झिनकू


झिनकू

झिनकू औराई के आगे फुटपाथ पर रहता है। कुल 5-7 परिवार हैं बांस की दऊरी, बेना आदि बनाने वालों के। आजमगढ़ के रहने वाले हैं ये। अपने गांव पांच साल में एक बार जाते हैं – तब जब प्रधानी का चुनाव होता है। जिसे वोट लेना होता है, वही ले कर जाता है। वही खर्चा देता है।

यहीं रहते हैं तो तय है कि अपनी मेहनत से कमाते होंगे। कोई जरायम पेशा नहीं|

मैंने उसे एक चेंगारी – बड़े कटोरे बराबर की दऊरी बनाने का ऑर्डर दिया। 100रू में एक। चेंगारी बनाई तो अच्छी पर कुछ बड़े आकार की। मन माफिक आकार की होती तो और बनवाता। न होने पर रिपीट ऑर्डर नहीं दिया।

मन था कि धईकारो के इस कौशल को अमेजन पर एक व्यवसाय का रूप दूँ। वह तालमेल झिनकू से न हो पाया।
कोई और झिनकू मिलेगा फिर कभी। फिर कहीं।

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डा. दुर्गातोष पाण्डेय की रचनाधर्मिता पर विचार


Durgatoshडा. दुर्गातोष पाण्डेय ऑन्कॉलॉजिस्ट हैं। केंसर विशेषज्ञ। भारत के अन्यतम केंसर विशेषज्ञों में अग्रणी। उम्र लगभग 44 साल। गूगल सर्च करने पर उनके विषय में शब्द उभरते हैं – बेस्ट ऑन्कॉलॉजिस्ट ऑफ़ इण्डिया। गूगल पर उनके विषय में 19 रिव्यू हैं और सब पॉजिटिव! रेटिंग 4.9/5 है। लगभग यही रेटिंग उनके फ़ेसबुक पेज पर है।

मुझे लगा कि यह व्यक्ति तो केंसर के फील्ड में ही घूमता होगा। सोते जागते उसे केंसर की बलात म्यूटेट करती सेल्स ही नजर आती होंगी। बातचीत में भी उसी फ़ील्ड की भारी भरकम टर्मिनॉलॉजी से लोगों को आतंकित करता होगा।

अपने लड़के की ब्रेन इंजरी के चक्कर में अनेकानेक न्यूरोसर्जन्स से पाला पड़ा है मेरा। उनमें से अधिकांश (तीन अन्यतम व्यक्तियों को छोड़) अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता के केकून में बंधे नजर आये। अत: विशेषज्ञ डा्क्टरों के प्रति मन में कोई बहुत अच्छी धारणा नहीं है मेरी।

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डा. दुर्गातोष पाण्डेय

जब डाक्टर पाण्डेय से मिलने का योग बना तो यही विचार मन में था। उनके बारे में नेट पर जो सामग्री छानी, उसमें एक बात ने ध्यान आकर्षित किया – दुर्गातोष जी ने एक पुस्तक लिखी है। अ पीप इनटू वॉइड (A Peep into Void)| यह केंसर विषयक नहीं है। क्वाण्टम थियरी, यूनिफ़ाइड फील्ड थियरी, काल, अनन्तता, पदार्थ और ऊर्जा के आपसी सम्बन्ध, दर्शन, भौतिकी, गणित और तर्कशास्त्र के इलाके की पुस्तक है। 

अजीब लगा मुझे। अपने अतीत के बारे में कई बातें मुझे याद हो आयीं। याद आये अपने गणित के डीन डा. विश्वनाथ कृष्णमूर्ति। जो हमें ललचाते रहे कि अपनी इन्जीनियरिंग की पढ़ाई की बजाय गणित पकड़ें और जीवन में फील्ड मेडल पाने का सपना पालें। याद आये बायोलॉजी के प्रोफेसर दासगुप्ता जिन्होंने कोशिका के म्यूटेट होते समय धनात्मक आयन के एकाएक 180 अंश पलट कर जाने की बात कही थी और मैं दो दिन अपने द्वितीय वर्ष की भौतिकी/गणित के सहारे उसकी थ्योरी रचने की कोशिश करता रहा। अन्तत: जो बनना था, वही बना। रेल परिचालन का प्रबन्धक – जिसमें दसवीं दर्जा से ज्यादा की पढ़ाई की जरूरत नहीं होती। पर अपने कार्य के क्षेत्र से इतर कुछ कर दिखाने की एक ललक जो मन में होती है – और जिस ललक के कारण डा. दुर्गातोष पाण्डेय ने यह पुस्तक लिखी होगी – उस मनस्थिति को बखूबी जानता हूं मैं।

