पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज


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प्रयागराज गया था मैं पिछले मंगलवार। ढाई दिन रहा। शिवकुटी का कोटेश्वर महादेव का इलाका बहुत सुन्दर चित्रों वाली दीवालों से उकेरा हुआ था। पहले यह बदरंग पोस्टरों से लदा होता था। बड़ा सुन्दर था यह काम।

(अर्ध) कुम्भ मेला तीन महीने में होगा प्रयागराज में। कई शताब्दियों बाद शहर का नाम पुन: प्रयागराज हुआ है। शिवकुटी में जो भी लोग मिले, सबने कहा कि मैं मेले के समय प्रयाग में ही रहूं। ये चित्र देख कर जोश मुझे भी आ रहा था कि प्रयागराज में अगले कुम्भ मेले के दौरान रहना अच्छा अनुभव होगा। Continue reading “पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज”

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धोख


मैं उसे बिजूका (scarecrow) के नाम से जानता था, यहां उसे गांव में धोख कहते हैं। शायद धोखा से बना है यह। खेत में किसान की फसल को नुक्सान पंहुचाने वाले हैं जंगली जानवर (नीलगाय या घणरोज़) और अनेक प्रकार की चिड़ियां। उनको बरगलाने या डराने के लिये है यह धोख।

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खेत के दूसरे किनारे के निकट था धोख। मैने अपनी साइकिल सडक के किनारे खड़ी की। जोन्हरी (ज्वार) का खेत था। बालें फूट गयी थीं। दो सप्ताह में फसल तैयार हो जायेगी। दिवाली तक कट जायेगी। खेत में और मेड़ पर नमी थी। पानी भी था कहीं कहीं। चलना कठिन काम था। एक बार तो सोचा कि धोख जी से मिले बगैर लौट लिया जाये। पर अन्तत: उन तक पंहुच ही गया।

धोख जी अटेंशन अपनी एक टांग पर खड़े थे। किसी सजग प्रहरी की तरह। उनकी एक टांग तो बांस था जिसपर उन्हे बनाया गया था। पजामे की दूसरी टांग यूं ही फहरा रही थी। मानो किसी दुर्घटना में एक पैर कट गया हो। एक कुरता पहना हुआ था धोख जी ने। ठीक ठाक और साफ़ था। हांथ पीटी करते व्यक्ति की मुद्रा में साइड में फैले थे। सिर किसी घरिया पर काला कपड़ा लपेट कर बनाया गया था। बहुत कलात्मक तो नहीं थे धोख जी, पर जीवन्त थे। उन्हे देख कर आभास होता था कि कोई व्यक्ति खड़ा है।

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कौव्वे, मुनियां, गौरय्या, मैना आदि जोन्हरी खाने आती हैं। जोन्हरी और बाजरे का तना मोटा होता है, इसलिये कौव्वे और तोते जैसे कुछ बड़े पक्षी भी दाना चुग लेते हैं।

चिड़ियां आपस में कहती होंगी – “अरे राम, कौनो मनई खड़ बा। हम न जाब (हे भगवान, कोई आदमी खड़ा है, मैं नहीं जाऊंगी)।”

DSC_1293जो जानकार होती होगी वह साहस बंधाती होती – मत डेराऊ गोंईयां, ई त मनई नाहीं, धोख हौ ( डरो मत सखी, यह आदमी नहीं धोख है)।

इसी तरह मादा नीलगाय भी ठिठकती होगी खेत के आसपास। कतरा कर निकलता चाहती होगी। पर अगर उसका झुण्ड का सरदार अनुभवी और लम्बी दाढी वाला कद्दावर घणरोज हुआ तो वह कहता होगा – “अरे डियर, फिकर नॉट। देखती नहीं हो, यह बिजूका है। धोख। इससे अगर हमारा झुण्ड डरता रहा तो भूखे मर जायेगा। चलो, घुसो और चर डालो खेत। बच्चे भी निष्कण्टक खेत में चलें।”

चित्र लेते समय मैं सोच रहा था – अगर मैं लिक्खाड़ लेखक होता तो “एक धोख की आत्मकथा” जैसा कुछ लिखता।

घर लौटने को देर हो गयी थी। सेण्डल खेत में पानी और कीचड़ से सन गयी थी। धोख का चित्र लेने का मिशन पूरा कर मैं सडक पर लौटा और साइकिल उठा, घर की ओर चला।


