माताप्रसाद – कड़ेप्रसाद और शीतला माता का मंदिर

नवरात्रि पर्व के पहले दिन मैं तुलापुर गांव में शीतला माता के मन्दिर गया था। यह मन्दिर जीर्णोद्धार कर बनाया गया है। मूर्तियों से लगता है कि सैकड़ों या हजार साल का रहा होगा वह मंदिर। खण्डित मूर्तियां भी रखी हैं वहां।

वैसे यह पूरा इलाका शुंग और कुषाण कालीन अवशेषों से भरा पड़ा है। मेरे पुरातत्ववेत्ता मित्र डा. रविशंकर ने बताया कि यहां पास में गंगा के प्रवाह से एक बैकवाटर की झील थी और उसके किनारे 600बीसीई की बस्ती थी।

DSC_1069<[शीतलामाता के पुराने मन्दिर पर के दीवार पर जड़ी मूर्तियां ऐसी हैं]

पर इसी पुराने मन्दिर के पास लगभग तीस साल पहले का बना शीतला माता का एक नया मन्दिर है – महराजगंज-चौरी की दो लेन की सड़क पर। वहां मिले थे कड़े प्रसाद। उनकी मिठाई की दुकान है। बगल की उन्ही की जमीन पर यह मन्दिर बनाया गया है। उन्ही की जमीन पर मन्दिर और चाय-मिठाई की दुकान – यह बिजनेस का बहुत शानदार मॉडल है। बहुत कुछ वैसा ही जैसे महानगरों में गाय और चारा ले कर बैठा व्यक्ति जिससे चारा खरीद कर उसी की गाय को लोग खिलाते हैं। लोगों की श्रद्धा का व्यवसाय।

आज कड़े प्रसाद और उनके बड़े भाई माता प्रसाद मिले दुकान पर। माता प्रसाद ने ही अधिकांश बात की। कड़े प्रसाद मात्र संपुट दे रहे थे।

DSC_1083[शीतलामाता का माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद की जमीन पर बना नया मन्दिर]

माता प्रसाद ने बताया कि मन्दिर यद्यपि उनकी जमीन पर बना है, पर बनाने में आस पास के लोगों का भी पर्याप्त सहयोग मिला है। हर साल वे गुरुपूर्णिमा पर भण्डारा भी करते हैं। उसमें भी बहुत से लोगों का सहयोग होता है। कड़े प्रसाद ने जोड़ा – भण्डारे में करीब 8-9 क्विण्टल बुन्दिया बनती है। दस हजार लोग खाते होंगे भण्डारे में।

माताप्रसाद की अम्माजी (बकौल उनके) 108 साल की हैं। सत्तर के दशक में जब मन्दिर बना था तो उसमें आग्रह अम्माजी का ही था। शीतला माता ने उन्हें ही सपने में आदेश दिया था मन्दिर बनाने के लिये। वे शीतलामाता की बड़ी भक्त हैं। (बकौल माताप्रसाद) उनके सिर पर माता आती भी थीं और तब अम्माजी ट्रान्स में चली जाया करती थीं। अब तो वे बहुत वृद्ध हो गयी हैं। चला फिरा भी नहीं जाता। अब मन्दिर की पूजा का सारा भार माताप्रसाद के तीसरे भाई जिलाजीत के जिम्मे है।DSC_1142[माताप्रसाद (दांयें) और कड़ेप्रसाद। अपनी दुकान के बाहर]

परिवार का मुख्य उद्यम यह मिठाई/चाय की दुकान है। दुकान माताप्रसाद देखते हैं। कड़े प्रसाद को दुकान पर बैठना नहीं रुचता। वे मिठाई और नमकीन बनाते हैं और गाड़ी से घूम घूम कर बेचते हैं।

दुकान से एक किलो नमकीन मैने खरीदा भी। सस्ता है। 120रु किलो। कड़े प्रसाद ने बताया कि रोफ़ाइण्ड तेल में बना है (पामोलीन में नहीं)। कड़े प्रसाद हमारे गांव में भी आते हैं मिठाई नमकीन बेचते। “लोटन गुरू (गांव के प्रसिद्ध ओझा) के यहां भी आता हूं मैं।”

नवरात्रि व्रत के कारण मैने तो नहीं खाया नमकीन पर घर पर लोगों ने चखकर बताया कि स्वाद अच्छा है।

परिवार के दो लडके अंकलेश्वर (गुजरात) में मिठाई की दुकान खोले हैं। कड़े प्रसाद से मिठाई बनाना सीखा है उन्होने। लोग गुजरात में मेहनत मजदूरी के लिये जाते हैं, पर माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद के बच्चे गुजरात गये हैं बिजनेस करने।

बिल्कुल देसी दिखने वाले भाई हैं। देसी परिवेश। पर उनके बिजनेस सेंस पर तो किसी मैनेजमेण्ट संस्थान में भाषण दिया जा सकता है। मैं तो प्रभावित हो गया उनसे। जहां इस पूर्वांचल में हर व्यक्ति सरकारी नौकरी तलाश रहा है, वहां इस विश्वकर्मा परिवार का मिठाई-नमकीन व्यवसाय बहुत आकर्षक लगा।


Advertisements

आपकी टिप्पणी के लिये खांचा:

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s