भदोही की आर्कियॉलॉजी के तत्वशोधक रविशंकर

प्रोफेसर (डा.) अशोक सिंह ने अगियाबीर टीले के खुदाई स्थल मुझे रविशंकर से परिचय कराते बताया कि अगर आपको भदोही के पुरातत्व पर जानकारी चाहिये तो इन (रविशंकर) से बेहतर सोर्स कोई नहीं। तभी मुझे लग गया कि मुझे रविशंकर जी को कस कर पकड़ना है अपने आस-पास की जानकारी में गहराई और सांद्रता लाने के लिये।

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रविशंकर

यहां जिससे भी बात करो – तथाकथित जागरूक स्थानीय से भी – तो वे भदोही को मात्र भरों से जोड़ते हैं। पर आसपास जो भी दिखता है, उसे मेरे जैसा सतही जानकारी वाला जीव भी भांप सकता है कि वह सब 1200ईस्वी के बहुत पहले की सभ्यता की बदौलत है। दूसरे; भर या भारशिव केवल भदोही में नहीं हैं। विकीपेडिया पर एक काल में उत्तर भारत के बड़े हिस्से में उनका प्रभाव दिखता है। तब भर या भर-द्रोह को भदोही मात्र से जोड़ना और भदोही की पहचान वही बना देना क्या चीज है?

मैने अपने आप से कहा – “जीडी, अगर इस इलाके में तुम्हें अपने जीवन का तीसरा और चौथा भाग काटना है तो रविशंकर जैसे से मिलना और जानकारी समेटने-सहेजना तुम्हारी बंजर बौद्धिक जमीन को जबरदस्त नैसर्गिक उर्वरक इनपुट देगा। मत चूको उससे।“

और मैने रविशंकर जी से फोन कर समय मांगा। अगियाबीर टीले पर आर्कियॉलॉजिकल खुदाई सवेरे छ बजे प्रारम्भ हो जाती है। अपने साथ कर्मी ले कर रविशंकर छ बजे वहां पंहुंच जाते हैं। वहीं उनके किशोर महराज (बीएचयू के रसोइये) नाश्ता-चाय ले कर 8-9 बजे के बीच पंहुचते हैं। इग्यारह बजे तक खुदाई चलती है।

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अगियाबीर की खुदाई निर्देशित करते रविशंकर

दोपहर के भोजन/विश्राम के बाद तीन से शाम छ बजे दूसरी शिफ्ट में खुदाई चलती है। पूरे खुदाई के समय वहीं मौजूद रह कर निर्देशित करने और प्राप्त सामग्री को तरतीबवार जमवाने का काम करते हैं रविशंकर जी। खुदाई करने वाले कर्मी यद्यपि लम्बे अनुभव के कारण पुरातत्व की आवश्यकताओं के प्रति पर्याप्त संवेदित किये जा चुके है; पर खुदाई उनके भरोसे छोड़ कर ये पुरातत्ववेत्ता वहां से हट नहीं सकते। मेरे फोन करने पर रविशंकर जी ने कहा कि शाम 6 बजे खाली हो कर वे नहाने के बाद सात बजे चाय पीते हैं। उस समय मैं उनसे मिलने आ सकता हूं।

शाम सात बजे, सूर्यास्त बाद के धुंधलके में, द्वारिकापुर के प्राइमरी स्कूल, जहां पुरातत्व विभाग की टीम रुकी है, पंहुचा मैं। बहुत आत्मीयता से मिले रविशंकर जी। साथ में दो अन्य व्यक्ति – आशीष और पटेल जी भी थे। लगभग एक घण्टा समय दिया रविशंकर जी मुझे और बताया अपने भदोही पर किये शोध के बारे में।

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संझा समय द्वारिकापुर प्राइमरी स्कूल पर अपने कैम्प में मिले रविशंकर। चाय पीते हुये हुई चर्चा।

बीएचयू के एक कुशल अध्यापक की तरह हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने और अपनी बात दृढता से कहने की वाक्पटुता है रविशंकर में। वैसी कुशलता मैं अपने आप में डेवलप करने के स्वप्न देखता हूं। और कहीं न कंहीं यह भी जानता हूं कि अब वैसी पटुता सम्भव नहीं है पाना! अंत: मन्त्र मुग्ध सा सुनता हूं रविशंकर जी को।

भदोही की बात करते रविशंकर बताते हैं कि भर-द्रोह भर में भदोही का इतिहास समेटना एक व्यापक षडयन्त्र का हिस्सा है – उस प्रकार के लोग जो 1200-1400इस्वी के मध्य भरों के किलों के होने और उसके बाद मुहम्मद गोरी की सेना द्वारा पददलित/ध्वस्त किये जाने को ही भदोही के इतिहास का खूंटा मानते हैं; उन लोगों का षडयन्त्र। और इस षडयन्त्र में स्यूडो-सेक्युलर लोग महती भूमिका निभाते हैं।