विजय बहादुर बिन्द और दिघवट का टीला


विजय बहादुर बिन्द की झोंपड़ी है दिघवट के टीले पर। वह टीला, जिसको सरसरी निगाह से देखने पर भी 2500 साल पहले की सभ्यता के दर्शन हो जाते हैं – पुरानी बिखरी ईटों और मृद्भाण्ड के टुकड़ों के माध्यम से। वह झोंपड़ी तो टीले की ग्राम सभा की जमीन पर है। झोंपड़ी तो यूं ही बना ली है। पास में उनकी चार बिस्से जमीन पर सब्जियां उगाई गयी हैं। उसके आगे करीब डेढ़ बीघा जमीन है – जिसमें दो फसलें लेते हैं विजय बहादुर। जमीन निचली है। फिर भी दो फसलें ले पाते हैं वे।

बकौल मेरे पुरातत्वविद मित्र रविशंकर जी के, वहां  हजारों साल पहले बहुत बड़ी झील हुआ करती थी जब गंगा का विस्तार ज्यादा हुआ करता था और उनके किनारे बहुत सा पानी झीलों के रूप में रुका करता था। यह झील नाले के माध्यम से गंगा नदी से जुड़ी थी। टीले पर रहने वाले पूर्वज झील पर निर्भर थे और नाव के माध्यम से गंगा नदी से जुड़े थे।

विजय बहादुर टीले की प्राचीनता से परिचित हैं पर वे भी (अन्य भदोहियों की तरह) प्राचीनता को भरों से जोड़ते हैं। भर एक जनजातीय समूह था जो इस इलाके में प्रभुत्व रखता था। विकीपेडिया में यह अंश देखें –

४०० साल पूर्व भदोही परगना में भरों का राज्य था, जिसके ड़ीह, कोट, खंडहर आज भी मौजूद हैं। भदोही नगर के अहमदगंज, कजियाता, पचभैया, जमुन्द मुहल्लों के मध्यम में स्थित बाड़ा, कोट मोहल्ले में ही भरों की राजधानी थी। भर जाति का राज्य इस क्षेत्र सहित आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, इलाहाबाद एवं जौनपुर आदि में भी था। गंगा तट पर बसे भदोही राज्य क्षेत्र में सबसे बड़ा राज्य क्षेत्र था। सुरियांवां, गोपीगंज, जंगीगंज, खमरिया, औराई, महाराजगंज, कपसेठी, चौरी, जंघई, बरौट आदि क्षेत्र भदोही राज्य में था। गंगा तट का यह भाग जंगलों की तरह था।

विकीपेडिया भरों को 400 साल पहले से जोड़ रहा है। यह पन्ना तथ्यात्मक रूप से सम्पादन मांगता है। सम्भवत: भर थोड़े समय के लिये इस इलाके पर कब्जा जमाये थे – सम्भवत: हजार साल पहले। पर वे प्राचीनता का प्रतीक तो नहीं ही हैं। हर एक भदोहिया एक गलत जानकारी रखता है अपने इतिहास के बारे में।

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विजय बहादुर नें बताया कि कोट (टीले) पर बहुत सम्पदा है। पर वह किसी को नहीं मिलेगी।

मैने पूछा – क्यों?

“वह (प्रेतात्मा) जो मांगती है, वह आदमी के बस में नहीं है दे पाना।”

राजन भाई ने एक्स्प्लीसिट प्रश्न किया – क्या मांगती है? बलि?”

“साधारण बलि नहीं, बहुत अलग तरह की जो आदमी दे नहीं सकता।”

जैसे?

“जैसे तीन टांग की गाय, एक टांग का मुरगा और अपना जेठ लड़का”

विजय बहादुर की यह (बलि और खजाने की) बात मुझे बहुत दकियानूसी लगी। पर यही सब प्रचलित होगा गांव देहात में। इन ग्रामीणों को न तो सही इतिहास की जानकारी है, न ही वे (21वीं सदी में भी) तन्त्र,मन्त्र, बलि आदि की अवधारणाओं से ऊपर उठ पाये हैं। मैं यही आशा करूंगा कि विजय बहादुर या उन जैसे लोग कभी दिग्भ्रमित हो, खजाने की खोज में न लग जायें टीले पर।

मैने बात पलट दी। पूछा टीले पर घणरोज (नीलगाय) हैं?