खैर, डा. दुर्गातोष तो यूनीफ़ाइड फील्ड थ्योरी के क्षेत्र में न जाने पर भी एक अन्यतम विषय के अन्यतम विशेषज्ञ बन गये। लिहाजा उनके मन में कोई मलाल तो नहीं ही होगा कि गणितज्ञ/दार्शनिक/तर्कशास्त्री/भौतिक-विज्ञानी या उप्निषदिक जगत के विद्वान नहीं बने। और जो उनसे मिल कर मुझे लगा – वे अन्यतम इन्सान अवश्य हैं।

PeepInToVoidउनकी पुस्तक A Peep into Void नुक पर तो है, पर अमेजन किंडल पर नहीं। अमेजन से पेपरबैक में इस लिये नहीं खरीदी कि जाने कितने दिन बाद मिलेगी और गांव के पते पर कहीं डिलिवर होने की बजाय वापस न चली जाये। मैने डा. दुर्गातोष से अनुरोध अवश्य किया है कि उसे किण्डल पर उपलब्ध कराने के लिये अपने पब्लिशर को कहें। देखें, क्या होता है।

वैसे उनका विषय मेरे लिये बहुत रोचक है। डॉन ब्राउन का उपन्यास – एंजल्स एण्ड डेमोन्स (Angels and Demons) अभी अभी खत्म किया है मैने जिसमें मैटर और एण्टीमैटर के योग से ऊर्जा बनने की अवधारणा से बहुत बढ़िया थ्रिलर बन गया है। मन में मैटर/एण्टीमैटर और ऊर्जा के योग संयोग घूम रहे हैं और उस में डा. पाण्डेय की पुस्तक पर छपा सर्प युग्म (सर्प, जो एक दूसरे को खा कर पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे। दोनों में से कोई नहीं बचेगा!)

डा. दुर्गातोष से मिल कर एक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगी, वह उनकी सहजता और उनकी सामान्य व्यक्ति/मरीज से सम्प्रेषण की खूबी थी। हिन्दी में अपने मरीजों से बात करते हुये जबरी विषेषज्ञता के भारी भरकम शब्द ठेल कर उन्हे आतंकित नहीं कर रहे थे। अन्यथा, विकास दुबे जैसा मेरा ब्रदर-इन-लॉ, जो ऑपरेशन के नाम से वैसे ही घबरा रहा था और नम आंखों वाली उसकी पत्नी निधि कभी भी सहज न हो पाते। अपनी पुस्तक के प्रारम्भ में उन्होने अपने को हम्बल केंसर सर्जन कहा है। यही विनम्रता उनकी यू.एस.पी. है! Intro

डा. दुर्गातोष ने  कभी अपने (बतौर ऑन्कॉलॉजिस्ट) मानवीय अनुभवों पर कोई पुस्तक लिखी तो मैं समझता हूं कि बहुत सशक्त पुस्तक होगी वह! और 44 साल की उम्र तथा 12 साल बतौर विशेषज्ञ अनुभव के आधार पर वह पुस्तक जरूर लिखी जा सकती है! इस बीच इस पुस्तक – अ पीप एनटू वॉइड पढ़ने की इच्छा रखता हूं।

रामप्रसाद दूबे, कांवरिया


अधिकांश कांवरिये समूह में थे। वह अकेला चला जा रहा था सवेरे सवा छ बजे। अपनी धुन में। उसके पास रंगबिरंगी कांवर भी नहीं थी। एक रस्सी से दो छोटे प्लास्टिक के जरीकेन लटकाये था कांधे पर। एक आगे और एक पीछे। कपड़े एक शंकरजी के छापे वाला टीशर्ट और नेकर, केसरिया रंग में, भी पुराने लग रहे थे। मुझे लगा कि वह अरुण की चाय की चट्टी पर रुकेगा; पर वह चलता चला गया। अभी यहां से बनारस 38 किलोमीटर दूर है। आज पूरा दिन तो लगेगा ही।

उससे मैने पूछा कब चले थे?

कल सवेरे दस बजे। प्रयागराज से। प्रयाग यानि संगम। दारागंज के पास से।

अब तक वह व्यक्ति नब्बे किलोमीटर चल चुका है एक दिन से भी कम हुआ। कैसे चला होगा?

मुझे लगा कि गलत सुना मैने। अत: फिर पूछा कल चले थे कि परसों?

