विजय बहादुर बिन्द और दिघवट का टीला

विजय बहादुर बिन्द की झोंपड़ी है दिघवट के टीले पर। वह टीला, जिसको सरसरी निगाह से देखने पर भी 2500 साल पहले की सभ्यता के दर्शन हो जाते हैं – पुरानी बिखरी ईटों और मृद्भाण्ड के टुकड़ों के माध्यम से। वह झोंपड़ी तो टीले की ग्राम सभा की जमीन पर है। झोंपड़ी तो यूं ही बना ली है। पास में उनकी चार बिस्से जमीन पर सब्जियां उगाई गयी हैं। उसके आगे करीब डेढ़ बीघा जमीन है – जिसमें दो फसलें लेते हैं विजय बहादुर। जमीन निचली है। फिर भी दो फसलें ले पाते हैं वे।

बकौल मेरे पुरातत्वविद मित्र रविशंकर जी के, वहां  हजारों साल पहले बहुत बड़ी झील हुआ करती थी जब गंगा का विस्तार ज्यादा हुआ करता था और उनके किनारे बहुत सा पानी झीलों के रूप में रुका करता था। यह झील नाले के माध्यम से गंगा नदी से जुड़ी थी। टीले पर रहने वाले पूर्वज झील पर निर्भर थे और नाव के माध्यम से गंगा नदी से जुड़े थे।

विजय बहादुर टीले की प्राचीनता से परिचित हैं पर वे भी (अन्य भदोहियों की तरह) प्राचीनता को भरों से जोड़ते हैं। भर एक जनजातीय समूह था जो इस इलाके में प्रभुत्व रखता था। विकीपेडिया में यह अंश देखें –

४०० साल पूर्व भदोही परगना में भरों का राज्य था, जिसके ड़ीह, कोट, खंडहर आज भी मौजूद हैं। भदोही नगर के अहमदगंज, कजियाता, पचभैया, जमुन्द मुहल्लों के मध्यम में स्थित बाड़ा, कोट मोहल्ले में ही भरों की राजधानी थी। भर जाति का राज्य इस क्षेत्र सहित आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, इलाहाबाद एवं जौनपुर आदि में भी था। गंगा तट पर बसे भदोही राज्य क्षेत्र में सबसे बड़ा राज्य क्षेत्र था। सुरियांवां, गोपीगंज, जंगीगंज, खमरिया, औराई, महाराजगंज, कपसेठी, चौरी, जंघई, बरौट आदि क्षेत्र भदोही राज्य में था। गंगा तट का यह भाग जंगलों की तरह था।

विकीपेडिया भरों को 400 साल पहले से जोड़ रहा है। यह पन्ना तथ्यात्मक रूप से सम्पादन मांगता है। सम्भवत: भर थोड़े समय के लिये इस इलाके पर कब्जा जमाये थे – सम्भवत: हजार साल पहले। पर वे प्राचीनता का प्रतीक तो नहीं ही हैं। हर एक भदोहिया एक गलत जानकारी रखता है अपने इतिहास के बारे में।

DighvatVijayBahadur

विजय बहादुर नें बताया कि कोट (टीले) पर बहुत सम्पदा है। पर वह किसी को नहीं मिलेगी।

मैने पूछा – क्यों?

“वह (प्रेतात्मा) जो मांगती है, वह आदमी के बस में नहीं है दे पाना।”

राजन भाई ने एक्स्प्लीसिट प्रश्न किया – क्या मांगती है? बलि?”

“साधारण बलि नहीं, बहुत अलग तरह की जो आदमी दे नहीं सकता।”

जैसे?

“जैसे तीन टांग की गाय, एक टांग का मुरगा और अपना जेठ लड़का”

विजय बहादुर की यह (बलि और खजाने की) बात मुझे बहुत दकियानूसी लगी। पर यही सब प्रचलित होगा गांव देहात में। इन ग्रामीणों को न तो सही इतिहास की जानकारी है, न ही वे (21वीं सदी में भी) तन्त्र,मन्त्र, बलि आदि की अवधारणाओं से ऊपर उठ पाये हैं। मैं यही आशा करूंगा कि विजय बहादुर या उन जैसे लोग कभी दिग्भ्रमित हो, खजाने की खोज में न लग जायें टीले पर।

मैने बात पलट दी। पूछा टीले पर घणरोज (नीलगाय) हैं?

“कम आते हैं आजकल। पर आने पर फसल बरबाद जरूर करते हैं। उनसे बचाने के लिये ही मड़ई बना कर रहना पड़ता है। उनके अलावा मोर थे, पर अब यहां से चले गये हैं। सांप बहुत हैं। शायद मोर न रहने से बड़ गये हैं।”

चलते समय राजन भाई को कुछ करेले दिये विजय बहादुर ने। मैने चलते चलते कहा – मिलते आता रहूंगा आपसे।


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