तेरही के अरेंजमेंट के लिए डोसा वाले दूबे जी

कोई दुकान नहीं, कोई इन्वेंट्री नहीं, फिर भी खूब चलता है दूबे जी का बिजनेस. सब मोबाइल फोन का कमाल है.


आज पिताजी के दाह संस्कार के बाद दसवां दिन था.
सिर और दाढ़ी-मूँछ का मुंडन हुआ. मुण्डा मूड़ अजीब लग रहा है.

जिन्दगी में पहली बार मूछें साफ की गई हैं. मूड़ मुण्डा होने पर बदले मौसम में – जब हल्के बादल हैं – सिर ठनक रहा है. एक गमछा लपेटा है ठनक से बचाव के लिए.

मुण्डा मूड़ और गमछा लपेटे मैं


तेरही के इंतजाम के लिए विजय नारायण दुबे जी मिले. डोसा वाले. पहले डोसा का ठेला लगाते थे. अब नोकिया फीचर फोन से अपना केटरिंग बिजनेस चलाते हैं. अच्छे लगे!

मैने पूछा कोई आपका ये फोन गायब कर दे तो आपका बिजनेस तो धक्का खा जाएगा? उन्होंने जवाब दिया कि बड़ा नुकसान होगा. सारा काम मोबाइल से है. अपना कोई दुकान वगैरह नहीं है.

विजय नारायण दुबे जी

कोई दुकान नहीं, कोई इन्वेंट्री नहीं, फिर भी खूब चलता है दूबे जी का बिजनेस. सब मोबाइल फोन का कमाल है.

और लोग कहते हैं कि काम का टोटा है.

दुबे जी के डोसा की मेरी अम्मा (जब जीवित थीं) बड़ी फैन थीं. दूबे जी ने कहा कि मौका पड़ेगा तो हमें भी खिलाएंगे.

फिलहाल तो वे पिताजी की तेरही का इंतजाम करेंगे. उन्हें केटरिंग इंतजाम के लिए बयाना दिया. बयाना की रकम को उन्होंने तीन बार विधिवत सिर से लगाया. लक्ष्मी जी की इज़्ज़त से ही लक्ष्मी जी आती और रहती हैं. यह दूबे जी बख़ूबी जानते हैं.

दूबे जी से आगे भी काम पड़ेगा. अभी तो तेरही है. कभी प्रसन्नता के अवसर पर भी उनकी जरूरत पड़ेगी. ग़म और खुशी, दोनों का रिश्ता भोजन से है.


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अमृतस्य गंगा

आस्था और वास्तविकता के जबरदस्त विरोधाभासों की नदी हैं गंगा. आस्था ही है कि इस रास्ते दस दिनों से पीपल के पेड़ पर घण्ट में जल भर रहा हूँ मैं!



गंगा जीवन दायिनी हैं. गंगा का पानी अमृत है. लेकिन (और यह बहुत बड़ा लेकिन है) गंगा का पानी अब पीते हुए सकुचाते हैं लोग. मैंने खुद भी इस जगह (शिव कुटी में) मुंह भर कर गंगाजल से कुल्ला नहीं किया दशकों से. पीने की बात दूर रही.

गंगा एक दशक पहले आईसीयू में थीं. अब भी शायद हैं वहीं पर. बावजूद इसके कि नमामि गंगे अभियान बहुत सुनने में आता है.

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