कल। पास में 100रुपये थे। जल उठाया प्रयाग में तो चलते चले गये। पुल पार कर इस पार आने पर हुआ कि अब चाय पी लूं। चाय पी कर जब टटोला तो पाया कि सौ रुपये का नोट कहीं गिर गया था। उसके बाद तो लगा कि कहीं रुका भी क्या जाये। पैसे थे नहीं तो चलता चला गया। रात भर चलता रहा हूं।

अवधी में बोल रहा था वह व्यक्ति। मैने परिचय पूछा। नाम बताया रामप्रसाद दूबे (दूबे पर जोर दिया – “बाभन हई“)। गांव पांहों जिला मिर्जापुर। कहने को चार भाई हैं, पर अपना कोई नहीं। मांबापपत्नीबच्चे कोई नहीं है।

उसने मेरी संवेदना की नब्ज बहुत कस कर दबा दी थी अपना हाल और परिचय बता कर। मैने कहा चलो, चाय पी लिया जाये।

कटका पड़ाव की नुक्कड़ की दुकान पर बैठे हम। बैठने के पहले रामप्रसाद ने अपने जरीकेन चाय की दुकान की मड़ई के बांस पर लटका दिये।

मैने एक कुल्हड़ चाय पी। उसे दो कुल्हड़ पिलाई। चाय पीते हुये रामप्रसाद ने बताया कि उनकी शादी हुई थी; पर साल भर में ही पत्नी चल बसी। टीबी थी उसे शायद। लोगों ने बात छुपा कर शादी कर दी थी। पत्नी के मरने के बाद दूसरी शादी नहीं की उन्होने।

करते क्या हो?

दो पंड़िया हैं। उन्ही को पालता हूं। अभी पड़ोस वाले को सहेज कर आया हूं। चाराकबार (भूसा) का इन्तजाम कर। खेतीजमीन नहीं है। थोड़ी जजमानी है। उसी से काम चलता है। जजमान भी जब बुलाते हैं तभी जाता हूं।

मैं जितना रामप्रसाद को सुन रहा था, उतना संवेदित हुये जा रहा था। … गांवदेहात में ऐसे आदमी की भी जिन्दगी चल रही है। इतनी विपन्नता का भाव अगर मुझे एकआध घण्टे के लिये भी हो जाये तो शायद अवसाद में पागलपन का दौरा सा पड़ जाये! यह आदमी सहजनिरपेक्ष भाव से बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ाने जा रहा है। बीस घण्टे से चलता चला जा रहा है।

धन्य शंकर जी! क्या दुनियां है आपकी!

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कटका पड़ाव की चाय की दुकान पर रामप्रसाद दूबे। चाय पीने के बाद।

दुकान वाले को मैने कहा कि एक पाव पेड़ा भी दे दें इन्हे। रामप्रसाद ने कहा कि पेड़ा अभी नहीं खायेंगे वे। पेड़ा गंठिया कर रख लिया अपने गमछे में। मैने उन्हे 50रुपये भी दे दिये; यह कहते हुये कि बनारस तक का उनका काम तो चल जायेगा।

रामप्रसाद ने हाथ जोड़ कर मेरा अभिवादन किया। बोले हां, बनारस तक का इन्तजाम हो गया। आगे जैसा भोलेनाथ करेंगे, वैसा होगा।

गमछे में दो गांठे और थीं। मैने पूछा क्या है। रामप्रसाद ने बताया कि एक में सुर्ती/चुनौटी है। दूसरे में कुछ सिक्के। कुल मिला कर 11 रुपये। रामप्रसाद ने अगर पहले बताया होता कि एमरजेंसी फण्ड में उनके पास 11रु हैं तो शायद मेरी संवेदना की नब्ज उतने गहरे से नहीं दबती कि मैं पेड़ा और पचास रुपये उन्हे देता। पर भले हीं गंवई हो, जजमानी करने वाला बाभन इतनी साइकॉलॉजी जानता है कि किसी अपरिचित में करुणा कैसे उद्दीपित की जा सकती है।

सवेरे सवेरे बटोही के साथ चहलकदमी करते हुये आज विशुद्ध देशज भारत के दर्शन हुये। रामप्रसाद दुबे बाबा विश्वनाथ के दरबार में जा रहे थे। वहां जो पुण्य़ उन्हे मिलने जा रहा था; उसमें मैने जानेअनजाने अपने को भी टैग कर दिया, एक सौ दो रुपये का खर्च कर।

रामप्रसाद आगे बढ़े बनारस की ओर। मैं अपने घर की ओर लौट चला।DSC_0353