“कम आते हैं आजकल। पर आने पर फसल बरबाद जरूर करते हैं। उनसे बचाने के लिये ही मड़ई बना कर रहना पड़ता है। उनके अलावा मोर थे, पर अब यहां से चले गये हैं। सांप बहुत हैं। शायद मोर न रहने से बड़ गये हैं।”

चलते समय राजन भाई को कुछ करेले दिये विजय बहादुर ने। मैने चलते चलते कहा – मिलते आता रहूंगा आपसे।


गांव में अजिज्ञासु (?) प्रवृत्ति


गांव में बहुत से लोग बहुत प्रकार की नेम ड्रॉपिंग करते हैं। अमूमन सुनने में आता है – “तीन देई तेरह गोहरावई, तब कलजुग में लेखा पावई” (तीन का तेरह न बताये तो कलयुग में उस व्यक्ति की अहमियत ही नहीं)। हांकने की आदत बहुत दिखी। लोगों की आर्थिक दशा का सही अनुमान ही नहीं लगता था। यही हाल उनकी बौद्धिक दशा का भी था। हर दूसरा आदमी यहां फर्स्ट क्लास फर्स्ट था, पर दस मिनट भी नहीं लगते थे यह जानने में कि वह कितना उथला है। बहुत से लोगों को अपने परिवेश के बारे में न सही जानकारी थी, न जिज्ञासा। कई नहीं जानते थे कि फलानी चिड़िया या फलाना पेड़ क्या है? और वे अधेड़ हो चले थे।

पर निन्दा मनोविलास का प्रमुख तरीका दिखा। लोगों के पास समय बहुत था। और चूंकि उसका उपयोग अध्ययन या स्वाध्याय में करने की परम्परा कई पीढ़ियों से उत्तरोत्तर क्षीण होती गयी थी, लोगों के पास सार्थक चर्चा के न तो विषय थे, न स्तर।

मैने देखा कि बहुत गरीब के साथ बातचीत में स्तर बेहतर था। वे अपनी गरीबी के बारे में दार्शनिक थे। उनमें हांकने की प्रवृत्ति नहीं थी। अगर वे बूढ़े थे, तो वे जवानों की बजाय ज्यादा सजग थे अपने परिवेश के बारे में। उम्र ज्यादा होने के कारण वे ज्यादातर अतीत की बात करते थे और अतीत पर उनके विचारों में दम हुआ करता था। कई बार मुझे अपनी नोटबुक निकालनी पडती थी उनका कहा नोट करने के लिये।

ज्यादातर 25-50 की उम्र की पीढी मुझे बेकार होती दिखी। वे ज्यादा असंतुष्ट, ज्यादा अज्ञानी और ज्यादा लापरवाह नजर आये। बूढे कहीं बेहतर थे। यद्यपि इस सामान्य अनुभव के अपवाद भी दिखे, पर मोटे तौर पर यह सही पाया मैने।

मैं यह इस लिये नहीं कह रहा कि मेरी खुद की उम्र 60 से अधिक है। मैने बच्चे से लेकर बहुत वृद्ध तक – सभी से बिना पूर्वाग्रहों के सम्प्रेषण करने का किया है और जहां (भाषा की दुरुहता के कारण) सम्प्रेषण सहज नहीं हुआ, वहां ध्यान से निरीक्षण करने का प्रयास किया है। सम्प्रेषण और निरीक्षण में मेरी अपनी क्षमता की कमियां हो सकती हैं; नीयत की नहीं।

मेरे बारे में गांव के लोगों में जिज्ञासा यह जानने में अधिक थी कि सरकारी नौकरी में कितनी ऊपरी कमाई होती थी। मुझे नौकरी कितनी घूस दे कर मिली। मैं किसी को नौकरी दिलवा सकता हूं कि नहीं। रेलवे की भर्ती के लिये फ़ार्म भरा है, कैसे कुछ ले दे कर काम हो सकता है। किसी में यह जिज्ञासा नहीं थी कि एक सरकारी अफसर (मेरे अफ़सरी के बारे में वे जानते थे, इस क्षेत्र में कई बार रेलवे के सैलून में यात्रा की थी मैने, उसका ऑरा उन्होने देखा है) गांव में रह कर साइकिल से भ्रमण करने और छोटी छोटी चीजें देखने समझने की कोशिश क्यों कर रहा है? अगर वह “ऊपरी कमाई” से संतृप्त होता या उसकी प्रवृत्ति धन के विषय में उस प्रकार की होती तो क्या वह यहां आता और रहता?

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उनकी जो अजिज्ञासा (या क्या शब्द होगा इसके समकक्ष – इनडिफ़रेंस – का तर्जुमा) उनकी अपनी दशा, अपने परिवेश के बारे में थी, वही मेरे बारे में भी दिखी। मूलत: ये लोग पर्यवेक्षण और मनन की वह परम्परा कुन्द कर जुके हैं, जिसके बारे में प्राचीन भारत जाना जाता था और जिसकी अपेक्षा मैं कर यहां आया था।

उनका दूसरे के बारे में जानना या सम्बन्ध परनिन्दा की वृत्ति से ज्यादा उत्प्रेरित था। वे शायद बहुत अर्से से घटिया नेता, नौकरशाह, लेखक, शिक्षक आदि ही देखते आये हैं।

