अरहर के पौधे


अरहर के पौधे। आठ-दस फुट के। फूलों से लदे।
अरहर के पौधे। आठ-दस फुट के। फूलों से लदे।

उन्हे पौधे कहना एक अण्डर स्टेटमेण्ट होगा। आठ दस फुट के हो गये हैं, पेड़ जैसे हैं। फूल लगे हैं। यूं कहें कि फूलों से लदे हैं। करीब दो दर्जन होंगे। गांव के मेरे घर में अनाधिकार आये और साधिकार रह रहे हैं।

पिछले सीजन में जो थोड़ी बहुत अरहर हुई थी खेत में; फसल कटने के बाद मेरे घर के एक कोने में रखी गयी थी। उसके कुछ बीज गिरे और आने वाली बारिश में अनुकूल अवसर पा कर पनप गये। जब थोड़े बड़े हुये तो खरपतवार निराने वाली महिलाओं को पत्नीजी ने साफ़ करने को कहा था। पर निराई करने वालों की लीडर ने कहा – “नाहीं फुआ, ई रहरि हओ। रहई दअ। (नहीं बुआ, यह अरहर है, रहने दें इसे)”

उन निराई करने वाली महिलाओं का अपना एथिक्स है। घास या खरपतवार के अलावा कोई भी पौधा जो काम का हो या पेड़ बनने वाला हो; उसे काटती नहीं हैं। उन्हे निर्देश भी दिये जायें तो कोई न कोई तर्क दे कर छोड़ देती हैं। सो, निराई करने वाली महिलाओं की दया माया से ये पौधे बच गये और आज खूब छंछड़ गये हैं।

मेरे पिताजी अनुमान लगाते हैं कि पांच सेर अरहर तो निकल ही आयेगी उनसे। इन्हे देख कर ही मैं आकलन करता हूं कि इस साल अरहर की फसल अच्छी होगी और दाम काबू में रहेंगे। उस विपक्ष के घोस्ट राइटर के लिखे भाषण को पढ़ने वाले नेता को “अरहर मोदी” का नारा देने का अवसर नहीं मिलेगा।

घर में – करीब आठ बिस्वा जमीन में अनेक वनस्पतियां, अनेक जन्तु साधिकार आ गये हैं। शहर में रहते तो एक फ्लैट में गमले में कुछ देसी/विलायती पौधे पनपाते। यहां वे ऐसे हैं मानो घर उन्ही का हो और हमें रहने दे कर कृतार्थ कर रहे हों हमें।

पर शायद “मानो” सही शब्द नहीं है। वे वास्तव में कृतार्थ कर रहे हैं हमें और सही मायने में यह गांव में रहने का आनन्द है।

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मैं लेखक नहीं हूं (शायद)


win_20170211_07_58_12_proमेरी ब्लॉग पोस्टों में शायद शब्द का बहुत प्रयोग है। पुख्ता सोच का अभाव रहा है। लिखते समय, जब कभी लगा है कि भविष्य में अमुक विषय में अपनी सोच को स्पष्टता दूंगा (सोच को फ़र्म-अप करूंगा), तो शायद का प्रयोग करता रहा हूं। बतौर एक टैग के।

अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई में प्रॉबेबिल्टी और सांख्यिकी (Probability & Statistics) मेरा प्रिय विषय रहा है। समय के साथ इन्जीनियरिंग भुला दी, पर हर परिस्थिति में अपने विचार को तोल कर उसे एक प्रॉबेबिल अंक देने की प्रवृत्ति बनी है – आज भी। अत: जब यह लिख रहा हूं कि “मैं लेखक नहीं हूं” तो उसको तोल रहा हूं कि कितने प्रतिशत लेखक हूं मैं – और वह अंक 50% से कम ही बन रहा है।

रिटायरमेंट के समय मन में था कि बहुत कुछ लिखूंगा। अब सवा साल होने को है और लेखन के नाम पर लगभग शून्य है। पहले यह था कि इंटरनेट की दशा खराब थी घर में। ब्लॉग पर जो पहले लिखा था, उसका अवलोकन और सम्पादन नहीं हो पा रहा था। सो ब्लॉग से मन उचट गया। यद्यपि समय का उपयोग पढने और साइकल ले कर अपना गंवई परिवेश देखने में बहुत हुआ। वह अनुभव कम ही लोगों को होता होगा। उस दौरान सोचा भी बहुत। लगता था कि अगर वह सब लिखा जाये तो महत्वपूर्ण दस्तावेज – पुस्तक – बन सकता है। ऐसी पुस्तक जिसे शायद अच्छी खासी संख्या में पाठक मिल सकें।

पर लिखा कुछ भी नहीं।

सो, तकसंगत तरीके से कहूं तो मैं लेखक नहीं हूं। पर मैं यह भी जानता हूं कि जिन्दगी; जो कुछ भी है; तर्कसंगत जैसी कोई चीज नहीं है। जिन्दगी स्पोरेडिक, जर्की, मनमौजी और जुनूनी चीज है। कब कैसी निकलेगी; कब कौन सी राह पकड़ लेगी; कहा नहीं जा सकता। सो पोस्ट की हेडिंग में शायद शब्द का प्रयोग किया है मैने।

यह भी अहसास होता है कि जिन्दगी की दूसरी पारी में समय पहली पारी जितना नहीं है। पहली पारी से अधिक अनुभव है। पर पहली पारी की ऊर्जा नहीं है शायद। और ऊर्जा ऑवर-ग्लास से बहुत ज्यादा झर जाये, उसके पहले उसका पर्याप्त दोहन कर लेना चाहिये।

मैं ट्विटर पर अपनी पिन की हुई ट्वीट पर एक नजर फिर डालता हूं –

“अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है। अभी तो इस परिन्दे का इम्तिहान बाकी है। अभी अभी मैने लांघा है समन्दर को। अभी तो पूरा आसमान बाकी है।”

दूसरी पारी के आसमान पर बहुत कुछ लिखना है। पर कैसे लिखोगे जीडी, अगर लेखक नहीं हो? तुम्हारे शब्दकोष में मात्र कुछ हजार शब्द हैं। शायद दो हजार से कम। तुम्हारी एकाग्रता – कंसन्ट्रेशन भी गौरैय्या की तरह है। इधर उधर फुदकती है। पहले अपना व्यक्तित्व बदलो बन्धु।

यह लिख रहा हूं कि शायद इसी से व्यक्तित्व की शायदीयता खत्म हो सके। शायद विचार फुदकने की बजाय फर्म-अप होने लगें।

लिखना है। बाज को उडान भरनी है। शायद