कन्दमूल फल, चिलम और गांजा – 2012 की पोस्ट पर री विजिट

… लगता है कि (कम से कम ग्रामीण समाज में) गांजा को एक सीमा तक रिस्पेक्ट प्राप्त है, जो बीड़ी, खैनी या तंबाखू को नहीं…



सत्ताइस जनवरी 2012 को प्रकाशित की थी कन्द मूल बेचने वाले पर पोस्ट. उस पोस्ट पर एक टिप्पणी है – “राजा पिएं गांजा, बीड़ी पिएं चोर. चू** खाएं तंबाखू, थूंके चहूं ओर.” उससे लगता है कि (कम से कम ग्रामीण समाज में) गांजा को एक सीमा तक रिस्पेक्ट प्राप्त है, जो बीड़ी, खैनी या तंबाखू को नहीं मिलती.

गांजा अवैध है पर गंजेड़ी व्यापक हैं. निश्चय ही उन्हें गांजा नित्य प्रति मिलता ही है. और मिलने का माध्यम इतना कठिन नहीं होता होगा, जितना हमें लगता है.

प्रयाग में तो मैंने गंजेड़ी देखे नहीं थे. यह जरूर सुना था कि शिव कुटी के पास गंगा किनारे सुन्दर बगिया में उनका अड्डा जमता है…. पर गांव में आने के बाद चिलम भी देखी और गांजे की पुड़िया भी.

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मोकालू गुरू का चपन्त चलऊआ- पोस्ट पर री विजिट

भूत प्रेत, चुड़ैल, ओझा, सोखा का स्पेस गांव के जीवन में, मोबाइल और स्मार्ट फोन के युग में अभी भी है और उनका महत्व कम नहीं हुआ है.



यह मेरी ब्लॉगिंग के सबसे पुराने समय की पोस्ट है. सन 2007 में लिखी. उस समय भरत लाल मेरा बंगलों पियुन था. अपने गांव के किस्से मुझे सुनाया करता था. उसके किस्सों का भी प्रभाव था कि अंततः रिटायरमेंट के बाद उसी गांव – विक्रमपुर – में मैंने बसने का निर्णय लिया.

नेशनल हाइवे 19 (GT Road) के किनारे है गांव विक्रमपुर

भूत प्रेत, चुड़ैल, ओझा, सोखा का स्पेस गांव के जीवन में, मोबाइल और स्मार्ट फोन के युग में अभी भी है और उनका महत्व कम नहीं हुआ है. शिक्षा, मेडिकल सेवायें और औद्योगिक विकास अभी भी लचर हैं. जब तक वे ऐसे रहेंगे, ऑकल्ट का दबदबा बना रहेगा.

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अपने ब्लॉग, मानसिक हलचल, पर सोच विचार

वैसे मैं ब्लॉग पर ट्रैफिक के आंकड़े देखता हूं तो पाता हूँ कि हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम (?) काल की बजाय आज उसपर आने वालों की संख्या दैनिक आधार पर तिगुनी है. लोग टिप्पणियाँ नहीं (या बहुत कम) कर रहे हैं, पर पढ़ने वाले पहले से ज्यादा हैं.



मेरा हिन्दी का ब्लॉग मानसिक हलचल (halchal.blog) मुख्यतः भारत, अमेरिका, सिंगापुर और कुछ यूरोपीय देशों में पढ़ा जाता है.
हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम दौर में मैं छोटे ब्लॉगिंग दायरे में प्रसन्न था. बाद में मेरे कुछ ब्लॉग मित्र पुस्तक ठेलने में लग गए. मुझे भी बहुत से मित्रों ने कहा कि वह करूँ. अनूप शुक्ल जी तो बहुत कहते रहे, अभी भी कहते हैं, पर वह मैं कर नहीं पाया.

मानसिक हलचल पर पाठक यातायात. आंकड़ा wordpress के App का स्क्रीनशॉट है. जितना गाढ़ा लाल रंग, उतने अधिक पाठक.

मैं भी सोचता था कि ब्लॉग की पुरानी पोस्टों में ही इतना कन्टेन्ट है कि एक दो पूरे आकार की पुस्तकें उसमें से मूर्त रूप ले सकती हैं. कई बार गंभीरता से सोचा भी. पर कुल मिला कर अपने को ब्लॉगर से पुस्तक लेखक के रुप में रूपांतरित नहीं कर पाया. शायद पुस्तक लिखने के बाद उसका प्रकाशक तलाशने और उसकी बिक्री की जद्दोजहद करने का मुझमें माद्दा नहीं था/है. या फिर यह शुद्ध आलस्य ही है.