जब मैने श्रीलाल शुक्ल की रागदरबारी पढ़ी थी (और बार बार पढ़ी थी) तो यही समझा था कि यह मात्र सटायर है, जीवन का मात्र एक पक्ष या एक कोण है। पर (दुखद रहा यह जानना) कि गांव समाज “रागदरबारी” मय ही है – नब्बे प्रतिशत। गांव को किसी और तरीके से समझना, लोगों को बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट देकर क्लीन स्लेट से समझना – यह तकनीक भी बहुत दूर तक नहीं ले गयी मुझे।…

अगर गांव-देहात की कोई आत्मा होती है, तो वह मुझे अभी तक देखने में नहीं मिली। पर अभी मात्र तीन साल ही हुये हैं यहां। फिर से कोशिश, स्लेट पुन: साफ़ कर (बिना पूर्वाग्रहों के) की जा सकती है। मैं वह करूंगा भी। उसके सिवाय चारा नहीं है। अगर वह नहीं करूंगा तो मेरे अन्दर यहां आकर रहने की निरर्थकता उत्तरोत्तर और गहरायेगी।


लिखूं, या न लिखूं किताब उर्फ़ पुनर्ब्लागरो भव:


मेरे साथ के ब्लॉगर लोग किताब या किताबें लिख चुके। कुछ की किताबें तो बहुत अच्छी भी हैं। कुछ ने अपने ब्लॉग से बीन बटोर कर किताब बनाई। मुझसे भी लोगों ने आग्रह किया लिखने के लिये। अनूप शुक्ल ने मुझे ब्लॉग से बीन-बटोर के लिये कहा (यह जानते हुये कि किताब लिखने के बारे में मेरा आलस्य किस कोटि का है)।

बीन बटोर का मन नहीं हुआ और नये सिरे से लिखने का आलस्य बना रहा। कालान्तर में आग्रह करने वाले भी (शायद थक कर) चुप हो गये। इधर मेरा ब्लॉग/फ़ेसबुक पर आनाजाना कम हो गया। गांव में रहने का लाभ तो था, अनुभव खूब हुये, पर बड़ा घाटा इण्टरनेट की खराब दशा का था।

इण्टरनेट की समस्या हल करने के लिये मेरी बिटिया वाणी पाण्डेय ने सुझाव दिया कि उसके यहां आ कर पुस्तक लिखने का समय वहीं गुजारूं। उसके यहां – बोकारो में – 80एमबीपीएस का ऑप्टीकल फ़ाइबर कनेक्शन है। जो यद्यपि कही हुई स्पीड पर तो नहीं चलता, पर मुझ जैसे के लिये बड़ी तेज स्पीड वाला है। उसके यहां जाता हूं तो घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले वह वाई-फाई का वर्तमान पासवर्ड मुझे बताती है। Smile

वाणी पाण्डेय का ऑफ़र तो आकर्षक था, पर भला कोई बिटिया के यहां जम कर महीनों बैठा रह सकता है? भारतीय समाज में वह बड़ा अटपटा माना जाता है। सो अभी तक वह अवाइड करता रहा हूं। उसका परिणाम है कि लिखना भी अवाइड हो रहा है।

मैने सोचा कि किताब लेखन के लिये पहले अपने को लेखन मोड में तो लाया जाये। उसके लिये जरूरी समझा कि अपने ब्लॉग पर लिखना ही नियमित कर लिया जाये। चूंकि इण्टरनेट की दशा/स्पीड केवल रात में कुछ बेहतर होती है; मैने तय किया कि ऑफलाइन लिखा जाये दो तीन घण्टा रोज और देर रात एक घण्टे जाग कर वह अपलोड कर दिया जाये। AAAAAA

फिर ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिये लाइवराइटर (आजकल यह विण्डोज लाइवराइटर नहीं, ओपन सोर्स “ओपन लाइवराइटर” है) इन्स्टाल किया और उसमें अपना ब्लॉग एड्रेस halchal.blog लॉग इन किया। एक छोटी ब्लॉग की टेस्ट पोस्ट भी अपलोड कर लाइवराइटर प्रोग्राम को चेक भी कर लिया। उसके बाद करीब 1000 शब्दों तथा 6  चित्रों वाली पोस्ट लिखी। पर वह अपलोड करने के लिये रात में जगने पर भी बहुत मशक्कत करनी पड़ी। पांच-सात बार कोशिश करने पर भी अपलोड नहीं कर पाया। इण्टरनेट का लिंक अपलोड करने के दौरान टूट जाता था। मैने वाई फाई में जियो, एयरटेल और वोडाफ़ोन के 4जी के नेट ट्राई कर देख लिये। ये सभी अपने को हिरण बताते हैं पर सभी गांव में कछुआ हो जाते हैं।

