धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर

कुनबीपुर में खीरे का मोलभाव और खरीद कर आगे बढ़े राजन भाई और मैं। आगे धईकार बस्ती थी उसी गांव में। सवेरे सवेरे लोग काम पर लग गये थे। स्त्रियां बरतन मांज रही थीं। बच्चे खेलने में मशगूल हो गये थे। बकरियां और मुर्गियां इधर उधर मुंह मार रही थीं।

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सवेरे का शीतल समय। धईकार बस्ती में सब काम पर लग गये थे। वह दऊरी बना रहा था।

वह बन्दा सवेरे दऊरी बनाने के काम में लग गया था।

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दऊरी बनाने के औजार। नीचे बांका है और दायें हाथ में बांकी।

राजन भाई को देख उसने पैलगी की। मुझे चित्र लेता देख थोड़ा संभल कर बैठ गया। मैने पूछा उसके औजारों के बारे में। गंड़ासा नुमा औजार को उसने बताया – बांका।  उसका प्रयोग वह बांस काटने में करता है। उससे छोटी बांकी। बांकी से महीन काम करता है वह – बांस को छीलना, दऊरी की सींके बनाना आदि। दऊरी बुनने के बाद उसके ऊपर बांस का रिंग नुमा गोला लगाता है। उसी से दऊरी में मजबूती आती है। उसने बिनी दऊरी और गोला दिखाया मुझे।

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दऊरी की बुनावट देखी मैने। बहुत सुघड़ थी। बांस की सींकें जो प्रयोग की गयी थीं, उनमें कहीं कोई एसा कोना नहीं था जिससे उपयोग करने वाले की उंगलियों में फांस लग जाये। दऊरी का आकार भी पूर्णत:अर्ध गोलाकार था। उस आदमी ने दाम बताया डेढ़ सौ रुपये। दिन भर में एक ही बना पाता है – ऐसा उसने बताया। यह भी जाहिर किया कि इस काम में बरक्कत नहीं है – साहेब, बांस भी कितना मंहगा हो गया है। 

आसपास के खेतों में खटीक-किसान यह दऊरी का प्रयोग करते हैं। उसके स्थान पर प्लास्टिक के टब का प्रयोग नहीं होता। अभी भी दऊरी का प्रयोग बेहतर और किफ़ायती दोनो होगा, अन्यथा इन लोगों का कामधाम खत्म हो गया होता।

कामधाम खत्म तो हो ही रहा है। दोना-पत्तल तो लगभग प्रयोग से बाहर ही हो गये हैं। बंसवारी खत्म हो रही हैं तो बांस की बनी वस्तुयें भी कम होती जा रही हैं। मन में आता है कि इन सभी लुप्त होती विधाओं का दस्तावेजीकरण कर लूं मैं। लेखन/चित्र/वीडियो के माध्यम से। PARI – People’s Archive of Rural India ऐसा ही कर रहा है।

राजन भाई को मैं इस बारे में कहता हूं। वे भी समझते हैं इस जरूरत को। यद्यपि इस तरह का कोई काम उन्होने किया नहीं है, पर मेरे साथ घूमते और चित्र आदि सोशल मीडिया पर पोस्ट करते उन्हे यह लगने लगा है कि गांव के इलाके को अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर लाने का यह अच्छा तरीका है।

उस कारीगर को बताते हैं – तोर फोटो लेहे हयेन। अब अमेरिका, लन्दन, सगरौं जाये तोर फोटो। तब एक्स्पोर्ट आर्डर मिले (तेरा फोटो ले लिया है। अब विदेशों में जायेगा यह फोटो और उससे मिलेंगे एक्स्पोर्ट के आर्डर)।

गांव के मनई से बात करना खूब आता है राजन भाई को। आखिर यहीं रहे, पले, बढ़े हैं वे। उनके साथ घूमने का आनन्द भी है और जानकारीयां पाने का लाभ भी।

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