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अतिवृष्टि की सुबह, अस्पताल में

क्वार महीने का आधा खतम हो रहा है. कल अमावस्या है. कल श्राद्ध पक्ष समाप्त हो जाएगा. परसों नवरात्र प्रारंभ होगा. पर इस समय इतनी तेज बारिश पहले किसी साल हुई हो, याद नहीं पड़ता….



आज रात भर बारिश होती रही. अस्पताल के कमरे में जब भी रात में नींद खुली, और साठ की उम्र पार करने के बाद ब्लैडर की क्षमता कम हो जाने के कारण ज्यादा ही खुलती है, तेज बारिश की आवाज और खिड़की से यदा कदा बिजली की चमक का एहसास होता रहा.

सवेरे उठने के बाद चाय का बहुत इंतजार करना पड़ा. घर में हमारे ड्राइवर साहब नहीं आए थे. घर से वही चाय ले कर आते हैं.

हमारा घर वहां ब्राह्मणों की बस्ती से अलग चमरौटी और पसियान के बीचों-बीच है. अशोक, ड्राइवर साहब ब्राह्मण बस्ती में रहते हैं. बारिश इतनी हो रही थी कि मेरे घर तक आने का साहस और मन ही न बना पाए वे.

बारिश में भीगता अस्पताल का गार्ड.

यहां सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल में ऊपर बरसाती में कैंटीन है. मेरी पत्नीजी वहां भी हो कर आयीं. पता चला कि वहां दूध नहीं आया है. सो चाय नहीं बन सकती. बारिश में अस्पताल के बाहर किसी चाय की दुकान पर भीगते हुए जाने का साहस हममें नहीं था.

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आत्माराम तिवारी की अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में उड़द और गाय की चिंता

अशक्त, कूल्हे की हड्डी जोड़ने का ऑपरेशन कराए एमरजेंसी वार्ड में लेटे चौरासी वर्षीय पंडित आत्माराम तिवारी का मन गांव देहात, घर, उड़द और गाय में घूम रहा है. उन्हें एक बंधुआ श्रोता चाहिए पर लोग पगहा छुड़ा भागते हैं.



कूल्हे की हड्डी टूट गई है आत्माराम तिवारी जी की. उम्र भी चौरासी साल. सूर्या ट्रॉमा सेंटर के एमरजेंसी वार्ड में बिस्तर पर पड़े हैं. मेरे पिताजी के बगल में.

उनके साथ आए लोग तो उनकी उम्र 95 – 96 बताते हैं. पर उम्र इन्फ्लेट कर बताना तो इस इलाके की परम्परा है. वर्ना, उन्होंने खुद ही बताया कि सन 1995 में स्कूल मास्टरी से साठ साल की उम्र में रिटायर हुए थे. यूं चौरासी की उम्र भी कम नहीं होती. पर जो झांकी नब्बे पार का बताने में बनती है, वह ज्यादा सुकून दायक होती है. महिला की उम्र कम और वृद्ध की ज्यादा बताने की परम्परा शायद भारतीय ही नहीं, वैश्विक है.

खैर, उम्र की बात छोड़ आत्माराम जी के वर्तमान की बात की जाए. उनकी कूल्हे की हड्डी टूटी है पर वे पूरी तरह चैतन्य हैं. स्कूल मास्टर रह चुके हैं तो बोलने में उनका हाथ खुला है. पर्याप्त. लगभग अनवरत बोलते हैं.

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24 सितंबर, पुष्य नक्षत्र, स्वर्ण प्राशन

मेरी पोती पद्मजा (चिन्ना) पांड़े ने भी कल पहली बार स्वर्ण प्राशन किया. उसके अनुसार डाक्टर अंकल बहुत अच्छे हैं, कोई सूई नहीं लगाई .



हम यहाँ सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल में हैं, पिताजी के यहां भर्ती होने के कारण.

अंदर ही बंद रहता हूं तो अंदाज नहीं लगता कि मौसम कितना खराब है. गंगाजी की बाढ़ की खबरें मिलती रहती हैं. कल तक तो बाढ़ पर ही थीं. कल ही क्वार मास में पुष्य नक्षत्र का संयोग था. स्वर्ण प्राशन का दिन.

पुष्य नक्षत्र के दिन ही प्राचीन काल में राज वैद राज्य के बच्चों को स्वर्ण भस्म (घी में मिला कर) चटाया करते थे. यह कृत्य 24 बार किया जाता था 16 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों के साथ. स्वर्ण प्राशन का लाभ होता था बच्चे की रोग प्रतिरोध क्षमता और मेधा के विकास में.

यह पुनः प्रारंभ किया है सूर्या चाइल्ड हॉस्पिटल के डाक्टर दंपति शर्मिला और संतोष तिवारी ने. और थोड़े ही समय में 1700 के आसपास बच्चों का इसके लिए पंजीकरण हो गया है.

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