ब्लॉग पोस्ट मैने फिर सुधारी। चित्रों के साइज घटा कर 110केबी की बजाय 40-50केबी का किया। तब जा कर दो तीन ट्राई करने में पोस्ट अपलोड हो पाई।

यह तो स्पष्ट हो गया कि यह “दिन में लेखन, रात में अपलोडन” का प्रयोग बहुत सफ़ल नहीं रहेगा। पर इस जद्दोजहद से एक लाभ होगा कि लैपटाप पर लिखने का छूटा अभ्यास री-कैप्चर हो सकेगा। दूसरे, मुझे अपने लिखने के स्टाइल (जिसमें लेखन और कैमरे का समांग मिश्रण है) बदलना होगा और चित्रों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। पुस्तक लेखन के हिसाब से वह सही भी है। उस लेखन शैली में शब्दों के द्वारा चित्र बनाने की क्षमता विकसित होनी चाहिये बनिस्पत चित्रों के सीधे प्रयोग के।

DSC_0972पुस्तक किस विषय पर हो – इसके बारे में भी मैं सोचता रहा हूं। एक तो गंगा किनारे के मेरे भ्रमण की अनेक ब्लॉग पोस्टें हैं। उनको एक बार फ़िर से पढ़ कर उनको नये सिरे से लिख कर पुस्तकबद्ध किया जा सकता है। तब के ज्ञानदत्त से आजका ज्ञानदत्त बेहतर ही लिखेगा – यह मान कर चला जा सकता है। दूसरे, मेरे पास गांव में रीवर्स माइग्रेशन का (लगभग) अलग प्रकार का अनुभव है। उसके बारे में कतरों-कतरों में मैने बहुत सोचा है। गांव का अनुभव खट्टा-मीठा है। कभी कभी लगता है कि बहुत बड़ी बेवकूफ़ी हुई है अपनी सारी जमा पूंजी गांव में फंसाने में। और कभी लगता है इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता था। गांव का परिवेश और गांव का अनुभव बहुत अच्छे और बहुत खराब के आकलन के बीच झूलता है। उसके साथ मेरा मूड भी स्विंग करता है। कभी अपने को बहुत आशावादी पाता हूं और कभी घोर मिसएन्त्रॉफ (misanthrope) समझता हूं। … लगता है यह बहुत आकर्षक विषय रहेगा, लिखने में भी और पाठक के लिये भी।

पर लिखूं या न लिखूं किताब का द्वन्द्व अभी भी कायम है। इस द्वन्द्व में पोस्ट रिटायरमेण्ट जीवन के तीन साल निकल गये हैं। रिटायरमेण्ट के पहले गांव में घूमने के लिये खरीदी साइकिल भी अब पुरानी सी हो गयी है।

इतना जरूर हुआ है कि ब्लॉग पर नियमित लिखने का मन बनाया है। पाठकों के लिये नहीं (वैसे भी फ़ेसबुक/ट्विटर के इस जमाने में बड़ी पोस्टें पढ़ने पाठक कम ही आते हैं); अपने खुद के लिये। ब्लॉग एक डायरी का काम देगा। और उससे लिखने की आदत सुधरेगी।

बाकी; “लिखूं या न लिखूं किताब” का सवाल जस का तस बना रहेगा। पुनर्ब्लागरो भव:; जीडी। Open-mouthed smile


माताप्रसाद – कड़ेप्रसाद और शीतला माता का मंदिर


नवरात्रि पर्व के पहले दिन मैं तुलापुर गांव में शीतला माता के मन्दिर गया था। यह मन्दिर जीर्णोद्धार कर बनाया गया है। मूर्तियों से लगता है कि सैकड़ों या हजार साल का रहा होगा वह मंदिर। खण्डित मूर्तियां भी रखी हैं वहां।

वैसे यह पूरा इलाका शुंग और कुषाण कालीन अवशेषों से भरा पड़ा है। मेरे पुरातत्ववेत्ता मित्र डा. रविशंकर ने बताया कि यहां पास में गंगा के प्रवाह से एक बैकवाटर की झील थी और उसके किनारे 600बीसीई की बस्ती थी।

DSC_1069<[शीतलामाता के पुराने मन्दिर पर के दीवार पर जड़ी मूर्तियां ऐसी हैं]