भदोही के प्राचीन इतिहास के बारे में रविशंकर जो भी कह रहे थे, उसकी भाषा मेरी स्मृति में जस की तस नहीं है, नोट्स भी बहुत अच्छे लिये नहीं हैं; पर उनके कहने से यह जरूर समझ गया कि आज से 50 हजार से 5 हजार साल पहले तक गंगा की धारा बहुत उथली थी और वे अपना कोर्स व्यापक रूप से बदलती थीं। बहुत कुछ कोसी नदी की तरह। भदोही जिले में सभी पुरातत्व स्थल (100 के आसपास तो रविशंकर जी ने ही आइडेण्टीफ़ाई किये हैं अपने सर्व में) कमोबेश गंगा के किनारे ही थे नव पाषाण युग में। कालान्तर में गंगा की धारा संयत हुई और वर्तमान दशा में (लगभग) स्थिर हुई।

रविशंकर मेरे समक्ष इतिहास-प्रागैतिहास का तिलस्म खोल रहे थे – यह द्वारिकापुर जहां हम बैठे थे; वह तब भी यहीं था और इसी नाम से! उन्होने बताया कि भदन्त आनन्द कौशल्यायन का पाली से अनुदित कुलाल जातक का उन्होने अध्ययन किया। उसमें वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म की चर्चा है – वाराणसी नगर के द्वारग्राम में कुम्भकार कुल में उत्पन्न पूर्व जन्मना तथागत। यह संदर्भ 600 बीसी के आसपास द्वारग्राम (द्वारिकापुर) में एक बड़ी कुम्हार बस्ती का होना बताता है।

रविशंकर बताते हैं कि भूमि खनन का माफिया (या निरीह किसान भी) खेत-जमीन से मिट्टी निकालने की प्रक्रिया में आर्कियॉलॉजिकल साइट्स को खत्म किये दे रहा है। इलाके की 100 में से तीस-चालीस प्रतिशत साइट्स उनके देखते देखते गायब या इनसिग्नीफिकेण्ट हो गयी हैं।

भदोही का इतिहास भू ठेकेदार माफिया; मनरेगा और खनन विभाग की तिकड़ी द्वारा नष्ट कर दिया जा रहा है और आर्कियालॉजिकल सर्वे वाले भिखारी के मानिन्द वह सब होते देख रहे हैं!

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खनन माफिया के आराध्यदेव हनुमान जी।

रविशंकर भदोही को भद्रा नदी (कूर्म/वाराह पुराण में वर्णित गंगा का एक नाम भद्रा) या जिले में प्राप्त भैदपुर (भद्रपुर) जो मौर्यकालीन पुरातत्व प्रमाण युक्त स्थान है अथवा भदरांव (भद्रांव) से जोडने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार ये जगहें वहां हैं, जहां गंगा (भद्रा) कभी बहती रही होंगी। रविशंकर स्वयम् अपनी इस सोच से संतुष्ट नहीं हैं; पर वे इस दृढ मत के हैं कि भदोही के नाम और इलाके का अस्तित्व 1200 इस्वी से तो कहीं ज्यादा पुराना है। नव पाषाण युग तक तो वह जाता ही है।

रविशंकर से मिल कर मैं अपने घर के लिये जब चला तो वे और उनके दोनो मित्र मुझे मेरे वाहन तक छोड़ने आये। पूरा आदर-सम्मान दिया मुझे और भविष्य में अनेकानेक उठने वाले मेरे सवालों का उत्तर देने का प्रयास करने का आश्वासन भी दिया।

चलते समय मुझे लगा कि डा. अशोक कुमार सिंह, रविशंकर (और कुछ सीमा तक मैं भी) गंगा नदी के इर्दगिर्द अपने लिये वर्तमान और भविष्य का स्थान खोज रहे हैं। हम लोग अपने लिये लीगेसी (legacy – भविष्य की पीढियों के लिये छोड़ी जाने वाली अपनी विरासत) के मेगालिथ खोज रहे हैं। डा. अशोक को वह अगियाबीर में नजर आता है। रविशंकर (भले ही भदोही पर रिसर्च करने को रिलक्टेण्टली तैयार हुये) भदोही इलाके के प्रागैतिहास/इतिहास में वह लीगेसी तलाश रहे हैं। मुझे अपने ब्लॉग से उम्मीद है कि कालान्तर में वह मुझे लीगेसी प्रदान करेगा। ब्लॉग जो आस-पास (मुख्यत: गंगा नदी के इर्दगिर्द) घूमता है। गंगा नदी अमृतवाहिनी हैं और हम लोगों को – डा. अशोक, रविशंकर और मुझे – लीगेसी का अमृतत्व प्रदान करेंगी। बस, अपनी अपनी जद्दोजहद; अपनी अपनी कशमकश में हम लगे रहें।… अमृतस्य गंगा!

अपनी धुन में रमे हैं और अपनी धुन के पक्के हैं डा. अशोक और रविशंकर। और यह सुदृढ लीगेसी के अमृत की चाह, एक जुनून से ही मिलती है! मुझे पक्का यकीन है उस विषय में!

हां, पूरा और पक्का!

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रविशंकर जी ने खींचा अगियाबीर पुरातत्व खनन स्थल पर मेरा (बायें), शिवकुमार (विभागीय ड्राफ़्ट्समैन) और किशोर महराज (रसोईया) का चित्र।

Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://halchal.blog/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyan1955

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