल घर चला आया। लगा, कि यदा कदा रेल कर्मियों के साथ कुछ समय गुजारना चाहिये मुझे। यहां कटका के सभी प्रकार के रेल कर्मियों के साथ – सिगनल, बिजली, ट्रेफ़िक, इंजीनियरिंग… सभी के साथ।


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