पर इसी पुराने मन्दिर के पास लगभग तीस साल पहले का बना शीतला माता का एक नया मन्दिर है – महराजगंज-चौरी की दो लेन की सड़क पर। वहां मिले थे कड़े प्रसाद। उनकी मिठाई की दुकान है। बगल की उन्ही की जमीन पर यह मन्दिर बनाया गया है। उन्ही की जमीन पर मन्दिर और चाय-मिठाई की दुकान – यह बिजनेस का बहुत शानदार मॉडल है। बहुत कुछ वैसा ही जैसे महानगरों में गाय और चारा ले कर बैठा व्यक्ति जिससे चारा खरीद कर उसी की गाय को लोग खिलाते हैं। लोगों की श्रद्धा का व्यवसाय।

आज कड़े प्रसाद और उनके बड़े भाई माता प्रसाद मिले दुकान पर। माता प्रसाद ने ही अधिकांश बात की। कड़े प्रसाद मात्र संपुट दे रहे थे।

DSC_1083[शीतलामाता का माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद की जमीन पर बना नया मन्दिर]

माता प्रसाद ने बताया कि मन्दिर यद्यपि उनकी जमीन पर बना है, पर बनाने में आस पास के लोगों का भी पर्याप्त सहयोग मिला है। हर साल वे गुरुपूर्णिमा पर भण्डारा भी करते हैं। उसमें भी बहुत से लोगों का सहयोग होता है। कड़े प्रसाद ने जोड़ा – भण्डारे में करीब 8-9 क्विण्टल बुन्दिया बनती है। दस हजार लोग खाते होंगे भण्डारे में।

माताप्रसाद की अम्माजी (बकौल उनके) 108 साल की हैं। सत्तर के दशक में जब मन्दिर बना था तो उसमें आग्रह अम्माजी का ही था। शीतला माता ने उन्हें ही सपने में आदेश दिया था मन्दिर बनाने के लिये। वे शीतलामाता की बड़ी भक्त हैं। (बकौल माताप्रसाद) उनके सिर पर माता आती भी थीं और तब अम्माजी ट्रान्स में चली जाया करती थीं। अब तो वे बहुत वृद्ध हो गयी हैं। चला फिरा भी नहीं जाता। अब मन्दिर की पूजा का सारा भार माताप्रसाद के तीसरे भाई जिलाजीत के जिम्मे है।DSC_1142[माताप्रसाद (दांयें) और कड़ेप्रसाद। अपनी दुकान के बाहर]

परिवार का मुख्य उद्यम यह मिठाई/चाय की दुकान है। दुकान माताप्रसाद देखते हैं। कड़े प्रसाद को दुकान पर बैठना नहीं रुचता। वे मिठाई और नमकीन बनाते हैं और गाड़ी से घूम घूम कर बेचते हैं।

दुकान से एक किलो नमकीन मैने खरीदा भी। सस्ता है। 120रु किलो। कड़े प्रसाद ने बताया कि रोफ़ाइण्ड तेल में बना है (पामोलीन में नहीं)। कड़े प्रसाद हमारे गांव में भी आते हैं मिठाई नमकीन बेचते। “लोटन गुरू (गांव के प्रसिद्ध ओझा) के यहां भी आता हूं मैं।”

नवरात्रि व्रत के कारण मैने तो नहीं खाया नमकीन पर घर पर लोगों ने चखकर बताया कि स्वाद अच्छा है।

परिवार के दो लडके अंकलेश्वर (गुजरात) में मिठाई की दुकान खोले हैं। कड़े प्रसाद से मिठाई बनाना सीखा है उन्होने। लोग गुजरात में मेहनत मजदूरी के लिये जाते हैं, पर माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद के बच्चे गुजरात गये हैं बिजनेस करने।

बिल्कुल देसी दिखने वाले भाई हैं। देसी परिवेश। पर उनके बिजनेस सेंस पर तो किसी मैनेजमेण्ट संस्थान में भाषण दिया जा सकता है। मैं तो प्रभावित हो गया उनसे। जहां इस पूर्वांचल में हर व्यक्ति सरकारी नौकरी तलाश रहा है, वहां इस विश्वकर्मा परिवार का मिठाई-नमकीन व्यवसाय बहुत आकर्षक लगा।


दिघवट का टीला – 2600 साल पहले का अतीत और वर्तमान


मेरे घर (गांव विक्रमपुर कलां, तहसील औराई, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश) से दिघवट लगभग 6-7 किलोमीटर दूर है। पहले सड़क मार्ग बहुत खटारा था,अब अच्छा हो गया है। नयी सरकार ने सडकें फिर से बनवाई भी हैं और जहां रिपेयर से काम चलता था, वहां बहुत हद तक कराया भी है। अत: वहां तक जाने-आने में कोई खास दिक्कत नहीं हुई मुझे।

मेरे घुटने के दर्द के बावजूद, वहां तक साइकिल चलाने और टीले पर चढ़ने में कोई परेशानी नहीं हुई।

इस टीले के बारे में डा. रविशंकर ने भदोही जिले के आर्कियॉलॉजिकल साइट्स के अपने शोध प्रबन्ध में जिक्र किया है। वहां जा कर देखा तो ईंटें और मृद्भाण्ड-खण्ड वैसे ही मिले जैसे अगियाबीर के टीले पर दिखाई देते थे। बाद में रविशंकर जी से फोन पर बातचीत भी हुई तो उन्होने बताया कि टीले पर 600BCE से मानव बसावट के चिन्ह हैं।DSC_1103[दिघवट के टीले की एक कटान में मृद्भाण्ड और ईंटों के अंश देखे जा सकते हैं]

टीले के पश्चिम में विस्तृत भूमि – राजन भाई के अनुसार 500 बीघा – निचली (low lying) है। रविशंकर जी के अनुसार यह झील रही होगी। बड़ी झील। ईंटवां – भीटी के बीच नाला गंगा में जा कर मिलता है। यह झील उस नाले के माध्यम से गंगा नदी से जुड़ी हुई थी। सम्भवत: ढाई हजार साल पहले यह नाला और चौड़ा रहा हो। एक विस्तृत वाटर-वे रहा हो। दिघवट के कोट की प्राचीन ऐतिहासिक बस्ती का यह आवागमन का साधन रहा होगा। यहां से गंगा और गंगा नदी से पूरे उत्तरापथ से जुड़ा रहा होगा दिघवट।DSC_1124[टीले के पश्चिम में निचली जमीन (झील) का विस्तार। यहां वनस्पति है पर कोई निर्माण नहीं]

डा. रविशंकर जी ने बताया कि उनके शोध कार्य के दौरान ही टीले पर निर्माण का काम हो रहा था और टीले की बहुत सी मिट्टी काट दी गयी थी।

निर्माण और पुरातत्व में छत्तीस का आंकड़ा है। बहुत सी आर्कियालॉजिकल साइट्स निर्माण/विकास और मिट्टी बेचने वाले माफ़िया की बलि चढ़ गयी हैं। मैने दिघवट के टीले पर भ्रमण के दौरान पाया कि यहां से भी बहुत कुछ पुरातन नष्ट हो गया है। टीले पर या तो इमारती निर्माण हुआ है या जमीन समतल करने के लिये बहुत सी मिट्टी गहरे में छील दी है।

DSC_1101 [यह जमीन समतल खेत बनाने के लिये करीब 8 फ़ुट गहरी काट दी गयी है दिघवट के टीले पर।]

टीले पर पता चला कि अस्सी के दशक में यहां एक साधू आये थे – स्वामी प्रवीणानन्द। दक्षिण भारतीय मूल के थे पर हिन्दी बहुत अच्छी बोलते थे। रामकृष्ण मिशन से जुड़े थे। मिशन के अस्पताल चलाने का गहन अनुभव था उन्हें। वे जवान थे, ऊर्जा से भरे हुये। कई देसी-विदेशी भाषाओं के जानकार और वाणी के द्वारा लोगों को प्रभावित करने की जबरदस्त क्षमता थी उनमें। किसी कारण से रामकृष्ण मिशन से उनके मतभेद हो गये थे। वे वहां से अलग हो कर इस क्षेत्र में घूम रहे थे। उनके मन में दृढ़ इच्छा थी कि एक निस्वार्थ सेवा का अस्पताल खड़ा करेंगे।DSC_1138
[टीले पर स्वामी प्रवीणानन्द का चित्र]

प्रवीणानन्द मेरे स्वर्गीय स्वसुर जी के सम्पर्क में आये। उन्होने मेरे स्वसुर जी से कहा कि इलाके के लोगों से उनका सम्पर्क करा दें। उसके बाद उन्हें प्रभावित करना, धन संग्रह करना, जमीन का इन्तजाम करना और अस्पताल खड़ा करना वे कर लेंगे। मेरे स्वसुर जी इलाके के प्रभावशाली व्यक्ति थे। उन्होने इलाके में लोगों से उनका परिचय कराया। बम्बई में भी कई रुसूख वाले लोगों से उन्हें मिलवाया। और बहुत कम समय में दिघवट के टीले की 16 बीघा ग्रामसभा की जमीन का पट्टा उन्होने हासिल कर लिया। अस्पताल भी खड़ा कर लिया। चलने भी लगा।

जुनूनी व्यक्ति थे प्रवीणानन्द जी। लोगों ने बताया कि अस्पताल बनाने के लिये धन एकत्र करने के उपक्रम में उन्होने मुर्गी और सूअर पालन भी किया था। किसी भी कार्य को निषिद्ध नहीं माना उन्होने। 

पर स्वामी जी स्वयम् मधुमेह और हृदय रोग से ग्रस्त हो गये। अपने प्रॉजेक्ट को पूरी तरह पल्लवित नहीं कर पाये। हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गयी। उनके बाद उनके साथी न उतने सक्षम थे, न उनमें लक्ष्य के प्रति ईमानदारी थी। जितनी तेजी अस्पताल और आश्रम खड़ा हुआ, उतनी तेजी से डिसयूज में आ गया।DSC_1099[विवेकानन्द मिशन की इमारत, जिसका साइनबोर्ड भी बदरंग हो गया है।]

लगभग एक घण्टा वहां गुजारने में मुझे बहुत जानकारी नहीं मिल सकी। मोटा मोटा अनुमान हो गया प्रवीणानन्द और अस्पताल के बारे में।

दिघवट के टीले पर अस्पताल है, जिसके साइनबोर्ड की लिखावट धूमिल हो गयी है। एक केयर टेकर दिखे दक्षिण भारतीय। उन्होने बताया कि महराजगंज के कोई डाक्टर (डा. चौरसिया) वहां आते और बैठते हैं। थोड़ा बहुत उपचार ग्रामीणों का होता है। स्वामी प्रवीणानन्द ने डाक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ़ के रहने के लिये एक बड़ी इमारत बनाई थी, उसमें अभी एक स्वयम् सेवी संस्था – एम फॉर सेवा – ने एक हॉस्टल खोला है जिसमें 54 गरीब बच्चे रखे हैं। उनके रहने-खाने और शिक्षा का खर्च और प्रबन्धन यह संस्था करती है। संस्था अपना एक बिल्डिंग वहीं बना रही है। जब बन कर तैयार होगी इमारत, तब वे यह अस्पताल की इमारत खाली कर देंगे।DSC_1114[एम फॉर सेवा – aimforseva.org – के द्वारा चलाये जा रहे हॉस्टल के बच्चों के साथ राजन भाई और मैं]

मुझे यह स्पष्ट नहीं हुआ कि जमीन का प्रबन्धन कैसे हो रहा है। अगर 16 बीघा जमीन प्रवीणानन्द जी के विवेकानन्द मिशन अस्पताल के नाम है तो यह एनजीओ उस जमीन का किस प्रकार उपयोग कर रहा है? पर जो मुझे अच्छा लगा, वह था 54 बच्चों के वहां साफ़-सुथरे वातावरण में रहने और शिक्षा की व्यवस्था हो गयी थी।DSC_1119[एम फॉर सेवा नामक संस्था का बन रहा हॉस्टल]

मैने प्रवीणानन्द जी का रिहायशी स्थान भी देखा। वहां गांव के कोई व्यक्ति इन्तजाम देखते हैं। कोई स्वामी जी हैं जो बनारस में रहते हैं और आते जाते हैं। ट्रस्ट के कर्ताधर्ता वे हैं।

राजन भाई ने टीले के नीचे बसे दिघवट गांव में एक सज्जन श्री सीताराम तिवारी से मिलाया। श्री तिवारी मेरे स्वसुर जी के मित्र थे। इस समय लगभग सेमी-रिटायर्ड जिन्दगी है उनकी कलकत्ता में अपने व्यवसाय से। उनका ह्वाइट-गुड्स का कारोबार है। अब काम लड़के देखते हैं। जैसा बातों से लगा – व्यवसाय पर उनकी पक्की पकड़ है। बड़े ही विनम्र स्वभाव के हैं सीताराम तिवारी जी। जब मुझे पता चला कि मेरे स्वर्गीय स्वसुर जी के भाई सरीखे थे वे; मैने उनका चरण स्पर्श किया।

DSC_1140[श्री सीताराम तिवारी]

सवेरे आज भ्रमण में लगभग ढाई घण्टा लगा। सामान्य से एक घण्टा अधिक। इस भ्रमण में बहुत सी जानकारी मिली और बहुत से प्रश्न भी उठे। आगे कई चक्कर लगेंगे दिघवट के।

दिघवट का अतीत – 2600 साल पहले का मानव जीवन; और आज का इतिहास – प्रवीणानन्द स्वामी का धूमकेतु कि तरह आना और जाना; दोनो ही रोचक हैं। हां, टीले पर वनस्पति भी आकर्षित करती है। कभी डा. रविशंकर के साथ बैठना हुआ तो उसपर भी चर्चा होगी। डा. रविशंकर पुरातत्व के साथ साथ इस विषय में भी गहरे जिज्ञासु हैं और ज्ञानी भी।DSC_1131[दिघवट टीले पर यह वनस्पति, जाने क्या है।]